इसराइल, फ़लस्तीन समेत मध्य पूर्व के बड़े इलाके पर हुकूमत करने वाले तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का पतन कैसे हुआ था

इमेज स्रोत, FAUSTO ZONARO
- Author, नॉरबेर्टो पारेडेस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
"गणतंत्र ज़िंदाबाद, मुस्तफा कमाल पाशा ज़िंदाबाद!"
29 अक्टूबर, 1923 को तुर्की के चुने हुए जनप्रतिनिधि नई सरकार के गठन के बाद ये नारा लगा रहे थे. इस नए बने देश के पहले राष्ट्रपति के तौर पर कमाल अतातुर्क ने उसी दिन शपथ ली थी.
लेकिन ऐसा नहीं था कि देश में हरेक शख़्स उस रोज़ खुश ही था. कुछ लोग उस दिन दुनिया के सबसे महानतम ताक़तों में से एक ऑटोमन साम्राज्य के पतन का अफ़सोस भी मना रहे थे.
तुर्क साम्राज्य के पतन और आधुनिक तुर्की के उदय के अब सौ साल पूरे हो गए हैं. तुर्की पर 600 सालों तक हुकूमत करने वाले उस्मानिया सल्तनत की ताबूत में आख़िरी कील नवंबर, 1922 में ग्रैंड नेशनल असेंबली ने सुल्तान के ओहदे को ख़त्म करने साथ ठोक दी थी.
तुर्की पर इस खानदान ने 1299 में इसकी स्थापना से लेकर इसके पतन तक शासन किया था. इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में दुनिया के कई ताक़तवर देशों को चुनौती देने वाले उस्मानिया सल्तनत का पतन तुर्कों के लिए एक त्रासदी की तरह था.

इमेज स्रोत, Getty Images
ऑटोमन साम्राज्य का विस्तार तीन महादेशों में था. आज का बुल्गारिया, मिस्र, ग्रीस, हंगरी, जॉर्डन, लेबनान, इसराइल, फलस्तीन, मकदूनिया, रोमानिया, सीरिया, सऊदी अरब के कुछ और उसका सागर तट, उत्तरी अफ्रीका कभी ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा रहा था. अल्बानिया, साइप्रस, इराक़, सर्बिया, क़तर और यमन के कुछ हिस्से या फिर पूरे इलाके ही ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा थे.
लेकिन इन देशों में उस्मानिया सल्तनत की औपनिवेशिक विरासत को लेकर इतना विवाद है कि उन्होंने इसे भुलाना ही बेहतर समझा.
पर तुर्की के लोगों में उस्मानिया सल्तनत को लेकर एक नॉस्टालजिया है, सुनहरे दिनों की यादें हैं, इस पर उन्हें गर्व होता है.
उस्मानिया सल्तनत के संस्थापक उस्मान प्रथम तब के अनातोलिया जिसे अब तुर्की के नाम से जाना जाता है, में अपने साम्राज्य की नींव रखी थी.
वक़्त के साथ-साथ उनके साम्राज्य का दायरा 50 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया था. उस्मान नाम से ही ऑटोमन शब्द वजूद में आया. सुल्तान उस्मान के वंशजों ने छह सदी तक इस ताक़तवर मुल्क पर शासन किया.
कुस्तुनतुनिया का पतन

इमेज स्रोत, Getty Images
पैरिस डिडेरॉट यूनिवर्सिटी में ऑटोमन और मध्य पूर्व के इतिहास के प्रोफ़ेसर ओलिवियर बुके बताते हैं कि सुल्तान उस्मान ने जिस सल्तनत की नींव रखी थी, वो केवल एक तुर्की राज्य था.
उनके साम्राज्य के विस्तार की शुरुआत 1453 में कुस्तुनतुनिया के पतन के साथ शुरू हुई.
सफ़ेद घोड़े पर बैठे सुल्तान महमत द्वितीय के कुस्तुनतुनिया में दाखिल होने के साथ ही हज़ारों सालों से चली आ रही बाइजेंटाइन सल्तनत का ख़ात्मा हो गया.
इसके बाद उन्होंने वहां ऑटोमन साम्राज्य के दूसरे हिस्सों से लोगों को लाकर बसाया गया. सुल्तान महमत द्वितीय ने कुस्तुनतुनिया का नाम बदलकर इस्तांबुल कर दिया, जिसका अर्थ होता है 'इस्लाम का शहर.'
इसके साथ ही ये शहर न केवल ऑटोमन साम्राज्य की राजनीतिक और सैन्य राजधानी बन गया बल्कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया के बीच अपनी ख़ास भौगोलिक स्थिति के कारण वो विश्व व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र भी बन गया.
ऑटोमन साम्राज्य की आर्थिक ताक़त का श्रेय सुल्तान मेहमत द्वितीय की नीतियों को भी दिया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने अपनी सल्तनत में सौदागरों और शिल्पकारों को बहुत बढ़ावा दिया.
उन्होंने व्यापारियों को इस्तांबुल में बसने और वहां से अपना व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके बाद के शासकों ने भी ये नीति जारी रखी.
ऑटोमन साम्राज्य की कामयाबी का नुस्ख़ा

इमेज स्रोत, Getty Images
इस बात को एक तरफ़ रख भी दें कि ऑटोमन साम्राज्य में सारी ताक़त एक ही व्यक्ति में केंद्रित थी, इसके सफल होने के और भी कारण थे.
प्रोफ़ेसर ओलिवियर बुके के मुताबिक़, इसकी एक प्रमुख वजह ये थी कि ऑटोमन साम्राज्य में सैन्य और आर्थिक नीतियों को, दोनों को तरजीह दी जाती थी.
प्रोफ़ेसर ओलिवियर बुके कहते हैं, "ये एक ऐसा राज्य था जिसमें संसाधनों के दोहन को सैन्य विस्तार से जोड़ा गया. इस सैन्य विस्तार का मक़सद भी नए संसाधन हासिल करना था ताकि सुनियोजित तरीके से अधिक कर लगाए जा सकें."
प्रोफ़ेसर ओलिवियर ऑटोमन साम्राज्य की कामयाबी का श्रेय उसकी सैनिक शक्ति को भी देते हैं. वे कहते हैं कि ऑटोमन फौज काफी प्रशिक्षित थी और तेजी से हमलों को अंजाम देने की महारत रखती थी. इसमें वो जानिसार एलीट कॉर्प्स भी शामिल था जिसके पास सुल्तान की सुरक्षा का जिम्मा था. शांति के समय टैक्स वसूलने के लिए भी अलग से फौज थी.
ऑटोमन साम्राज्य की नौकरशाही के पास संसाधनों के वितरण का काम था और ये इस्लाम की भावना से प्रेरित और एकीकृत था.
प्रोफ़ेसर ओलिवियर कहते हैं, "ये एक विविधता भरा समाज था. सैद्धांतिक रूप से कहें तो वहां कोई जबरन धर्मांतरण (इस्लाम में) नहीं था लेकिन हकीकत में ऐसा था. कुछ इलाकों में इस्लामीकरण की आधिकारिक नीति भी थी."
ऑटोमन साम्राज्य को उनकी व्यावहारिकता के लिए भी जाना जाता है. वे दूसरी संस्कृतियों से अच्छी चीज़ें अपना लेते थे और उन्हें अपना बना लेते थे.
सुलेमान आलीशान

इमेज स्रोत, Getty Images
ऑटोमन साम्राज्य के सबसे मशहूर सुल्तानों में सुलेमान आलीशान का भी नाम लिया जाता है. सुलेमान आलीशान ने 1520 से 1566 तक तुर्की पर शासन किया.
सुलेमान के दौर में ऑटोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार बालकन, हंगरी और वियना तक था. पश्चिमी दुनिया में सुलेमान को 'आलीशान' का खिताब मिला तो पूरब में उन्हें 'कानूनी' कहा गया.
इन्हीं खिताबों में से एक उपाधि 'पूरब और पश्चिम के सुल्तान' की भी थी जिसे लेकर विवाद भी है.
इतिहासकारों का कहना है कि सुलेमान आलीशान के इस खिताब को रोम की सत्ता को चुनौती के रूप में देखा गया. हालांकि सुलेमान के शासनकाल के बाद भी ऑटोमन साम्राज्य का विस्तार होता रहा था.
लेकिन पश्चिमी दुनिया में सुलेमान की हुकूमत को ऑटोमन साम्राज्य के स्वर्ण काल के रूप में देखा जाता है. इस दौर में कई सफल सैनिक अभियानों को अंजाम दिया गया था.
साम्राज्य जो सार्वभौम होना चाहता था

इमेज स्रोत, HERITAGE IMAGES
'पूरब और पश्चिम के सुल्तान' की उपाधि से ये साफ़ लगता है कि ऑटोमन साम्राज्य अपने सामने किसी और नहीं देखता था, किसी को बराबर नहीं समझता था.
प्रोफ़ेसर ओलिवियर बुके कहते हैं, "ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तानों की नज़र में किसी और सल्तनत का कोई और सुल्तान नहीं हो सकता था."
उनका कहना है कि एक सार्वभौम साम्राज्य का विचार बाइज़ंटाइन साम्राज्य की विरासत और इस्लाम से आया था.
वे कहते हैं, "वे ज़मीन के हर उस हिस्से को जीत लेना चाहते थे जहां मर्द और औरत रहते हों. दर अल-इस्लाम के दायरे से बाहर हरेक देश को वो जीत लेना चाहते थे."
यही वजह थी कि ऑटोमन साम्राज्य ने सदियों तक हुकूमत की. उनके पास अभूतपूर्व नौसैनिक ताक़त थी जिसका समय के साथ-साथ विस्तार होता गया.
प्रोफ़ेसर ओलिवियर बुके कहते हैं, "ऑटोमन साम्राज्य के कमज़ोर पड़ने की शुरुआत उस वक़्त शुरू हुई जब सैन्य अभियान मुश्किल होने लगे या उसे रोकना मुश्किल हो गया."
ऑटोमन साम्राज्य के अंत की शुरुआत

इमेज स्रोत, Getty Images
ऑटोमन साम्राज्य के कमज़ोर पड़ने की पहली घटना उस वक़्त हुई जब 1571 में लेपांटो की लड़ाई में उसे हार का सामना करना पड़ा.
इस जंग में उसका मुक़ाबला 'होली लीग' से था. ये एक सैनिक गठबंधन था जिसमें कैथोलिक देश शामिल थे और इसकी कमान स्पेन की राजशाही के हाथों में थी.
इस गठबंधन में वे इलाके भी शामिल थे जिन्हें आज इटली कहा जाता है.
मानवता के इतिहास में इसे अब तक की सबसे बड़ी रक्तरंजित लड़ाइयों में गिना जाता है. इस जंग के साथ ही भूमध्यसागर में ऑटोमन साम्राज्य के सैनिक विस्तार पर विराम लग गया था.
इसके साथ ही ऑटोमन साम्राज्य की क़िस्मत ने उसका साथ देना छोड़ दिया और फिर पतन की शुरुआत हो गई जिसका सिलसिला आने वाली सदियों तक चलता रहा.
बीसवीं सदी की शुरुआत में इस्तांबुल में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया था और ऑटोमन साम्राज्य की बुनियाद खोखली हो चुकी थी.
1912-13 में हुए प्रथम बालकन युद्ध में उसका मुकाबला बालकन लीग से हुआ. बुल्गारिया, ग्रीस, मॉन्टेनीग्रो और सर्बिया का ये गठबंधन रूस की मदद से उस्मानिया सल्तनत को अपनी ज़मीन से बेदखल करना चाहता था.
सैनिक रूप से कमज़ोर ऑटोमन साम्राज्य ये जंग हार गया और यूरोप में उसे अपने सभी इलाके छोड़ने पड़े लेकिन कुस्तुनतुनिया और उसके आस-पास के इलाके उसकी वरदहस्त में ही रहे.
इतिहासकार इस हार को ऑटोमन साम्राज्य के लिए एक शर्मनाक़ पराजय के रूप में देखते हैं.
आख़िरी झटका

इमेज स्रोत, FAUSTO ZONARO
बाक़ी बची हुए ऑटोमन इलाक़े एक ख़राब आर्थिक दौर से गुज़र रहे थे. इसकी वजह से ट्रेड रूट्स में हो रहे परिवर्तन, बढ़ती बेरोज़गारी और एशिया-यूरोप के बीच बढ़ती व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा.
साथ ही उन्हें ब्रिटेन और फ़्रांस जैसी यूरोपीय ताक़तों की विस्तारवादी महत्वकांक्षाओं से भी दो-चार होना पड़ रहा था.
इसके अलावा साम्राज्य में विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था. आर्मीनियाई, कुर्द और ग्रीक लोग तुर्कों के दबदबे की शिकायत करने लगे थे.
इन सब दिक्कतों की पृष्ठभूमि में इस्तांबुल ने फ़्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और रूस के ताक़तवर गठबंधन के साथ युद्ध छेड़ दिया.
पश्चिमी गठबंधन को पहले विश्व युद्ध (1914-1918) में जीत मिली और ऑटोमन साम्राज्य की विघटन की शुरुआत हो गई.
इस युद्ध के बाद सीरिया के लिए फ़्रैंच मैंडेट अस्तित्व में आया. साथ ही इराक़ और फ़लस्तीन के लिए ब्रिटिश मैंडेट. इस मैंडेट के ज़रिए दो यूरोपीय ताक़तें इस क्षेत्र में अप्रत्यक्ष रूप से राज करने लगीं. हांलाकि ये सब लीग ऑफ़ नेशंस की सहमति से हो रहा था.
ऑटोमन प्रशासन इस बात से अनभिज्ञ था कि 1917 में ही ब्रिटेन और फ़्रांस ने इलाक़े को आपस में बांट लिया था.
उसी वर्ष बालफ़ोर घोषणा पर भी हस्ताक्षर किए गए थे. इस घोषणा में यहूदियों के लिए फ़लस्तीन के इलाक़े में एक होमलैंड देने का वादा किया गया था.
एक नया देश

इमेज स्रोत, Getty Images
आधिकारिक तौर पर 1 नवंबर, 1922 को ऑटोमन साम्राज्य का अंत हो गया. उस दिन सुल्तान का पद ख़त्म कर दिया गया.
एक साल बाद तुर्की गणराज्य की स्थापना की गई.
गणतंत्र बनाने की क्रांति का नेतृत्व करने के बाद मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क राष्ट्रपति बने. उन्हें आधुनिक तुर्की का पिता कहा जाता है.
ऑटोमन साम्राज्य के अंतिम सुल्तान बने मेहमत चतुर्थ. बताया जाता है कि क्रांतिकारियों से बचने के लिए उन्हें ब्रिटिश गार्ड्स ने इस्तांबुल से निकाल लिया था.
मेहमत इटली पहुँचे और वहां समुद्र किनारे सेन रेमो रिजॉर्ट पर रहने लगे. बिडंबना देखिए कि ये वही जगह थी जहाँ उनके साम्राज्य को बांटने पर ब्रिटेन और फ़्रांस ने वार्ताएं की थीं.
वहीं. चार साल बाद उनकी मौत हो गई. सुल्तान इतने ग़रीब हो गए थे कि मौत के बाद उनका ताबूत इटली के अधिकारियों ने अपने कब्ज़े में ले लिया.
वे चाहते थे सुल्तान ने जो स्थानीय व्यापारियों से कर्ज़ लिया, दफ़्न किए जाने से पहले उसे चुकाया जाए.
उधर, एक नया रिपब्लिक साम्राज्यवादी महत्वकांक्षाओं को पीछे छोड़ चुका था. उसका था कमालवाद. एक ऐसी विचारधारा जिसे अतातुर्क लागू कर रहे थे.
कई इतिहासकार कहते हैं कि तुर्की की धर्मनिरपेक्षता ऑटोमन साम्राज्य की ही देन है.
नव ऑटोमनवाद

इमेज स्रोत, Getty Images
दूसरी तरफ़ ऑटोमन साम्राज्य के ख़लीफ़ा कम अधिकारों के साथ कुछ समय के लिए तुर्की में एक संस्था के रूप में बने रहे, जब तक 3 मार्च 1924 को यह पूरी तरह ख़त्म न हो गया.
आज ऑटोमन साम्राज्य के खात्मे का कारण पहला विश्व युद्ध बताने के विचार का विरोध यह दावा करते हुए किया जाता है कि इसकी वजह पश्चिम की ग़लती है.
इतिहासकार ओलिवियर कहते हैं, "तुर्की के शासन और वर्तमान राष्ट्रपति (रेचेप तैय्यप अर्दोआन) ने (साम्राज़्य के पतन में) पश्चिम की ज़िम्मेदारी के विचार को कई सालों तक उठाया."
हाल के वर्षों में, तुर्की में एक नए-ऑटोमन युग को पुर्नजीवित करने की भावना ने ज़ोर पकड़ा है.
ऑटोमन के अतीत और उस शासन का तुर्की के इस क्षेत्र में प्रभुत्व का सम्मान अपने व्यापक अर्थ में एक इस्लामिक और साम्राज्यवादी राजनीतिक विचारधारा है.
अपना चेहरा अधिक 'पश्चिमी' और 'सेक्युलर' दिखाने की मंशा से कई दशकों से आधुनिक तुर्की के नेता खुद को साम्राज्यवादी विरासत और इस्लाम से दूर रखने की कोशिश करते रहे हैं.
लेकिन जबसे अर्दोआन सत्ता में आए, उन्होंने देश के ऑटोमन अतीत और इसके इस्लामी परम्परा के प्रति अपने लगाव को छुपाया नहीं.
इस बात का सबूत ये है कि जिस हाजिया सोफ़िया को कमाल अतातुर्क ने प्रसिद्ध म्यूज़ियम बनाया था उसे अर्दोआन ने मस्जिद में बदला, हालांकि उनका ये कदम काफ़ी विवादित रहा.
इसी तरह अर्दोआन ने लगातार सेलिम आई के प्रति अपने झुकाव को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया. ऑटोमन साम्राज्य को ऐतिहासिक रूप से विस्तारित करने का श्रेय सुल्तान सेलिम को जाता है.
साल 2017 में एक संवैधानिक जनमतसंग्रह जीतने के बाद अर्दोआन ने अपनी पहली सार्वजनिक सभा पूर्व ऑटोमन सुल्तान के मकबरे पर की. इस संवैधानिक जनमतसंग्रह से उनकी शक्तियों में काफ़ी इजाफ़ा हुआ.
और हाल ही में, उन्होंने इस्तांबुल के जलडमरूमध्य पर बने पुलों में से एक पुल बोस्फोरस का नाम अपने नाम पर बदलने का फैसला किया.
ओलिवियर कहते हैं, "ऑटोमन साम्राज्य विलुप्त हो चुका है लेकिन एक नव-ऑटोमन विकसित हुआ है. 20वीं सदी के अंत की तुलना में आज ऑटोमन सम्राज्य के अधिक संदर्भ दिखने लगे हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












