शौचालय का सपना पूरा करतीं ये बेटियां

पुनिया और उनकी बहन

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    • Author, नीरज सिन्हा
    • पदनाम, झारखंड से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

रांची से क़रीब 55 किलोमीटर दूर गानालोया गांव पहुंचकर जब पुनिया के बारे में पूछा, तो बैलों को हांक लगा रहे एक बच्चे ने कहा, "पुनिया दीदी के घर जाने के लिए थोड़ा पीछे लौटकर बाएं वाली कच्ची गली से जाएं."

कुछ ही मिनटों में हम पुनिया के घर के सामने थे, जहां वो धूप में अपनी मुर्गियों को संभाल रही थीं.

पुनिया ने घर, खेती और कॉलेज की पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ शौचालय बनाने के लिए एक-एक ईंट जोड़ी.

वीडियो कैप्शन, सूअर बेचकर शौचालय बनवाया

जब अपनी और छोटी बहन की स्कॉलरशिप के आठ हज़ार रुपए कम पड़ गए तो पुनिया ने अपने सूअर बेच डाले.

उनकी बहन सूमी ढोडराई ने उनका साथ दिया और कहा, "दीदी तू राजमिस्त्री का काम संभालना, मैं मज़दूरी पक्की करूंगी."

सूमी ढोडराई ने बताया, "हमें शौच के लिए गांव से एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. फिर हमने शौचालय बनाने का फ़ैसला किया."

सूमी आगे बताती हैं, "कॉलेज में लड़कियां पुनिया से अक्सर पूछती थीं कि क्या उसे शौचालय के बिना परेशानी नहीं होती, तो फिर मैंने ठान ली कि शौचालय बनवाकर ही रहूंगी."

पुनिया उस दिन को नहीं भूलीं, महीनों की मेहनत के बाद शौचालय बन कर तैयार हो गया, जब वो शौचालय की दीवारों पर गुलाबी रंग चढ़ा रही थीं तो पुराने ख्यालों वाले मां-बाबा उसे देर तक निहारते रहे थे.

पंचायत प्रतिनिधि उर्मिला देवी कहती हैं पुनिया के इस काम ने आदिवासी इलाके में महिलाओं का मान और हौसला बढ़ाया है. वे बताने लगी कि लगभग साढ़े तीन सौ घरों वाले इस गांव में चालीस फ़ीसदी शौचालय होंगे.

पुनिया का सम्मान

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पुनिया की इस पहल से प्रभावित होकर प्रशासन ने उसके घर बिजली का कनेक्शन लगवा दिया है, साथ ही उसे प्रशस्ति पत्र भी दिया गया है और अब उसे स्वच्छता अभियान का ब्रांड अबेंसडर बनाने की तैयारी हो रही है.

इस तरह स्वच्छता सूची में फिसड्डी झारखंड में शौचालय निर्माण की कोशिशें तेज़ हो रही हैं.

हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 263 प्रखंडों में महज़ 18 प्रखंडों को ही खुले में शौच से मुक्त कराया जा सका है.

लौहनगरी जमशेदपुर में छठी क्लास की छात्रा मोंद्रिता चटर्जी ने अपनी जेब ख़र्च के पैसे बचाकर केंदाडीह गांव में सामुदायिक शौचालय बनाने के लिए दिए.

सामाजिक कार्यकर्ता दुर्गा के मुताबिक़ 300 ग़रीब परिवारों की बस्ती में एक भी शौचालय नहीं था.

मोद्रिता चटर्जी

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मोद्रिता की मां स्वीटी चटर्जी कहती है कि कई दफ़ा जेब ख़र्च के लिए ज़्यादा पैसे मांगने पर उसे पापा की डांट सुननी पड़ती थी, लेकिन बाद में जब जानकारी मिली तो हम दोनों उसकी मुहिम में शामिल हो गए.

मोद्रिता अब हलुदबनी बस्ती के उस स्कूल में शौचालय बनाने की तैयारी में है, जहां इसके अभाव में लड़कियां स्कूल नहीं जाना चाहतीं.

नई नवेली दुल्हन के लिए बना शौचालय

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जमशेदपुर के बदिया गांव में सुभाष नायक की शादी हो रही थी, किसी तरह डिप्टी कलेक्टर संजय पांडे को मालूम हुआ कि घर में शौचालय नहीं.

उन्होंने कहा कि दुल्हन शौच के लिए बाहर न जाए इसलिए बिना वक्त गंवाए श्रमदान शुरू हुआ, जो रात भर चलता रहा.

दुल्हन सुनीता की पहली प्रतिक्रिया थी, "सपने में भी नहीं सोचा नहीं था उनके लिए एक साथ कई खुशियां लेकर आएगी शादी."

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