इन 5 वजहों से समझिए डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में पहुँचने की कहानी

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- Author, एंजेल बरबूडेज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंडो
जनवरी 2021 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस छोड़ा था, तब अमेरिकी सियासत को समझने वाले कई विश्लेषकों का मानना था कि ट्रंप का सियासी करियर खत्म हो गया है.
उनके प्रशासन के दौरान भी रिपब्लिकन नेता ट्रंप की औसत लोकप्रियता रेटिंग महज 41 फ़ीसदी थी.
गैलप पोलिंग फर्म के मुताबिक यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति की सबसे कम रेटिंग थी.
राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल खत्म होने के समय तो लोकप्रियता का ये पैमाना और गिर गया था और ये रेटिंग लुढ़ककर 34 फ़ीसदी पर आ गई थी.

ट्रंप ने साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी हार स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल्स पर उनके समर्थकों ने ट्रंप की छवि को और नुकसान पहुँचाया था.
लेकिन तमाम आंकलन को झुठलाते हुए ट्रंप ने चार साल बाद ज़ोरदार वापसी की और डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस को हराकर एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं.
ट्रंप की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी भी कुछ कम कांटों भरी नहीं थी. उन पर अलग-अलग अदालतों में कई मामले चल रहे थे. उन्हें राहत मिली जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले से, जिसमें न केवल उनके चुनाव लड़ने की राह बनीं, बल्कि उन मामलों में भी सज़ा को निलंबित कर दिया गया, जिनमें अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था.
मई 2024 में मैनहट्टन की एक अदालत ने ट्रंप को 34 बड़े अपराधों का दोषी क़रार दिया. इनमें एडल्ट फिल्मों की स्टार, स्टॉर्मी डेनियल्स को उनका मुंह बंद रखने के एवज़ में दिए गए पैसे का मामला भी शामिल था.
आइए, जानते हैं वो पाँच वजहें जिन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को वापस सत्ता दिलाई.
1. अर्थव्यवस्था

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कोरोना महामारी के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था. जो बाइडन के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में महंगाई ने ऐसा तांडव मचाया कि अमेरिकी जनता परेशान हो गई.
जून 2022 में महंगाई दर 9.1 फ़ीसदी के स्तर पर पहुँच गई थी, जो कि 40 साल में सबसे अधिक थी.
महंगाई को काबू करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक 'फ़ेडरल रिज़र्व' ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना शुरू किया. इसका असर भी दिखा और सितंबर 2024 तक महंगाई दर 2.4 फ़ीसदी के आस-पास पहुँच गई.
हालाँकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर ये भी रहा कि कर्ज़ महंगा हो गया और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार मंद पड़ गई. शायद यही वजह थी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में लोगों ने माना कि अपना वोट देते समय उनके सामने अर्थव्यवस्था मुद्दा बेहद बेहद अहम होगा.
इसमें क़रीब 54 फ़ीसदी लोगों का ये मानना था कि कमला हैरिस के मुक़ाबले इस मुद्दे को ट्रंप बेहतर तरीके से हल कर सकते हैं.
2. वफ़ादार वोटर्स

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ट्रंप की जीत में सबसे प्रमुख योगदान रहा उनके वफ़ादार वोटर्स का. दुनियाभर के विश्लेषक या मीडिया कुछ भी कहें, लेकिन ट्रंप अपने वफ़ादार समर्थकों की ऐसी फौज बनाने में कामयाब रहे, जो हर सूरत में उनके साथ रहे.
ट्रंप के फैन्स 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के उनके नारे से ख़ासे प्रभावित रहे हैं.
इसके अलावा, ट्रंप कुछ उन समुदायों को भी अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब रहे, जो साल 2016 में उनसे दूर थे.
ट्रंप ने काले युवा वर्ग के साथ मुसलमान समुदाय के वोटर्स को भी लुभाया. इनमें से ज़्यादातर ऐसे इलाकों से थे, जहाँ आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं हैं.
3. माइग्रेशन और बॉर्डर

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गैलप के मुताबिक ट्रंप ने आप्रवसान के मुद्दे को प्रमुख चुनावी हथियार बनाया और उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिला.
दक्षिणी सीमा से अमेरिका में ग़ैरक़ानूनी तरीके से प्रवेश करने वालों का मुद्दा अमेरिका में वैसे ही चर्चा में बना हुआ था. बाइडन प्रशासन के शुरुआती तीन साल में अवैध शरणार्थियों का ये आंकड़ा बढ़कर 63 लाख तक पहुँच गया था.
ट्रंप ने डेमोक्रेट उम्मीदवार पर ज़ोरदार हमला बोला और कहा कि डेमोक्रेट सरकार की खुली सीमा नीति के कारण ही इस समस्या ने विकराल रूप लिया है.
अपने चुनावी अभियान के दौरान ट्रंप ने कहा कि वो अमेरिका और मेक्सिको के बीच उस दीवार का निर्माण पूरा करेंगे, जिसका वादा पिछले कार्यकाल में किया था. उन्होंने ये भी कहा है कि वो अमेरिका में बिना दस्तावेज़ के रहने वाले प्रवासियों को वापस भेजेंगे.
4. यूक्रेन और ग़ज़ा में युद्ध

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हालाँकि यूक्रेन या ग़ज़ा में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वहाँ अमेरिका उसी नीति पर चल रहा है जो उसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद 'अमेरिका फर्स्ट' के तौर पर अपनाई है.
डोनाल्ड ट्रंप जब साल 2016 में पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, तब अधिकांश अमेरिकी जनता इराक़ में चल रहे युद्ध से ऊब चुकी थी.
इराक़ के बाद अमेरिकी फ़ौज कथित इस्लामिक स्टेट से जूझने लगी और ऐसा लगने लगा कि अमेरिका कभी न खत्म होने वाली जंग में फंस चुका है. हालाँकि दिलचस्प ये है कि इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में जंग रिपब्लिकन राष्ट्रपति के कार्यकाल में ही शुरू हुई थी.
ट्रंप इस वादे के साथ व्हाइट हाउस पहुँचे कि नई जंग शुरू नहीं करेंगे और उन्होंने इस वादे को पूरा भी किया. इसके बाद वो खुद को युद्ध विरोधी उम्मीदवार के तौर पर पेश करने में कामयाब रहे.
ट्रंप को अमेरिका के उन वोटर्स का भी साथ मिला जिनका मानना था कि रूस के ख़िलाफ़ जंग में अमेरिका यूक्रेन की कुछ ज़्यादा ही मदद कर रहा है. ट्रंप ने वादा किया कि अगर वो फिर राष्ट्रपति बनते हैं तो 24 घंटे में रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करवा देंगे.
चुनावी अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने ये भी कहा कि वो ग़ज़ा में जंग ख़त्म कर देंगे, हालाँकि उन्होंने ये नहीं बताया कि 'कैसे'? लेकिन लगता है कि मतदाताओं ने उनके इस वादे पर यकीन किया है.
5. डेमोक्रेट प्रत्याशी बदलने का फ़ायदा

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डोनाल्ड ट्रंप को डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति प्रत्याशी में बदलाव का भी फायदा मिला है. अपने चुनावी अभियान में पहले उन्होंने जो बाइडन पर निशाना साधा.
जून में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच बहस के दौरान बाइडन मजबूती से अपना पक्ष रखने में नाकाम रहे साथ ही उनकी सेहत को लेकर भी सवाल उठे. हालाँकि लगातार गिर रही लोकप्रियता के कारण बाइडन को अपनी उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी.
कमला हैरिस चुनाव अभियान के दौरान ख़ुद को बाइडन की नीतियों से अलग नहीं रख सकीं, ख़ासकर उन्हें महंगाई और ख़राब अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर मतदाताओं की नाराज़गी का सामना करना पड़ा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















