कितना वेतन चाहिए, आवेदन में ये जानकारी देना कितना सही है?

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अमेरिका में रहने वाली मैरी (बदला हुआ नाम) ने अक्टूबर में एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में निकली नौकरी के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था. वह योग्य उम्मीदवार के लिए बताई गई सभी ज़रूरतों को पूरा करती थीं.
कंपनी ने आवेदन मंगवाते समय यह भी बताया था कि इस पद के लिए वह कितना वेतन देने वाली है. इसमें न्यूनतम से अधिकतम वेतन की एक रेंज या सीमा बताई गई थी.
मैरी ने बीबीसी वर्कलाइफ़ की एमिली मैकक्रैरी-रुइज़-एस्पार्ज़ा को बताया कि उन्होंने आवेदन करते समय अधिकतम सीमा के आसपास का वेतन मांगा था, लेकिन आवेदन करने के 24 घंटों के अंदर ही ईमेल आ गया कि उनका आवेदन ‘रिजेक्ट’ यानी ख़ारिज कर दिया गया है.
बाद में मैरी को उसी कंपनी में नियुक्तियां करने वाले विभाग में कार्यरत अपने किसी जानने वाले से एक बात पता चली.
मैरी को बताया गया कि जो वेतन उन्होंने मांगा था, वह बहुत ज़्यादा था. कंपनी अधिकतम सीमा के आसपास वेतन मांगने वालों के बजाय कम वेतन चाहने वालों को नौकरी देना चाहती थी. इसके लिए कंपनी ने एक एल्गॉरिदम बनाया था, जो मैरी की तरह ज़्यादा वेतन मांगने वालों का आवेदन सीधे ही ख़ारिज कर देता था.
क्या धोखा दे रही हैं कंपनियां?

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नोएडा में रह रहे कॉन्टेंट राइटर पवन कुमार का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा है. उन्होंने बीबीसी सहयोगी आदर्श राठौर को बताया कि पिछले कुछ समय से वह लगातार कई कंपनियों के लिए आवेदन कर चुके हैं और कई बार तो तुरंत ही उनका आवेदन रिजेक्ट कर दिया गया.
वह बताते हैं, "शुरू में मुझे समझ नहीं आया कि सारी योग्यताएं पूरी करने के बावजूद ऐसा कैसे हो रहा है कि टेस्ट या इंटरव्यू के लिए बुलाने से पहले ही रिजेक्ट कर दिया जा रहा है. बाद में मैंने ध्यान दिया कि शायद ऐसा मेरी सैलरी एक्सपेक्टेशन (अपेक्षित वेतन) के कारण हो रहा है."
पवन ने कहा, "लिंक्डइन पर एक कॉन्टेंट कंपनी में निकली वैकेंसी में वेतन की सीमा 6 से 10 लाख रुपए सालाना लिखी हुई थी. जब मैंने 10 लाख रुपए मांगे तो मेरा आवेदन रिजेक्ट हो गया. लेकिन, एक महीने बाद मैंने उसी कंपनी में उसी पद के लिए निकली वेकेंसी के लिए आवेदन करते समय आठ लाख मांगे तो मुझे टेस्ट के लिए फ़ोन आ गया."
पवन कहते हैं कि उनकी फ़ील्ड में काम करने वाले कई लोगों के साथ ऐसा हुआ है.
वह हैरानी जताते हैं कि जब इतना वेतन देना ही नहीं होता तो ये कंपनियां ऐसा लिखती क्यों हैं.

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ऑटोमेशन सॉफ़्टवेयर कंपनी ज़ैपियर में रिक्रूटिंग मैनेजर बोनी डिल्बर बीबीसी वर्कलाइफ़ से कहती हैं कि कंपनियां वेतन की सीमा बताकर किसी तरह की धोखाधड़ी नहीं कर रहीं, बल्कि कर्मचारी ही किसी नौकरी की ‘सैलरी रेंज’ का मतलब नहीं समझ पा रहे हैं.
वह कहती हैं, "अगर किसी नौकरी में वेतन की रेंज 70 हज़ार डॉलर से 1 लाख डॉलर लिखी है तो उस पद पर जॉइन करने वाले को 85 हज़ार डॉलर दिए जा सकते हैं, लेकिन उस भूमिका में रहते हुए वह बोनस और वेतनवृद्धि पाकर एक लाख डॉलर तक कमा सकता है."
डिल्बर कहती हैं, "अधिकतम वेतन की रेंज 1 लाख बताने का मतलब यह नहीं है कि कंपनी किसी नए कर्मचारी को आते ही एक लाख दे देगी. इसका मतलब है कि जिस पद के लिए आप आवेदन कर रहे हैं, उस पद पर रहते हुए आप अधिकतम एक लाख तक वेतन ले पाएंगे."
वह कहती हैं कि ज्यादातर कंपनियां इस रेंज के बीच भर्तियां करना चाहती हैं, ताकि कर्मचारी का वेतन बढ़ाने की गुंजाइश बनी रहे. सभी उस रेंज के शीर्ष पर नहीं पहुंच सकते, सिर्फ़ अच्छा प्रदर्शन करने वालों को ही उच्चतम वेतन मिलेगा.
वेतन की रेंज को लेकर बन रहे क़ानून

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बीबीसी वर्कलाइफ़ पर छपे लेख के अनुसार, ''अमेरिका के सात राज्यों में 2020 के बाद से ऐसे क़ानून बनाए गए हैं, जिनके ज़रिए वेतन को लेकर पारदर्शिता लाने की कोशिश की गई है."
इन क़ानूनों के तहत कंपनियों के लिए भर्ती करते समय यह बताना आवश्यक हो गया है कि उस पद के लिए वे किस रेंज में वेतन देने वाली हैं. ऐसा करने का मक़सद यह है कि कंपनियां वेतन को लेकर लोगों से भेदभाव न करें.
एक तरह से देखा जाए तो इससे नौकरी तलाशने वालों को सुविधा होती है. उन्हें पता होता है कि उस पद के लिए उन्हें कितना वेतन दिया जाने वाला है, ऐसे में वे टेस्ट या इंटरव्यू जैसी प्रकियाओं के बाद वेतन को लेकर बात न बनने के कारण समय बर्बाद होने से बच जाते हैं.
लेकिन इन क़ानूनों के कारण कंपनियां और नौकरी देने वाले संगठन असहज हैं.
बीबीसी वर्कलाइफ़ पर छपे लेख के अनुसार, नौकरी तलाशने में मदद करने वाले प्लेटफ़ॉर्म ‘ज़िपरिक्रूटर’ ने एक सर्वे में पाया था कि "44 प्रतिशत नियोक्ताओं को लगता है कि अगर वे भर्ती करते समय पद के साथ वेतन की रेंज बता देंगे तो उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां उससे भी ज़्यादा वेतन का प्रस्ताव देकर उम्मीदवारों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं."
साथ ही, कंपनियों को यह भी लगता है कि इससे उन्हें सही शुरुआती वेतन देने को लेकर मोलभाव करने में भी दिक्कत आती है.
ऐसे में कंपनियां इन क़ानूनों की भाषा की कमियों का फ़ायदा उठाकर कुछ भी सैलरी रेंज बता देती हैं और बाद में अपने हिसाब से ही वेतन देती हैं. अगर ज़्यादा वेतन चाहने वाला कोई उम्मीदवार एल्गॉरिदम से बच भी जाए, तो उसे इंटरव्यू में कम वेतन ऑफ़र किया जाता है.

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अस्पष्टता और भ्रम
वॉशिंगटन डीसी में अपनी रिक्रूटमेंट कंसल्टेंसी चलाने वालीं पूर्व कॉर्पोरेट रिक्रूटर कर्स्टन ग्रेग्स ने बीबीसी वर्कलाइफ़ से कहा कि ख़ाली पद के विज्ञापन में इस तरह से रेंज बताने का तरीक़ा स्पष्ट नहीं है. ख़ासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें भर्ती प्रक्रिया के बारे में पता नहीं होता. इसी कारण वे वेतन को लेकर दी जा रही जानकारियों को लेकर भ्रम में रहते हैं.
ग्रेग्स के मुताबिक़, "कुछ कंपनियां अपने विज्ञापनों में वेतन की ऐसी रेंज बता रही हैं, जो सिर्फ कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने को लेकर हैं. उनका कहना है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है."
कर्स्टन ग्रेग्स कहती हैं, "पे रेंज में बिना स्पष्ट किए ‘फ़ुल पे स्केल’ लिस्ट करना आसान तो है ही, ज़्यादा वेतन दिखने के कारण नौकरी काफ़ी आकर्षक भी हो जाती है. इस भ्रम को ख़त्म करने का साधारण सा हल है- वही रेंज डालिए, जिस वेतन में कंपनी वाकई किसी को नौकरी पर रखना चाहती है."
किसी भी नौकरी के लिए ‘हायरिंग रेंज’ और ‘फ़ुल पे स्केल’ दो अलग चीज़ें हैं. हायरिंग रेंज का मतलब है कि भर्ती किए जाने वाले नए कर्मचारियों को न्यूनतम से अधिकतम कितना वेतन दिया जा सकता है, वहीं फ़ुल पे स्केल का मतलब है कि उस पद पर रहते हुए कोई कर्मचारी अधिकतम कितना वेतन पा सकता है.
क्या है रास्ता

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चंडीगढ़ में एक सॉफ़्टवेयर कंपनी के एचआर विभाग में कार्यरत नवीन ठाकुर बताते हैं कि जॉब लिस्टिंग में ज़्यादा वेतन हो और कम वेतन पर हायरिंग हो तो इसमें ज़रूरी नहीं कि हमेशा गड़बड़ हो.
वह कहते हैं, "इसमें निराश होने की कोई बात नहीं है. बहुत सी फील्ड्स ऐसी हैं जहां पर अनुभव के बजाय स्किल को तरजीह दी जाती है. ऐसे में, कई बार बहुत बार कम वेतन चाहने वाला कम अनुभवी उम्मीदवार प्रतिभा के दम पर बाक़ी उम्मीदवारों पर हावी हो जाता है. बहुत बार तो बताई गई रेंज से ज़्यादा सैलरी पर भी नौकरी दी जाती है."
ज़ैपियर की बोनी डिल्बर कहती हैं कि किसी नौकरी के लिए आवेदन करते समय वह ‘हायरिंग रेंज’ ही नहीं, बल्कि ‘फ़ुल पे स्केल’ के बारे में जानना चाहेंगी. वह कहती हैं कि कंपनियों और अन्य नियोक्ताओं को भी इस मामले में स्पष्टता अपनानी चाहिए.
उनके अनुसार, "अगर आप नौकरी के लिए आवेदन मंगवाते समय हायरिंग रेंज के बजाय फ़ुल पे स्केल की जानकारी दे रहे हैं तो इसका स्पष्ट तौर पर ज़िक्र करें.”
वह कहती हैं, “अगर मुझे नौकरी लेनी है तो बताई गई रेंज के टॉप के आसपास वेतन मे नौकरी नहीं लूंगी, क्योंकि उसके बाद तो मेरे पास ग्रोथ के लिए कोई जगह ही नहीं होगी."
कुछ ऐसी ही रणनीति अब पवन भी अपना रहे हैं.
वह हंसते हुए कहते हैं, "अब मैं उसी वेकेंसी के लिए एप्लाई करता हूं, जिसमें मेरी एक्सपेक्टेड सैलरी निचली रेंज में आती है. जैसे मैं 10 लाख चाहता हूं तो 6 से 10 लाख वाली जॉब के बजाय 8 से 12 लाख की रेंज के लिए आवेदन करना पसंद करूंगा."
वहीं, मैरी का कहना है कि वह भी शुरुआती आवेदन में स्पष्ट रूप से नही बतातीं कि उन्हें कितना वेतन चाहिए.
बीबीसी वर्कलाइफ़ को वह बताती हैं कि वह रेंज के बीच से कुछ मांगती हैं ताकि तुरंत ही उनका आवेदन खारिज न कर दिया जाए.
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