दुनिया के सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश में भारत की जड़ें मज़बूत होने की कहानी

इंडोनेशिया में गोलाबारी करते हुए भारतीय सैनिक

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया में गोलाबारी करते हुए भारतीय सैनिक.
    • Author, पीटर कैरे
    • पदनाम, फेलो एमेरिटस, ट्रिनिटी कॉलेज ऑक्सफोर्ड और एडजंक्ट प्रोफ़ेसर

इंडोनेशिया, 17 हज़ार से ज़्यादा द्वीपों में फैला है. यहाँ 700 से ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं और 1340 से ज़्यादा जातीय समूह रहते हैं.

ये दुनिया के सबसे विविधता वाले इलाक़ों में से एक है. इंडोनेशिया का द्वीप समूह एशिया की दो महान सभ्यताओं चीन और भारत के बीच आबाद है.

ईसा से 290 साल पूर्व से लेकर 15वीं सदी तक इंडोनेशिया, भारत के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा रहा था. इस दौरान इंडोनेशिया की स्थानीय राजनीतिक व्यवस्थाओं पर हिंदू और बौद्ध धर्मों का गहरा असर पड़ा था.

भारतीय उप-महाद्वीप के दक्षिण पूर्व में स्थित राजवंशों, ख़ास तौर से चोल साम्राज्य (300 ईसा पूर्व से 1279 ईस्वी तक) ने जावा पर राज करने वाले राजाओं के साथ व्यापारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध स्थापित कर लिए थे.

इस वजह से इंडोनेशियाई द्वीप समूह, भारत के प्रभाव क्षेत्र में आ गए थे और उनका भारतीयकरण और संस्कृतीकरण हो गया था.

इंडोनेशिया

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इमेज कैप्शन, द्वीपों में फैला इंडोनेशिया.

इंडोनेशिया पर भारतीय भाषाओं की छाप

इसका एक दिलचस्प उदाहरण इंडोनेशिया में बोली जाने वाली बोलियों पर भारतीय भाषाओं के असर के तौर पर देखा जा सकता है.

इंडोनेशिया के द्वीपों पर ऑस्ट्रोनेशियन परिवार की बोलियां बोली जाती हैं.

लेकिन, जावा की पुरानी बोली (ओल्ड जावा) बोलने वाले तमिल शब्द वालुकु (जोताई करना) का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं.

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ओल्ड जावा बोली की शब्दावली और उसको लिखने की पूरी व्यवस्था, यानी जावा के अक्षर (लिपि और अक्षर), प्राचीन भारतीय भाषाओं पर आधारित हैं.

ओल्ड जावा भाषा की हर लिखी जाने वाली विधा (साहित्य, प्रार्थना और शिलालेखों) को प्राचीन भारतीय भाषाओं से लिया गया है.

मिसाल के तौर पर ककाविन (ओल्ड जावा भाषा में बखान करने के लिए ख़ास तरह से लिखी जाने वाली कविताएं, जिन्हें संस्कृत के काव्यों की तरह छंद में बांधकर लिखा जाता है), पर्व (संस्कृत की महाभारत और रामायण का गद्य संकलन), मंत्र (अलग अलग तरह की प्रार्थनाएं और पूजा-पाठ के मंत्र), और प्रशस्ति (कांसे और पत्थर पर खुदे फ़रमान).

हमें इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि आज के इंडोनेशिया का सूत्र वाक्य भिन्नेका तुंगल इका (सब अलग-अलग हैं पर एक हैं, यानी विविधता में एकता), दो महान भारतीय धर्मों हिंदू और बौद्ध धर्मों से प्रेरित है.

इंडोनेशिया पर अलग-अलग समय पर बौद्ध और हिंदू राजा-रानियों ने शासन किया है.

जैसे कि महारानी गायत्री राजपत्नी (1276-1350 ईस्वी). गायत्री, मजापहित के संस्थापक और पहले शासक केर्ताराजासा जयवर्धना (शासन काल 1293-1309 ईस्वी) की पत्नी थीं.

उनके पोते हयाम वुरुक (शासन काल 1350-89 ईस्वी) शैव संप्रदाय के मानने वाले थे. ‘विविधता में एकता’ की ये परिकल्पना 14वीं सदी में ओल्ड जावा में लिखे गए सुतसोम ककाविन से ली गई है, जिसे एम्पू तंतुलार ने लिखा था.

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इमेज कैप्शन, जावा को देखने के बाद रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि उन्हें यहाँ हर तरफ़ भारत दिखाई देता है.

जब रविंद्रनाथ टैगोर इंडोनेशिया के जावा पहुंचे

कहा जाता है कि जावा के ज्वालामुखी, ‘हिमालय की परछाइयां’ हैं. ये सोच भी भारत से मिली सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है.

इसी तरह आज के इंडोनेशिया के बाशिंदों का डीएनए भी है, जिसमें से औसत छह प्रतिशत भारतीय मूल का है.

वही, असेह और बाली जैसी जगहों पर तो इंडोनेशियाई लोगों के डीएनए में भारतीय मूल की विरासत 10 प्रतिशत तक है.

ये इलाक़े सदियों से हिंद महासागर के व्यापारिक संपर्कों के ज़रिए भारत से वस्तुओं, रीति-रिवाजों और संस्कृतियों का लेन-देन कर रहे थे.

दक्षिणी बाली के शाही दरबारों पर ब्राह्मणवादी प्रभाव की विरासत काफ़ी मज़बूत थी.

लेकिन इतने बड़े पैमाने पर भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव के बावजूद, जावान के लोग नक़ल करने वाले ग़ुलाम नहीं थे.

ये बात इंडोनेशिया के पड़ोसी स्याम (1932 के बाद का थाईलैंड) के ठीक उलट है. स्याम में उसके पड़ोसी देशों बर्मा और चीन के सांस्कृतिक प्रभाव सीधे-सीधे अपना लिए गए थे और उसमें कोई स्थानीय सौंदर्यबोध जोड़ने वाला बदलाव नहीं किया गया.

वहीं, जावा के निवासियों ने भारत से कला और अध्यात्म के क्षेत्र में जो प्रेरणा हासिल की, उससे उन्होंने अपनी अलग कला और संस्कृति की रचना की, जो उनकी अपनी ज़मीन की ख़ुशबू में रची बसी थी.

फिर चाहे वो आर्किटेक्चर (स्थापत्य कला) हो, या फिर साहित्यिक और धार्मिक विलक्षण प्रतिभा के नमूने. इसका सबसे अच्छा बखान बंगाल के कवि गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने किया है.

जब टैगोर 1929 में जावा के पहले सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बोएडी ओएटोमो (1908-42) के मेहमान बनकर वहांँ गए, तब उन्होंने जावा की संस्कृति को क़रीब से देखा था.

जावा के शानदार प्राचीन हिंदू और बौद्ध स्मारकों को देखने के बाद टैगोर ने एलान किया था कि, ‘मैं यहां पर हर तरफ़ भारत को देखता हूं, फिर भी उसे पहचान नहीं पाता हूं!’

इसका मतलब ये है कि दक्षिणी मध्य जावा में हिंदू और बौद्ध स्मारकों को ध्यान से देखते हुए भले ही टैगोर को जावा के कोने-कोने में भारतीय सभ्यता की छाप दिखाई देती थी.

लेकिन ऐसा लगता है कि इस भारतीय प्रभाव में भी सौंदर्य के लिहाज़ से बड़े क्रांतिकारी बदलाव किए गए थे. ठीक वैसे ही जैसे शेक्सपियर के नाटक दि टेम्पेस्ट के किरदार एरियल ने कहा था, ‘नई पहचान देने वाला बहुत अजनबी मगर शानदार और समृद्ध बदलाव.’

फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट

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इमेज कैप्शन, फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट.

उपनिवेश काल में आए बदलाव: अंग्रेज़ों का राज (1811-16) और इसकी विरासत

इंडोनेशिया के यूरोपीय उपनिवेश बनने से पहले के दौर में उस पर, दक्षिणी एशियाई और ख़ास तौर से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की छाप और उसकी प्रेरणा तो चारों तरफ़ दिखाई देती है.

लेकिन, जब हम उसके औपनिवेशिक काल की तरफ़ बढ़ते हैं, तो हमें इंडोनेशिया में बड़े बदलाव और अलग ही तरह का मंज़र नज़र आता देता है.

इसकी शुरुआत मार्शल हर्मन विलेम डाएंडेल्स (1762-1818) के गवर्नर जनरल बनकर के पहुँचने से होती है. मार्शल हर्मन को नेपोलियन ने गवर्नर जनरल नियुक्त किया था और वो जनवरी 1808 से 1811 तक इस ओहदे पर रहे.

ये दौर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का था: फ्रांस की क्रांति (1792-1802) और उसके बाद नेपोलियन के दौर के युद्ध (1803-1815), अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए पहले विश्व युद्ध के तजुर्बे जैसे थे.

इस दौरान नौसेनाओं की जंगें देखने को मिलीं. उपनिवेश बनाने के लिए यूरोपीय ताक़तों ने नए-नए देशों की तलाश में अभियान भेजे. इसके बाद अर्जेंटीना से लेकर दक्षिणी पूर्वी एशिया तक हमले किए गए.

नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम से क़रीब 12 हज़ार 600 समुद्री मील दूर स्थित जावा, इन यूरोपीय युद्धों का एक बड़ा मोर्चा बन गया था.

अगस्त-सितंबर 1811 में ब्रिटेन ने 12 हज़ार सैनिकों के साथ जावा पर हमला बोला था. ब्रिटेन के आधे से ज़्यादा सिपाही बंगाली थे.

घुड़सवार तोपखाने और इंजीनियरों की कुछ टुकड़ियां मद्रास या आज के चेन्नई से भी थीं. इन सबको ख़ास तौर से जावा की मुहिम के लिए ‘वॉलंटरी बटालियन’ के तौर पर भर्ती किया गया था.

इनमें से बंगाल लाइट इन्फैंट्री वॉलंटियर बटालियन (एलआईवीबी) ख़ास तौर से बर्तानिया के लिए बोझ बन गई.

इंडोनेशिया

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इमेज कैप्शन, सुराबाया युद्ध के दौरान जापानी सेना ब्रिटिश सेना द्वारा ज़ब्त किए टैंक की रखवाली करते हुए एक भारतीय सैनिक.

जब भारतीय सैनिक जंग का हिस्सा बने

बंगाल के इन सिपाहियों के बारे में वहाँ ब्रिटेन के लेफ्टिनेंट गवर्नर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स (1781-1826; कार्यकाल 1811-16) ने कहा था कि ‘उनकी आदतें और तौर-तरीक़े जावा के लोगों के लिए अपमानजनक थे... (जिनकी वजह से) अक्सर परेशानी खड़ी हो जाती थी.’ इन सिपाहियों को ‘पूर्वी समुद्र की विशाल बैरक’ यानी भारत से भर्ती किया गया था.

19वीं सदी के आते आते ब्रिटेन ने भारत से भाड़े के लड़ाकों की क़रीब ढाई लाख सैनिकों की फ़ौज खड़ी कर ली थी.

भारत से भर्ती किए गए ये सिपाही, पूरे एशिया और मध्य-पूर्व (मिस्र और सीरिया) तक लड़ने के लिए भेजे जाते थे. जावा में अंग्रेज़ों की तरफ़ से लड़ने के लिए भेजे गए भारतीय सैनिकों ने पांच साल की सेवा के दौरान अपने ख़ून से बलिदान की एक नई इबारत लिखी थी.

आधुनिक युग में कम से कम दो बार ऐसा हुआ, जब इंडोनेशिया के मोर्चे पर भारतीय सैनिक, दो-दो ख़ूनी जंगों का हिस्सा बने थे.

पहले 26 अगस्त 1811 को आज के जकार्ता (1942 से पहले बटाविया का मीस्टर कॉर्नेलिस) के जतिनेगारा में. इसके बाद 10 से 27 नवंबर 1945 के दौरान पूर्वी जावा के सुराबाया में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटेन की तरफ़ से ख़ूनी युद्ध लड़े थे.

पहले युद्ध के दौरान, ब्रिटेन के मुक़ाबले में लड़ रही फ्रांस और डच सेनाओं के पचास प्रतिशत सैनिक मारे गए थे.

वहीं, स्थानीय मद्रासी और जावा के हल्पट्रोयपेन (स्थानीय सहयोगी टुकड़ियां) के 80 फ़ीसद जवान मौत के मुंह में समा गए थे. फ्रांस के गवर्नर जनरल मार्शल हर्मन ने इस औपनिवेशिक युद्ध के लिए 18 हज़ार सैनिकों की जो फ़ौज भर्ती की थी.

लेकिन, इन छह हफ़्तों के दौरान (4 अगस्त से 18 सितंबर 1811 के बीच) इसमें से 12 हज़ार से ज़्यादा सैनिक जंग के मैदान में मारे गए थे.

जतिनेगारा/ मिस्टर कॉर्नेलिस में सैनिकों की इतनी लाशें जमा हो गई थीं कि उन्हें सामूहिक क़ब्रों में दफ़नाना पड़ा. पड़ोस के कांपुंग मेलायू के लोगों ने इसका नाम रवा बांग्के (लाशों का दलदल) रख दिया था.

बाद में, जावा के गवर्नर अली सादिकिन (कार्यकाल 1966-77) ने इसका नाम रवा मावर, यानी ग़ुलाबों का दलदल रखकर इस कुख्यात जगह की ख़ूनी यादों पर एक झीना पर्दा डालने की कोशिश की थी.

दूसरा मौक़ा, यानी नवंबर 1945 में सुराबाया का युद्ध, वो आख़िरी मोर्चा था जब किसी औपनिवेशिक संघर्ष में भारतीय सैनिकों को ब्रिटेन की कमान में लड़ना पड़ा था.

इस युद्ध के नतीजे सभी पक्षों के लिए घातक साबित हुए थे, सुराबाय में पैदा हुए इंडोनेशिया के राष्ट्रवादी नेता और राजनयिक, डॉक्टर रुसलान अब्दुलग़नी ने इस युद्ध के बारे में लिखा था कि, ‘ये एक ऐसी तबाही थी, जिसने सुराबाया के इतिहास की ही नहीं, बल्कि इसके साथ साथ पूरे इंडोनेशिया में हमारी आज़ादी की लड़ाई की दशा और दिशा बदल डाली.’

लेकिन, हम अचानक अपनी कहानी से आगे की छलांग लगाने लगे हैं.

इंडोनेशिया

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इमेज कैप्शन, सुराबाया में इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों द्वारा भारतीय सैनिकों को उनके ख़िलाफ़ न लड़ने की अपील करते हुए लगाया गया पोस्टर.

बंगाल के सैनिकों का विद्रोह

पहले, हमें 19वीं सदी के युद्ध की बात करनी चाहिए. जावा पर अपने छोटे से शासनकाल यानी 1811 से 16 के दौरान, अंग्रेज़ों को अहसास हुआ कि वहाँ पाँच हज़ार सैनिकों वाले अड्डा बनाए रखने के लिए, बंगाल के सिपाहियों पर बहुत अधिक भरोसा करना उन्हें बहुत महंगा पड़ा था.

19 अगस्त 1816 को बटाविया से यूनियन जैक उतारा गया और जावा को दोबारा डच सैनिकों को सौंपा गया था. लेकिन उससे पहले जावा में अंग्रेज़ों को बहुत मुसीबतें उठानी पड़ी थीं.

अक्टूबर-नवंबर 1815 के दौरान, वहां तैनात बंगाल के सिपाहियों ने बग़ावत कर दी थी. दक्षिणी मध्य जावा के योग्याकार्ता और सुराकार्ता के दरबारों में हुई सैनिकों की इस बग़ावत को सिपाही षडयंत्र के नाम से जाना जाता है.

ये विद्रोह इतना गंभीर था कि ब्रिटिश सरकार की चूलें हिल गई थीं. इस साज़िश में सुराकार्ता के शासक सुनान पाकु बुवोनो चतुर्थ (कार्यकाल 1788-1820) और बंगाल की लाइट इन्फैंट्री वॉलंटियर बटालियन के लगभग 800 सैनिक शामिल थे.

ये सैनिक 1811 से ही लगातार इन दरबारों के सैनिक अड्डों पर तैनात रहे थे. सिपाही षडयंत्र रचने वालों का मक़सद अपने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करना, और जावा में मौजूद दूसरे विदेशी यूरोपीय लोगों का सफ़ाया करना था.

सुनान को यूरोपीय शासकों को उखाड़ फेंकने में मदद करने के बदले में लाइट इन्फ्रैंट्री के जवानों के एक सिपाही सूबेदार- या कप्तान की रैंक वाले जेसीओ- को नया लेफ्टिनेंट गवर्नर तैनात किया जाना था.

इसके अलावा पश्चिमी जावा और उत्तरी तटीय ज़िलों (पसिसिर) को ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की निगरानी में सौंपा जाना था. ख़बरें तो यहां तक थीं कि सुराकार्ता के शासक सुनान ने अपनी एक बेटी भी इस सिपाही सूबेदार से ब्याहने का वादा किया था.

जावा में हिंदू और बौद्ध अतीत के प्रतीक के रूप में वहां बहुत से पुराने मंदिर और पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं. जब अंग्रेज़ों ने वहां क़ब्ज़ा किया तो उन्होंने इन प्राचीन स्मारकों की साफ़-सफ़ाई और सर्वेक्षण शुरू कराया.

जावा में नौंवी शताब्दी का बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर

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इमेज कैप्शन, जावा में नौंवी शताब्दी का बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर.

हो सकता है कि इसी वजह से जावा के शासक वर्ग के बीच अपने हिंदू और बौद्ध इतिहास और भारतीय विरासत के प्रति दिलचस्पी पैदा हुई हो.

मिसाल के तौर पर योग्याकार्ता में प्रिंस डिपोनेगोरो (1785-1855) ने तो आस-पास के मंदिरों से कई मूर्तियां ले जाकर अपने महल में रखवा ली थीं और अपने ध्यान के लिए निकाले जाने वाले वक़्त में चार चांद लगाए थे.

प्रिंस डिपोनेगोरो को डच उपनिवेशवादियों के ख़िलाफ़ जावा के युद्ध (1825-30) के नेता के तौर पर याद किया जाता है.

जब सिपाही साज़िश हुई, तो ज़मीनी स्तर पर तैनात ब्रिटेन के अपने अधिकारियों की तादाद बेहद कम थी. सेना के नियमों के मुताबिक़, 800 देसी सैनिकों के ऊपर कम से कम सात ब्रिटिश अधिकारी होने चाहिए थे.

मगर, उस समय इससे भी कम ब्रिटिश सैनिक अफ़सर वहां तैनात थे. इसी वजह से इस साज़िश का पता अंग्रेज़ों को बहुत देर से चल सका. लेकिन, ब्रिटिश सैनिक कमान ने तेज़ी से क़दम उठाया और बाग़ी सैनिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की.

17 सैनिकों को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देने (मुग़ल दौर का चलन) की सज़ा दी गई. इसके अलावा पचास दूसरे सैनिकों को हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़कर बंगाल वापस भेज दिया गया.

लेकिन, जावा में तैनात होने वाले वो आख़िरी भारतीय सिपाही नहीं थे. ब्रिटिश सेना में भर्ती बहुत से सिपाही फौज छोड़कर भाग गए थे.

उन्होंने जावा के स्थानीय परिवारों में शादियां कर लीं. कई सिपाही महावत बन गए, या फिर योग्याकार्ता में सुल्तान के अंगरक्षकों की टुकड़ी में शामिल हो गए. प्रिंस डिपोनेगोरो ने अपनी आत्मकथा (बाबड) में इनमें से एक नूरनगली नाम के सिपाही को, ‘बंगाल का पारंपरिक हकीम’ (दुकुन बेंग्गाला) बताया है. नूरनगली बाद में शहज़ादे का निजी डॉक्टर बन गया.

गवर्नर जनरल अर्ल एमहर्स्ट

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इमेज कैप्शन, भारत के गवर्नर जनरल अर्ल एमहर्स्ट.

वहीं, जावा में बस गए दूसरे भारतीय सिपाहियों ने जावा युद्ध (1825-30) के दौरान दोनों ही पक्षों यानी डच और जावा सेनाओं की तरफ़ से लड़ाई लड़ी. बोयोलाली में दूध के कारोबार की शुरुआत भी एक पूर्व भारतीय सिपाही ने तब की थी, जब वहां अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा हो गया था. उसकी डेयरी में घी और दूसरे डेयरी उत्पाद बनाए जाते थे. वो सिलसिला आज तक जारी है.

जावा में युद्ध शुरू होने से एक साल पहले 1824 में बंगाल और उसके सिपाही एक बार फिर से समस्या बन गए थे. इसकी वजह ये थी कि पैसे की क़िल्लत झेल रही नीदरलैंड्स- इंडीज़ की हुकूमत ने कलकत्ते के एक प्राइवेट बैंक जॉन पामर ऐंड कंपनी से, 60 लाख सिक्के रुपए (2023 के हिसाब से 35 करोड़ डॉलर) उधार लिए थे.

बैंक ने ये क़र्ज़ जावा के सबसे ज़्यादा उपजाऊ सूबे केडू के बदले में दिया था. 1826-27 के दौरान, जब ये लगने लगा कि प्रिंस डिपोनेगोरो की सेना, डचों को जावा से खदेड़ देंगी, तो ये क़र्ज़ एक बड़ा मसला बन गया था.

अपना क़र्ज़ डूबने की चिंता से परेशान जॉन पामर ऐंड कंपनी ने बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल (1834 के बाद भारत के गवर्नर जनरल) अर्ल एमहर्स्ट (कार्यकाल 1823-28) से कहा कि वो डच सेनाओं की मदद के लिए दो हज़ार सैनिक जावा भेजने पर विचार करें. बैंक की इस अर्ज़ी पर बाद में ब्रिटेन की संसद में भी चर्चा हुई थी.

हालांकि, ब्रिटेन के विदेश मंत्री जॉर्ज कैनिंग (1822-27) के सुझाव पर बैंक का ये प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया था. ब्रिटिश संसद ने माना था कि बंगाल प्रेसिडेंसी के सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल जावा के युद्ध में करना ग़लत होगा.

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो.

सुराबाया का युद्ध (10-27 नवंबर 1945) और भारतीय राष्ट्रवाद: ब्रिटिश राज के ताबूत में आख़िरी कील

जावा युद्ध के क़रीब सवा सौ साल बाद ब्रिटेन को एक बार फिर से इस बात का अहसास हुआ कि जावा में इंडोनेशिया की राष्ट्रवादी सेनाओं के ख़िलाफ़ भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल कितना नुक़सानदेह हो सकता है.

25 अक्टूबर 1945 को चार हज़ार भारतीय सैनिकों वाली एक ब्रिगेड, सिंगापुर से सुराबाया पहुंची. इस ब्रिगेड की कमान ब्रिगेडियर जनरल ऑबर्टिन वाल्टर सोदर्न मैलेबी (1899-1945) के हाथ में थी. उनकी ज़िम्मेदारी उथल-पुथल भरे इस शहर में अमन क़ायम करने की थी.

असल में 17 अगस्त 1945 को राष्ट्रपति सुकर्णो और उप-राष्ट्रपति हत्ता ने जकार्ता में आज़ादी का एलान कर दिया था. इसके बाद, 22 अगस्त 1945 से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे तमाम संगठनों (स्त्रिज्द संगठनों) ने पूर्वी जावा के इस महान बंदरगाह शहर में अपने स्वतंत्र अधिकार हासिल करने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया था.

इन संगठनों की अगुआई ज़्यादातर युवाओं के हाथ में थे. उनके आंदोलन को तेज़ी से कामयाबी मिली. अक्टूबर के शुरुआती महीनों तक सुराबाया शहर का पुराना इलाक़ा पूरी तरह से स्वतंत्रता सेनानियों के क़ब्ज़े में आ चुका था. जापानी सेना उनके आगे पूरी तरह से लाचार दिख रही थी.

इसके अलावा, इन नौजवानों ने गुबेंग में जापान की नौसेना के मालखाने से काफ़ी तादाद में गोला-बारूद लूट लिए थे, जिन्हें स्थानीय लोगों में बाँट दिया गया था.

इंडोनेशिया में एक सैनिक ब्रिटिश टैंक पर निशाना साधते हुए

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया में एक सैनिक ब्रिटिश टैंक पर निशाना साधते हुए.

ब्रिगेडियर जनरल मैलेबी को इन बातों की कोई ख़बर नहीं दी गई थी. 23वीं भारतीय डिविज़न के इतिहासकार के शब्दों में ब्रिगेडियर मैलेबी ने ‘अनजाने में बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया था.’

मैलेबी ने अपने 4,000 सैनिकों को कंपनी (100) और प्लाटून (30) के टुकड़ों में बांटकर पूरे इलाक़े में फैला दिया था, ताकि अहम इमारतों और ठिकानों की निगरानी की जा सके.

एक हफ़्ते के भीतर ही मैलेबी की सेना को स्वतंत्रता सेनानियों के आगे झुकते हुए तांजुंग पेराक बंदरगाह के इलाक़े से पीछे हटना पड़ा था. जब वो स्वतंत्रता सेनानियों के साथ युद्धविराम की बातचीत के लिए अपनी लिंकन कार में सवार होकर मोर्चे पर पहुंचे, तो उन्हें खुली खिड़की से एक पेमुदा (स्वतंत्रता सेनानी) से गोली मार दी गई थी, और 30 अक्टूबर 1945 को ब्रिगेडियर मैलेबी का निधन हो गया था.

अंग्रेज़ों ने भी इसका बदला लेने में देर नहीं की. 10 नवंबर 1945 तक, मेजर जनरल सर रॉबर्ट मानसर्ग (1900-1970) की अगुवाई में ब्रिटिश भारतीय सेना की पूरी पांचवीं डिवीज़न, सुराबाया पहुंच गई थी. इस डिवीज़न के पास टैंक और लड़ाकू विमान भी थे.

अगले दो हफ़्तों के दौरान (10 से 27 नवंबर 1945) इस डिवीज़न ने गलियों और सड़कों में आमने सामने की लड़ाई लड़ते हुए, सुराबाया के बंदरगाह शहर को दोबारा अपने क़ब्ज़े में ले लिया था.

जब 27 नवंबर को लड़ाई रुकी, तो लगभग साढ़े चार लाख लोगों की आबादी वाले शहर के एक तिहाई या डेढ़ लाख लोग बेघर हो चुके थे. और, इस युद्ध में क़रीब 16 हज़ार पेमुदा और इंडोनेशिया के सैनिक (तेंतारा कियामनन रकयात TKR) मारे जा चुके थे.

इस दौरान बड़ी तादाद में आम नागरिकों की भी मौत हुई थी, और क़रीब बीस हज़ार लोग घायल हुए थे. मारे गए अंग्रेज़ों और भारतीयों की तादाद 588 थी. ये शाही ब्रिटिश सेना की आख़िरी ख़ूनी लड़ाई थी, और इसके नतीजे बेहद घातक साबित हुए थे (जैसा ऊपर रुसलान अब्दुलगनी ने लिखा है)

ब्रिटेन के एडमिरल लॉर्ड लुई माउंटबेटन

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन के एडमिरल लॉर्ड लुई माउंटबेटन.

ऐसा कैसे हुआ?

जब 15 अगस्त 1945 को जापान ने बिना शर्त समर्पण कर दिया. तो नीदरलैंड्स और ईस्ट इंडीज़ के पुराने उपनिवेशों की ज़िम्मेदारी, अमरीकी जनरल डगलस मैकआर्थर की दक्षिणी पश्चिमी पैसिफिक कमान से लेकर ब्रिटेन के एडमिरल लॉर्ड लुई माउंटबेटन की दक्षिणी पूर्वी एशियाई कमान को सौंप दी गई थी.

माउंटबेटन को जावा के हालात का क़तई अंदाज़ा नहीं था. जो उनके बयान से ज़ाहिर है:

‘मैंने बिना किसी ख़ुफ़िया रिपोर्ट के नीदरलैंड्स और ईस्ट इंडीज़ को साउथ वेस्ट पैसिफिक इलाक़े से अपनी कमान में ले लिया था. मुझे (माउंटबेटन) को जावा में पैदा हुए हालात की कोई जानकारी नहीं दी गई थी.'

निश्चित रूप से ये तो पता था कि युद्ध से पहले से इंडोनेशिया में एक आंदोलन चल रहा है; और इसको नामचीन बुद्धिजीवियों से समर्थन भी मिल रहा है. इनमें से कइयों (जैसे कि डॉक्टर टिजिप्टो मंगोएनकोएसोएमो, सुवार्दी सुरयानिनग्राट/ की हाजदार देवांतारा और ईएफई डोउवेस डेक्कर) को तो राष्ट्रवादी प्रोपेगैंडा में हिस्सा लेने की वजह से देश निकाला भी झेलना पड़ा था.

लेकिन जापान के क़ब्ज़े (1943-45) के दौरान इस आंदोलन का क्या हुआ, इसकी मुझे बिल्कुल भी ख़बर नहीं थी. एनईआई के लेफ्टिनेंट गवर्नर डॉक्टर एच. जे. वान मूक (1894-1965; कार्यकाल 1942-48), एक सितंबर को कैंडी (सीलोन) आए थे.

उन्होंने बातचीत के दौरान ऐसा कोई इशारा नहीं दिया था कि जावा पर दोबारा क़ब्ज़ा करने के दौरान, जापानी सैनिकों को बंधक बनाने के अलावा कोई और समस्या होगी.’

ख़ुफ़िया जानकारी देने में इस नाकामी के नतीजे सुराबाया में अंग्रेज़ों और इंडोनेशियाई नागरिकों को किस तरह भुगतने पड़े, ये तो पहले ही बताया जा चुका है.

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो के साथ भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू.

लेकिन, भारतीय सैनिकों का क्या हुआ?

सुराबाया में स्वतंत्रता सेनानियों के हाथों मारे गए ब्रिगेडियर मैलेबी, ख़ुद ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे. वो ब्रिटिश भारतीय सेना की दूसरी पंजाब रेजिमेंट से ताल्लुक़ रखते थे.

उनकी कमान के तहत मराठा लाइट इन्फैंट्री (चौथी और छठी बटालियनें) और राजपूताना राइफल्स (पांचवीं बटालियन) के सैनिक थे. लेकिन, जब जनरल मानसर्ग की पांचवीं भारतीय डिवीज़न, सुराबाया पहुंची, तो उनके साथ 11 इन्फैंट्री ब्रिगेड थीं.

जिनमें बड़ी तादाद में गुरखा सैनिक (पहली, पांचवीं, आठवीं, नौवीं और दसवीं गुरखा राइफल्स), पंजाबी (15वीं पंजाब रेजिमेंट), सिख (11वीं सिख रेजिमेंट), जाट (नौवीं जाट रेजिमेंट), बिहारी (पहली बटालियान बिहार रेजिमेंट), बलूच (10वीं बलूच रेजिमेंट), मराठा (मराठा लाइट रेजिमेंट), हैदराबादी (19वीं हैदराबाद रेजिमेंट) और राजपूत (राजपूताना राइफल्स) सैनिक भी थे.

जब इन सैनिकों को इंडोनेशिया की आज़ादी के लड़ाकों को कुचलने के लिए कहा गया, तो इन भारतीय सैनिकों ने कैसी प्रतिक्रिया दी थी? क्योंकि, इंडोनेशिया के लड़ाके तो उपनिवेशवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ ठीक वैसी ही लड़ाई लड़ रहे थे, जैसे कांग्रेस की अगुवाई में भारत में स्वदेशी और स्वराज आंदोलन चलाए जा रहे थे.

भारतीय सैनिकों को ये बात समझने के लिए ज़्यादा मशक़्क़त भी नहीं करनी पड़ी थी. क्योंकि इंडोनेशिया के स्वतंत्रता सेनानियों यानी पेमुदा ने सुराबाया की तमाम दीवारों पर खालिस अंग्रेज़ी में बहुत से पोस्टर लगा रखे थे, जिन पर लिखा था:

‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आज (30 सितंबर 1945 को) आदेश दिया है कि इंडोनेशिया और दूसरी राष्ट्रीय पार्टियों का विद्रोह दबाने के लिए भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. हम एशिया और अफ्रीका में स्वतंत्रता के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों में दिलचस्पी रखते हैं और उनको भी अपना लक्ष्य हासिल करने में मदद करना चाहेंगे. इंडोनेशिया के लोगों ने अपनी आज़ादी का एलान कर दिया है और अब हम इसकी रक्षा के लिए लड़ रहे हैं.’

पाकिस्तान के फ़ौजी तानाशाह जनरल मुहम्मद ज़िया उल हक़

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के फ़ौजी तानाशाह जनरल मुहम्मद ज़िया उल हक़.

इस पोस्टर को देखकर भारतीय सैनिकों की क्या प्रतिक्रिया रही होगी. इसके लिए, 1944 में ब्रिटिश भारतीय सेना में कमीशन लेकर कैप्टन बने पी.आर.एस. मणि एक अच्छी मिसाल हो सकते हैं.

उन्हें जनसंपर्क की एक इकाई में तैनात किया गया था. कैप्टन मणि ने जापान के आत्मसमर्पण करने तक बर्मा और मलाया (1962 के बाद मलेशिया) में तैनात भारतीय सैनिकों के अनुभव को बयान किया है.

15 अगस्त के बाद जब माउंटबेटन की साउथ ईस्ट एशिया कमान ने मणि समेत दूसरे भारतीय सैनिकों को इंडोनेशिया और वियतनाम की राष्ट्रवादी सेनाओं के ख़िलाफ़ तैनात किया, तो कैप्टन मणि को बेहद मायूसी हुई. ख़ास तौर से तब और जब उन्हें पता चला कि वो सुराबाया में जनरल मानसर्ग की पांचवीं भारतीय डिवीज़न के साथ लड़ रहे हैं.

इस तजुर्बे से कैप्टन मणि का दिल इस क़दर उचाट हुआ कि जनवरी 1946 में उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया. फिर वो बंबई के अख़बार फ्री प्रेस जर्नल के विदेशी संवाददाता बन गए.

1928 में स्थापित किया गया फ्री प्रेस जर्नल, भारत और इंडोनेशिया, दोनों की आज़ादी की पुरज़ोर वकालत करता था. मणि ने 1946-47 के दौरान इंडोनेशिया से जर्नल के लिए रिपोर्टिंग की. उन्होंने ऐसे लेख लिखे जो इंडोनेशिया की आज़ादी की लड़ाई का मज़बूती से समर्थन करते थे.

जब 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, तो मणि भारतीय विदेश सेवा में भर्ती हो गए और जकार्ता में भारत के पहले कॉन्सुल जनरल नियुक्त किए गए.

1980 में भारत की राजनयिक सेवा से रिटायर होने के बाद, मणि ने 1945 से 1947 के दौरान इंडोनेशिया में बिताए गए अपने दिनों के काग़ज़ात जमा किए. और, उन्होंने भारत के नज़रिए से इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम की दास्तान लिखी: दि स्टोरी ऑफ़ दि इंडोनेज़ियन रिवोल्यूशन 1945-50.

इस किताब को (मद्रास यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ ऐंड साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज़ ने 1986 में प्रकाशित किया था. बाद में इंडोनेशिया में इस किताब का अनुवाद ‘जेजाक रिवोल्यूसी 1945: सेबुआह केसाकसियान सेजाराह’ के नाम से 1989 में प्रकाशित किया गया.

कैप्टन मणि जैसे बहुत से भारतीय सैनिक थे, जो इंडोनेशिया के राष्ट्रवादी आंदोलन से हमदर्दी रखते थे और उन्होंने इंडोनेशिया के सशस्त्र संघर्ष में मदद के लिए अपने सैन्य कौशल का इस्तेमाल किया.

इंडोनेशिया के लोगों के लिए भारतीय सैनिकों के बीच कैसी हमदर्दी थी, इसकी पूरी तस्वीर समझने के लिए हमें कैप्टन मणि जैसे बहुत से और लोगों की कहानी जाननी चाहिए.

जिससे पता चल सके कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद, जब इंडोनेशिया आठ महीनों के लिए अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में रहा था, तो हालात कैसे रहे थे.

पाकिस्तान के फ़ौजी तानाशाह जनरल मुहम्मद ज़िया उल हक़ (1924-1988) ने ब्रिटिश भारतीय सेना की तरफ़ से एशिया प्रशांत के कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी थी. वो ‘ऑपरेशन कैपिटल’ के दौरान बर्मा में तैनात रहे थे और ‘ऑपरेशन ज़िपर’ के दौरान मलाया में.

जनरल ज़िया को सितंबर 1945 में 23वीं ब्रिटिश भारतीय डिवीज़न के साथ जावा में तैनात किया गया था. जनरल ज़िया ने 1943 में इंडियन मिलिट्री अकादेमी देहरादून से कमीशन लिया था.

जावा के सैन्य अभियान (1945-46) में हिस्सा लेने के बाद ज़िया भारत लौट आए.

1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान आर्मी में शामिल होने का चुनाव किया.

इंडोनेशिया में ज़िया का अनुभव कैसा रहा था, इसका हम सिर्फ़ अंदाज़ा लगा सकते हैं. और, बाद में उनके फ़ौजी करियर और सियासी महत्वाकांक्षाओं पर इसके असर को लेक भी अटकलें ही लगाई जा सकती हैं.

इंडोनेशिया में 9वीं शताब्दी का प्रम्बानन मंदिर

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इमेज कैप्शन, इंडोनेशिया में 9वीं शताब्दी का प्रम्बानन मंदिर.

निष्कर्ष

आधुनिक युग में इंडोनेशियाई द्वीप समूह में ब्रिटेन की भूमिका भयंकर हिंसा और क्रूरता वाली रही थी. इसका असर भारत में ब्रिटेन की छवि पर भी पड़ा था.

ब्रिटेन ने 1811 से 1816 और फिर नेपोलियन राज की जंगों के दौरान जावा में बंगाल प्रेसिडेंसी के सिपाहियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था.

इसके बाद, 1945-46 के दौरान भी इंडोनेशिया में ब्रिटेन की दख़लंदाज़ी परेशानी भरी रही थी. इन दोनों ही घटनाओं ने भारतीय उप-महाद्वीप में ब्रिटेन की सियासी हैसियत पर गहरा असर डाला था, जिससे भारत की आज़ादी के अभियान को रफ़्तार मिली.

उन्नीसवीं सदी में बंगाल के सिपाहियों ने जावा के शासकों के साथ मिलकर ब्रिटेन के ख़िलाफ़ घातक साज़िश रची और बग़ावत की. जावा में बंगाली सिपाहियों के षडयंत्र से केवल नौ साल पहले, आरकॉट में भारतीय सैनिक बग़ावत (1806 का वेल्लोर विद्रोह) कर चुके थे.

और, जावा में विद्रोह के केवल चार दशक बाद 1857 में सिपाहियों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की पहली लड़ाई लड़ी थी. 1945 में जब भारतीय सैनिक इंडोनेशिया के स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे, तो उस समय भारत में स्वराज या स्वतंत्रता का अभियान एक न रोका जा सके वाला अभियान बन चुका था.

इन दोनों ने भारत में ब्रिटिश राज के ख़ात्मे की रफ़्तार तेज़ कर दी थी. इन दोनों घटनाओं की विरासत आज भी आम लोगों के ज़हन में ताज़ा हैं. हालांकि, इंडोनेशिया में रह रहे भारतीय मूल के लोगों- ख़ास तौर से सिंधियों की तादाद बेहद कम है. 28 करोड़ आबादी वाले इंडोनेशिया में भारतीय मूल के लोगों की संख्या केवल एक लाख बीस हज़ार है.

जबकि, चीनी और अरब मूल के मिली जुली नस्ल वाले इंडोनेशियाई नागरिकों यानी पेरानाकन चाइनीज़ की संख्या, कुल आबादी का 3.2 प्रतिशत है.

लेकिन, अभी भी भारत की कहानी इंडोनेशिया की जनता को सुनाए जाने की ज़रूरत है. क्योंकि, इंडोनेशिया के भारतीय और हिंदू-बौद्ध इतिहास की जड़ें दो हज़ार साल से भी ज़्यादा गहरी हैं.

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