ट्रेनों में शौचालय की शुरुआत कैसे हुई?

- Author, सुहैल हलीम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
डेढ़ सदी से भी अधिक के इंतज़ार के बाद भारत में रेलगाड़ियों के ड्राइवरों के लिए अच्छी ख़बर है, अब उनकी यात्रा कितनी भी लंबी हो, उन्हें शौचालय खोजने के लिए इंजन से उतर कर नहीं भागना पड़ेगा.
भारत में रेलगाड़ियों के ड्राइवरों को 'लोको पायलट' कहा जाता है, वे पायलट भले ही हों, लेकिन अब तक वे शौचालय की बुनियादी सुविधा से वंचित थे.
लोको पायलट मनप्रीत सिंह कहते हैं, "हमें आठ घंटे की शिफ्ट में केवल दस मिनट का ब्रेक मिलता है, और ऐसा नहीं है कि आप कहीं भी गाड़ी रोक कर खड़े हो जाएं. हमें पहले वायरलेस पर अगले स्टेशन के प्रभारी को सूचना देनी पड़ती है, फिर जल्दी से भागकर स्टेशन का टॉयलेट उपयोग करना पड़ता है. अब हमारी एक लंबे समय से रूकी हुई मांग स्वीकार कर ली गई है. हमें तो आसानी होगी ही, रेल गाड़ियां भी समय पर चल सकेंगी."

लोको पायलट कैसी परेशानी से गुज़रते होंगे, यह अनुमान लगाना तो मुश्किल नहीं और वे इस मुश्किल से कैसे निपटते थे, उसके बारे में भी कई दिलचस्प कहानियां हैं.
अब रेलवे के इंजन में जो नए शौचालय बनाए जा रहे हैं, वे आधुनिक तकनीक पर आधारित हैं, बिल्कुल वैसे जैसे आप हवाई जहाज में देखते हैं. हर शौचालय पर लगभग 18-20 लाख रुपए ख़र्च होंगे.
ड्राइवरों को तो 160 साल इंतज़ार करना पड़ा. लेकिन यात्रियों को शौचालय की सुविधा केवल आधी सदी में ही मिल गई थी.
लेकिन इसके पीछे एक रोचक कहानी है.

एक यात्री अखिल चंद्र सेन ने 1909 में पश्चिम बंगाल के साहबगंज डिविज़नल कार्यालय को एक अनोखा ख़त लिखा था. इसमें उन्होंने अपनी पीड़ा बयान की थी.
यह ख़त आज भी दिल्ली के रेल संग्रहालय में मौजूद है.
अखिल चंद्र सेन ने लिखा था,
मान्यवर,
"मैं ट्रेन से अहमदपुर स्टेशन पहुंचा. कटहल खाने से मेरा पेट फूला हुआ था. इसलिए मैं शौच के लिए चला गया, मैं फ़ारिग हो ही रहा था कि गार्ड ने सीटी बजा दी, मैं एक हाथ में लोटा और दूसरे में धोती थाम भागा. मैं गिर पड़ा और वहां स्टेशन पर मौजूद औरतों और मर्दों सबने देखा...मैं अहमदपुर स्टेशन पर ही छूट गया. यह बहुत ग़लत बात है, अगर यात्री शौच के लिए जाते हैं तब भी गार्ड कुछ मिनटों के लिए ट्रेन नहीं रोकते? इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि गार्ड पर भारी जुर्माना डाला जाए. वर्ना यह ख़बर अख़बार को दे दूंगा."

इसके बाद यात्री ट्रेनों में शौचालय की सुविधा दे दी गई. अब यात्री ट्रेनों में पुराने गंदे टॉयलेट की जगह नए 'बायो टॉयलेट' लगाए जा रहे हैं. चालू वित्त वर्ष में ऐसे 17 हजार शौचालय बनाए जाएंगे.
लेकिन इंजन में नए शौचालय बनाना टेढ़ी खीर है, क्योंकि इस पर ख़र्च भी बहुत अधिक है और पुराने इंजनों में जगह नहीं, इसलिए रेलवे के साठ हज़ार ड्राइवरों के लिए मंज़िल अभी दूर है.
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