बिंदेश्वर पाठक: भारत में शौचालय क्रांति लाने वाले जिनसे कभी अमेरिका ने मांगी थी मदद

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सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक का मंगलवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया. सुलभ इंटरनेशनल के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट आरसी झा ने उनके निधन की पुष्टि की है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "सुलभ इंटरेशनल के मुख्यालय में पाठक सर ने झंडोत्तोलन किया. हमलोगों से बातचीत भी की. वो पूरी तरह से ठीक थे. लेकिन अचानक उन्हें तकलीफ़ महसूस हुई. उनको हमलोग एम्स लेकर गए. डॉक्टरों ने क्रिटिकल बताया. फिर कार्डियक अरेस्ट से डेढ़ से दो बजे के बीच में उनका निधन हो गया."
पद्म भूषण से सम्मानित बिंदेश्वर पाठक ने 1970 के दशक में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विसेज की नींव रखी थी.
इसके जरिये उन्होंने पूरे देश में बस अड्डों, रेलवे स्टेशन और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर शौचालय बनाए .
आज पूरे देश में इन शौचालयों का नेटवर्क सुलभ शौचालय के नाम से मौजूद है.
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प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने जताया शोक
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिन्देश्वर पाठक के निधन पर शोक जताया है.
राष्ट्रपति मुर्मू ने ट्वीट कर लिखा, "पाठक ने स्वच्छता के क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल की थी. उन्हें पद्म भूषण सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. उनके परिवार तथा सुलभ इंटरनेशनल के सदस्यों को मैं अपनी शोक-संवेदनाएं व्यक्त करती हूं."
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक के निधन को देश के लिए बड़ी क्षति बताया है.
पीएम मोदी ने कहा, "पाठक स्वप्नदर्शी व्यक्ति थे जिन्होंने समाज की प्रगति और हाशिये पर पड़े लोगों को सशक्त करने के लिए काफी काम किया."
उन्होंने कहा, "बिंदेश्वर जी ने स्वच्छ भारत बनाने को अपना मिशन बना लिया था. उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन को अपना काफी सहयोग दिया. उनसे कई बार बातचीत हुई और उस बातचीत में सफाई को लेकर उनका उत्साह दिखता था. उनका काम लोगों को प्रेरित करता रहेगा. इस दुख की घड़ी में उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएं. ओम शांति."

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'पहले टॉयलेट बनाइए, फिर स्मार्ट सिटी'
भारत में शौचालय क्रांति लाने वाले बिंदेश्वर पाठक ने स्मार्ट सिटी योजना पर साल 2014 में बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कहा था कि सरकार को पहले शौचालय बनवाना चाहिए और फिर पैसे बचे तो... स्मार्ट सिटी.
उनका कहना था, "एक ऐसा शहर जहां सारी सुविधाएँ हों, वहां कौन नहीं रहना चाहेगा, स्मार्ट सिटी योजना काफ़ी अच्छी है. शहरों को सुंदर बनना ही चाहिए. साफ-सुथरे, सारी सुविधाओं से पूर्ण, पर्यावरण की दृष्टि से उपयुक्त शहर बनने ही चाहिए. इसमें किसी को क्या एतराज़ हो सकता है."
"लेकिन इसी का अगर आप दूसरा पहलू देखें तो, हमारे देश के करोड़ों घरों में पक्के शौचालय तक नहीं है. मैं तो यहीं कहूंगा कि पहले सभी घरों में शौचालय बनवा दिए जाएं और फिर अगर पैसे बचे तो स्मार्ट सिटी बनाएं जाएं. शहरों का विकास तो अच्छी बात है, लेकिन गांवों की ओर भी उतना ही ध्यान देने की ज़रूरत है और उन्हें भी साफ-सुथरा बनाना चाहिए."
"अगर स्मार्ट सिटी की बात की जाएं तो इसके अपने फ़ायदे और नुक़सान हैं. नुक़सान ये है कि शहर का जितना अधिक विकास होगा, उतने ही अधिक पेड़ कटेंगे, 24 घंटे बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा का सहारा लेना होगा, जिसके अपने ख़तरे हैं. पर अच्छी बात ये भी है एक ख़ूबसूरत शहर किसे रास नहीं आएगा... लेकिन इसके प्रभावों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता."
"निर्माण के दौरान पेड़ न कटें इस बात पर ज़ोर दिया जाना चाहिए, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे. लेकिन बड़ी तस्वीर ये है कि दुनिया के कई देशों में पहले से ही स्मार्ट सिटी हैं तो भारत में ये बने तो इसे एक अच्छी पहल ही कहा जाएगा."

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भंगी मुक्ति प्रकोष्ठ से शुरुआत
बिंदेश्वर पाठक 1968 में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ दिनों तक पढ़ाने का काम किया. फिर बिहार गांधी शताब्दी समारोह समिति में एक कार्यकर्ता के तौर पर शामिल हुए.
यहां वो भंगी मुक्ति (मैला ढोने वालों की मुक्ति) प्रकोष्ठ में काम करने लगे. यहीं उन्होंने मैला ढोने वालों की समस्याओं के बारे में जाना. इसके बाद उन्होंने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की.
इसी के तहत उन्होंने कम लागत में सार्वजनिक शौचालय बनवाने की पहल की.
1970 में जब उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की तभी उन्होंने खुले में शौच जाने की प्रथा और गंदे सार्वजनिक शौचालयों की जगह साफ-सुथरे शौचालय बनाए जाने की ज़रूरत महसूस की.
उनके संगठन को देश भर में सार्वजनिक जगहों पर सुलभ शौचालय बनाने का श्रेय जाता है. कम लागत में बने ये शौचालय इको-फ्रैंडली माने जाते हैं.

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सुलभ मॉडल पर बने शौचालयों को सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के क्षेत्र में क्रांति माना जाता है.
उनका संगठन मानवाधिकार, पर्यावरण, स्वच्छता, गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के विकास और प्रबंधन और कचरा प्रबंधन के साथ ही ही सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने का काम करता है.
उन्होंने सबसे पहले 1968 में डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो कम खर्च में घर के आसपास मिलने वाली सामग्री से बनाया जा सकता है.
इसे दुनिया की बेहतरीन तकनीकों में से एक माना गया. बाद में उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल की मदद से देश भर में सुलभ शौचालयों की शृंखला स्थापित की.

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अमेरिकी सेना के लिए शौचालय
भारत सहित कई देशों में शौचालय उपलब्ध करा चुके ग़ैर सरकारी संगठन 'सुलभ इंटरनेशनल' ने साल 2011 में अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना के लिए एक ख़ास तरह के शौचालय बनाने की योजना बनाई थी.
सार्वजनिक सुविधाओं के क्षेत्र में पिछले कई दशकों से काम कर रहा यह संस्थान इससे पहले क़ाबुल में शौचालय उपलब्ध करवा चुका था.
लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था कि अमेरिकी सेना ने खुद उनसे इसके लिए आग्रह किया था. अमेरिकी सेना ने ख़ास तरीक़े के 'बायो गैस' से संचालित शौचालय की मांग की थी.
सेना चाहती थी की इस तरीके के कारगर और सस्ते शौचालय क़ाबुल में सभी जगह स्थापित किए जाएं.

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अफ़ग़ानिस्तान में भी मदद
सुलभ इंटरनेशनल काबुल नगर पालिका के लिए तब तक कई शौचालय बना चुका था.
उस वक्त सुलभ के प्रमुख डॉक्टर बिन्देश्वर पाठक ने बीबीसी से कहा था, "हमारी संस्था ने कुछ वर्ष पहले ही काबुल नगर पालिका को सहयोग देते हुए वहां कुछ शौचालय तैयार किए थे लेकिन इस बार अमेरिकी सेना ने हमसे सहयोग मांगा है और हमारी संस्था उनकी पूरी मदद करेगी."
डॉक्टर पाठक ने कहा था कि उनकी संस्था के लिए गर्व की बात है कि उनकी संस्था की तकनीक का इस्तेमाल अब दूसरे देश भी करना चाहते हैं.
उस समय 'सुलभ इंटरनेशनल' भारत के अलावा दक्षिण अफ्रीका, चीन, भूटान, नेपाल और इथोपिया समेत 10 अन्य देशों में शौचालय से संबंधित तकनीक दे चुका था.
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