उत्तर प्रदेश में दलित, पिछड़ी जातियों और मुस्लिम मतदाताओं ने किसे वोट दिया

बीजेपी

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    • Author, संजय कुमार
    • पदनाम, सह निदेशक, सीएसडीएस

उत्तर प्रदेश में 'इंडिया' गठबंधन ने लोकसभा चुनाव के नतीजों में सबको चौंका दिया.

इस गठबंधन ने अगड़ी जातियों को छोड़कर सभी प्रमुख सामाजिक वर्गों में गहरी पैठ बना ली है.

यूपी में भारतीय जनता पार्टी ने 75 सीटों पर चुनाव लड़ा था और पांच सीटों पर एनडीए के घटक दलों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे.

बीजेपी 75 में से केवल 33 सीटें ही जीत पाई और उसकी सहयोगी पार्टियां राष्ट्रीय लोक दल 2 और अपना दल (सोनेवाल) केवल एक सीट जीत पाई.

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की अगुआई वाले 'इंडिया' गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं.

लोकनीति-सीएसडीएस के पोस्ट पोल सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि सामान्य या अगड़ी जातियों- ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर भाजपा का समर्थन किया, जबकि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाताओं ने 'इंडिया' गठबंधन को प्राथमिकता दी.

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किसने किसे वोट किया?

लोकनीति सीएसडीएस

वोटिंग से पहले कहा जा रहा था कि बीजेपी के प्रति राजपूत मतदाताओं में नाराज़गी है लेकिन सर्वे के आंकड़ों में यह बात नहीं दिखी.

सर्वे में हर दस में से नौ (लगभग 90 फ़ीसद) ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया.

यादव-मुस्लिम मतदाताओं का साथ आना 'इंडिया' गठबंधन के पक्ष में देखा जा सकता है. साथ ही बड़ी संख्या में गैर-जाटव दलित वोट भी 'इंडिया' गठबंधन के साथ आए.

बहुजन समाज पार्टी का अपने कोर वोटर जाटव सहित सभी सामाजिक वर्गों के बीच जनाधार कम हुआ है.

बीएसपी का नुक़सान 'इंडिया' गठबंधन के लिए एक फ़ायदा था क्योंकि बीएसपी का वोट भारी मात्रा में उसके पक्ष में चला गया.

कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से उसे छह सीटें मिलीं.

अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच बेहतर तालमेल का असर ज़मीनी स्तर पर उनके कार्यकर्ताओं तक पहुंचा और यह उनकी सीटों की हिस्सेदारी में भी दिखाई दिया.

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पीडीए के आगे बीजेपी फ़ेल

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बीजेपी अपनी सोशल इंजीनियरिंग के लिए जानी जाती है लेकिन अखिलेश यादव के पीडीए के वैकल्पिक सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले से परास्त हो गई.

अखिलेश अपने बयानों में पीडीए का मतलब बताते हुए कहते थे- पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक.

इसके तहत अखिलेश यादव ने ज़्यादातर टिकट पिछड़े और दलितों को बांटे.

यादवों और मुसलमानों को कम सीटें दीं ताकि एमवाई (मुस्लिम और यादव) पार्टी होने के आरोप का मुक़ाबला किया जा सके.

सपा ने 32 ओबीसी, 16 दलित, 10 ऊंची जाति के उम्मीदवारों और 4 मुसलमानों को टिकट दिए.

संविधान बदलने के बारे में कुछ भाजपा नेताओं के बयानों ने ओबीसी और दलितों के मन में डर पैदा कर दिया था.

उनकी आशंकाएं बीजेपी के 400 से अधिक सीटें जीतने के लक्ष्य से और बढ़ गई थी.

भारतीय जनता पार्टी विपक्ष के इस नैरेटिव का मुक़ाबला नहीं कर पाई कि बीजेपी संविधान बदलना चाहती है और ओबीसी के साथ एससी/एसटी का आरक्षण ख़त्म करना चाहती है.

(लोकनीति-सीएसडीएस की ओर से 191 संसदीय क्षेत्रों में 776 स्थानों पर चुनाव बाद सर्वे कराया गया था. सर्वे का नमूना राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वोटरों की सामाजिक प्रोफ़ाइल का प्रतिनिधि है. सभी सर्वे आमने-सामने साक्षात्कार की स्थिति में, अधिकांश मतदाताओं के घरों पर किए गए.)

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