वर्क फ्रॉम होम से महिलाओं को कितना नफ़ा, कितना नुक़सान
सुशीला सिंह
बीबीसी संवाददाता

इमेज स्रोत, Getty Images
कोरोना महामारी ने एक नए और अलग तरह के कामकाजी माहौल को जन्म दिया और वो था वर्क फ्रॉम होम.
हालांकि कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को घर से काम करने की सुविधा पहले से देती आ रही थीं लेकिन कोरोना के दौरान ये पहली बार हुआ जब अधिकांश लोग घर से काम करने लगे.
ये सिलसिला तकरीबन दो साल तक चला और धीरे-धीरे जब स्थिति सामान्य हुई तो दफ़्तरो ने अपने कर्मचारियों को वापस बुलाना भी शुरू कर दिया.
जहां कुछ कंपनियों ने सामान्य तौर पर काम करना शुरू कर दिया वहीं कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को वापस दफ़्तर बुलाने को लेकर चुनौती का सामना कर रही हैं.
इन्हीं में से एक कंपनी है टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस.
हाल ही में ये कंपनी सुर्खियों में तब आ गई जब कंपनी के मुख्य एचआर मिलिंद लक्कड़ ने कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट में बताया कि कई महिला कर्मचारियों ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
मिलिंद लक्कड़ की तरफ से मीडिया में जारी जानकारी के मुताबिक़, ''कंपनी के घर से काम करने की सुविधा को ख़त्म करने के बाद बड़ी संख्या में महिला कर्मचारियों ने इस्तीफ़े दे दिए. ऐसे में कंपनी का ये फ़ैसला महिलाओं के तेज़ी से हो रहे इस्तीफ़े का एक कारण बन रहा है.''
उनके अनुसार, ''मेरा मानना है कि कोरोना के दौरान घर से काम करने ने कुछ महिलाओं को उनकी घरेलू व्यवस्था के मुताबिक़ ढाल दिया और इस वजह से वो दफ़्तर आकर काम नहीं करना चाहती हैं.''
साथ ही उनका कहना था, ''वित्तीय वर्ष 2023 में बड़ी संख्या में महिलाओं के नौकरी छोड़ने से हमारी लैंगिक विविधता लाने की कोशिशों को भी धक्का पहुंचा है, लेकिन हम इसे दोगुना करने का प्रयास कर रहे हैं.''
वर्क फ्रॉम होम ने क्या बदला?
गुरुग्राम की एक निजी कंपनी में काम करने वाली शर्मिला कहती हैं कि अगर उन्हें रोज़ ऑफ़िस जाने के लिए कहा जाएगा तो उनके लिए काम करना मुश्किल होगा.
उनके अनुसार, ''हमें दो दिन ऑफ़िस जाना होता है और हम तीन दिन घर से काम कर सकते हैं. इससे हमें काम करने में एक लचीलापन मिला है. लेकिन ऑफ़िस जाना भी ज़रूरी है ताकि टीम से बातचीत हो सके जो काम के लिए अहम होता है और ये ग्रोथ के लिए भी ज़रूरी है क्योंकि मिलने पर नई-नई चीज़े जानने में मदद मिलती है.''
40 वर्षीय सपना (बदला हुआ नाम) भी एक निजी कंपनी में काम करती हैं.
सपना के अनुसार वे हाइब्रिड मॉडल पर हमेशा काम करना पसंद करेंगी.
वो बताती हैं, ''अगर आपको घर और ऑफ़िस दोनों से ही काम करने का मौका मिलता है तो एक संतुलन बनाना आसान होता है. इसमें घर के काम, बच्चे और ऑफ़िस का काम हो जाता है.
लेकिन जिस दिन उन्हें पूरे दिन कॉल पर रहना पड़ता है उस दिन वे ऑफ़िस जाना पसंद करती हैं क्योंकि कई बार घर पर रहकर उन्हें खाना खाने तक का समय नहीं मिल पाता.
सपना बताती हैं कि ऐसा भी होता है जब घर में रहकर प्राथमिकताएं अगर बदल दी जाएं तो ऑफ़िस और घर दोनों के काम पर असर पड़ता है.
कामकाजी महिलाओं पर शोध

इमेज स्रोत, Aishwarya Joshi
लीड एट क्रिया यूनिवर्सिटी में रिसर्च मैनेजर एश्वर्या जोशी हाल ही में भारत के केंद्रीय , दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व के क्षेत्रों से किए गए शोध का ज़िक्र करती हैं.
वो बताती हैं कि हाइब्रिड वर्क और उससे महिलाओं की काम में भागीदारी पर पड़ने वाले प्रभाव पर हाल ही में 400 महिलाओं के साथ एक शोध किया गया था.
उनके अनुसार, ''आप सैंपल सर्वे छोटा बता सकते हैं पर इसमें से 22 प्रतिशत महिलाओं ने ये बताया कि अगर उन्हें काम करने के दौरान लचीलापन नहीं मिला और लंबा सफर करने के बाद ऑफ़िस आना पड़ेगा तो वो नौकरी छोड़ देंगीं. इसमें से 80 फ़ीसदी महिलाओं ने काम के घंटों में भी लचीलापन देने को अहम बताया है.''
इस सर्वे में कहा गया है कि जिन संस्थाओं में हाइब्रिड मॉडल है वहां सकारात्मकता ज़्यादा दिखी. वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दिए जाने पर विकलांग लोगों को भी काम के ज़्यादा मौक़े मिल सकेंगे.
रोहित कुमार का कहना है ''घर से काम करने के दौरान कामकाजी महिलाएं घर, काम, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल कर पाईं और ऑफ़िस का काम भी अपनी सहुलियत के मुताबिक़ कर पाईं. वहीं आने-जाने का समय भी बचा. कई इलाकों में महिलाओं की आने-जाने की निर्भरता घर के पुरुष पर होती है. ये भी उनके नौकरी छोड़ने का कारण बन जाता है.''
रोहित कुमार दि क्वॉन्टम हब (टीक्यूएच) के सह-संथापक हैं और पॉलिसी एंड रिसर्च के प्रमुख भी रह चुके हैं.
टीक्यूएच की स्थापना हार्वर्ड और ऑक्सफर्ड से पढ़ाई कर चुके लोगों ने 2017 में की थी. ये संस्था भारतीय परिवेश में होने वाली नीतिगत समस्याओं पर सहयोग देने के मक़सद से काम करती है.

इमेज स्रोत, Rohit Kumar
वर्क फ्रॉम होम पर पक्ष और विपक्ष
लेकिन ऐसे भी कई लोग हैं जो केवल ऑफ़िस से ही काम करना पसंद करते हैं और वो इसके लिए अलग-अलग तर्क देते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुषमा रामाचंद्रन कहती हैं कि हर महिला घर से ही काम करना पसंद करती है ये कहना ग़लत होगा और हर काम घर में रहकर करना संभव भी नहीं है.
वो बताती हैं, ''जहां घर छोटे होते हैं वहां जू़म पर मीटिंग में आने में दिक़्कत होती है क्योंकि बच्चों का शोर या घर में चल रहे काम की वजह से डिस्टर्ब हो जाती थी और उससे एकाग्रता पर भी असर पड़ता है.''
वहीं जानकार बताते हैं कि कई ऐसे क्षेत्र हैं जैसे मेडिकल, निर्माण, उत्पादन आदि जहां लोगों को फैक्ट्री या कंपनियों में आकर काम करना ही पड़ेगा ऐसे में हर काम घर से करना संभव नहीं हो सकता है.
ऐसे में ये मांग कई चीज़ों पर असर डालेगी और इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा और इससे भी महिलाएं प्रभावित होंगी.
महिलाओं पर बोझ

इमेज स्रोत, Getty Images
आमतौर पर देखा जाता था कि महिलाएं गर्भधारण के दौरान या उसके बाद नौकरी छोड़ देती हैं और बच्चे के थोड़े बड़े होने पर फिर नौकरी करने लगती हैं.
घर के काम को लेकर चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच ने हर चीज़ का बोझ महिला पर डाला हुआ है और अगर ऐसे ही ये जारी रहेगी तो ये समस्याएं इसी तरह से आगे बढ़ती रहेंगी.
आंबेडकर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, अर्थशास्त्री दीपा सिन्हा कहती हैं, ''पारंपरिक सोच यही रही है कि घर का काम महिलाओं की ज़िम्मेदारी होती है. इस धारणा को बदलकर घर में महिला और पुरुष को समानता के साथ अपने काम बांटने की ज़रूरत है.''
महिलाओं का अर्थव्यवस्था में योगदान

भारतीय उद्योग परिसंघ या सीआईआई के मुताबिक़ भारत में 43.2 करोड़ कामकाजी उम्र की महिलाएं हैं.
इसमें से 34.3 करोड़ महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम कर रही है.
वहीं सकल घरेलू उत्पाद में इन महिलाओं का योगदान 18 फ़ीसदी है.
लैंगिक समानता लाने और महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए भी सरकार की तरफ़ से कई नीतियां लागू की गई हैं.
जहां पंचायत स्तर पर 50 फ़ीसदी आरक्षण दिया गया है. वहीं भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम दुनिया में तीसरे स्थान पर है वहीं यूनिकॉर्न कम्यूनिटी में वो तीसरे बड़े स्थान पर है.
लेकिन इसमें केवल 10 फ़ीसदी महिला संस्थापक हैं.
वर्क फ्रॉम होम की बात की जाए तो रोहित कुमार कहते हैं कि हाइब्रिड ही भविष्य है लेकिन इसे अमलीजामा पहनाने को लेकर कंपनी और कर्मचारियों में बहस जारी है.
वो मानते हैं भविष्य में कंपनियों को अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा.
वहीं सुषमा रामाचंद्रन का कहना है कि इसे लेकर लचीला रुख़ अपनाने की ज़रूरत है.
जहां संभव हो वहां हफ़्ते में कुछ दिन घर से और कुछ दिन ऑफ़िस बुलाकर काम करवाया सकता है, लेकिन इसके लिए दबाव ठीक नहीं होगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












