बिहार के शराब माफ़िया के राज़: 'कहां से मिली नहीं बताऊंगा'- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना (बिहार) से
"उस दिन पार्टी में किसी ने दे दिया, हम हल्का सा पी लिए तो सर चक्कर देने लगा. काम छोड़कर चले आए. हम डॉक्टर के पास नहीं जा रहे थे, लेकिन फिर ये कांड हो गया तो मां रोने लगी, तब डॉक्टर के पास गए. डॉक्टर बोले कि एकाध महीने में आंखों से थोड़ा-बहुत दिखने लगेगा."
सत्येंद्र महतो बिहार में छपरा के बहरौली गांव के हैं. उनकी आंखें आम इंसानों की तरह दिखती हैं, लेकिन ज़हरीली शराब की वजह से आंखों की रोशनी चली गई है.
सत्येंद्र 12 दिसंबर की शाम पड़ोस के एक गांव में एक जनेऊ (उपनयन) समारोह में काम करने गए थे.
वहां किसी ने शराब दी जिसे पीकर उनकी तबीयत बिगड़ गई और इधर सारण के कई इलाक़ों में ज़हरीली शराब ने मौत का तांडव मचा दिया. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बहरौली में भी ज़हरीली शराब से कुछ लोगों की मौत हुई है.

ज़हरीली शराब का स्रोत
मां की ज़िद पर सत्येंद्र समय पर हॉस्पिटल पहुंच गए तो जान बच गई, लेकिन आंखों की रोशनी चली गई. मज़दूरी कर घर चलाने वाले सत्येंद्र का परिवार अब कैसे चलेगा, इसका कुछ पता नहीं है. लेकिन वो अब भी ज़हरीली शराब के कारोबारियों के बारे में कुछ नहीं बताना चाहते.
"शराब कहां से आई... अब ये नहीं बताऊंगा." सत्येंद्र के इन शब्दों के पीछे शराब माफ़िया का डर है या क़ानून का, इस पर भी वो ख़ामोश हैं. लेकिन ज़हरीली शराब से प्रभावित सारण के इलाक़े में शराब के इस अवैध कारोबार की जानकारी कई लोगों को है.
इशुआपुर के सरवरा गांव की नीता देवी के हाथ लगातार थरथरा रहे हैं. उनके पति बिक्की महतो पहले गुजरात में एक कंपनी में काम करते थे. वहीं की फ़ैक्ट्री का एंट्री कार्ड दिखाते हुए नीता देवी कुछ बताने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बता नहीं पा रही हैं.
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नीता का तीन साल का बेटा भी बोल नहीं पाता, लेकिन इसी उम्र में पिता का दाह संस्कार करना पड़ा. नीता देवी ने ज़िंदगी के 22 साल भी पूरे नहीं किए हैं, लेकिन पति छोड़कर चले गए.
बिक्की महतो की कच्ची झोपड़ी में बीवी, तीन बच्चे और बूढ़े मां-बाप रह गए हैं. ज़हरीली शराब ने ही 25 साल के बिक्की की भी जान ले ली. अब इनके पास हर महीने सरकार की तरफ़ से मुफ़्त में मिलने वाला एक किलो गेहूं और तीन किलो चावल रह गया है.
बिक्की के पिता लाल बाबू महतो का कहना है, "एक किलोमीटर दूर बजरहियां में दारू बिकता है. वहीं 14 तारीख को दारू पीकर घर आया और कहने लगा तबीयत खराब लग रही है.
फिर उल्टी करने लगा. मैंने कहा चलो डॉक्टर के पास तो नहीं गया. रात में दो बजे तबीयत बिगड़ी और बेचैनी होने लगी. एंबुलेंस बुलाई, लेकिन रास्ते में ही 15 तारीख की सुबह उसकी मौत हो गई."
उनका कहना है कि 'शराबबंदी में दारू कैसे आता है, ये तो नीतीश कुमार बता सकते हैं, लेकिन इधर दारू का टैंकर आता है.'

मरने वाले ज़्यादातर ग़रीब और मज़दूर
ज़हरीली शराब से सबसे ज़्यादा प्रभावित छपरा के बहरौली, इशुआपुर, मशरख, अमनौर और इसके आसपास के कई गांव हैं.
इन इलाकों में बड़ी संख्या में दलित, मुसलमान, यादव और कई अन्य पिछड़ी जातियों के लोग रहते हैं.
इनमें से ज़्यादातर लोग मज़दूरी का काम करते हैं जो मिस्त्री का काम जानते हैं और काम मिलने पर रोज़ पांच सौ रुपये की आमदनी हो जाती है, जबकि मज़दूरों को चार सौ रुपये मिलते हैं.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, सारण में ज़हरीली शराब से क़रीब 40 लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि स्थानीय लोगों के अनुसार, और मीडिया रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा कहीं ज़्यादा है.
ज़हरीली शराब से हुए इस हादसे में सबसे ज़्यादा ग़रीब दलितों की मौत हुई है. लेकिन शराब का ये क़हर, जाति और धर्म देखकर लोगों पर नहीं टूटा. मुस्लिम हों या यादव, हर किसी को इसने अपना शिकार बनाया.

बिहार-यूपी बॉर्डर पर स्कैनिंग मशीन से पकड़ी जाती है शराब
बिहार के छपरा और उत्तर प्रदेश के बलिया के बीच घाघरा नदी बहती है.
जबकि छपरा की सीमा बिहार के ही गोपालगंज, सिवान और मुज़फ़्फ़रपुर ज़िलों से भी लगी हुई है.
हम जब बिहार-उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर घाघरा नदी के किनारे मांझी चेक पोस्ट पर पहुंचे तो वहां बिहार आने वाली हर गाड़ी की जांच हो रही थी.
सरकार ने इसके लिए स्कैनिंग मशीन दी है जो सामानों को बिना उतारे ही गाड़ियों में किसी भी तरल पदार्थ की जांच कर सकती है.
मांझी चेक पोस्ट पर मौजूद असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर अमित ने हमें बताया, "हमने हाल ही में पॉलीथीन वाले देशी शराब भी पकड़े हैं, जो शिमला मिर्च के नीचे छुपाकर ले जाए जा रहे थे. यहां से ज़्यादातर विदेशी शराब की एंट्री होती है."

ज़हरीली शराब से मौतें
ऐसा भी नहीं है कि बिहार में ज़हरीली शराब पीकर केवल छपरा में ही मौत हुई है.
बिहार के औरंगाबाद में इसी साल ज़हरीली शराब पीने से कई लोगों की मौत हो गई थी.
बीते वर्ष यानी 2021 के अक्टूबर नवंबर के महीने में राज्य के गोपालगंज, सिवान और चंपारण में एक महीने के अंदर ज़हरीली शराब पीने से 65 से ज़्यादा लोगों की मौत के मामले सामने आए थे.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक 200 से ज़्यादा लोगों की मौत ज़हरीली शराब पीने से हुई है.

पुलिस पर संगीन आरोप
बिहार में देशी शराब ज़्यादातर राज्य की सीमा के अंदर ही स्थानीय स्तर पर तैयार की जाती है.
स्थानीय लोगों के मुताबिक़, इसे छोटे-छोटे स्तर पर तैयार किया जाता है जबकि विदेशी शराब ज़्यादातर हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से आती है.
स्थानीय पत्रकार वीरेश सिंह बताते हैं, "शराब की बिक्री मोबाइल सिस्टम से होती है. इसे नाव से लाया जाता है और फिर गांव-गांव तक पहुंचाया जाता है. फिर जिसको ज़रूरत होती है वो मोबाइल पर फ़ोन कर शराब मंगाता है. पुलिस को ये सब पता है, लेकिन कोई कुछ नहीं करता है."
बिहार पुलिस पर इस तरह के आरोप स्थानीय लोग, मीडिया और राजनीति से जुड़े लोग भी लगाते रहे हैं.
पुलिस या प्रशासन को शराब के कारोबार के बारे में कितनी जल्दी जानकारी मिल सकती है, इसकी एक झलक एसआईटी के ऐक्शन में भी दिखती है.
छपरा कांड की जांच के लिए राज्य सरकार ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई है और इसने घटना के 72 घंटों के अंदर ही 213 शराब कारोबारियों को गिरफ़्तार कर लिया है.
एसआईटी ने इतने ही समय में पांच हज़ार लीटर से ज़्यादा अवैध शराब भी बरामद की और शराब बनाने की 80 भट्ठियों को भी नष्ट कर दिया.
पुलिस प्रशासन पर लग रहे आरोपों पर हमने उनका पक्ष जानना चाहा, लेकिन उनकी ओर से हमें अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.
पुलिस की ओर से इस संबंध में उनका पक्ष आने पर हम उसे यहां अपडेट करेंगे.

राजनीतिक दलों से क़रीबी
स्थानीय पत्रकार मनोज कुमार सिंह बताते हैं, "पुलिस और ख़ासकर चौकीदार 50 फ़ीसदी शराब तस्करों को जानते हैं और उन्हीं की निगरानी में शराब बेची जाती है. यहां तक कि कई बार आबकारी विभाग वाले भी छापा मारते हैं तो स्थानीय पुलिस को नहीं बताते हैं क्योंकि पुलिसवाले ही शराब तस्करों को पहले से सूचना दे देते हैं."
बिहार में यह आरोप भी लगाया जाता है कि ज़्यादातर शराब माफ़िया राजनेताओं या राजनीतिक दलों के आसपास रहने की कोशिश करते हैं ताकि इसकी आड़ में वो अपना धंधा चला सकें.
मंगलवार को भी छपरा के मढ़ौरा इलाक़े से एक जेडीयू नेता के घर से बड़ी मात्रा में अवैध शराब ज़ब्त की गई है.
ख़बरों के मुताबिक़, जेडीयू नेता कामेश्वर सिंह का कहना है कि वो पिछले 30 साल से इस घर में नहीं रहते हैं. उनके मुताबिक यहां किराएदार रहते हैं और उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.
सारण का एक्साइज़ विभाग और पुलिस भी लगातार शराब तस्करों के इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए छापेमारी कर रही है.
सारण के एसपी ने इस मामले पर कुछ भी बात करने से इनकार कर दिया है, लेकिन उत्पाद विभाग का कहना है कि अगले दो-तीन दिनों में वो ज़हरीली शराब के इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंच सकते हैं.
इस बीच सारण में पुलिस और एक्साइज़ विभाग ने अपनी छापेमारी बढ़ा दी है. उसने सारण में 13 दिसंबर से 20 दिसंबर तक कुल 2376 छापेमारी की है जिसमें शराब पीने वाले 426 और बेचने वाले 238 लोग गिरफ़्तार हुए हैं.
इस अभियान में अब तक 11839 लीटर अवैध शराब भी ज़ब्त की गई है. ख़ास बात यह है कि इसमें 10,000 लीटर से ज़्यादा देशी शराब है. यानी अब भी सस्ते देशी शराब का ही अवैध कारोबार ज़्यादा हो रहा है.
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कर्ज़ में डूबे परिवार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह चुके हैं कि जो लोग ज़हरीली शराब पीकर मारे गए, उनके परिवार को सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा नहीं मिलेगा.
इस शराब कांड में मारे गए ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं थे. इसमें सबसे बड़ी तादाद ग़रीब और रोज़ मेहनत-मज़दूरी कर घर चलाने वालों की है. यहां कई परिवार ऐसे भी हैं जिनके पास भोजन का यह संकट पहले से था और अब क़र्ज़ में भी डूब गए हैं.
27 साल के ब्रजेश राय मज़दूरी करके घर चलाते थे. उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए घरवालों ने किसी तरह डेढ़ लाख़ रुपये का क़र्ज़ लिया और पटना के एक निजी अस्पताल में ले गए.
ब्रजेश राय की मां श्रीपति का कहना है, "पता नहीं कहां से पिया. सब लोगों के सामने हाथ फैलाकर डेढ़ लाख़ रुपये का कर्ज़ लेकर पटना ले गए. लेकिन बेटे को नहीं बचा सके.''
इसके बाद वो कुछ नहीं बोल पाईं, तो पोते साहिल ने बताया, "13 तारीख़ की रात खाना खाकर सोए, सुबह तबीयत बिगड़ी तो निजी अस्पताल में इलाज कराने पटना के यूनिवर्सल हॉस्पिटल ले गए, वहां एक लाख़ रुपये ख़र्च हो गए. 70 हज़ार रुपये तो डेड बॉडी देने के ले लिए."
एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि 'ऐसी परिस्थिति आने पर स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन भी इलाज से ज़्यादा भीड़ के नियंत्रण में लग जाते हैं. लाखों रुपये ख़र्च कर बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो किसी काम के नहीं रह गए. लोगों को यहां से छपरा और वहां से पटना रेफ़र किया जाने लगा."
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