कंपनियां क्यों दे रही हैं अलग-अलग कर्मचारियों को अलग तरह की सुविधाएं

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क्या आप उस पीढ़ी से हैं जो एक ओर तो अपने बुज़ुर्ग माता-पिता का ख़्याल रख रही है तो दूसरी ओर अपने बच्चों की परवरिश और पढ़ाई का भी ध्यान रख रही है?

ऐसा दौर हर किसी के जीवन में आता है. इन दिनों जेन एक्स, यानी 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोगों को अपनी ज़िंदगी, करियर और सेहत का ख़्याल रखने के साथ-साथ ये सब ज़िम्मेदारियां भी उठानी पड़ रही हैं.

लेकिन ये सब करना आसान नहीं होता. ऐसे में इस उम्र के लोग बेहतर नौकरी की तलाश करते हैं जहां उनकी आर्थिक और अन्य ज़रूरतें पूरी हो सकें.

संस्थानों और कंपनियों को भी यह पता है कि अगर वे इन कर्मचारियों को अपने साथ बनाए रखना चाहती हैं तो उन्हें कुछ ख़ास करना होगा. कुछ ऐसा, जिससे उनके कर्मचारियों को अपने जीवन में आ रही चुनौतियों से निपटने में मदद मिले.

यही कारण है कि दुनिया भर में ऐसी कंपनियों की संख्या बढ़ रही है जो मिड-लाइफ़ (40-45 से लेकर 65 की उम्र) के दौर में चल रहे कर्मचारियों को स्वास्थ्य की देखभाल के लिए दी जाने वाली हेल्थ चेकअप या हेल्थ इंश्योरेंस जैसी सुविधाओं के अलावा भी नई सुविधाएं देने लगी हैं.

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क्या बदल रहा है अब?

हाल ही में क्लाउड सॉफ्टवेयर कंपनी सेल्सफ़ोर्स ने अमेरिका में अपने कर्मचारियों के लिए ‘एल्डरकेयर बेनेफ़िट स्कीम’ लॉन्च की ताकि वे अपने बुज़ुर्ग परिजनों का ख़्याल रख सकें. इसके अलावा, 50 से ज़्यादा उम्र के कर्मचारियों को कैंसर की जांच से जुड़ी सुविधा भी दी जा रही है.

इसी तरह, अमेरिकी सॉफ़्टवेयर कंपनी अडोबी अपने कर्मचारियों के बच्चों का दाख़िला यूनिवर्सिटी में करवाने और बुज़ुर्गों की घर में ही देखरेख का इंतज़ाम करवाने में मदद कर रही है.

कई सारी कंपनियों ने मेनोपॉज़ सपॉर्ट कार्यक्रम भी शुरू किए हैं ताकि महिला कर्मचारियों को रजोनिवृत्ति के समय आने वाले बदलावों से निपटने में मदद मुहैया करवाई जा सके.

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तेल अवीव यूनिवर्सिटी के कॉलर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफ़ेसर पीटर बैमबर्गर ने बीबीसी वर्कलाइफ़ के लिए रेबेका एम. नाइट से बात करते हुए कहा, “इन सुविधाओं को देने के पीछे के कारण सिर्फ़ आर्थिक नहीं हैं. बल्कि इन सुविधाओं का असर कर्मचारी के बच्चों और माता-पिता पर पड़ता है. ऐसे में कंपनियां सिर्फ़ आर्थिक सहायता नहीं कर रहीं बल्कि कर्मचारियों के साथ मज़बूत भावनात्मक रिश्ता बना रही हैं कि हमें आपकी फ़िक्र है.”

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के व्यवसाय प्रबंधन और औद्योगिक प्रशासन विभाग में प्रोफ़ेसर तनुजा अग्रवाल कहती हैं कि कंपनियां ये सब बेनेफ़िट यानी सुविधाएं इसलिए दे रही हैं ताकि हुनरमंद लोगों को अपने यहां काम करने के लिए आकर्षित कर सकें.

उन्होंने बीबीसी के सहयोगी आदर्श राठौर को बताया कि कंपनियों के बीच प्रतिभावान कर्मचारियों को तलाशने की होड़ रहती है. उनके मुताबिक़, विकल्प भले बहुत हों मगर हुनरमंद कर्मचारी तलाशना आसान नहीं है. इसलिए कंपनियां इस मामले में बाक़ी कंपनियों से बाज़ी मारना चाहती हैं.

वह कहती हैं, “अच्छे कर्मचारी बहुत मायने रखते हैं. ऐसे में कंपनियां चाहती हैं कि वे उनके यहां रुके रहें और अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित रहें. इसके अलावा, कंपनियों को अपने कर्मचारियों में विविधता (लिंग, उम्र आदि) के कारण ऐसी नीतियां बनानी पड़ती हैं जिनसे सभी वर्गों की ज़रूरतों का ख़्याल रखा जा सके.”

कंपनियों की ओर से कर्मचारियों को दी जा रही सुविधाएं किसी तरह का ‘परोपकार’ नहीं है. शोध बताते हैं कि कर्मचारियों को उनकी ज़रूरतों के हिसाब से सुविधाएं और लाभ देने से रिटेंशन (नौकरी में टिके रहने) और प्रदर्शन, दोनों पर असर पड़ता है.

बीबीसी वर्कलाइफ़ पर प्रकाशित लेख के अनुसार, गार्टनर के एक शोध में पाया गया कि इस तरह के लाभ देने से कर्मचारियों के उसी कंपनी में रुके रहने की दर में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जबकि उत्पादकता 12 प्रतिशत बढ़ गई.

प्रोफ़ेसर बैमबर्गर कहते हैं, “कंपनियां जानती हैं कि बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए किसी को तलाशना या उनकी देखभाल के लिए सही जगह का चुनाव करने में समय भी लगता है और इस दौरान भावनात्मक दबाव भी रहता है. इन कामों के लिए कर्मचारी को काफ़ी समय लग सकता है. ऐसे में अगर कंपनियां मदद करती हैं तो कर्मचारी काम के लिए उपलब्ध रहेगा और उसका मन भी काम में लगेगा.”

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मिड-लाइफ़ सपोर्ट

इस समय कामकाजी वर्ग में अलग-अलग आयुवर्गों के लोग हैं और सभी की ज़रूरतों को एक ही तरह की सुविधाओं से पूरी नहीं किया जा सकता.

अमेरिका की एचआर कंसल्टेंसी ‘नेक्सट लेवल बेनेफ़िट्स’ की सीईओ लॉरेन विनन्स ने बीबीसी वर्कलाइफ़ के लिए रेबेका एम. नाइट्स को बताया, “कंपनियां अपने कर्मचारियों में मौजूद अलग-अलग लोगों और उनकी मांगों पर ध्यान दे रही हैं. वे देख रही हैं कि यह व्यक्ति ज़िंदगी में कहां पर है, किस चीज़ का सामना कर रहा है और कैसे हम अपने पैसे का सार्थक ढंग से निवेश कर सकते हैं.”

विनन्स कहती हैं कि जेन X को नई तरह की सुविधाएं देना महत्वपूर्ण है. वह कहती हैं, “जेन X के लोग अपने संस्थानों में सीनियर पदों पर हैं और लीडर की भूमिका में हैं. अगर वे अभी उस स्तर पर नहीं हैं तो जल्द पहुंचने वाले हैं. ऐसे में कंपनियां चाहती हैं कि ये लोग उनके पास रुके रहें.”

‘मेनोपॉज़ सपोर्ट’ के फ़ायदे

कंपनियों द्वारा दी जा रही नई तरह की सुविधा है- मेनोपॉज़ सपोर्ट. एक शोध के मुताबिक, यह सुविधा न सिर्फ़ कर्मचारियों, बल्कि कंपनियों के लिए भी फ़ायदेमंद है.

बीबीसी वर्कलाइफ़ के अनुसार, मायो क्लीनिक ने अप्रैल में एक शोध प्रकाशित किया था. इसमें कहा गया था कि मेनोपॉज़ के दौरान आने वाली परेशानियों के कारण हर साल महिलाएं जितने घंटे काम नहीं कर पाती हैं, उससे क़रीब 1 अरब 80 करोड़ डॉलर का नुक़सान होता है.

अमेरिकी बायोटेक कंपनी जेनेंटेक में 54 फ़ीसदी महिलाएं हैं और कर्मचारियों की औसत उम्र 45 साल है.

इस कंपनी ने इसी साल अपने 13500 कर्मचारियों, उनकी पत्नी या पार्टनर के लिए एक विशेष सुविधा पेश की है. इससे वे मेनोपॉज़ के लक्षणों से निपटने के लिए डॉक्टर से वीडियो अपॉइंटमेंट ले सकते हैं या फिर रेफ़र किए जाने पर डॉक्टर से मिल भी सकते हैं.

कंपनी की चीफ़ पीपल ऑफ़िसर कोरी डेविस कहती हैं, “हमारी कई कर्मचारी यहीं नौकरी करते हुए मेनोपॉज़ से गुज़रेंगी. ऐसे में हम नहीं चाहते हैं कि उन्हें कोई दिक्कत हो.”

अमेरिकी कंपनी सिस्को ने इस साल से अपने कर्मचारियों के लिए नई सुविधा दी है, जिससे वे अपने बुज़ुर्ग माता-पिता, विकलांग बच्चे या अचानक किसी बीमारी की चपेट में आने वाले कर्मचारी की देखभाल कर सकते हैं.

सिस्को के ग्लोबल बेनेफिट्स लीडर स्कॉट फ़्लॉएड कहते हैं कि ये सुविधा जून में किए गए सर्वे के आधार पर दी गई.

सर्वे में पाया गया था कि कई कर्मचारी, खासकर महिलाएं, परिजनों की देखभाल कर रही हैं और परेशान हैं. ज़्यादा दिक्कत जेन X की महिलाओं को थी.

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सुविधाओं से क्या फ़र्क़ पड़ता है?

यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ ऑस्ट्रेलिया में प्रोफ़ेसर कैरल कुलिक ने बीबीसी वर्कलाइफ़ को बताया कि कर्मचारियों को दिए जाने वाले लाभों और सुविधाओं का सांकेतिक महत्व होता है.

वह कहती हैं, “ये बेनेफ़िट मनोवैज्ञानिक तौर पर भी महत्वपूर्ण होते हैं. इससे एक संदेश जाता है कि कंपनी आपकी योग्यता और आप जैसे लोगों की कद्र करती है.”

डीयू में प्रोफ़ेसर तनुजा अग्रवाल भी कहती हैं कि कर्मचारी सिर्फ़ एक नौकरी नहीं तलाश रहे होते हैं बल्कि उन्हें ऐसा लाइफ़स्टाइल चाहिए होता है जिसमें उन्हें संतुष्टि, तरक्की, वर्कलाइफ़ बैलेंस और एक तरह के रिश्ते का अहसास हो.

शोध बताते हैं कि भले ही कर्मचारी इन सुविधाओं का लाभ न उठाएं, लेकिन इनका बहुत फ़र्क़ पड़ता है.

उदाहरण देते हुए प्रोफ़ेसर कैरल कुलिक कहती हैं कि भले ही अभी कर्मचारियों को किसी सुविधा की ज़रूरत न हो, लेकिन उन्हें लगेगा कि भविष्य में ज़रूरत पड़ेगी तो उन्हें कंपनी से वह सुविधा मिल जाएगी.

वह कहती हैं, “ये सुविधाएं कर्मचारियों पर अच्छा असर डालती हैं. इससे लोगों को उम्रदराज़ होना बोझ नहीं लगता.”

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‘कैफ़ेटेरिया बेनेफ़िट’

'नेक्सट लेवल बेनेफिट्स’ की सीईओ लॉरेन विनन्स कहती हैं कि ये चुनौतियां पहले भी थीं. लेकिन यह संयोग नहीं है कि कंपनियां अब जाकर ये सुविधाएं देने लगी हैं.

वह कहती हैं, “आर्थिक अनिश्चितताओं को देखते हुए अब कंपनियां सावधानी से बजट ख़र्च कर रही हैं. अगर आपको बजट घटाना है तो आप इंश्योरेंस और रिटायरमेंट प्लान पर कैंची चलाएंगे. बदले में आप ऐसी सुविधाएं देंगे जो सस्ती पड़ें.”

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर तनुजा अग्रवाल कहती हैं कि कंपनियों को समझना चाहिए कि अगर कर्मचारियों को नौकरी बदलने से रोके रखना है तो अपने यहां ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिससे उन्हें काम के दौरान और उसके इतर भी सम्मान मिले. इसके लिए कंपनियों को दो स्तर पर काम करना चाहिए- करियर ग्रोथ और पर्सनल बैलेंस.

वह बताती हैं, “कई बार कंपनियां ऐसे बेनेफ़िट दे रही होती हैं जिनका कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं मिल रहा होता. ये बात कर्मचारियों और नौकरी देने वालों, दोनों के लिए ख़राब है.”

प्रोफ़ेसर तनुजा कहती हैं, “बदलते माहौल, कर्मचारियों की बदलती ज़रूरतों और विविधता को देखें तो कोई एक ऐसा आदर्श प्लान नहीं हो सकता जो सभी के लिए काम का हो. ऐसे में, कैफ़ेटेरिया अप्रोच, जिसे फ़्लेक्सिबल या बफ़े अप्रोच भी कहते हैं, उसके माध्यम से कर्मचारियों को बहुत सारे विकल्पों में से अपनी उम्र के दौर के हिसाब से सुविधाएं और लाभ चुनने की आज़ादी मिलनी चाहिए.”

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