कितना सही होता है अपने मन की आवाज़ को सुनना

आभास

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अगर आप कोई बात किसी ठोस वजह और आधार के बिना कहेंगे तो कोई आपकी बात नहीं मानेगा.

आज तर्कसंगत सोच का ज़माना है. तर्क हमें वजह तलाशने पर मजबूर करते हैं. हम सभी मानते हैं कि कुछ भी बेवजह नहीं होता.

फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम बिना किसी वजह के मान लेते हैं. ऐसी बातों का आधार होते हैं हमारे ज़ज़्बात.

आज की तर्कसंगत सोच वाली पीढ़ी अतार्किक लोगों को पिछड़ी सोच का मानती है. माना जाता है कि साइंस की तरक्क़ी से पहले ऐसी बातें होती थीं. आज ये सब अविश्वसनीय हैं.

क्या आभास बेवजह होते हैं?

लेकिन साइंस ही इस बात पर मुहर लगाता है कि जज़्बात बेवजह नहीं होते. उन्हें आसानी से नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. और ना ही उन्हें तर्क की कसौटी पर परखा जा सकता है. इसके बावजूद उनकी अपनी अहमियत है. आभास बेवजह नहीं होते. ये हमारी सोच और तजुर्बों का नतीजा होते हैं.

दरअसल तमाम तरह की जानकारियों को हमारा दिमाग काटता-छांटता रहता है और याददाश्त के अलग अलग ख़ानों में उन्हें जमा करता रहता है.

रिसर्च दावा करती हैं कि हमारा मस्तिष्क कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर की तरह काम करता है. वो मौजूदा हालात और तजुर्बे की पुरानी जानकारियों और तजुर्बों से तुलना करता है और तुरंत कमांड देता है कि अब आगे क्या होने वाला है.

वैज्ञानिक दिमाग के काम करने के इस तरीक़े को 'प्रिडिक्टिव प्रोसिसिंग फ़्रेमवर्क' कहते हैं.

हमारा दिमाग़ मौजूदा हालात से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहता है. अगर ऐसी कोई घटना घटती है, जो दिमाग़ में मौजूद डेटा से मेल नहीं खाती तो दिमाग़ तुरंत ही अपने अंदर बंद आंकड़ों को अपडेट करता है.

ये सब जान-बूझकर नहीं किया जाता. बल्कि दिमाग़ बिना किसी आदेश के ये काम ख़ुद करता रहता है.

क्या है आभास और कैसे होता है?

ऐसा भी नहीं है कि हमें हर समय ही आभास होते हैं. ये तभी होता है जब दिमाग़ में मौजूदा हालात से मिलती जुलती कोई जानकारी जमा होती है और दिमाग़ उस पुराने डेटा से उसका मिलान कर लेता है.

मिसाल के लिए आप अंधेरे में सड़क के बीचो-बीच गाड़ी चला रहे हैं. अचानक आपको एहसास होता है कि साइड होकर गाड़ी चलानी चाहिए.

कुछ ही दूर जाकर आप देखते हैं कि सड़क के बीचों बीच बड़ा गड्ढा है. अगर आपको किनारे गाड़ी चलाने का एहसास नहीं हुआ होता, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता था. यानी आपके दिमाग़ को आभास हो गया था कि आगे कुछ गड़बड़ ज़रूर है.

दरअसल हम जिस तरह के माहौल में रहते हैं और जिन रास्तों से गुज़रते हैं, हमारा दिमाग़ उनसे वाक़िफ़ हो जाता है.

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दिमाग वहां की सारी जानकारियां अपने पास जमा कर लेता है. वो मौजूदा हालात की अपने पास जमा जानकारियों से तुलना करता रहता है. इसीलिए तजुर्बे की बुनियाद पर आभास को ज़्यादा भरोसेमंद बनाया जा सकता है.

क्या आभास के आधार पर लेने चाहिए फैसले?

मनोवैज्ञानिक साहित्य में आभास को दो तरह की सोच में बांटा गया है.

इनके मुताबिक आभास वाली सोच तीव्र, अवचेतन मन में उपजने वाली स्वचालित सोच है. जबकि किसी बात या तजुर्बे का हिसाब-किताब लगाने वाली सोच तर्क के आधार पर जान-बूझकर तैयार की जाती है. इसे तैयार होने में टाइम भी लगता है.

रिसर्च बताती हैं कि दिमाग़ एक ही वक़्त में दोनों तरह की सोच तैयार करने का काम नहीं करता. ये तरीक़ा आगे पीछे होता रहता है.

इन दोनों का आपस में कोई ताल्लुक़ भी नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि ये दोनों ही सोच एक दूसरे पर हावी होने की कोशिश ज़रूर करती हैं. हम सभी जाने-अनजाने दोनों ही सोच का इस्तेमाल करते हैं.

दावा तो ये भी किया जाता है कि बड़ी-बड़ी साइंस रिसर्च भी आभास की बुनियाद पर की गई हैं. वैज्ञानिकों के आभास ने ही उन्हें नए आइडिया पर काम करके नया कॉन्सेप्ट तैयार करने की प्रेरणा दी. बाद में उन्हीं की परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करके किसी ठोस नतीजे पर पहुंचा गया.

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कहने को तो आभास वाली सोच के नतीजे डांवाडोल होते हैं. लेकिन, कई बार विश्लेषणात्मक सोच के नतीजे भी ऐसे ही साबित होते हैं.

कई बार गुमराह भी करते हैं आभास

रिसर्च बताती हैं कि बहुत ज़्यादा सोच-विचार, फ़ैसला लेने की सलाहियत पर असर डालता है. ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि विश्लेषणात्मक सोच के आधार पर लिए गए फ़ैसलों को सही साबित करने के लिए हम आभासी सोच को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

कई मर्तबा हम फ़ैसला ले लेते हैं लेकिन वजह हमारे पास नहीं होती.

अगर आभास वाली सोच हमारे फ़ैसलों को इतना प्रभावित करती है, तो सवाल उठता है कि क्या विश्लेषणात्मक सोच की तरह इस पर भी भरोसा किया जाए.

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आभास चूंकि पुराने तजुर्बे की बुनियाद पर होते हैं. तीव्र होते हैं और अपना फ़ैसला ख़ुद ही करते हैं. ऐसे में कई तरह की ख़ामियां भी हो जाती हैं.

आभास हमें कई मर्तबा गुमराह भी कर देते हैं. और कई बार दिमाग़ खुद भी सोच तैयार करते समय भेद-भाव कर जाता है.

लिहाज़ा सलाह यही है कि आभास को अपने मौजूदा हालात से जोड़कर देखिए. अगर आभास मौजूदा हालात और तजुर्बे से मेल नहीं खाता तो फिर विश्लेषणात्मक सोच पर विचार कीजिए.

लेकिन आभास को पूरी तरह नज़र अंदाज़ मत कीजिए. मुश्किल फ़ैसले की घड़ी में दोनों सोच की तुलना करके फ़ैसला कीजिए.

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