विधानसभा चुनाव में जीतीं 'आधी आबादी' की सत्ता में कितनी भागीदारी?

महिला वोटर

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी चार राज्यों में सत्ता पर काबिज़ होने के लिए तैयार है. ख़बरें हैं कि बीजेपी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में होली के बाद सरकार बनाएगी तो पंजाब में सभी पार्टियों पर झाड़ू फेर आम आदमी पार्टी ने सत्ता पाई और बुधवार को खटकर कलां में भगवंत मान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली.

इन चुनावों में जहां महिला वोटरों को अहमियत समझते हुए कई राजनीतिक पार्टियों ने वायदे और नारे दिए. वहीं, ये देखा गया कि कई ऐसी महिला उम्मीदवार भी चुनीं गईं जो पहली बार चुनावी मैदान में थीं. इन पांच राज्यों में महिला उम्मीदवारों ने साल 2017 के मुक़ाबले बेहतर प्रदर्शन किया है.

उत्तरप्रदेश

सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो यहां 47 महिलाओं ने चुनाव जीता. ये भी देखा गया कि चुनावों में जहां महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है वहीं पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं का टर्न आउट भी बढ़ा है.

विधानसभा चुनाव में महिलाएं

सीएसडीएस में प्रोफ़ेसर संजय कुमार इस बात को आगे बढ़ाते हुए इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया बताते हैं.

सीएसडीएस सामाजिक विज्ञान और मानविकी पर शोध करने वाली संस्था है.

संजय कुमार के अनुसार, ''महिलाएं ज़्यादा सजग हुईं हैं, गांव-गांव में महिलाएं सोशल मीडिया के ज़रिए चीज़ों को पढ़ती-समझती हैं और चर्चाएं करती हैं. चुनाव में उनकी दिलचस्पी बढ़ी है और उनका झुकाव बीजेपी की ओर दिखाई देता है.''

साथ ही वे कहते हैं, 'पंचायती राज में महिलाओं के आरक्षण ने उन्हें राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने में बड़ी भूमिका निभाई है और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले स्वयं एक उम्मीदवार को चयन करने का फ़ैसला केवल 25-26 फ़ीसद महिलाएं लेती थीं, वो बढ़कर अब 50-55 फ़ीसद तक पहुंच गया है. इसका मतलब ये हुआ कि वे घर के पुरुषों पर निर्भर न रहकर स्वंय फैसला ले रही हैं.'

महिलाओं को किन मुद्दों ने लुभाया

यूपी की महिलाओं से राज्य की समाजवादी पार्टी ने सरकारी नौकरियों में 33 फ़ीसद आरक्षण का वादा किया तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का नारा 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' और महिलाओं को 40 फ़ीसद टिकट देने का एलान महिला सशक्तिकरण के तौर पर देखा गया. दोनों के ही रोड शो और रैलियों में भीड़ भी उमड़ी लेकिन ये सारी कोशिशें महिलाओं को रिझाने में नाकामयाब दिखीं.

संजय कुमार का कहना था, "इन चुनावों में महिलाओं के लिए मुख्यत: क़ानून व्यवस्था और राशन के मुद्दे ने हर जाति में काम किया. साथ ही महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दे पीछे छूट गए और उम्मीदवारों को पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं ने अधिक वोट दिया.''

महिला विधायक

हालांकि, महिलाओं ने वोट तो बढ़ चढ़ कर दिए लेकिन 403 सीटों वाली विधानसभा में केवल 47 महिलाओं का जीतकर आना बड़ा करिश्मा नहीं माना जा सकता.

इन महिलाओं में तीन ऐसी महिलाएं - बेबी रानी मौर्य, डॉ पल्लवी पटेल और महाराजी प्रजापति हैं जिनका नाता राजनीति से प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप में रहा लेकिन ये पहली बार चुनावी मैदान में थीं और चुनीं गईं. लेकिन अब सवाल ये उठ रहा है कि जो महिला प्रत्याशी चुन कर आई हैं उनमें से कितनी कैबिनेट में शामिल की जाएंगी और उन्हें मंत्रालय कौन सा मिलेगा?

पंजाब

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पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे अप्रत्याशित माने जा रहे हैं. यहां का नतीजा एक नए प्रयोग के तौर उभरा हुआ माना जा रहा है क्योंकि लोगों ने पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों को छोड़ आम आदमी पार्टी पर भरोसा दिखाया. यहां भी महिलाओं की समुचित भागीदारी देखी गई.

चुनावी मैदान से यहां 13 महिलाएं जीतकर आईं. इसमें 11 आप से तो एक-एक शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस से जीतीं हैं.

प्रोफ़ेसर मोहम्मद ख़ालिद कहते हैं कि इस चुनाव में आप ने महिलाओं को ज़्यादा टिकटें दीं और वो जीतकर आईं जिसमें से कई पहली बार चुनाव लड़ीं और जीतीं लेकिन अब उनके सामने विधायक की भूमिका में काम करना चुनौती होगी.

महिलाएं

प्रो. मोहम्मद ख़ालिद, पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं.

उनके अनुसार, "आमतौर पर राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को पृष्ठभूमि में ही रखती हैं, चाहें वो टिकट वितरण का मामला हो या जीतकर आने के बाद मंत्रिमंडल में पद देने का सवाल हो. आमतौर पर उन्हें हल्के विभाग दिए जाते हैं."

"हालांकि केंद्र में महिलाओं को बड़ी भूमिका दी गई है जैसे निर्मला सीतामरमण का पद. ऐसे में आप भी सीख ले सकती हैं ताकि महिलाओं को सशक्त किया जा सके."

साथ ही वे कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के वोट की अहमियत तो समझने लगे हैं कि लेकिन बात जब उन्हें प्रतिनिधित्व देने की आती है तो वो पीछे हट जाती हैं जिसकी मिसाल महिला आरक्षण बिल है जो अभी भी अधर में लटका हुआ है.

उत्तराखंड

महिला विधायक

उत्तराखंड में 70 सीटों पर हुए विधानसभा चुनाव में आठ महिलाओं ने बाज़ी मारी. साल 2017 में हुए चुनाव में यहां से पांच महिलाएं जीत कर आईं थीं.

साल 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर इस पहाड़ी और मैदानी राज्य का गठन हुआ था.

राज्य में पुरुषों का पलायन आम बात हैं ऐसे में वहां के सामाजिक ढांचे की बात की जाए तो महिलाएं घर संभालने, सामाजिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ आर्थिक ज़िम्मेदारियां भी निभाती हैं.

उत्तराखंड

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दून यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर राजेंद्र पी मांमगेन के अनुसार "राज्य में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं लेकिन विडंबना ये है कि राजनीतिक पार्टियां उनमें विनबिलिटी फैक्टर या जीतने की क्षमता को नहीं देखती क्योंकि इसमें पैसा भी काम करता है."

उनके अनुसार, "राज्य में पंचायती चुनावों में महिलाओं के लिए पचास फ़ीसद से अधिक आरक्षण का प्रावधान किया गया है, महिलाएं वोट करने में भी आगे आती हैं. शराबबंदी पर मुहिम चला चुकी हैं लेकिन महिलाओं में इच्छा शक्ति भी दिखाई नहीं देती है क्योंकि पार्टियां भी उन्हें बढ़ावा नहीं देती."

ऐसे में महिलाओं में सामाजिक चेतना लाने की ज़रूरत है साथ ही उनमें ये भरोसा दिखाने की ज़रूरत है कि उनमें नेतृत्व की क्षमता है और इसके लिए उन्हें भी पहल करनी होगी.

गोवा

महिला विधायक

40 सीट वाली गोवा भारत की सबसे छोटी विधानसभा है और इसमें महिलाओं की भागादारी भी उतनी ही छोटी है.

साल 1994 में सबसे ज़्यादा चार महिलाएं जीत कर आईं थीं और इस आंकड़े को बदल नहीं पाई हैं.

साल 2017 में जहां दो महिलाएं जीत कर आईं थीं वहीं इस बार तीन महिलाएं जीती हैं.

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 20 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है.

गोवा का चुनाव कवर कर चुके बीबीसी संवाददाता मयूरेश कुन्नूर बताते हैं कि मैदान में 300 उम्मीदवार थे जिसमें से केवल 26 महिलाओं को टिकट दिए गए थे. साथ ही दिलचस्प बात ये रही कि जो तीन महिलाएं चुनाव जीत कर आईं हैं उनके पति भी इस बार चुनावी मैदान में थे और उन्होंने भी जीत हासिल की है यानि तीन जोड़ों ने चुनाव जीता है.

इन दो दंपतियों में दिव्या विश्वजित राणे (परयें) और विश्वजित राणे (वालपई), जेनिफर मोन्सेरात (तालगाव) और अतानासियो मोन्सेरात (पणजी) बीजेपी की टिकट से चुनाव जीते हैं. ऐसे में परिवारवाद की राजनीति न करने का दावा करने वाली बीजेपी ने पति और पत्नी को चुनाव लड़ाना पसंद किया.

पूर्व मंत्री मायकल लोबो (कलंगुट) और उनकी पत्नी डिलायला मायकल लोबो (शिवोली) कांग्रेस की टिकट से चुनाव जीत कर आए हैं. अब देखना ये हैं कि बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी जब सरकार बनाएगी तो इन महिला विधायकों को कैबिनेट में जगह मिलेगी या नहीं.

मणिपुर

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मणिपुर

पूर्वोतर राज्य मणिपुर के समाज को मातृसत्तात्मक समाज कहा जाता है लेकिन राजनीति में अगर आधी आबादी की भागीदारी की बात की जाए तो उसका सूरते हाल अन्य राज्यों से अलग नहीं दिखता.

इस राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले अधिक है और इस विधानसभा के लिए केवल पांच महिलाएं चुनीं गईं हैं. हालांकि यह पिछली बार की तुलना में बेहतर है जब 2017 में केवल दो महिलाओं ने चुनाव जीता था.

पूर्वोत्तर भारत के स्थानीय पत्रकार दिलीप कुमार शर्मा के मुताबिक़, ''राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि पांच महिलाएं चुन कर आईं हैं."

इस बार यहां 17 महिलाएं चुनावी मैदान में थीं जो कुल 265 उम्मीदवारों का महज 6.42 फ़ीसद है. हालांकि, महिला उम्मीदवारों की संख्या अबतक की सबसे ज़्यादा थी.

जानकारों का मानना है कि राज्य की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका के बारे में बात तो होती है लेकिन चुनाव में महिलाओं का नामकंन कम होता है क्योंकि उनकी भूमिका संस्थाओं में ज़्यादा स्वीकारी जाती है.

जानकार मानते हैं कि ज़्यादातर महिलाओं में ये समझ रची बसी है कि राजनीति उनके लिए सही नहीं है लेकिन इस सोच को बदलने की ज़रूरत है. अगर राजनीति में धन-बल के इस्तेमाल की बात होती है तो महिलाओं के सामने उनके सामाजिक कार्य और छवि है. जब राजनीतिक पार्टियां उन्हें एक बड़ा वोट बैंक मान सकती हैं तो वो टिकट वितरण में इतनी कंजूस या पूर्वाग्रहों से ग्रसित/पीड़ित क्यों हो जाती हैं. अगर ये बदलेगा तो मतदाताओं का नज़रिया भी बदलेगा और महिलाएं नीति निर्धारण में ज़्यादा दिखाई देंगी.

वीडियो कैप्शन, गोवा के चुनाव में ममता का दांव क्या गुल खिलाएगा?

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