पसंदीदा काम को लेकर घट रहे जुनून को फिर कैसे बढ़ाएं?

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

तरुण गोयल एक ट्रेकर और ट्रैवल ब्लॉगर हैं. उन्हें हिमालय के प्राचीन दर्रों और उन पुरानी पगडंडियों को नापना पसंद है जो अब सड़कें बन जाने के कारण वीरान हैं.

बर्फ़ीले बीहड़ों में कई मील की मुश्किल यात्राओं में आई चुनौतियों और उनसे जूझने के अनुभव पर उन्होंने एक किताब भी लिखी है- सबसे ऊंचा पहाड़.

बहुत से लोग सोशल मीडिया पर तरुण को मेसेज भेजकर बताते हैं कि वे उनकी किताब को पढ़कर ट्रेकिंग के लिए प्रेरित हुए. मगर तरुण का कहना है कि आज वह ख़ुद ट्रेकिंग और उससे संबंधित लेखन, दोनों के लिए अपना जुनून खोते जा रहे हैं.

वह कहते हैं, “मैंने दूसरी किताब काफ़ी पहले पूरी कर ली थी. मगर फिर सोचता हूं कि इसे छपवाने और बेचने में कितनी माथापच्ची होगी. साथ ही अब भयंकर ठंड में बर्फ़ पर चलने, तंबू में रहने और कई मुश्किलों को झेलने का मन नहीं करता.”

हममें से कई लोगों के अनुभव तरुण की तरह रहे होंगे. पहले हमें कुछ कामों या गतिविधियों में बहुत रुचि रही होगी लेकिन धीरे-धीरे उनके प्रति उत्साह कम हो गया होगा. ऐसा नौकरी-पेशे के मामले में भी हो सकता है.

‘दि एक्सपेक्टेशन इफ़ेक्ट: हाउ योर माइंडसेट कैन ट्रांसफ़ॉर्म योर लाइफ़’ किताब के लेखक डेविड रॉबसन जब छह साल के थे, तभी उनके मन में लेखक बनने का जुनून पैदा हो गया था.

आज वह एक लेखक और पत्रकार के तौर पर ख़ुद को भाग्यशाली मानते हैं जो बचपन के सपने को पूरा कर पाए. लेकिन उनके जीवन में कई दौर ऐसे भी आए, जब इस काम को लेकर उनका जुनून कम हो गया.

वह बताते हैं, “लंदन में जनवरी के दौरान मिज़ाज कुछ बोझिल सा हो जाता है. एक ही तरह का काम करना इतना थकाऊ हो जाता है मानो कभी न रुकने वाली ट्रेडमिल पर दौड़ रहा हूं. मन करता है कि इससे कूदकर हट जाऊं.”

लेकिन वह अकेले नहीं हैं. सोशल मीडिया पर पिछले दिनों क्वाइट क्विटिंग (quiet quitting) का चलन देखने को मिला था. इसका मतलब है कि नौकरी में अंतुष्ट होने पर आप नौकरी छोड़ने के बजाय बस काम चलाने भर काम करते हैं, अलग से मेहनत नहीं करते.

ऐसा तब होता है जब लोग नौकरी में तरक्की के लिए बहुत मेहनत करते हैं लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हो पातीं.

कुछ लोगों के लिए किसी एक काम में जुनून ख़त्म होने का मतलब है कि अब करियर को बदलने का समय आ गया है. लेकिन करियर बदलना हमेशा संभव नहीं होता.

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शोध बताते हैं कि कुछ लोग किसी काम को लेकर उत्साह और प्रेरणा बनाए रखने के लिए स्वाभाविक तौर पर कई तरह के अलग-अलग तरीके अपनाते हैं.

अमेरिका के ऑस्टिन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में मनोविज्ञान की प्रोफ़ेसर पैट्रिशिया चेन ने भी इसी विषय पर शोध किया है.

अपने पिछले शोध में उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की थी कि काम को लेकर जुनून से सम्बंधित दो अलग-अलग मानसिकताओं, ‘फ़िट थ्योरी’ और ‘डिवेलप थ्योरी’ का असर क्या रहता है.

‘फ़िट’ वाली मानसिकता रखने वाले मानते हैं कि हर व्यक्ति के लिए कोई एक ख़ास काम ही सही रहता है. किसी काम को लेकर उसका जुनून, ख़ुशी और कामयाबी इस पर बात पर निर्भर करते हैं कि वह काम उसकी पसंद का है या नहीं.

वहीं ‘डिवेलप’ वाली सोच रखने वाले मानते हैं कि जब आप किसी काम को सीखने की प्रक्रिया से गुज़रते हैं तब उसे लेकर जुनून पैदा हो जाता है. जैसे ही आप किसी काम में बेहतर होते हैं, आपको अपने काम से उतना ही प्यार होने लगता है.

‘फ़िट’ और ‘डिवेलप’ थ्योरी को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर इशिता उपाध्याय कहती हैं कि साधारण शब्दों में समझें तो एक थ्योरी कहती है कि वह काम करना चाहिए, जिसमें आपको आनंद आए, जबकि दूसरी कहती है कि आप जो काम करते हैं, उसमें आनंद लेना चाहिए.

डॉ. इशिता कहती हैं, “फिट थ्योरी के मुताबिक़, किसी को काम के प्रति तभी जुनून पैदा होता है जब वह उसकी रुचि का हो. यह एक तरह से अमेरिकी अवधारणा है जिसमें व्यक्ति, काम से महत्वपूर्ण होता है. जबकि एशियाई संस्कृति में यह माना जाता है कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे अपने काम को पसंद करता चला जाता है. यह सोच ज़्यादा मानवीय है."

प्रोफ़ेसर पैट्रिशिया चेन ने अपने शोध के दौरान कई सारे प्रश्नों के माध्यम से अलग-अलग जगह काम करने वाले लोगों की मानसिकता और उनके प्रदर्शन को आंका. उन्होंने पाया कि लोगों को वैसे ही नतीजे देखने को मिलते हैं, जैसी उनकी सोच होती है.

जैसे कि फ़िट मानसिकता वाले लोगों को ऐसी नौकरी में ख़ुशी तलाशने में दिक्कत होती है जो उनकी रुचि की न हो. वहीं डिवेलप मानसिकता वाले लोगों को अलग-अलग तरह के कामों में मज़ा आता है और उनमें उनकी रुचि भी पैदा हो जाती है. इससे समय के साथ उनकी संतुष्टि बढ़ती चलती है, भले ही नौकरी उनकी सारी उम्मीदों पर खरी न उतर रही हो.

इस शोध के बाद प्रोफ़ेसर चेन को यह पता लगाना था कि डिवेलप वाली मानसिकता रखने वाले लोग अलग-अलग हालात में अपना जुनून कैसे बनाए रखते हैं. वे ऐसे कौन से तरीके अपनाते हैं कि काम करने को लेकर उनकी ललक बनी रहती है.

इसके लिए उन्होंने अलग-अलग विषयों की पढ़ाई कर रहे 316 अंडरग्रैजुएट छात्रों पर सर्वे किया और पूछा कि जिन विषयों को वे पढ़ रहे हैं, उन्हें लेकर उनके उत्साह में कब और कैसे बदलाव आया.

इन छात्रों से मिले सैकड़ों जवाबों से पांच ऐसी रणनीतियों की पहचान की जिनकी मदद से इन छात्रों ने विषय की पढ़ाई को लेकर अपने जुनून को बनाए रखा था.

क्या करें

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1. अपने लिए महत्वपूर्ण बातों की पहचान करना:

बिज़नस की पढ़ाई करने वाला छात्र यह सोचने की कोशिश कर सकता है कि थ्योरी से मिलने वाले ज्ञान से उसे एक स्टार्ट अप शुरू करने में मदद मिल सकती है.

2. सामाजिक नज़रिये से महत्वपूर्ण बातों की पहचान करना

छात्र सोच सकता है कि जो विषय वह पढ़ रहा है, उससे मिलने वाले ज्ञान से उसे समाज और दुनिया के बारे में समझ विकसित करने में मदद मिलेगी.

3. जानकारियां जुटाना

नई जानकारियां हासिल करने पर आपके अंदर और ज़्यादा जानने की ललक पैदा हो सकती है. हमें अपनी पसंद के विषयों की पहचान करने में मदद मिल सकती है. अगर कोई हतोत्साहित महसूस करे तो उसे कोई नया स्किल सीखना चाहिए.

4. व्यावहारिक अनुभव हासिल करना

कई छात्रों ने पाया कि इंटर्नशिप या काम का प्रैक्टिकल अनुभव लेने से उनमें पढ़ाई करने का जोश जगा.

5. सलाहकार तलाशना और माहौल बदलना

छात्र ऐसे अध्यापक तलाश सकते हैं जिनसे उन्हें प्रेरणा मिलती हो. या फिर ऐसे दोस्त जो उनके काम को मज़ेदार बनाएं.

प्रोफ़ेसर चेन ने यह भी पाया कि डिवेलप वाली मानिसकता रखने वाले छात्रों का उनके विषय में समय के साथ जुनून बढ़ा था जबकि फ़िट वाली सोच रखने वाले छात्र इस तरह के तरीके नहीं अपना पाए थे.

प्रेरित कैसे हों?

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प्रोफ़ेसर चेन का शोध भले ही छात्रों पर केंद्रित था, लेकिन इसके नतीजे काम को लेकर रुचि और प्रेरणा के सम्बंध में हुए व्यापक मनोवैज्ञानिक शोधों के नतीजों से मेल खाते हैं.

इस शोध के दौरान उन्हें ऐसे तरीके भी मिले, जिन्हें अपनाकर आप ख़ुद को किसी काम करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और उत्साह को बनाए रख सकते हैं.

ऐसे दो उपयोगी तरीके हैं- प्रॉक्सिमल गोल सेटिंग (नज़दीकी लक्ष्य तय करना) और सेल्फ़ कॉन्सिक्वेटिंग (अपने लिए कोई सज़ा या इनाम तय करना).

ये तकनीक तब काम आती हैं जब आपको ऐसा काम मिला हो जिसमें चुनौतियां तो कई हों मगर बदले में मिलने वाला लाभ कम. ऐसे में काम को शुरू करने के लिए कोई प्रेरणा नहीं मिल रही होती.

ऐसे में प्रॉक्सिमल गोल सेटिंग के तहत आपको इस प्रॉजेक्ट को छोटे-छोटे कई कामों में बांटना होगा, जिन्हें जल्दी से पूरा किया जा सकता हो. फिर जब आप उन कामों को निपटाते चलेंगे तो आपको संतुष्टि होती चलेगी.

जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मुंस्टर में पोस्ट डॉक्टरल शोधार्थी माइकी ट्रॉटनर कहती हैं कि यह तरीका तब असरदार होता है जब आप छोटे काम निपटाने के बाद ख़ुद को कोई इनाम दें. जैसे कि नेटफ्लिक्स देखें या कुछ और पसंद का काम करें. इसे सेल्फ़ कॉन्सिक्वेटिंग कहा जाता है.

क्या करना चाहिए?

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‘डिवेलप’ मानसिकता के लोगों में ऊपर बताई गई रणनीतियां स्वाभाविक तौर पर होती हैं. लेकिन प्रोफ़ेसर चेन का शोध बताता है कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है.

उनके शोध में शामिल ज़्यादातर छात्र फ़िट मानिसकता वाले थे. ऐसे में अगर उन्हें बताया जाए कि उनमें भी जुनून और प्रेरणा बढ़ाने की क्षमता है तो यह उनके लिए फ़ायदेमंद हो सकता है.

इन तरीकों को पढ़ाई ही नहीं, अन्य कामों में भी आज़माया जा सकता है. नौकरी और करियर के मामले में भी.

अपने जीवन के बड़े लक्ष्यों के बारे में विचार करने, अपने काम से दूसरों को हो रहे फ़ायदे के बारे में सोचने, प्रेरित करने वाले सहकर्मियों की मदद लेने और अपने लिए छोटे-छोटे इनाम तय करने से आप काम को लेकर अपना जुनून बढ़ा सकते हैं.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सारी ज़िम्मेदारी आपको ही उठानी है.

एना के. शैफ़नर ब्रिटेन में लाइफ़ कोच हैं. वह कहती हैं, “आपको बॉस से बात करके अपनी पसंद और रुचि वाला काम लेने की कोशिश करनी चाहिए. नौकरी देने वालों को भी इस मामले में उदार रवैया अपनाना चाहिए क्योंकि इससे उनके कर्मचारी अच्छा प्रदर्शन कर पाएंगे.”

शैफ़नर यह भी कहती हैं कि अगर आपको लग रहा है कि आप अपने करियर में फंस से गए हैं तो हो सकता है कि आप कुछ ज़्यादा उम्मीदें रख रहे हों. इससे असंतोष बढ़ सकता है.

वह सलाह देती हैं, “कोई शौक़ (हॉबी) पकड़िए. इससे आपको एक मक़सद मिलेगा, संतुष्टि भी मिलेगी. सिर्फ़ नौकरी ही जीवन में संतुष्टि पाने का एकमात्र ज़रिया नहीं है.”

(आप मूल कहानी को यहां पढ़ सकते हैं.)

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