मनीष सिसोदिया पर सीबीआई कार्रवाई के पीछे क्या गुजरात चुनाव हैं?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की आबकारी नीति में बदलाव में हुए कथित भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच में फंसे दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि सीबीआई उन्हें कभी भी गिरफ़्तार कर सकती है.
सिसोदिया ने ये भी कहा है कि 2024 का चुनाव केजरीवाल बनाम मोदी होगा और आम आदमी पार्टी को कमज़ोर करने के लिए उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया जा रहा है.
दिल्ली के उपराज्यपाल ने सीबीआई से कथित आबकारी घोटाले की जांच की सिफ़ारिश की थी. इसके बाद दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को वापस ले लिया था.
शुक्रवार को सीबीआई ने मनीष सिसोदिया के घर समेत कई ठिकानों पर छापेमारी की और 15 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया है.
इसी बीच रविवार को सीबीआई ने मनीष सिसोदिया और अन्य अभियुक्तों के ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर जारी किया है.

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सीबीआई की कार्रवाई और उससे पैदा विवाद के बीच अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने कहा है कि वो सोमवार को दो दिन के गुजरात दौरे पर जा रहे हैं.
जांच एजेंसियों के इस्तेमाल पर सवाल
सीबीआई की कार्रवाई पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं, "मनीष सिसोदिया पर लगे आरोपों में कितना सच है और कितना झूठ ये अदालत ही तय करेगी. लेकिन आज के दौर में जिस तरह से देशभर में विपक्ष के ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है उससे एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं. इसका मतलब ये नहीं है कि सरकार की दिल्ली सरकार की ये शराब नीति सही है. लेकिन ये स्पष्ट दिख रहा है कि जांच एजेंसियों का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है."
सीबीआई ने हाल के सालों में विपक्ष के कई नेताओं के ख़िलाफ़ जांच की है लेकिन बीजेपी से जुड़ा कोई नेता सीबीआई के निशाने पर नहीं रहा है. ऐसे में केंद्रीय जांच एजेंसी के राजनीतिक इस्तेमाल का सवाल भी उठ रहा है.
विनोद शर्मा कहते हैं, "सवाल ये है कि इन जांच एजेंसियों को बीजेपी के किसी नेता का भ्रष्टाचार नहीं दिखता है ना ही उनका कोई ग़लत व्यवहार इनकी नज़र में आता है. ये एक बड़ी बहस है और इस बहस ने विपक्ष को एकजुट कर दिया है. जो भी सरकार का विरोधी है उस पर जांच बिठा दी जाती है. क्या ये जायज़ है कि जब चाहों जिस पर चाहों छापा मार दो? ऐसे भी कई उदाहरण हैं कि लोगों पर छापे मारे गए और जब वो बीजेपी के साथ हो गए तो कार्रवाई बंद हो गई."

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मनीष सिसोदिया के घर पर सीबीआई छापे जहां राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं वहीं बड़ा सियासी मुद्दा भी बन गए हैं. केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी मनीष सिसोदिया और आम आदमी पर लगातार हमलावर हो रही है.
बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है कि दिल्ली में 'बेवड़ी और रेवड़ी सरकार है.'
उन्होंने मनीष सिसोदिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि अब उनके नाम की स्पेलिंग बदलकर MONEY SHH हो गई है.
सिसोदिया पर हमलावर होते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा, "यदि दिल्ली की शराब नीति सही थी तो फिर उसे वापस क्यों लिया गया?"
आबकारी नीति में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों पर राजनीतिक विवाद के बीच ये सवाल भी उठा है कि क्या सीबीआई निष्पक्षता से जांच कर पाएगी?
विनोद शर्मा कहते हैं, "जब सत्तारूढ़ दल किसी जांच पर टिप्पणी करता है तो इससे एक तरह से जांच एजेंसी पर दबाव बनता है और ये शक पैदा होता है कि क्या जांच एजेंसी सही से जांच कर पाएंगी. केस दर्ज होते ही अगर आपने ये तय कर दिया है कि इसमें घपला है तो फिर जांच की ज़रूरत ही क्या है? जांज एजेंसी जब अपना काम कर रह रही हैं तो उसका काम पूरा होने से पहले ही ये तय न कर दिया जाए कि घपला है."

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आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से पैदा हुई थी और ईमानदारी से काम करने का दावा करती रही है.
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के प्रति सख़्त होने का दावा करते रहे हैं. ऐसे में दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री और अरविंद केजरीवाल के सबसे क़रीबी नेता मनीष सिसोदिया पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने केजरीवाल की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ नीति पर भी सवाल खड़े किए हैं. अरविंद केजरीवाल ने अभी तक सिसोदिया पर लगे सभी आरोपों को ख़ारिज किया है और वो लगातार उनके समर्थन में खड़े हैं.
मनीष सिसोदिया के ख़िलाफ़ सीबीआई की जांच में अगर कुछ ठोस निकलता है तो उनकी बहु-प्रचारित ईमानदारी सवालों में आ जाएगी.
विश्लेषक मानते हैं कि अगर सवाल किसी की ईमानदारी परखने का है तो जांच एजेंसी भी निष्पक्ष होनी चाहिए.
विनोद शर्मा कहते हैं, "अगर जांच इस बात की होनी है कि कौन ईमानदार है और कौन नहीं तो फिर जांच करने वाली संस्था भी ईमानदार होनी चाहिए, उस पर कोई शक या आरोप नहीं होने चाहिए. जांच एजंसी ईमानदारी से काम तब ही कर पाएगी जब उसे बिना दबाव के काम करने दिया जाएगा. अभी ये लग रहा है कि ऐसा हो नहीं रहा है."
गुजरात और हिमाचल में चुनाव
अगले कुछ महीनों में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं और इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी अपनी ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश कर रही है.
आम आदमी पार्टी ने हाल ही में पंजाब चुनावों में इकतरफ़ा जीत हासिल कर सरकार बनाई है. जहां-जहां मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कमज़ोर है या कमज़ोर नज़र आ रही है वहां-वहां आम आदमी पार्टी ख़ासतौर पर सक्रिय है.
विश्लेषक मानते हैं कि सिसोदिया पर कार्रवाई की एक वजह आगामी विधानसभा चुनाव भी हो सकते हैं.
विनोद शर्मा कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि बीजेपी का अगर कोई मुकाबला कर सकता है तो वह आम आदमी पार्टी है. इस मुद्दे पर सियासत दोनों तरफ़ से हो रही और आम आदमी पार्टी भी इस पर सियासत कर रही है. 2024 में आम चुनाव हैं लेकिन उससे पहले दिसंबर में गुजरात में और नवंबर में हिमाचल प्रदेश में चुनाव हैं. अरविंद केजरीवाल इन दोनों ही राज्यों में जाते रहते हैं और बीजेपी को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों ही प्रांतों में बीजेपी सत्ता में है और इस कार्रवाई की जड़ में इन राज्यों के चुनाव भी हो सकते हैं."

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आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ख़ासतौर पर गुजरात में सक्रिय हैं और उन्होंने पार्टी के गुजरात में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या वाक़ई में आम आदमी पार्टी ने गुजरात में अपनी राजनीतिक ज़मीन बनाई है?
2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस भले ही चुनाव हार गई थी लेकिन पिछले चुनावों के मुक़ाबले पार्टी ने अपनी सीटें और वोट प्रतिशत दोनों बढ़ाया था.
गुजरात के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक घनश्याम शाह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने गुजरात में अपनी राजनीतिक ज़मीन कितनी मज़बूत कर ली है ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगा लेकिन पिछले एक महीने से केजरीवाल यहां काफ़ी सक्रिय रहे हैं. आम आदमी पार्टी ने अब तक यहां 15-16 उम्मीदवार भी घोषित कर दिए हैं. ऐसा लग रहा है कि केजरीवाल यहां के मध्यम वर्ग को प्रभावित कर पाने की कोशिश में हैं."
गुजरात में अपनी रैलियों में केजरीवाल ने यहां शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का वादा किया है और महंगाई जैसे मुद्दों पर भी कई चुनावी वादें भी किए हैं. केजरीवाल गुजरात के शहरी वोटर और मध्यम वर्ग को अपना संदेश पहुंचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं.
केजरीवाल की अपनी छवि एक ईमानदार नेता की है और गुजरात में राजनीति में ईमानदार व्यक्तित्व वोटरों को आकर्षित करता रहा है.

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घनश्याम शाह कहते हैं, "गुजरात में 1970-75 के बाद से ईमानदार राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रति रुझान रहा है. मध्यम वर्ग का झुकाव ईमानदर व्यक्तित्व की तरफ़ रहा है. यही वजह थी कि 2009 में नरेंद्र मोदी ने नारा दिया था कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा और उसे लोगों ने स्वीकार किया था."
लेकिन लोकनीति सीएसडीएस के एक 2007 में हुए सर्वे के मुताबिक गुजरात में 70 फ़ीसदी से अधिक लोगों ने माना था कि साल 2002 के मुक़ाबले राज्य में भ्रष्टाचार बढ़ा है.
घनश्याम शाह कहते हैं, "गुजरात के लोग ये मानते हैं कि नरेंद्र मोदी भ्रष्ट नहीं है. लेकिन गुजरात के लोग इस बात को भी नकारते हैं कि राज्य में भ्रष्टाचार कम हुआ है. बल्कि यहां भ्रष्टाचार बढ़ा ही है. शहरी क्षेत्र के लोग पुलिस, नगरीय प्रशासन और सरकारी कार्यालयों के भ्रष्टाचार से परेशान हैं."
तो क्या आम आदमी पार्टी अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि का फ़ायदा गुजरात में ठा सकती है, घनश्माय शाह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की छवि ये है कि वो भ्रष्टाचार विरोधी पार्टी है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी के काम को भी उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है. गुजरात में पार्टी की भ्रष्टाचार विरोधी पार्टी होने की छवि असरदार हो सकती है. ऐसे में बीजेपी ये चाहती है कि लोगों को ये समझा सके कि आम आदमी पार्टी भी एक भ्रष्ट पार्टी है. इस वजह से ये लगता है कि मनीष सिसोदिया पर सीबीआई के छापे एक राजनीतिक प्रयास भी हो सकते हैं."
साल 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और राज्य में इकतरफ़ा वोटिगं हुई थी. बीजेपी ने यहां सभी 26 लोकसभा सीटें जीतीं थीं.
लेकिन साल 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को नुक़सान हुआ था. पिछले चुनावों की 115 सीटों के मुक़ाबले बीजेपी 99 सीट ही जीत पाई थी.
राजनीतिक रूप से गुजरात बीजीपी के लिए बेहद अहम है. बीजेपी के दो सबसे बड़े नेता अमित शाह और नरेंद्र मोदी गुजरात से ही आते हैं. गुजरात बीजेपी का गढ़ है और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी यहां किसी भी स्थिति में कमज़ोर नहीं दिखना चाहेगी और अपने इस गढ़ को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेगी.
घनश्याम शाह कहते हैं, "बीजेपी ने कांग्रेस और दूसरे दलों के लोगों को हर तरीके का इस्तेमाल करके अपनी तरफ खींचा और राजनीतिक जीत हासिल की. लेकिन अब हम ये देख रहे हैं कि गुजरात में शहरी क्षेत्र में बीजेपी के प्रति असंतोष बढ़ रहा है. यहां की स्थानीय मीडिया आमतौर पर बीजेपी के समर्थन में रहती है लेकिन अब वह भी शहरी क्षेत्र के असंतोष को दिखाने लगी है. ऐसे में बीजेपी यहां मिलने वाली किसी भी चुनौती को कैसे भी करके ख़त्म करना चाहेगी."
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