बच्चों में होने वाली रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ क्या होती है?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया में रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ (आरएचडी) से चार करोड़ लोग प्रभावित हैं और हर साल इस बीमारी से तीन लाख लोगों की मौत होती है.
वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन (डब्लयूएचएफ़) के मुताबिक़ ये एक ऐसी बीमारी है जो बचपन में होती है और इससे मौत और विकलांगता भी हो सकती है. संस्था का कहना है कि ये बीमारी पिछड़े और विकासशील देशों में ज़्यादा पाई जाती है.
ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीज़ (2019) की रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 14 उम्र के बच्चों में आरएचडी के 1.5 लाख से ज़्यादा नए मामले सामने आए जबकि इससे पीड़ित बच्चों की संख्या सात लाख से ज़्यादा थी.
इस बीमारी पर हाल ही में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) के डॉक्टरों ने एक शोध किया है.
आरएमएल में बाल रोग विशेषज्ञ विभाग के प्रमुख डॉक्टर दिनेश यादव बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि उन्होंने शोध के लिए 30 बच्चों को लिया जो उत्तर भारत के अलग-अलग इलाकों से उनके पास इसी बीमारी के इलाज के लिए आते थे.

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शोध क्या कहता है?
डॉक्टर दिनेश यादव ने अपनी रिसर्च के बारे में बताया, "हम ये जानना चाहते थे कि दुनिया के 20-25 प्रतिशत मामले भारत से क्यों आते हैं. क्या ये हमारे जीन की वजह से है? हालांकि हमारे शोध का सैंपल साइज़ छोटा है लेकिन रूमैटिक फ़ीवर के आ रहे मामलों को देखते हुए ये ज़रूरी था."
उनके अनुसार, "हमने ये जाना कि जिन बच्चों को हमने शोध में शामिल किया था उनमें कुछ एचएलए (मानव ल्यूकोसाइट एंटीजन) कॉमन थे जो ये बताता है जिनमें ये एचएलए (जीन) होंगे उनमें रूमैटिक फ़ीवर या आरएचडी होने की ज़्यादा आशंका होती है."
डॉक्टरों और डब्लयूएचएफ़ के अनुसार, ये बीमारी पांच से 18 वर्ष के उम्र के बच्चों को ज़्यादा प्रभावित करती है. इस बीमारी के ज़्यादा बढ़ने पर हृदय का वॉल्व ख़राब होने लगता है.
डॉक्टर दिनेश यादव बताते हैं, "बच्चों को इस बीमारी से प्रभावित करने के लिए एक ख़ास तरह का बैक्टीरिया (स्ट्रेप्टोकोकल फैरिनज़ाइटिस) ज़िम्मेदार होता. इस बीमारी में बच्चे या किशोर को बुख़ार आता है फिर रूमैटिक फ़ीवर (बुख़ार) का अटैक होने लगता है."
क्या है लक्षण?
रूमैटिक फ़ीवर होने के कई लक्षण होते हैं-
- गले में ख़राश होना
- बुख़ार आना
- घुटनों, कोहनी और कलाई के जोड़ों में दर्द होना
- थकान होना
आरएचडी के कई लक्षण हैं. इनमें शामिल हैं-
- हाँफना
- ख़ाँसी
- छाती में दर्द होना
- जोड़ों में दर्द
- थकान होना
- पेट, हाथ और पांव में सूजन होना

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तेज़ सांस लेने का मतलब
वहीं, डॉक्टर दिनेश यादव ये भी बताते हैं ऐसे भी मामले सामने आते हैं जहां इससे पीड़ित बच्चों को ऐसी कोई शिकायत नहीं होती और बाद में जाकर पता चलता है कि ये बीमारी उनके हार्ट पर असर कर गई है.
इसे समझाते हुए डॉ दिनेश यादव कहते हैं, "इस बीमारी में जब आप ठीक से सांस नहीं ले पाएंगे तो दिल की गति बढ़ जाती है. तेज़ सांस लेने का मतलब ही होता है कि हार्ट फेल होने लगा है क्योंकि हार्ट ख़ून पंप नहीं कर पाता है और उसका असर फेफेड़े पर पड़ता है और उसकी वजह से वो हांफ़ने लगता है या छाती में दर्द होने लगता है."
डॉक्टरों के अनुसार ये बीमारी एक बड़ी चुनौती पेश करती है क्योंकि जब आप कई बार लोगों से रूमैटिक फ़ीवर के लक्षणों के बारे में पूछते हैं तो वो बताते हैं कि उन्हें ऐसा कुछ नहीं हुआ और इसके आरएचडी बनने में कई साल लग जाते हैं.
बाद में जाकर चलता है कि उनकी हदय का वॉल्व सिकुड़ गया है या वो लीक करने लगा है और ये चुनौतीपूर्ण इसलिए है क्योंकि इससे युवा मैनफोर्स पर भी असर पड़ता है.

गर्भधारण के दौरान आरएचडी
डॉक्टर दिनेश यादव कहते हैं, "ये बीमारी एक दूसरे से फैलती है. ख़ासकर जहां भीड़भाड़ वाला इलाका होता है साथ ही उन इलाकों में जहां साफ़-सफ़ाई का ध्यान नहीं रखा जाता है."
हालांकि वे कहते हैं कि भारत में भी इसके मामलों में कमी आई है लेकिन पश्चिमी देशों की तुलना में विकासशील या गरीब देशों में इसका प्रभाव ज़्यादा है.
ये बीमारी अफ्रीकी देशों, मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत के देशों में पाई जाती है.
वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अनुसार, रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ होने का ख़तरा लड़कियों और महिलाओं में लड़कों या पुरुषों के मुकाबले दोगुना होता है.
गर्भधारण के दौरान दिल से जुड़ी परेशानियों में भी रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ अहम भूमिका निभाता है.

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क्या है इलाज
वहीं, इस बीमारी से एक गर्भवती महिला को हृदयाघात और दिल की धड़कन का अनियमित होना या एरिथमिया होने का भी ख़तरा रहता है.
डॉक्टर सलाह देते हैं कि इस बीमारी का इलाज गंभीरता से कराया जाना चाहिए और नियमित तरीके से दवाएं लेनी चाहिए.
डॉ दिनेश यादव बताते हैं कि इस बीमारी को शुरुआत में एंटिबॉयोटिक के ज़रिए ठीक किया जाता है. वहीं स्थिति थोड़ी ख़राब होने पर पेंसिलिन का इंजेक्शन भी दिया जाता है.
वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन और डॉक्टर ये सलाह देते हैं जिन देशों में आरएचडी के मामले ज़्यादा आते हैं वहां सरकार को दवाओं की उपलब्धता पर तो ध्यान देना ही चाहिए, साथ ही साफ़-सफ़ाई को भी प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि इस बीमारी को फैलने से रोका जा सके.
साल 2018 में जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों ने रूमैटिक फ़ीवर और रूमैटिक हार्ट डिज़ीज़ पर सर्वसम्मति से वैश्विक प्रस्ताव को स्वीकार किया था.
इसमें पहली बार रुमैटिक फ़ीवर और रुमैटिक हार्ट डिज़ीज को वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं में स्वीकृती दी गई थी.
इसमें कई सिफ़ारिश की गई थी जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य में सुधार, इस बीमारी की जड़ में जाकर उसके कारणों पर काम करना और दवाओं और तकनीक को लोगों तक पहुंचाना आदि है.
जानकार मानते हैं कि आरएचडी को लेकर चुनौतियां हैं जिसे इससे प्रभावित देशों को काम करना होगा.
वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टरों का शोध छोटा है लेकिन इसे बड़े स्तर पर किया जाना चाहिए ताकि इस बीमारी पर कारगर तरीके से काम किया जा सके.
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