कुछ आवाज़ों से क्यों चिढ़ होती है?

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- Author, अंजलि दास
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
मेट्रो, बस या ऑटो में जाते हुए आपने कई बार लोगों को हेडफ़ोन लगाए देखा होगा.
ज़ाहिर है इसमें कोई नई बात भी नहीं है क्योंकि वो अपनी मर्ज़ी से हेडफ़ोन लगाना पसंद करते हैं लेकिन क्या ऐसा करना किसी के लिए मजबूरी हो सकता है.
28 साल की मार्गोट नोएल के लिए हेडफ़ोन लगाना एक मजबूरी है और वो ऐसा अपने आप को बचाने के लिए करती हैं.
मार्गोट नोएल को मिसोफ़ोनिया है. साधारण भाषा में समझे तो ये एक ऐसा डिसऑर्डर है, जिसमें सामान्य लगने वाली आवाज़ें भी इससे पीड़ित व्यक्ति को चिड़चिड़ा कर देती हैं.
ऐसे में वो या तो ग़ुस्सा करने लगते हैं या नाराज़ हो जाते हैं, वे डर जाते हैं या उन्हें पैनिक अटैक भी आ सकता है.
इससे पीड़ित व्यक्ति जब ऐसी आवाज़ें सुनते हैं तो उनके मस्तिष्क में इंद्रियों को संवेदनाओं से जोड़ने वाला हिस्सा बहुत अधिक सक्रिय हो जाता है.
क्या आपने ये भी कभी सुना है कि कोई व्यक्ति अपने आस पास किसी के सांस लेने, खुजलाने, खाना चबाने, खरोंचने, पेन टैप करने जैसी कम आवाज़ से भी चिड़चिड़ा हो कर ग़ुस्सा हो जाता है?
ऐसे लोग एक डिसऑर्डर से पीड़ित हैं, जिसे मिसोफ़ोनिया कहते हैं.

मिसोफ़ोनिया है क्या?
अक्सर मिसोफ़ोनिया को ग़ुस्सा, चिंता और घृणा से जोड़ा जाता है.
मिसोफ़ोनिया नर्वस सिस्टम का एक डिसऑर्डर है. इसे बोलचाल की भाषा में आवाज़ या शोर से नफ़रत कह सकते हैं.
मिसोफ़ोनिया वो डिसऑर्डर है, जिसमें कुछ ख़ास आवाज़ों और उनसे संबंधित चीज़ों के प्रति आपकी सहनशीलता कम हो जाती है. इसे लेकर आप ग़ुस्सा करने लगते हैं, आपको घबराहट होने लगती है.
एक सेकेंड के हज़ारवें हिस्से से भी कम समय में ये आवाज़ें आपके दिमाग़ को ग़लत संकेत देती हैं.
ये आवाज़ें एक ख़तरे के रूप में आपके दिमाग़ के अलार्म सिस्टम अमिग्डला (Amygdala) को जगा देती हैं.
इसके साथ ही एड्रिनल ग्रंथि और कॉर्टिसोल हार्मोन प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार हो जाते हैं.
ये आवाज़ें एक आम व्यक्ति के लिए कहीं से भी ख़तरा नहीं होतीं.
हमें ये नहीं पता कि मिसोफ़ोनिया के डिसऑर्डर से कितने बच्चे, युवा, बुज़ुर्ग प्रभावित हैं लेकिन ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी), टिनिटस (कान में अजीब सी आवाज़ का अनुभव होना), हायपरएक्यूसिस (सामान्य आवाज़ भी बहुत तेज़ सुनाई देना), ऑटिज़्म ) और सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर या एसपीडी से प्रभावित लोगों में इस समस्या का होना बहुत आम है.
ये होता क्यों है, ये स्पष्ट आज भी नहीं है. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि ये मस्तिष्क या मनोविकार से जुड़ा हो सकता है.
किंग कॉलेज लंदन और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने नए अध्ययन में पाया कि ब्रिटेन में 18.4% आबादी में यह लक्षण देखने को मिला.
यानी लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति को किसी अन्य के आवाज़ कर के खाने, च्युइंगम चबाने और खर्राटे की आवाज़ें ट्रिगर करती हैं.
लेखिका डॉ. सिलिया वीटोरतौ कहती हैं, "अक़्सर मिसोफ़ोनिया के रोगी ख़ुद को अकेला महसूस करते हैं पर हक़ीक़त में ऐसा नहीं है. यह एक ऐसी चीज़ है, जिसे हमें जानने के साथ ही तालमेल बैठाने की ज़रूरत है.
मिसोफ़ोनिया का रोज़मर्रा के जीवन पर प्रभाव

केंट की ओलाना टैंसली हैनकॉक कहती हैं कि उन्हें मिसोफ़ोनिया के लक्षण 8 साल की उम्र से हैं.
वे बताती हैं, "मुझे सांस लेने की आवाज़, खाने या सूखे पत्ते की आवाज़ या क़ाग़ज से निकलने वाली आवाज़ें ट्रिगर करती हैं."
ओलाना कहती हैं, जैसे ही ये आवाज़ें मुझे सुनाई पड़ती हैं मैं या तो तुरंत उन्हें रोकना चाहती हूं या वहां से दूर हटना चाहती हूं. मैंने लंबे समय तक सिनेमा जैसी जगहों से परहेज किया. मैंने केवल तीन महीने में जॉब छोड़ दी. लेकिन धीरे धीरे इससे कैसे निपटा जाए ये मुझे समझ में आया और मैंने इयरप्लग लगाना शुरू किया."
जानकार क्या कहते हैं?
जानकार बताते हैं कि मिसोफ़ोनिया का आपके रिश्ते और लोगों से मेलजोल पर गहरा असर पड़ता है.
जिन बच्चों में इसके लक्षण पाए जाते हैं, उन्हें स्कूल में पढ़ाई के दौरान उनके व्यवहार पर पड़ता देखा गया है और वो स्कूल जाने से कतराते हैं.
ऐसी स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति के साथ समय बिताना एक चुनौती होती है. वो सामने वाले व्यक्ति से निकली इन आवाज़ों को सहन नहीं कर पाते. जब इसे वो सामने वाले व्यक्ति को इसे बताते हैं जो पूरी तरह से इस मामले से अनजान होता है और इसे समझ नहीं पाता.
ऐसे में जो व्यक्ति इस समस्या से जुझ रहा होता है, उसका दूसरे व्यक्ति से मनमुटाव या बहस तक हो जाती है.
ऐसा ही एक मामला अदील अहमद अमेरिका में मिसोफ़ोनिया-थीम वाले पॉडकास्ट के होस्ट के साथ देखने को मिला. उन्हें भी मिसोफ़ोनिया की समस्या है.
बीबीसी से वे कहते हैं, "कभी-कभी हम ऐसे मोड़ पर पहुँच जाते हैं, जब अपने ख़ुद के पेरेंट्स से दूर हो जाते हैं क्योंकि उन्हें ये पता नहीं होता कि हमें उनकी उन आवाज़ों से समस्या है जो वो जाने-अनजाने में आदतन निकालते हैं."
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता डॉ. जेन ग्रेगरी कहती हैं कि इस रोग से पीड़ित अधिकांश लोगों में 'फ़ाइट या फ़्लाइट' व्यवहार देखने को मिलता है.
फ़ाइट या फ़्लाइट का मतलब ये है कि वो इससे लड़ते हैं या वहां से दूर हट जाते हैं.
न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के डॉ. सुखबिंदर कुमार बीबीसी से कहते हैं, "जब मिसोफ़ोनिया के रोगी इस तरह की आवाज़ों को सुनते हैं तो अचानक अधिक सक्रिय हो जाते हैं. उन्हें ग़ुस्सा आने लगता है. वैसे तो ये आवाज़ सामान्य दिखती है लेकिन मिसोफ़ोनिया के रोगियों को यह कहीं अधिक सक्रिय कर देती है."
मिसोफ़ोनिया के मुख्य लक्षण

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इसकी कोई जांच नहीं होती है लेकिन कानों में आवाज़ की सहनशीलता कम होने और उसे लेकर एक नकारात्मक प्रतिक्रिया इसके प्रमुख लक्षण हैं.
सांस लेने और किसी दूसरे व्यक्ति के खाना खाने के दौरान चबाने से निकलती लगातार आवाज़ें मिसोफ़ोनिया से पीड़ित इंसान में इसके लक्षण को तुरंत सक्रिय (ट्रिगर) कर देती हैं.
आम तौर की दैनिक आवाज़े जैसे सांस लेना,खाना खाते से ट्रिगर होता है. यह ज़रूरी नहीं है की उन आवाज़ों का लेन देन केवल मनुष्य से नहीं जंतु अथवा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से भी जुरे हुए है. ये आवाज़ें मिसोफ़ोनिया के रोगी को असहनीय होती हैं और वो उस जगह से फ़ौरन हट जाना चाहते हैं.
वे अक्सर आपने कान बंद कर लेते हैं. इन आवाज़ों से उन्हें ग़ुस्सा के साथ कई बार पैनिक अटैक भी आता है.
अदील अहमद कहते हैं, "चाहे ये आवाज़ किसी के चबाने या सांस लेने का खरासने की हो. मैं सहन नहीं कर पाता हूं. या तो मुझे इससे ग़ुस्सा आता है या मैं वहाँ से दूर हो जाना चाहता हूँ."
हालांकि साथ ही वे यह भी कहते हैं, "जब कोई सामने वाला व्यक्ति हमारी समस्या को समझता है तो उससे हमारा तनाव कम हो जाता है."
क्या मिसोफ़ोनिया को ठीक किया जा सकता है?

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शोधकर्ताओं ने अब तक दिमाग़ को इस तरह ट्रिगर करने वाली आवाज़ों को रोकने का वैज्ञानिक रूप से कोई समाधान नहीं निकाला है.
हालांकि, हाल में शोधकर्ताओं ने मिसोफ़ोनिया को मनोवैज्ञानिक इलाज कॉग्नेटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी) से ठीक करने की कोशिश की. जिन 90 रोगियों पर यह शोध किया गया, उनमें से 42% के लक्षण में सुधार देखने को मिला.
एक वैकल्पिक लेकिन अप्रमाणित तरीक़ा ऑडियोलॉजिस्ट से टिनिटस रीट्रेनिंग थेरेपी करवाने का हो सकता है.
भारत में मिसोफ़ोनिया से कितने लोग पीड़ित हैं इसकी कोई सटीक जानकारी नहीं है लेकिन ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पीच ऐंड हियरिंग के एक ऑनलाइन सर्वे के मुताबिक 15.85 प्रतिशत लोगों में इसके जैसे लक्षण देखे गए.
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