क्या महिलाएं लोगों के सामने सवाल पूछने से कतराती हैं ?

क्या महिलाएं पब्लिक में सवाल पूछने से कतराती हैं?

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    • Author, अंजलि दास
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

"मैं सालों से दर्जनों रेडियो शो करती आई हूं साथ ही लाइव ऑडियंस के सामने सैकड़ों पब्लिक इवेंट किए हैं."

"ऐसे किसी भी सेशन में लोग सवाल भी पूछते हैं. वहां मैं लोगों को इतना आरामदेह महसूस कराती हूं जिससे कि उस दौरान वो सवाल पूछें. पर सवाल पूछने के लिए जब भी हाथ उठते हैं उनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले कम होती है."

"कभी कभी हो सकता है कि महिलाओं के पास पूछने के लिए सवाल ही कम हों. ठीक है ये हो सकता है. लेकिन हाथ उठाने के बाद भी कई बार वो अपनी बारी आने से पहले ही उसे नीचे कर लेती हैं. उनमें से कइयों ने बताया कि वो सवाल पूछना तो चाहती थीं लेकिन ये सोच कर कि उनका सवाल उतना बेहतर नहीं है, चुप रह गईं."

ये कहना है ब्रिटेन की लेखिका क्लाउडिया हैमंड का.

वे कहती हैं, "सालों के इस अनुभव से मैं आंकड़े देखने के लिए बाध्य हुई. इस विषय पर अधिकतर शोध अकादमिक सम्मेलनों में लोगों की मौजूदगी और उनके पूछे जाने वाले सवालों को देखते हुए किए गए हैं. मेरा अनुभव भी इससे अलग नहीं है."

क्या महिलाएं पब्लिक में सवाल पूछने से कतराती हैं?

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शोध क्या कहते हैं?

बर्कले स्थित कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की शोशना जारविस ने साल 2022 में शोध किया. ये शोध एक सम्मेलन पर आधारित था जिसमें जीव विज्ञानी, अर्थशास्त्री और खगोलविद शामिल थे.

इसमें शोशना जारविस ने देखा कि सम्मेलन में किसने, कितने सवाल पूछे. यानी इसमें शामिल हुईं महिलाओं और पुरुषों ने किस अनुपात में सवाल पूछे.

सम्मेलन में लोगों को सीट से उठकर कतार में लग कर माइक्रोफ़ोन पर सवाल पूछना था.

सम्मेलन में 63 फ़ीसद पुरुष मौजूद थे और बाकी महिलाएं. लेकिन पुरुषों ने 78 फ़ीसद सवाल पूछे और महिलाओं ने केवल 22 प्रतिशत. जबकि ये अनुपात उनकी मौजूदगी के अनुपात में होना चाहिए था.

ऐसे ही नतीजे यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की एलिसिया कार्टर ने भी अपने शोध में पाया. एलिसिया ने यह शोध 10 देशों में आयोजित हुए 250 अकादमिक सेमिनारों के दौरान किया.

इसमें उन्होंने पाया कि इन सम्मेलनों में एक चौथाई महिलाओं ने सवाल पूछे जबकि उनकी मौजूदगी पुरुषों के बराबर थी.

जारविस ने पाया कि महिलाओं को सवाल पूछने में अधिक बेचैनी होती है.

मोरोमी दत्ता

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क्या भारत में महिलाएं सवाल पूछने में सहज हैं?

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लेकिन भारत में भी क्या यही स्थिति है?

दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर मोरोमी दत्ता कहती हैं, "भारत में सेमिनार में महिलाओं की मौजूदगी तो होती है लेकिन उनकी तरफ से सवाल कम ही पूछे जाते हैं."

अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में बतौर वक्ता शामिल होने वालीं मोरोमी दत्ता कहती हैं, "हो सकता है कि ये मुझे अनुभव हुआ हो लेकिन भारत की तुलना में अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में महिलाएं न केवल अधिक संख्या में शामिल होती हैं बल्कि सवाल भी ज़्यादा पूछती हैं."

सवाल पूछने के मामले में भारतीय महिलाओं की हिचक को लेकर वे कहती हैं कि हो सकता है कि इसके पीछे उनका परिवेश, घर का माहौल या काम का बोझ वजह हो.

बातचीत के दौरान मोरोमी दत्ता एक अहम सवाल उठाती हैं, "आप पिछले कई सालों के रिज़ल्ट्स उठा कर देखें तो दसवीं या बारहवीं की परीक्षाओं में महिलाएं अव्वल आती रही हैं. इसके बावजूद जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूं वहां भी अभी महिलाओं की संख्या उतनी नहीं बढ़ी है."

वे यह भी कहती हैं कि डीयू में ही रिसर्च स्कॉलर लड़कों के मुक़ाबले लड़कियां आज भी बहुत कम हैं.

वहीं हाल ही में युवा महिलाओं में स्वास्थ्य समस्याओं पर आयोजित सेमिनार में बतौर वक़्ता शामिल हुए विमलोक तिवारी अपना अनुभव इसके उलट बताते हैं.

वे कहते हैं, "जिन सेमिनारों में महिलाएं और पुरुष दोनों मौजूद होते हैं उनमें महिलाएं अधिक सवाल पूछते दिखी हैं. अगर अनुपात की बात करें तो सेमिनारों में 60 से 70 फ़ीसद तक महिलाएं सवाल पूछती हैं."

विमलोक तिवारी

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विमलोक तिवारी दिल्ली यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ अफ़्रीकन स्टडीज़ में रिसर्च स्कॉलर हैं.

फ़ुटप्रिंट ऑफ़ वूमन इन मेकिंग भारत, वूमन इन डेवलपमेंट, इंडिक पर्सपेक्टिव ऑफ़ फ़ॉरेन पॉलिसी, आज के दौर में गांधी और अफ़्रीका के साथ भारत के संबंध जैसे सेमिनारों में बतौर वक़्ता शामिल हो चुके विमलोक तिवारी कहते हैं, "जिन सेमिनारों में दोनों तरह के जेंडर मौजूद होते हैं वहां पर सवाल पूछने वालों में महिलाएं भी खूब होती हैं लेकिन अधिकांश महिलाएं जेनरिक सवाल पूछती हैं, वहीं पुरुष पलट कर ज़्यादा सवाल पूछते हैं."

हालांकि वे यह भी कहते हैं, "विभागीय स्तर के छोटे सेमिनारों में महिलाओं की भागीदारी और उनकी ओर से पूछे जाने वाले सवाल कम होते हैं. हाल ही में 'मंडेला और गांधी' पर हुए एक सेमिनार में हमने 20 लोगों को सवाल पूछने का मौक़ा दिया. वहां केवल तीन महिलाओं ने सवाल पूछे."

विमलोक कहते हैं, "महिलाओं के अंदर हिचक होती है कि लोग उनके सवालों को जज करेंगे. इसके पीछे पारिवारिक और सामाजिक कारण भी हैं."

वे रिसर्च के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व अधिक होने की वजह भी गिनाते हैं.

क्या करें कि महिलाएं सवाल पूछें

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क्या करें कि महिलाएं सवाल पूछें?

तो आखिर क्या किया जा सकता है कि महिलाएं सवाल पूछे. कैसे उन्हें बढ़ावा दिया जा सकता है.

मोरोमी इस सवाल के जवाब में कोविड के दौर को याद करती हैं.

वे कहती हैं, "कोविड के दौरान आयोजित ऑनलाइन सेमिनारों में महिलाएं अधिक सवाल पूछती थीं. संभव है कि तब उनकी पहचान छिपी होती थी और इसकी वजह से वो सवाल पूछने में सहज होती थीं."

मोरोमी कहती हैं, "जब सेमिनार के आयोजकों को मजबूरी में ऑनलाइन जाना पड़ा तो बग़ैर एक शब्द बोले ही लोगों को सवाल पूछने का नया अवसर मिला. तब वो चैट बॉक्स में टाइप करके या बग़ैर नाम बताए ही सवाल पूछा करती थीं. वहां किसी भी तरह की झिझक नहीं होती थी."

क्या महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर सवाल कम पूछती हैं?

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पर शोध में क्या मिला?

बायोमेडिकल अनुसंधान के मशहूर केंद्र इंस्टिट्यूट पाश्चर में शोधकर्ता जुल्हान्लु झांग को इसके विपरीत अनुभव मिले.

उन्होंने 2021 में बायोइन्फ़ॉरमैटिक्स पर ऑनलाइन आयोजित सेमिनार में पुरुषों और महिलाओं के पूछे सवालों की गिनती की.

ऑनलाइन होने से पहले तक इस तरह के सेमिनारों में पुरुषों की संख्या ज़्यादा हुआ करती थी. लेकिन जब यह सम्मेलन ऑनलाइन आयोजित किया गया तो उसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर हो गई. फिर भी वहां पुरुषों ने 115 सवाल पूछे जबकि महिलाओं ने 57 सवाल पूछे.

वे यह भी कहती हैं कि ऐसे सेमिनारों में महिलाओं की तुलना में वरिष्ठ स्तर के पुरुष कहीं अधिक सवाल पूछते हैं.

एक शोध में यह पाया गया कि अगर मॉडरेटर या सम्मेलन का अध्यक्ष पुरुष है तो उसका भी प्रभाव पड़ता है. लेकिन झांग के शोध में सेमिनार किसकी अध्यक्षता में हो रहा है इससे महिलाओं के सवाल पूछने में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन वो कहती हैं कि मॉडरेटर की रणनीति से इसमें फ़र्क़ ज़रूर आ सकता है.

महिलाओं के सवाल की संभावना कम क्यों?

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महिलाओं के सवाल की संभावना कम क्यों?

शोधकर्ताओं ने अमेरिका में आयोजित एक बड़े मनोविज्ञान सम्मेलन में भाग लेने वाले 234 रिसर्च स्कॉलर का सर्वे किया.

इस सम्मेलन में भाग लेने वालों में 61% महिलाएं थीं.

उनसे पूछा गया कि इस सम्मेलन में और आम तौर पर अन्य सम्मेलनों में सवाल पूछने, अपनी राय शेयर करने और वक़्ताओं से संपर्क करने में वो कितने सहज थे.

उनमें से कइयों ने बताया कि वो सवाल पूछने और उस पर तीखी प्रतिक्रिया मिलने से कितना डरती थीं और ऐसा सोच कर कई बार सवाल पूछने को टाल देती थीं.

शोधकर्ताओं का मानना है कि महिलाएं सवाल पूछने और अपना नज़रिया ज़ाहिर करने में ख़ुद को असहज पाती हैं क्योंकि ज़्यादातर को सवाल पूछे जाने के बाद मिलने वाली तीखी प्रतिक्रिया की चिंता होती है.

महिलाओं के सवाल न पूछने के और भी अलग अलग कारण होते हैं. जैसे- किसी पिछले सम्मेलन का अनुभव जहां उस महिला की राय को कमतर आंका गया हो या नज़रअंदाज किया गया हो, या उन्होंने ऐसे सम्मेलनों में भाग लिया हो जहां महिलाओं को कम प्रतिनिधित्व दिया गया हो.

ऐसे कारणों को अच्छे से समझ कर ही सम्मेलन के आयोजनकर्ता महिलाओं की समान भागीदारी की बाधाओं को दूर करने में सक्षम हो सकते हैं.

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