बोर होते लोगों के ब्रेन के लिए ये है ‘गुड न्यूज़’

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- Author, अलमुडेना डी कैबो
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
कोई आपसे कहे कि चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठो और कुछ मत करो, तो आपका दिमाग इसे सीधे कुबूल नहीं करेगा, बल्कि ये ख्याल बार-बार आएगा कि कैसे कुछ अधूरे छूटे टास्क और दूसरे जरूरी काम पूरा कर लें.
आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में ये आम बात है. हर किसी को लगता है कि सोशल मीडिया पोस्ट से लेकर सभी ईमेल देखने, सारे टास्क पूरा करने और परिवार के साथ वक्त बिताने के लिए दिन के 24 घंटे कम पड़ जाते हैं.
इस दौरान ऐसा भी होता है, जब आप कोई काम नहीं कर रहे होते हैं, तब दिल बहलाने के लिए अपने मोबाइल में लग जाते हैं. कभी किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर कमेंट का जवाब देते हुए, तो कभी कुछ और चीजें ढूंढते हुए.
तब हर किसी के ज़ेहन में ये ख्याल नहीं आता कि बोर होना भी एक सहज विकल्प है.
कुछ लोग अपने ख्यालों, विचारों के साथ अकेला रहने की बजाय खुद को 'बिजली का झटका देना' पसंद करते हैं.. ये बात मशहूर साइंस जर्नल में छपी एक रिसर्च में सामने आई है.
शोध के लिए किए गए एक प्रयोग के तहत कुछ लोगों को 15 मिनट तक अकेले एक कमरे में बिठाया गया था. इन सभी लोगों से कहा गया कि इस दौरान उन्हें कुछ नहीं करना है. सिर्फ एक विकल्प था- एक बटन दबाना, जिससे इन्हें बिजली के हल्के झटके लगेंगे.
इलेक्ट्रिक शॉक हल्का ही सही, ये किसी को भी अच्छा नहीं लगता. लेकिन हैरानी की बात ये थी कि प्रयोग में शामिल ज़्यादातर लोगों, खासतौर पर पुरुषों ने बाहरी संवेदी उत्तेजनाओं से वंचित होना बेहतर समझा.
प्रयोग में शामिल 42 लोगों में से क़रीब आधे लोगों ने कम से कम एक बार वो बटन दबाया, जबकि इन्हें बिजली के झटके का एहसास पहले हो चुका था.
इसमें एक शख्स तो ऐसा था जिसने 15 मिनट खाली बैठे रहने के दौरान 190 बार बटन दबाया. इस प्रयोग के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक "ऐसा लगता है ज़्यादातर लोग खाली बैठे रहने के दौरान भी कुछ न कुछ करने की कोशिश करते हैं"

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हमेशा सक्रिय रहने वाला इकलौता अंग
हमारा मस्तिष्क दरअसल चौबीसों घंटे काम करता रहता है. हमारे सोने के बाद भी इसका काम जारी रहता है. इस दौरान ये सुनता है और तनाव पैदा करने वाले सभी कारकों को मैनेज करता है ताकि आप सुरक्षित तरीके से अच्छी नींद ले सके.
इस दौरान आपको पता नहीं चलता, फिर भी आपका दिमाग फैसले लेता है, समस्याओं के समाधान ढूंढता है और नई संभावनाओं के बारे में सोचता है.
हमारे शरीर में हमेशा 'ऑन' रहने वाला ये अंग कभी ब्रेक या छुट्टी नहीं लेता. लेकिन न्यूरोसाइंटिस्ट्स ये भी कहते हैं कि हमारे मस्तिष्क की भी एक सीमा होती है.
नींद ऐसी ही एक प्रक्रिया है, जिसमें हमारा दिमाग भले ही काम कर रहा होता है, लेकिन इस दौरान वो खुद को दुरुस्त भी करता है. इसलिए नींद के साथ बोर होना भी हमारी सेहत के लिए जरूरी होता है.
इटली के लोग बोर होने की इस खूबी से अच्छी तरह वाकिफ हैं. वहां तो एक कहावत भी है- कुछ नहीं करने का सुख. ये वहां के कल्चर का हिस्सा है, जिसके तहत लोग आराम करते हैं और कुछ नहीं करने वाली स्थिति का आनंद उठाते हैं.
कुछ नहीं करने से मतलब झपकी लेना नहीं, बल्कि इसके मायने और भी गहरे हैं. इसका सही मतलब है ख़ुद को रोजमर्रा की आपाधापी से अलग करना, अपने अंदर झांकना, आराम करना और ये महसूस करना कि आप वर्तमान में जी रहे हैं.
बोरियत में बढ़ती है क्रिएटिविटी
अमेरिका के रेन्सलेयर पॉलिटेक्नीक इंस्टीट्यूट के कॉग्निटिव साइंसेज डिपार्टमेंट में बतौर रिसर्चर काम कर रहीं न्यूरोसाइंटिस्ट एलिसिया वॉफ कहती हैं-" कभी कभार खुद को बोर होने देना ब्रेन हेल्थ के लिए जरूरी है."
फोर्ब्स पब्लिकेशन को दिए अपने स्टेटमेंट में एलिसिया आगे बताती हैं "बोर होने से हमारे समाजिक संबंध बढ़ते हैं. इस बारे में कई सोशल न्यूरोसाइंटिस्ट की खोज ये साफ कर चुकी है कि हमारे ब्रेन की नेटवर्किंग तब सबसे ज्यादा सक्रिय होती है जब हम कुछ करना बंद कर देते हैं. बल्कि यूं कहे तो बोरियत में क्रिएटिव आइडिया पनप सकते हैं. ये अजन्मे विचारों के बेहतर आइडिया में बदलने का मुफ़ीद वक्त होता है."
इसे विस्तार से बताते हुए एलिसिया आगे कहती है- "बोरियत वाले लम्हें हमें भले ही बेकार, खाली और गैरज़रूरी लगते हैं, लेकिन इस दौरान हमारे दिमाग में तमाम रणनीतियां और समस्याओं के समाधान कुलबुला रहे होते हैं. इस दौरान हमारे काम नहीं करने से ब्रेन को भी आराम मिल जाता है. कई मशहूर लेखक ये दावा कर चुके हैं कि उनके दिमाग में कई क्रिएटिव आइडियाज़ तब आए जब वे नहाने, घास छीलने या घर के फर्नीचर इधर से उधर करने जैसे काम कर रहे थे. इस तरह के पल को 'इनसाइट' (अंतरदृष्टि) कहा जाता है."
2019 में 'अकैडमी ऑफ मैनेजमेंट डिस्कवरीज़' में छपी एक स्टडी में एक और दिलचस्प बात सामने आई थी। स्टडी में शामिल शोधकर्ताओं ने एक ग्रुप को बीन्स को उनके रंग के हिसाब से छांटने का बोरिंग टास्क दिया था. जबकि दूसरे ग्रुप को इससे बेहतर काम सौंपा था.
टास्क के बाद इन दोनों ग्रुप्स के लोगों से कहा गया कि वो देर से आने का बेहतर से बेहतर बहाने बनाएं. शोधकर्ताओं ने पाया कि जिस ग्रुप को बोरिंग काम सौंपा गया था, उन्होंने उस ग्रुप से बेहतर बहाने बनाए, जिन्हें उनके मुकाबले बढ़िया काम दिया गया था.
'Art of Being Bored' नाम की किताब में ब्रिटिश सायकोलोजिस्ट सैंडी मान की भी दलील कुछ ऐसी है. वो कहती हैं 'बोरियत की भावना इतनी तगड़ी और प्रेरक होती है कि ये रचनात्मकता और विचारोत्तेजना को बढ़ा सकती है.'
बोरियत को लेकर सैंडी चेताते हुए कहती है "बोरियत एक जटिल दुष्चक्र है क्योंकि आप बोर तब होते हो जब आप किसी चीज़ को लेकर उत्तेजित होते हो. लेकिन इससे उबरने के लिए भी आपको वैसी ही उत्तेजना ज्यादा से ज्यादा चाहिए."
बोरियत पर पिछले 20 साल से रिसर्च कर रही सैंडी की राय में सबसे बड़ी समस्या इसकी छवि को लेकर है. बोरियत को गहराई से समझने की जरूरत है, तभी आप इसे सकरात्मक तरीके से देख सकते हैं.
बीबीसी से बातचीत में सैंडी आगे बताती हैं "ये एक इमोशन है, जो दिमाग में उत्सुकता की तलाश के दौरान पैदा होती है. अगर आप किसी ऐसी चीज की तलाश में है जो आपको रोमांचित करे. वो चीज़ जब आपको नहीं मिलती तब आपके अंदर एक निराशा पैदा होती है. वही बोरियत है."
सैंडी की राय में जब बच्चे बोर हों, तो पैरेंट्स को परेशान नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें छोड़ देना चाहिए. वो कहती है "बोरियत के बारे में अच्छी बात ये है कि इस दौरान आपको कुछ खास करना नहीं पड़ता. इसलिए अपनी बोरियत से खुद लड़ना उन्हें सीखने दें. उनके अंदर की क्रिएटिविटी इसी तरह से उजागर होगी."

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बोरियत से बढ़ता है ध्यान
जिस तरह नींद हमारे मस्तिष्क के लिए उपयोगी होती है, उसी तरह बोरियत या दुविधा की स्थिति भी दिमाग की सेहत के लिए जरूरी है.
न्यूयार्क टाइम्स में छपे अपने एक लेख में टिम क्रेइडर कहते हैं "खाली बैठना कोई अवकाश, भोग-विलास या बुरी बात जैसी कोई चीज़ नहीं. ये हमारे दिमाग के लिए उतना ही जरूरी है जैसे हमारे शरीर के लिए विटामिन डी. इसकी कमी होने से हमें रिकेट्स जैसी मानसिक परेशानी पैदा करने वाली बीमारी से जूझना पड़ता है."
अमेरिका की एक मैगजीन 'साइंटिफिक अमेरिकन' में भी बोरियत जैसी उलझन भरी स्थिति के फायदे गिनाते हुए लंबा चौड़ा लेख छपा है. इसमें टिम क्रेइडर कहते हैं "दुविधा या उलझन की स्थिति हमारे दिमाग में ध्यान और प्रेरणा का भंडार बढ़ाती है, इसके रचनाशीलता और उपयोगिता बढ़ती है. ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में बेहतर प्रदर्शन और स्थाई यादें बनाने में मददगार होती है."
'साइकोलॉजी टुडे' में छपे एक आर्टिकल में भी इस बात की तरफ इशारा किया गया है कि जरूरत से ज्यादा सूचनाएं होने की वजह से हमारा ध्यान भटकता है. इसकी अवधि कम होती है.
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस के प्रोफेशर शाहराम हेश्मत कहते हैं "जरूरत से ज्यादा बोझिल दिमाग और दबाव से राहत पाने के लिए ब्रेक लेना बेहद जरूरी होता है. सोशल मीडया और बोरियत पैदा करने वाले दूसरे माध्यमों से कुछ समय के लिए अलग होना भी बेहद फायदेमंद होता है."
एक्सपर्ट्स के मुताबिक सूचनाओं की भरमार वाले इस युग में हमारे मस्तिष्क पर डेटा और ध्यान बंटाने वाली दूसरी चीजों का बोझ लगातार बढ़ रहा है. यानी जितनी ज्यादा सूचनाएं, उतना ही ज्यादा ध्यान में कमी.

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मानसिक सेहत के लिए लाभकारी
अपनी किताब 'Art of Being Bored' में सैंडी मान लिखती हैं 'डे ड्रीमिंग' रोजमर्रा की आपाधापी के बीच राहत की एक सांस की तरह होती है. ये बात कई सारे अध्ययनों में साबित की जा चुकी है.
मिसाल के लिए आज के जमाने में दफ्तर के ईमेल, सोशल मीडिया और डेटिंग एप्स पर लगातार व्यस्तता आपके ब्रेन की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करती हैं. इसलिए दोबारा उसी ताकत से सक्रिए होने के लिए ब्रेक ज़रूरी हो जाता है. इसलिए सैंडी समेत तमाम एक्सपर्ट्स सूचनाओं के शोर में बोरियत को एक सुरक्षात्मक प्रक्रिया मानते हैं.
सैंडी बताती हैं "एक वयस्क के तौर पर हम ऐसी दुनिया में जब रह रहे हैं जहां हम पर सूचनाओं की बमबारी हो रही है. इन्हें हम तभी झेल सकते हैं, जब हमें इनकी आदत लग जाती है. इस तरह हम रेडियो, स्पैम, मैसेज जैसी चीजों के आदी होते जाते हैं. इसके अलावा कुछ और सोच नहीं पाते. हम अपने जीवन के दूसरे पहलुओं पर ध्यान से विचार के लिए तभी प्रेरित होते हैं जब इन सब चीजों से उबन पैदा होती है."
इसलिए जरूरी है, थोड़ी बोरियत भी पैदा की जाए, ताकि कुछ नहीं करने और इसे स्वीकर करने की खुशी मिलती रहे.
शाहराम हेश्मत आगे कहते हैं "इन फायदों को देखते हुए हमें बोरियत से बाहर निकलने के रास्ते तलाश करने की बजाय इसे स्वीकार करना चाहिए. हमें अपने दिमाग को स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ देना चाहिए. क्योंकि हम अपनी जिंदगी में चाहते क्या हैं, इसे समझने का एक मौका हो सकता है बोरियत"
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