किसान आंदोलन: मोदी सरकार के कृषि क़ानूनों पर अरविंद केजरीवाल इतने आक्रामक क्यों हैं?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर हैं.
बीजेपी, कांग्रेस से लेकर अकाली दल इस मुखरता को 'केजरीवाल की अवसरवादिता' क़रार दे रहे हैं.
वहीं, आम आदमी पार्टी का दावा है कि वो किसानों के साथ उस दिन से खड़ी है जब से ये क़ानून लोकसभा और राज्य सभा में पास किए गए थे.
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इस मुद्दे पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह बादल और केजरीवाल के बीच पिछले कई हफ़्तों से 'ट्विटर जंग' छिड़ी हुई रही.
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, "इन कृषि क़ानूनों के बारे में किसी भी मीटिंग में कोई चर्चा नहीं की गई थी और अरविंद केजरीवाल आपके बार-बार दोहराये गए झूठ से ये नहीं बदलने वाला है. और बीजेपी भी मुझपर दोहरे मापदंड रखने का आरोप नहीं लगा सकती है क्योंकि आपकी तरह मेरा उनसे किसी किस्म का गठजोड़ नहीं है."

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नोटिफ़ाई किया तो सदन में कानून क्यों फाड़ा?
विपक्षी पार्टियों का सवाल है कि जब दिल्ली सरकार ने कृषि क़ानून को नोटिफ़ाई कर दिया तो उसके बाद उन्हें सदन में फाड़ने का मतलब क्या है?
इस बारे में आप विधायक जर्नेल सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "जिस दिन किसी क़ानून पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाते हैं, उस दिन उसे नोटिफाई या डिनोटिफाई करने की किसी स्टेट की ताक़त नहीं रह जाती है. अगर राज्य सरकार के हाथ में होता तो पंजाब सरकार अपने यहाँ रद्द कर लेती तो किसानों को इतने महीनों से यहाँ बैठने और धक्के खाने की क्या ज़रूरत थी?"
वो कहते हैं, "ये सिर्फ़ गुमराह करने के लिए बोला जा रहा है. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की विधानसभा में भी और आंदोलन के पहले दिन से अपना रुख़ स्पष्ट किया है."
लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है कि जब पंजाब सरकार ने क़ानून को नोटिफ़ाई नहीं किया तो आम आदमी पार्टी ने ऐसा क्यों किया?
क्या ये सब चुनावी रणनीति का हिस्सा है?
पंजाब में आम आदमी पार्टी की राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह मानते हैं कि वो पंजाब में कांग्रेस और अकालियों के ख़िलाफ़ एंटी-इन्कमबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के कारण ख़ुद को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश में लगी है.
जगतार सिंह कहते हैं, "आम आदमी पार्टी की ओर से जिस तरह तीन कृषि क़ानूनों को असेंबली में फाड़कर फेंका गया, उसे देखकर ऐसा लगता है कि वो ख़ुद को इस तरह पेश करके साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में किसानों का समर्थन हासिल कर सकते हैं."
"पिछले चुनावों में पंजाब में इनकी काफ़ी सक्रियता थी. ऐसा लगता था कि आम आदमी पार्टी सरकार भी बना सकती है. जनता ने इन्हें समर्थन भी दिया. लेकिन इनसे कुछ ग़लतियां हुईं. उस ज़माने में इनके साथ कुछ अति महत्वाकांक्षी लोग भी थे. इससे इन्होंने अपना ही नुकसान कर लिया."
साल 2017 में आम आदमी पार्टी ने पंजाब के चुनाव में 20 सीटें हासिल करके प्रमुख विपक्षी दल के रूप में पंजाब की राजनीति में एक जगह हासिल की थी. लेकिन इसके बाद आम आदमी पार्टी में कई स्तरों पर आपसी कलह सामने आई.

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जगतार सिंह बताते हैं, "पंजाब में जब आम आदमी पार्टी को विपक्षी दल का मैंडेट दिया गया तब उसे ये संभाल नहीं पाए. इनके 20 विधायक भी एक साथ नहीं रह पाए. पार्टी बँट गई. इन्हें बहुत अच्छा मौक़ा मिला था. लेकिन इन्होंने जनता के मैंडेट के साथ धोखा किया."
"इसके बाद से अभी तक लोग इन पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है. हालाँकि मैं ये भी कहता हूँ कि पंजाब की राजनीति में एक तीसरी पार्टी की जगह बनी हुई है और ये लोग उसी स्पेस के लिए संघर्ष कर रहे हैं."
जगतार सिंह कहते हैं, "ऐसे में मुझे लगता है कि जिस तरह वे अपनी राजनीति को किसानों पर केंद्रित कर रहे हैं, वो इसी वजह से है. क्योंकि इन्होंने उस क़ानून को नोटिफ़ाई भी किया है और ऐसा करने का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे सके."
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गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक आम आदमी पार्टी
एक ओर आम आदमी पार्टी पंजाब की राजनीति में दख़ल बढ़ाती हुई दिख रही है, वहीं पार्टी ने गुजरात और उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश करने का एलान कर दिया है.
पार्टी ने 2022 में उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनाव को लड़ने का फ़ैसला कर लिया है. इसके साथ साथ पार्टी ने अपनी तरह की राजनीति को भी शुरू कर दी है.
आम आदमी पार्टी को आंदोलन के दिनों से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि पार्टी के हालिया राजनीतिक कदमों में चुनावी रणनीति की झलक मिलती है.
वो कहते हैं, "इस समय मैं जो कुछ देख रहा हूँ, उससे ऐसा लगता है कि आम आदमी पार्टी एक तरफ पंजाब और हरियाणा की राजनीतिक ज़मीन छोड़ना नहीं चाहती है. क्योंकि ये जो किसान आंदोलन है, वो मूलत: पंजाब और हरियाणा के ही किसानों का आंदोलन है. ऐसे में वह इस क्षेत्र की राजनीति में अपने दख़ल को बनाए रखना चाहते हैं. यही नहीं, वो वहां मजबूती से अपने पैर जमाना चाहते हैं."
लेकिन सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक जटिलता वाले राज्य में उतर सकती है. क्योंकि जहां दिल्ली के चुनाव जनता की मूल ज़रूरतें जैसे बिजली और पानी के मुद्दे पर जीते जाते हैं.
इसके अलावा, उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सत्ता की सीढ़ी जाति, धर्म और बाहुबल से होकर गुजरती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आम आदमी पार्टी उस जगह पहुँच चुकी है जहाँ वो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में बीजेपी, समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी को टक्कर दे सके.
उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक लंबे अरसे से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान मानते हैं कि अब उत्तर प्रदेश में भी वह राजनीतिक जगह बनने लगी है जिसे आम आदमी पार्टी हासिल कर सकती है.
वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव की चुप्पी से एक ऐसी जगह खाली हुई है जिसे आम आदमी पार्टी भर सकती है. हालाँकि, इनके पास अभी ज़मीन पर नेटवर्क नहीं है. लेकिन इनके पास वक़्त है."

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शरत प्रधान के मुताबिक़, "उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ बरसों में एक ऐसे मतदाता वर्ग का विकास हुआ है, जो नेता की छवि और उसके काम के आधार पर उसे वोट देना चाहता है. वो तलाश रहा है कि वह किसे वोट दे."
"ये वोटर बीजेपी को नहीं डालना चाहता, मायावती को भी नहीं डालना चाहता है और अखिलेश से वह नाउम्मीद हो गया है. कांग्रेस से किसी तरह की उम्मीद होने का सवाल ही नहीं उठता है. ये मतदाता वर्ग यूपी में बैठकर दिल्ली को देख रहा है, अपने रिश्तेदारों से दिल्ली सरकार के हालचाल ले रहा है."
"लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली की तरह पहली बार में यूपी की राजनीति में इतिहास रच देगी. अभी इसका संघर्ष अपनी जगह बनाने का है और इसके लिए भी इसे कड़ी मेहनत करनी होगी."
आम आदमी पार्टी जिस तरह से आगामी चुनावों के लेकर अपनी रणनीति बना रही है, उससे इतना तय है कि पार्टी इन राज्यों में अपना विकास करने की कोशिश करेगी.
सवाल ये भी है कि उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी नेतृत्व दिल्ली की ओर से जाएगा या वहाँ के स्थानीय नेतृत्व पर आम आदमी पार्टी पर भरोसा करके चुनाव में उतरेगी.?
फ़िलहाल जरनैल सिंह दावा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में भी उनकी पार्टी 'काम की राजनीति' करने के लिए ही उतरेगी.
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