तो अब आपकी दुनिया में शांति ही शांति होगी

घर का शांत कोना

इमेज स्रोत, Wendy Steck Merriman Photography

    • Author, टेसा लव
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

योको सेन का रोजगार उनके बेहद नाज़ुक कानों की वजह से चलती है. वो इलेक्ट्रॉनिक संगीतकार हैं. ऐसे में आवाज़ के प्रति उनकी नाज़ुकी या संवेदनशीलता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है.

लेकिन, पांच साल पहले जब योको बीमार पड़ीं, तो, उन्हें काफ़ी वक़्त अस्पताल में बिताना पड़ा. ऐसे में उनके संवेदनशील कान उनके लिए मुसीबत बन गए. अस्पताल में मशीनों की आवाज़ें, अलार्म, बीप ने उनके ज़हन में कोलाहल मचा दिया. उन्हें इस शोर से थकन महसूस होने लगी.

उन दिनों को याद कर के योको सेन कहती हैं, 'शोर से मैं बहुत परेशान हो गई थी, ख़ास तौर से बीप की आवाज़ और अलार्म से. इसके अलावा अस्पताल के लाउडस्पीकर, लोगों की आपस की बातें, चीख-पुकार और दरवाज़ों का धड़ाम से बंद होना मेरे सिर पर सवार हो गया था. अस्पताल में बहुत शोर होता है. वो मेरे ज़हन पर हमेशा के लिए तारी हो गया.'

घर का शांत कोना

इमेज स्रोत, Getty Images

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद योको सोचने लगीं कि वहां होने वाला शोर मरीज़ों की सेहत पर असर डालता होगा. अगर ऐसा है, तो वो उनकी मदद कैसे कर सकती हैं. वो अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन के जॉन हॉपकिंस मेमोरियल हॉस्पिटल से जुड़े सिबले इनोवेशन हब के लिए काम करती हैं.

लेकिन, अस्पताल के शोर से परेशान होकर योको ने लोगों को इससे निजात दिलाने की ठानी है. उन्होंने इसके लिए स्टार्ट-अप कंपनी खोली है, जिसका नाम है- सेन साउंड.

शुरुआत में योको चाहती थीं कि मशीनों से आने वाली बुरी, रगड़ वाली आवाज़ की टोन बदलें, ताकि मरीज़ कुछ बेहतर महसूस कर सकें. लेकिन अब योको ने अपने मिशन में अस्पताल के कर्मचारियों को भी शोर से निजात दिलाने का एजेंडा शामिल कर लिया है.

घर का शांत कोना

इमेज स्रोत, Getty Images

सेहत की दुनिया में आवाज़ और उसके असर

मरीज़ों के लिए अस्पताल का शोर बहुत परेशान करने वाला हो सकता है. उन्हें नींद लेने में दिक़्क़त हो सकती है. इससे उनकी सेहत में सुधार की रफ़्तार धीमी हो जाती है. लेकिन, इससे भी ज़्यादा फ़िक्र की बात उन कर्मचारियों के लिए है, जो अस्पताल में दिन-रात शोर से वाबस्ता रहते हैं.

कभी अलार्म, तो कभी मरीज़ों-परिजनों की गुफ़्तगू और कभी लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट. लगातार कोलाहल का सामना करते-करते, अस्पताल के कर्मचारी भी अलार्म से थकान महसूस करने लगते हैं. नतीजा ये होता है कि शोर-गुल में कभी ऐसे अलार्म भी गुम हो जाते हैं, जिन्हें फ़ौरन देखे जाने की दरकार होती है.

योको सेन कहती हैं कि, "जो मरीज़ों की देख-भाल करते हैं, हम उनका ख़याल रख कर तीमारदारी के सिस्टम को बेहतर बना सकते हैं. अक्सर अस्पताल के कर्मचारियों की परेशानियों और उनकी ज़रूरतों की अनदेखी होती है. लेकिन हम मरीज़ों का किसी अस्पताल में तजुर्बा बेहतर करना चाहते हैं, तो हमें सब से पहले अस्पताल के कर्मचारियों का ख़याल रखना होगा. नर्सों और डॉक्टरों का तजुर्बा बेहतर होगा, तो मरीज़ों की बेहतरी तय है."

हालांकि सेहत की दुनिया में आवाज़ की अब तक अनदेखी होती रही है. लेकिन इस पर जो रिसर्च हुई हैं, उनके नतीजे डरावने हैं. अमरीकन एसोसिएशन ऑफ़ क्रिटिकल केयर नर्सेज़ की एक रिपोर्ट से पता चला कि अस्पतालों में बजने वाले 72 से 99 फ़ीसद अलार्म बेवजह के होते हैं. केवल अमरीका के मैरीलैंड स्थित जॉन हॉपकिंस मेमोरियल अस्पताल में प्रति मरीज़ रोज़ाना 350 अलार्म बजते हैं.

शोर

अस्पतालों में कितना शोर

अमरीका की मेयो क्लिनिक के दुनिया भर में कराए गए सर्वे से पता चला है कि पिछले 50 सालों में दुनिया भर के अस्पतालों में शोर बहुत बढ़ गया है. दिन में ये शोर 57 डेसिबल से बढ़कर 72 डेसिबल हो गया है. वहीं, रात में अस्पतालों में होने वाला शोर 42 डेसिबल से बढ़कर 60 डेसिब कत पहुंच गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, 55 डेसिबल से ज़्यादा का शोर नींद ख़राब कर सकता है. इससे दिल की बीमारी का ख़तरा भी बढ़ जाता है. वहीं, एक स्टडी से पता चला है कि अलार्म बजने की वजह से लोगो के दिल की धड़कनें अस्त-व्यस्त हो जाती हैं. नतीजा ये होता है कि अलार्म सुनकर लोग अनदेखी करना शुरू कर देते हैं. या उन पर कोई असर ही नहीं पड़ता.

योको सेन कहती हैं कि, "मान लीजिए आप का कोई पड़ोसी है, जो अक्सर ग़लती से कार का अलार्म बजा देता है. किसी दिन अगर कार वाक़ई चोरी हो रही हो और अलार्म बजे तो क्या कोई देखने की ज़हमत उठाएगा?"

अलार्म बजने की वजह से होने वाली मौतों के बारे में कोई आंकड़ा नहीं है. भले ही इन मौतों के लिए अस्पताल के स्टाफ को ज़िम्मेदार माना जाए. मगर, इनमें उनका कोई हाथ होता नहीं है.

अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के स्कूल ऑफ़ नर्सिंग में प्रोफ़ेसर मिशेल पेल्टर कहती हैं कि, "नर्सों के ज़हन में शोर इकट्ठा होने लगता है. एक वक़्त ऐसा आता है कि उन्हें सिर्फ़ बीप...बीप...बीप...सुनाई देने लगता है. हमें ये भी पता है कि कई बार अपनी दिमाग़ी सेहत के लिए और मरीज़ों की बेहतरी के लिए भी नर्सें अलार्म की आवाज़ धीमी कर देती हैं. कई बार तो ये भी हुआ है कि अलार्म को पूरी तरह से बंद कर दिया गया."

अस्पताल में शोर

इमेज स्रोत, PA

बच्चे चुनेंगे अलार्म की आवाज़ें

यूरोप के जर्नल ऑफ़ न्यूरोसाइंस के मुताबिक़ लगातार शोर-शराबे के बीच रहने से नींद बुरी तरह प्रभावित होती है. किसी काम में ध्यान लगाने में दिक़्क़त होती है. इसके अलावा शोर का ताल्लुक़ डायबिटीज़, डिप्रेशन और बच्चे पैदा होने के वक़्त होने वाली पेचीदगियों से भी पाया गया है.

इस मुश्किल का हल निकालने के लिए योको सेन आवाज़ के विशेषज्ञों और रिसर्चरों के साथ काम कर रही हैं. अस्पतालों के लिए ऐसे अलार्म तैयार किए गए हैं, जो फ़ौरी मदद की गुहार तो लगाएं, मगर ज़हन को चुभें नहीं. मेडट्रॉनिक नाम की कंपनी ने इस काम में योको सेन की मदद की है. जल्द ही इन्हें बाज़ार में उतारा जाएगा. दूसरी कंपनियां भी इन आवाज़ों वाले अलार्म बना सकेंगी.

योको सेन एक स्वयंसेवी संस्था के साथ बच्चों के अस्पताल के लिए अलार्म बनाने का काम कर रही हैं. इसमें अलार्म की आवाज़ें ख़ुद बच्चों को चुनने का ज़िम्मा दिया गया है. ताकि, वो अपनी पसंद-नापसंद से अलार्म की ऐसी आवाज़ें चुनें, जो चुभें नहीं.

योको सेन कहती हैं कि, "लोगों के लिए एक-दूसरे से बात करना बहुत मुश्किल होता है. अब अगर आवाज़ों को बच्चे ख़ुद तैयार करेंगे, तो शायद बड़े भी मिल-जुलकर काम करने की प्रेरणा पाएं."

अस्पताल में शोर

इमेज स्रोत, Science Photo Library

बदलाव और उसके बेहतर परिणाम

इसके अलावा योको सेना और उनकी टीम एक शांति वाला कमरा भी तैयार कर रही हैं. जहां धीमी रोशनी और आरामदेह कुर्सियों के बीच राहत देने वाली ख़ुशबुएं होंगी. इन कमरों में जाकर अस्पताल के कर्मचारी कुछ पल सुकून के साथ बिता सकेंगे.

इसमें बहुत ही हल्की, रूह को सुकून देने वाली धुनें सरगोशियां करती सुनाई जाएंगी. इन ट्रांक्विलिटी रूम्स का मक़सद अस्पतालों के माहौल में इंक़लाबी बदलाव लाना है. योको सेन कहती हैं कि अस्पताल के कर्मचारियों को इस कोशिश से ये महसूस होगा कि उनकी भी फ़िक्र की जा रही है. उनका हौसला बढ़ेगा.

अस्पतालों के माहौल को बोझिल बनाने से बचाने के लिए ऐसी कोशिशें ज़रूरी हैं. सिबले इनोवेशन हब के पूर्व निदेशक निक डॉसन कहते हैं कि, "नर्सों और अस्पताल के दूसरे कर्मचारियों के लिए अस्पतालों में ऐसी जगह की सख़्त ज़रूरत है, जहां जाकर वो तनाव दूर कर सकें. कुछ पल सुकून से बिता सकें." निक डॉसन ने ट्रांक्विलिटी रूम तैयार करने में योको सेन की काफ़ी मदद की है.

सिबले मेमोरियल अस्पताल में बनाए गए ऐसे प्रोटोटाइप कमरे में वक़्त बिताने से कर्मचारियों का बर्ताव बेहतर हुआ है. मरीज़ों की देख-भाल भी बेहतर हुई है. इन कमरों में जाकर कर्मचारियों का तनाव कम हो गया. उनकी थकान दूर हो गई.

वो मरीज़ों की देख-भाल पर ज़्यादा ध्यान दे सके. शांति होने की वजह से मरीज़ों की निगरानी का काम भी अच्छा हुआ. अब योको सेन इस तजुर्बे को अमरीका के दूसरे अस्पतालों में दोहराना चाहती हैं.

अस्पताल में शोर

इमेज स्रोत, Getty Images

ये सुन कर अजीब लग सकता है कि अस्पताल या मेडिकल केयर की ट्रेनिंग के बिना ही योको सेन अस्पतालों को बेहतर करने में जुटी हैं. लेकिन निक डॉसन कहते हैं कि योको सेन की कामयाबी की बड़ी वजह यही है कि वो मेडिकल केयर के पेशे से नहीं जुड़ी हैं. वो दुनिया को अलग तरीक़े से सुनती हैं. तभी वो अस्पताल के कोलाहल से होने वाले नुक़सान को समझ सकीं.

निक डॉसन कहते हैं कि, 'हेल्थकेयर की दुनिया में अक्सर हमें नहीं पता होता कि नुक़सान कौन सी चीज़ कर रही है. लेकिन जब किसी तरफ़ इशारा कर के बताया जाता है कि इससे नुक़सान हो रहा है, तो मेडिकल केयर का सिस्टम उसे दुरुस्त करने में लगता है.'

दूसरे संगठन भी अस्पतालों में शोर-गुल कम करने के लिए काम कर रहे हैं. अमरीका के ज्वाइंट कमीशन ने 2014 में अस्पतालों के अलार्म का ज़िम्मा वहां की नर्सों का बताया. लेकिन मिशेल पेल्टर कहती हैं कि अलार्म सही ढंग से काम करें, ये ज़िम्मेदारी केवल नर्सों की नहीं है. इसके लिए दूसरे लोगों को आगे आना होगा. उन्हें अस्पतालों की मदद करनी होगी.

योको सेन की कंपनी सेन साउड यही काम कर रही है. ताकि भविष्य के अस्पतालों में कोलाहल नहीं, सुकून हो.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)