दिल्ली की राजनीति, शराब घोटाले से एलजी पर आम आदमी पार्टी के आरोपों तक

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली में बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच शुरू हुई तनातनी अब शराब घोटाले से आगे बढ़कर कथित शिक्षा घोटाले और एलजी पर नोट बदलवाने के आरोपों तक पहुंच गयी है.
आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कल यानी बीते सोमवार दिल्ली विधानसभा में विश्वास मत का आह्वान किया था.
दिल्ली में फ़िलहाल आम आदमी पार्टी की सरकार पर ख़तरा मंडराता नहीं दिख रहा है. लेकिन आम आदमी पार्टी लगातार बीजेपी पर अपने विधायकों को खरीदने के आरोप लगा रही है.
दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी कुछ दिन पहले ट्वीट कर बीजेपी में शामिल होने का ऑफर आने की बात की थी.
और इस सबके बीच आम आदमी पार्टी के विधायकों ने सारी रात दिल्ली विधानसभा परिसर में खुले आसमान के नीचे गुजारी है. आम आदमी पार्टी इसे अपनी ओर से विरोध प्रदर्शन करार दे रही है.
हालांकि, इस विरोध प्रदर्शन में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, राघव चड्ढा या संजय सिंह जैसे शीर्ष नेताओं ने इसमें हिस्सा नहीं लिया.
वहीं, दिल्ली में बीजेपी के तीन विधायकों की ओर से बीते शुक्रवार से विधानसभा परिसर में ही धरना प्रदर्शन जारी है.
लेकिन सवाल उठता है कि शराब घोटाले से शुरू हुई बात सरकार पर संकट और उप-राज्यपाल पर आरोप लगाने तक कैसे पहुंच गयी.

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अरविंद केजरीवाल की रणनीति क्या है?
बीजेपी की ओर से आम आदमी पार्टी की शराब से लेकर शिक्षा नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं. लेकिन अपनी शराब नीति का बचाव करने की जगह आम आदमी पार्टी बीजेपी पर आरोप लगा रही है.
ये आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आम आदमी पार्टी की रणनीति के बारे में क्या बताता है.
अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक उभार को देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि ये अपने आप में एक रणनीति है.
वह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की रणनीति शुरु से ही आरोप लगाने पर केंद्रित रही है. सदन में जिस तरह से विश्वास मत लाया गया है, ऑपरेशन लोट्स वगैरहा की बात चल रही है, ये शायद 'आप' की ओर से बीजेपी पर जवाबी हमला है. बीजेपी ने इसकी शुरुआत मनीष सिसोदिया को विवादास्पद बनाकर की थी. जवाबी हमला भी एक रणनीति है जो आम आदमी पार्टी को पसंद है. और बीजेपी भी उसी ओर चलती दिख रही है."

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क्या ये बीजेपी के स्टाइल वाली राजनीति है?
मगर ऐसा क्यों है? क्या आम आदमी पार्टी ने ये रणनीति बीजेपी से उधार ली है?
ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि पिछले सात - आठ सालों में देखने को मिला है कि बीजेपी अपने ऊपर आरोप लगने के बाद बचाव करने की जगह विपक्ष पर पलटवार करती दिखी है.
दिल्ली के उप-राज्यपाल विनय सक्सेना ने दिल्ली में शिक्षा पर भारी ख़र्च के बाद भी स्कूलों से बच्चों की ग़ैर-मौजूदगी का मुद्दा उठाया है.
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बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने आम आदमी पार्टी पर पांच लाख में बनने वाले कमरे को 33 लाख में बनाने का आरोप लगाया है.
लेकिन शराब एवं शिक्षा नीति पर अपना पक्ष रखने की जगह आम आदमी पार्टी भावनात्मक मुद्दों पर बीजेपी को घेरती दिख रही है.
अरविंद केदरीवाल ने सदन में कल यानी सोमवार को ही कहा है कि 'अब कह रहे हैं कि नए क्लासरूम क्यों बनाए, ज़्यादा बाथरूम क्यों बनाए, टॉयलेट क्यों बनाए, मैं देख रहा था...कह रहे थे कि इन्होंने टॉयलेट ज़्यादा बना दिए....हां जी, बना दिए...हमारी बच्चियां जो हैं, अगर उनको टॉयलेट जाना हो, अगर हमने ज़्यादा टॉयलेट बना दिए तो क्या ग़लत किया..."
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अपना बचाव करने की आम आदमी पार्टी की इस रणनीति पर प्रमोद जोशी कहते हैं, "आम आदमी पार्टी के साथ फिलहाल ये दिख रहा है कि उस पर जिन मुद्दों को केंद्र में रखकर आरोप लगाए जाते हैं, वो उनका जवाब नहीं देती. वो आरोप लगाने वालों पर नए आरोपों का पुलिंदा फेंकती है. ये रणनीति हो सकती है कि आरोपों पर जवाब देने से बचा जाए क्योंकि ऐसा करने से विवाद में पड़ने और अंतर्विरोध पैदा होने की आशंका हो सकती है."
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ये राजनीतिक लड़ाई कब ख़त्म होगी?
आम आदमी पार्टी का दावा है कि बीजेपी उस पर ये हमले गुजरात चुनाव की वजह से कर रही है.
वहीं, बीजेपी का कहना है कि आम आदमी पार्टी को शराब नीति आदि पर जवाब देना चाहिए.
ऐसे में सवाल उठता है कि ये सब कहां जाकर ख़त्म होगा.
दिल्ली और देश की राजनीति को वर्षों से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन मानते हैं कि 'बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच जब भी लड़ाई हुई है तो इसी स्तर पर हुई है. जब इनके नेता तोमर को पकड़ा गया था तब भी इन्हें लगा था कि इमरजेंसी लग गयी है.'
वहीं, बीजेपी की रणनीति पर अरविंद मोहन कहते हैं, "बीजेपी जब से सत्ता में आई है, तब से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उसके दूसरे तमाम दावों पर आम आदमी पार्टी की दिल्ली में जीत एक तमाचे जैसी रही है. अब जबकि बीजेपी लगातार कई सालों से दिल्ली पर राज करती आ रही है, तो उसे लगता है कि दिल्ली में उसकी सरकार बननी चाहिए."
"लेकिन जो मौजूदा संघर्ष है, वो शराब नीति से शुरू हुआ है, और अब शिक्षा नीति पर सवाल उठ रहे हैं. इसका इतिहास पुराना है. और इस पर जवाब देने की जगह आम आदमी पार्टी आरोप लगा रही है."
हालांकि, प्रमोद जोशी और अरविंद मोहन मानते हैं कि टीवी कैमरों के सामने होती इस राजनीतिक रस्साकशी के पीछे दोनों पार्टियों की सोची समझी रणनीति भी हो सकती है.
प्रमोद जोशी कहते हैं, "बीजेपी जिस तरह से आम आदमी पार्टी को घेर रही है, उससे ऐसा लगता है कि कहीं ये गुजरात चुनाव में कांग्रेस को मजबूत होने से रोकने की दिशा में कदम तो नहीं है."
अरविंद मोहन भी अपने इस विचार पर तर्क देते हुए कहते हैं कि 'आम आदमी पार्टी जिस तरह दलितों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर केंद्र को घेरने से बचती हुई नज़र आती है, उससे दोनों दलों के बीच किसी तरह की अंडरस्टेंडिग होने के संकेत मिलते हैं.'
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