जीविका: बिहार सरकार की वो योजना जिसके प्रचार में जुटे नीतीश कुमार लेकिन क्यों

बिहार नीतीश जीविका योजना

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

"मेरी पत्नी ने 'जीविका' से कर्ज़ लेकर यह दुकान शुरू की. हमें इससे बहुत मदद मिली है. हमने सारा कर्ज़ भी चुका दिया है. हमलोग मिलकर दुकान चलाते हैं और गाय भी ले रखी है. इससे हमारा परिवार चल जाता है. हमने दो बेटियों की भी शादी कर दी है."

महेंद्र महतो ने उत्साह के साथ ये जानकारी दी. उनकी पत्नी संगीता देवी बिहार सरकार के 'जीविका' सेल्फ़ हेल्प ग्रुप से जुड़ी हुई हैं. महेंद्र महतो बिहार में पटना के पास फतुहा के फ़तेहजंगपुर गांव के रहने वाले हैं.

फ़तेहजंगपुर गांव की ही ममता देवी बताती हैं कि उन्होंने 'जीविका' से कर्ज़ लेकर एक भैंस ख़रीदी और दूध के कारोबार से कर्ज़ भी चुका दिया है.

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इमेज कैप्शन, महेन्द्र महतो ने 'जीविका' से कर्ज लेकर दुकान खोली

वहीं सबलपुर गांव की उषा देवी ने दो बार 'जीविका' से कर्ज़ लिया और वो सारा कर्ज़ अदा कर चुकी हैं.

वो बताती हैं, "हम अनपढ़ हैं, ज़्यादा कुछ पता नहीं है. जीविका दीदी आईं और ग्रुप से जुड़ने के लिए बोला. मैंने ग्रुप से जुड़कर एक बार 20 हज़ार हज़ार का कर्ज़ लिया और ठेला ख़रीदा. पति इसी पर सब्ज़ी बेचते हैं. फिर 15 हज़ार का कर्ज़ लिया गाय ख़रीदने के लिए."

उषा देवी भी अपना सारा कर्ज़ उतार चुकी हैं और बताती हैं कि पहले ग़रीबी में जीवन गुज़रता था.

लेकिन (सेल्फ़ हेल्प) ग्रुप से जुड़ने के बाद उनके जीवन में काफ़ी बदलाव आया है.

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इमेज कैप्शन, 'जीविका' से जुड़े 'स्वयं सहायता समूह' के सदस्यों के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

नीतीश ख़ुद कर रहे हैं तारीफ़

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल 'समाधान यात्रा' पर हैं. यात्रा के दौरान एक बात है जो वो कभी नहीं भूलते, वो है इलाके की 'जीविका दीदी' से मिलना.

इस बहाने नीतीश कुमार जनता के बीच अपनी 'जीविका स्कीम' की याद भी ताज़ा कराते हैं और लगे हाथ योजना की तारीफ भी करते हैं.

समाधान यात्रा में जब नीतीश कुमार दरभंगा के लहेरियासराय में पहुँचे तो उन्होंने अपनी ही लॉन्च की इस योजना की तारीफ़ में कहा, "जीविका दीदियों ने कहा हमने सब जगह देसी विदेशी शराब बंद कर दिया. मैं मिलता हूं सब जगह जीविका दीदी से. वो बताती हैं पहले पति पीते थे घर में लड़ाई झगड़ा करते थे, अब घर आते हैं तो हंसते हुए आते हैं, कितना अच्छा लगता है."

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इमेज कैप्शन, जीविका दीदी मुनीता देवी- गांवों में घूम-घूम कर योजना से महिलाओं को जोड़ती हैं.

महिलाएं जो 'जीविका' से हैं दूर

सरकारी आंकड़े के मुताबिक़ साल 2022-23 में राज्य में 1.25 लाख नई 'जीविका दीदियों' को योजना से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है. जीविका केंद्र पटना के मुताबिक़ पटना ज़िले में 7997 परिवारों को अभी भी इस योजना से जोड़ा जाना है.

बिहार सरकार की जीविका योजना से जुड़ी इन महिलाओं की आवाज़ भी हम इसी वजह से सुनने पहुँचे.

लेकिन ज़मीन पर स्थिति वैसी नहीं है जैसी नीतीश कुमार घूम घूम कर बता रहे हैं.

इनमें से एक हैं फ़तुहा की ही रिंकू देवी. उनके पति ने पहले उनको जीविका से नहीं जुड़ने दिया. दरअसल, ग्रामीण परिवारों में बैंक और कर्ज़ के नाम से कई लोग घबराते भी हैं.

'जीविका दीदी' मुनीता देवी ख़ुद गांवों में घूमती हैं और महिलाओं को इससे जोड़ने का काम करती हैं.

वे बताती हैं, "अशिक्षा इसका बड़ा कारण है. कुछ लोगों को डर लगता है कि बैंक में उनके जो पैसे हैं, बैंक वाले वो पैसे भी ले लेंगे. कई बार 12 महिलाओं का ग्रुप नहीं बन पाता है या उनमें आपसी भरोसा या एकता न हो तो भी इनके ग्रुप बैंक अकाउंट नहीं खुल पाते हैं."

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इमेज कैप्शन, रिंकू देवी जैसी तमाम महिलाएं अभी 'जीविका' से नहीं जुड़ पाईं हैं

महिलाओं की दिक्कत

दो साल पहले रिंकू देवी के पति की मौत हो गई. उसके बाद उन्होंने आर्थिक मदद के लिए 'जीविका' से जुड़ना चाहा पर अब भी वो समूह से नहीं जुड़ पाई हैं. वजह है 'स्वयं सहायता समूह' का नहीं बन पाना.

इसी गांव की पतिया देवी बताती हैं कि उनके परिवार में ऐसा कोई नहीं जिसके भरोसे वो 'जीविका' से जुड़ सकें. उनको यह भी डर लगता है कि 'जीविका' से जुड़कर अगर कर्ज़ ले लिया और न चुका पाईं तो क्या होगा.

'जीविका' के तहत ग्रुप बैंक खाता खुलवाने के लिए आधार कार्ड के अलावा महिलाओं की उम्र भी 60 साल से कम होनी चाहिए. लेकिन कई बार शादी के बाद दूसरे गांव में बस जाने से आधार कार्ड की समस्या होती है तो कई बार महिलाएं ख़ुद भी ऐसी महिलाओं को अपने समूह से नहीं जोड़ती हैं जो किराए पर रह रही हों.

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'जीविका' योजना क्या है?

'जीविका' बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में उन महिलाओं के लिए काफ़ी मददगार है जिनके पास आय का कोई साधन नहीं है.

यह योजना बिहार के सभी 38 ज़िलों के सभी 534 ब्लॉक में चल रही है.

जीविका के तहत सबसे पहले ग़रीब महिलाओं को चुना जाता है, जिनके पास आय का कोई साधन नहीं होता है. ऐसी 10 से 12 महिलाओं का एक सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाया जाता है, ताकि किसी काम काज से जुड़ सके.

ऐसे हर ग्रुप का एक बैंक खाता खुलवाया जाता है और हर महिला को हफ़्ते में 10 रुपये बचाकर बैंक में जमा कराना होता है ताकि उनमें पैसे बचाने की आदत डाली जा सके.

हर ग्रुप के खाते में सरकार की तरफ से भी 30 हज़ार रुपये जमा कराये जाते हैं. इसे प्रोजेस्ट फ़ाइनेंसिंग कहा जाता है.

स्वयं सहायता समूह की महिलाएं इससे कर्ज़ लेकर कोई भी काम शुरू कर सकती हैं. या किसी भी ज़रूरत के लिए यहां से लोन ले सकती हैं.

इसका पैसा इन्हें ग्रुप के खाते में वापस करना होता है. यहां पैसे को सफलता से वापस करने के बाद बैंक ऐसे एक समूह को शुरू में डेढ़ लाख़ रुपये तक का लोन देती है.

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'जीविका' योजना की समस्याएं

बाहर से सबकुछ सही दिखने वाली जीविका योजना में कई समस्याएं भी हैं. इसमें सबसे प्रमुख है ग्रामीण इलाक़े में जागरूकता की कमी और शिक्षा का अभाव.

जीविका के तहत कर्ज़ की राशि कम होना भी ज़रूरतमंदों को माइक्रो फ़ाइनेंसिंग कंपनियों की तरफ खींचता है. ऐसी कंपनियां ऊंचे ब्याज दर पर कर्ज़ देती हैं और फिर यही आगे चलकर ग़रीब परिवारों के लिए एक समस्या बन जाती है.

मसलन किसी ग्रुप के खाते में तीन लाख रुपये हों तो एक 'जीविका दीदी' के हिस्से में क़रीब 30 हज़ार रुपये ही आते हैं. ऐसे में ज़्यादा पैसों के लिए उन्हें कोई और रास्ता ढूंढ़ना पड़ता है.

सबलपुर गांल की मुनकिया देवी भी जीविका से जुड़ी हैं. वे कहती हैं, ''बीस तीस हज़ार में क्या होता है अब. लाख-दो लाख मिले तो कुछ काम में आए.''

जीविका से जुड़े एक अधिकारी ने नाम न लेने की शर्त पर बताया, ''हमने एक ग्रुप को प्रेरित कर जीवन बीमा के लिए राज़ी किया. बाद महिलाओं ने कहा कि पैसे तो कट गए पर हमें कुछ नहीं मिला. हमें समझाना पड़ता है कि ये जीवन बीमा है. इसमें ऐसे पैसे वापस नहीं मिलते.''

लेकिन कई बार ऐसी बातों को लोग भ्रष्टाचार से जोड़ लेते हैं. वो बताते हैं कि लोगों को लगता है कि सरकारी सिस्टम ने पैसे बांट लिए. कई बार 'जीविका' की पूरी व्यवस्था का बहुत ही सॉफ़्ट होना भी संकट बनता है और लोग पैसे लेकर उसे लौटाने को लेकर गंभीर नहीं होते हैं. इससे उन्हें बैंकों से ब्याज पर कोई छूट नहीं मिलती है.

इसके अलावा 'जीविका योजना' में काम कर रहीं क़रीब सवा लाख महिला कर्मचारियों को नियमित करना भी नीतीश सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.

विपक्ष रहते हुए साल 2020 के चुनाव प्रचार में तेजस्वी यादव इस मुद्दे को कई बार उठा चुके हैं.

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'जीविका' का ग्रामीण इलाकों पर असर

बिहार सरकार इस योजना से जुड़े आंकड़ों के ज़रिए इसे 'सफल' करार देती है.

बिहार में इस योजना के सीईओ और निदेशक राहुल कुमार के मुताबिक़ 'जीविका' से राज्य की एक करोड़ 30 लाख महिलाएं जुड़ी हुई हैं.

इसमें सरकारी आंकड़े के मुताबिक राज्यभर में इस वित्तीय वर्ष यानी 2022-23 में 1.25 लाख परिवारों को जोड़ा जाना है.

इस योजना में एक परिवार से एक महिला को जोड़ा जाता है.

उनके मुताबिक़ बिहार में एक परिवार में औसतन पांच सदस्य होते हैं. इस तरह से राज्य की क़रीब आधी आबादी जीविका योजना से जुड़ी हुई है और ग्रामीण आबादी की बात करें तो क़रीब 60 फ़ीसदी आबादी सीधे तौर पर 'जीविका' से जुड़ी हुई है.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-5 के मुताबिक़ बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में राज्य के क़रीब 84 प्रतिशत परिवार रहते हैं.

इनमें 23 फ़ीसदी परिवारों की मुखिया घर की महिला हैं.

बिहार नीतीश जीविका योजना

साल 2019-2021 के आंकड़े बताते हैं कि राज्य की क़रीब 19 फ़ीसदी आबादी ऐसे घरों में रहती है जिसकी प्रमुख कोई महिला है.

बिहार के क़रीब 86 प्रतिशत परिवार हिन्दू हैं जबकि चौदह फ़ीसदी मुस्लिम हैं. बिहार में 53 प्रतिशत परिवार ओबीसी वर्ग से हैं जबकि 24 प्रतिशत दलित हैं.

'जीविका' का इनमें से आर्थिक तौर पर कमज़ोर ज़्यादातर ग्रामीण परिवारों पर बड़ा असर है. इस बड़ी आबादी के जीविका से जुड़ने के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जीविका दीदियों को बहुत महत्व देते हैं.

कैसे शुरू हुई 'जीविका' योजना

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने साल 2006-07 में इस योजना की शुरुआत वर्ल्ड बैंक से लोन लेकर की थी.

इसमें महिलाओं के सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाकर उनके बैंक खाते खुलवाए जाते थे और फिर उन्हें रोज़गार के लिए सरकार की तरफ मदद दी जाती थी.

ग्रामीण महिलाओं के लिए केरल और आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों में ऐसी ही योजना चलाई जा रही थी.

भारत में 1990 के दशक में 'स्वर्ण जयंती स्वरोज़गार योजना' के तहत भी महिलाओं के सेल्फ़ हेल्प ग्रुप को कर्ज़ दिया जाता था. लेकन उस दौर में पूरा ग्रुप एक ही काम करता था.

मसलन डेयरी उद्योग चलाना हो या पापड़ व्यवसाय करना हो. इसमें यह रिस्क होता था कि अगर व्यवसाय सफल नहीं हुआ तो सारे पैसे डूबने का ख़तरा होता था.

लेकिन 'जीविका' के तहत हर ग्रुप की हर महिला को अलग-अलग काम के लिए कर्ज़ मिलता है.

'जीविका' के तहत अब तक कुल 25 हज़ार करोड़ रुपये का बैंक क्रेडिट महिलाओं को दिया गया है. इसके लिए बिहार में महिलाओं के अब तक क़रीब 10 लाख़ ग्रुप (सेल्फ़ हेल्प ग्रुप) बैंक खाते खोले गए हैं.

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कर्ज़ चुकाना कितना आसान?

पटना ज़िले के प्रोजेक्ट मैनेजर मुकेश कुमार सस्मल के मुताबिक़, " इस योजना में कर्ज़ लेने पर एक प्रतिशत का मासिक ब्याज देना पड़ता है. यानि सालाना 12 प्रतिशत का. इसमें से सात प्रतिशत के ब्याज दर से बैंक पैसे वापस लेता है और बाक़ी ब्याज के पैसे ग्रुप के खाते में जमा हो जाता है, ताकि इससे ग्रुप को चलाने का ख़र्च निकाला जा सके."

वो बताते हैं कि समय पर कर्ज़ वापस करने पर बैंक की तरफ से कर्ज़दार महिला को ब्याज पर चार प्रतिशत की छूट भी अलग से मिल जाती है. इस तरह से जीविका में मूल रूप से बैंक को महज़ तीन प्रतिशत ब्याज चुकाना पड़ता है.

वो कहते हैं, "इसमें सबसे ख़ास बात यह है कि जीविका के तहत दिए गए कर्ज़ का 98 प्रतिशत से ज़्यादा बैंक को वापस मिल जाता है. इस योजना के तहत दिए गए कर्ज का एनपीए एक प्रतिशत से भी कम है. यानि ग्रामीण परिवार ऐसे कर्ज़ में दबता नहीं है."

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