उधम सिंह: ड्वाएर की हत्या से पहले लंदन में कई फिल्मों में किया काम

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- Author, जसपाल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल था 1933, जगह थी अविभाजित पंजाब की राजधानी लाहौर. जिस शख्स को ब्रिटिश पुलिस और खुफिया एजेंसियां उदय सिंह, शेर सिंह और फ्रैंक ब्राज़ील के नाम से जानती थीं, अब पासपोर्ट में उसका नाम उधम सिंह दर्ज था.
इस फर्ज़ी ब्रिटिश पासपोर्ट पर उधम सिंह के नाम से हस्ताक्षर थे और नंबर था 52753
पुलिस रिकॉर्ड में उदय सिंह के नाम से दर्ज व्यक्ति अब ऊधम सिंह बन गया था. इस पासपोर्ट को हासिल करने के पीछे उधम सिंह का मकसद पुलिस की नज़रों से बचकर भारत से बाहर जाना था.
यह जानकारी पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. नवतेज सिंह ने अपनी किताब 'द लाइफ स्टोरी ऑफ शहीद उधम सिंह' में और पटियाला के गवर्नमेंट कीर्ती कॉलेज के इतिहास के प्रोफ़ेसर सिकंदर सिंह ने अपनी किताब 'ए सागा ऑफ फ्रीडम मूवमेंट एंड जलियांवाला बाग' में भी लिखी है.
दोनों ने अपनी किताब में ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड का ज़िक्र किया है.
यह वही उधम सिंह थे जिन्होंने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में कभी पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे माइकल ओ ड्वाएर की हत्या कर दी थी.
ऐसा माना जाता है कि उधम सिंह ने 1919 में अमृतसर में जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने और भारत में तत्कालीन ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध जताने के लिए माइकल ओ ड्वाएर की हत्या की थी.
डॉ. नवतेज ने ब्रिटिश रिकॉर्ड के हवाले से उधम सिंह का बयान दर्ज किया है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध दर्ज कराने को सबसे अहम कारण बताया है.
उधम सिंह ने अपने जीवन में कई नाम बदले, कई देशों की यात्राएं की और कई पेशे अपनाये.

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डॉ. नवतेज के अनुसार, 1934 में किसी समय उधम सिंह ब्रिटेन पहुंचे.
वह बताते हैं, “उधम सिंह सबसे पहले इटली पहुंचे, जहां वह 3-4 महीने तक रहे. फिर फ्रांस, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया से गुज़रते हुए वह 1934 के अंत में इंग्लैंड पहुंचे.”
"1936 और 1937 के बीच, उधम सिंह ने रूस, पोलैंड, लातविया और एस्टोनिया की यात्रा की और 1937 में इंग्लैंड लौट आए."
उधम सिंह पर 4 किताबें और एक नाटक लिखने वाले राकेश कुमार के मुताबिक, "ऊधम सिंह ने अपने जीवन में लगभग 18 देशों की यात्रा की है. ख़ासकर उन देशों की जहां गदर पार्टी से जुड़े लोग थे."
पिछले कुछ वर्षों में, कुछ मूवी क्लिप सोशल मीडिया पर चर्चित हो गए हैं. इन वीडियो को लेकर दावा किया गया था कि इन फ़िल्मों में उधम सिंह ने काम किया है.
इसकी पुष्टि के लिए हमने ब्रिटेन और भारत में इतिहास और खासकर उधम सिंह के बारे में शोध करने वाले लोगों से बात की और किताबों से संदर्भ भी लिए.
सभी स्रोतों से यह स्पष्ट है कि उधम सिंह ने ब्रिटेन में कुछ फिल्मों में काम किया था.

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फ़िल्मों में काम किया
पीटर बैंस ब्रिटेन में महाराजा दलीप सिंह, पंजाब और सिखों के इतिहास पर शोध करते हैं.
पीटर बताते हैं, ''2004 में, मैंने 'सिख्स इन ब्रिटेन' नाम से अपनी किताब लिखी. उस समय मेरी मुलाकात ब्रिटेन में रहने वाले कई पंजाबी परिवारों से हुई. उनमें से कुछ बुजुर्ग थे जो उधम सिंह से मिले थे.”
"उन्होंने मुझे बताया कि 1930 के दशक में ब्रिटेन में रहने वाले कई पंजाबियों को फिल्मों में छोटी भूमिकाएँ मिलीं."
“ब्रिटेन में खालसा जत्था एक बहुत पुराना गुरुद्वारा साहिब है. इसे पटियाला के महाराजा, महाराजा भूपिंदर सिंह की मदद से बनाया गया था और उस समय इसका नाम 'महाराजा भूपिंदर सिंह धर्मशाला' रखा गया था.''
"फ़िल्म कंपनियां सीधे खालसा जत्थे से संपर्क करती थीं और जत्था, फ़िल्म कंपनियों में भारतीयों को भीड़ और अन्य पात्रों की भूमिका निभाने के लिए भेजता था."
''इनमें से आसा सिंह ग्रेवाल और बब्बू सिंह बैंस कई फिल्मों में नजर आए. इसी तरह उधम सिंह ने भी कुछ फिल्मों में काम किया है.''
रोजर पर्किन्स ने पिछले 40 वर्षों में ब्रिटिश सेना और नौसेना के इतिहास पर कई किताबें लिखी हैं. उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड और उधम सिंह द्वारा माइकल ओ ड्वाएर की हत्या पर एक किताब लिखी है.
उस किताब का नाम है 'द अमृतसर लिगेसी'. 1989 में प्रकाशित इस किताब में उधम सिंह के फिल्मों में काम करने का ज़िक्र है.
रॉजर्स लिखते हैं, "हंगेरियन पत्रकार और फिल्म निर्माता अलेक्जेंडर कोर्डा ने डेन्हम में अपना स्टूडियो स्थापित किया."
"1930 के दशक में उन्होंने दो फ़िल्में बनाईं जिनमें गैर-यूरोपीय सहायक अभिनेताओं की आवश्यकता थी."
''उधम सिंह ने 'साबू द एलीफेंट बॉय' और 'द फोर फेदर्स' में सहायक कलाकार के तौर पर काम किया था. वे इन फिल्मों में भीड़ के हिस्से के रूप में दिखाई दिए थे."

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रोजर्स के मुताबिक, ऐसी उम्मीद नहीं है कि वह इस तरह की फिल्मों में काम करके कोई अच्छी कमाई करते होंगे.
पीटर बैंस का कहना है कि वह अभिनेता आसा सिंह ग्रेवाल के बेटे से भी मिले हैं जिन्होंने उनके पिता और उधम सिंह की फिल्मों में काम करने की पुष्टि की है.
डॉ. नवतेज सिंह ने भी अपनी किताब में उधम सिंह द्वारा डेन्हम स्टूडियो के लिए फिल्में करने का ज़िक्र किया है.
अजय किशोर ब्रिटेन में रहते हैं और उन्होंने उधम सिंह के बारे में काफी शोध किया है. अजय ने उधम सिंह से जुड़े कई पुराने अखबारों की खबरें सहेज कर रखी हैं.
कुछ समय पहले उन्हें एक अखबार की कटिंग मिली, जिसमें 1938 में ऊधम सिंह की गिरफ्तारी की खबर थी.
डॉ. नवतेज ने इस घटना का जिक्र करते हुए बताया कि उधम सिंह और उनके एक साथी पर एक शख्स को धमकाने और पैसे मांगने का आरोप था.
इस मामले में जूरी की सहमति न बन पाने के कारण ऊधम सिंह को बरी कर दिया गया.

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इसी खबर को लिखते समय ऊधम सिंह की पहचान के बारे में बताते हुए लिखा गया कि उधम सिंह ने फिल्म 'द ड्रम' में काम किया था.
सोशल मीडिया पर फिल्म 'द एलीफेंट बॉय' की कुछ क्लिप शेयर करते हुए दावा किया जा रहा है कि इन क्लिप्स में उधम सिंह हैं.
यह तो सभी इतिहासकार मानते हैं कि 'द एलिफेंट बॉय' में उधम सिंह ने अभिनय किया था, लेकिन क्लिप्स को लेकर किए गए दावों पर उनकी राय अलग-अलग है.
अजय किशोर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ क्लिप भी शेयर किए हैं. अजय का दावा है कि उन्होंने फिल्म के हर फ्रेम को ध्यान से जांचा है और उन क्लिप्स को चुना है जिनमें उनके मुताबिक उधम सिंह नजर आ रहे हैं. हालांकि इस पर कई लोग सवाल भी उठाते हैं.
राकेश कुमार का कहना है कि इस बात की वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए कि उधम सिंह किस सीन में दिख रहे हैं.

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ऊधम ने कई नाम बदले
उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम में हुआ था. जन्म तिथि और वर्ष को लेकर अलग-अलग राय है, लेकिन ज़्यादातर इतिहासकार इस तिथि और वर्ष पर एकमत हैं.
उधम सिंह का पहला नाम शेर सिंह था. उधम सिंह की माता का नाम नरैणी और पिता का नाम चूहड़ राम था.
बचपन में अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद जब उधम सिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में रहना पड़ा तो वहां भी उनका नाम शेर सिंह लिखा हुआ था. इसकी पुष्टि डॉ. नवतेज सिंह ने की है.
राकेश कुमार के अनुसार, बचपन में उनका नाम शेर सिंह था, लेकिन जब 1927 में उधम सिंह को अमृतसर में गिरफ्तार किया गया तो उनके दो नाम उदय सिंह और फ्रैंक ब्राज़ील सामने आए.
“अपनी रिहाई के बाद वह नए ब्रिटिश पासपोर्ट के साथ उधम सिंह बन गए. ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड में मोहन सिंह, यूएस सिद्धू, मोहन सिंह, यूएस आजाद, सिद्धू सिंह आदि नाम दर्ज हैं.
जब 1940 में कैक्सटन हॉल में ओ ड्वाएर की हत्या के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो उन्होंने अपना नाम मुहम्मद सिंह आज़ाद बताया था.
“उसके बाद जेल से लिखे गए सभी पत्र मुहम्मद सिंह आज़ाद के नाम या हस्ताक्षर से लिखे गए थे. उन्होंने खास तौर पर एक पत्र भी लिखा कि उन्हें किसी अन्य नाम से न बुलाया जाए.''

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भगत सिंह का असर
इतिहासकार प्रोफेसर चमनलाल कहते हैं, ''उधम सिंह बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे. उन पर भगत सिंह और उनसे जुड़े आंदोलन का बहुत प्रभाव था. उधम सिंह भगत सिंह की तरह लेखक नहीं थे.''
"रिकॉर्ड पर उनके पत्र ज़्यादातर व्यक्तिगत स्तर पर लिखे गए थे लेकिन कुछ पत्रों में राजनीतिक मामलों का भी ज़िक्र था."
“उधम सिंह दृढ़ता से बोलते थे. अदालत में उनके भाषण भगत सिंह की तर्ज पर होते थे. वहां उन्होंने ज़ोरदार तरीके से अपनी बात रखी थी.”
डॉ. नवतेज के अनुसार, 1919-1921 के बीच जब ब्रिटिश सरकार और जनजातियों के बीच अफगानिस्तान की सीमा पर संघर्ष चल रहा था, उस समय ब्रिटिश सैनिकों को रेलवे के माध्यम से गोला-बारूद और रसद की मदद दी जा रही थी.
इस अभियान में मदद के लिए कई भारतीयों को भेजा गया. उधम सिंह ने 1919 से 1921 तक रेलवे में काम किया जिसके लिए उन्हें 'सेवा मेडल' मिला.
डॉ. नवतेज के मुताबिक इसके अलावा उधम सिंह ने नैरोबी में मोटर मैकेनिक और अमेरिका में फोर्ड कंपनी में मैकेनिक के तौर पर काम किया. उन्होंने बढ़ई का भी काम किया.
1934 में जब उधम सिंह ब्रिटेन पहुंचे, तो उन्होंने विभिन्न कंपनियों में बढ़ई के रूप में काम किया था.
ऊधम सिंह को मदन लाल ढींगरा के पास दफनाया गया
माइकल ओ ड्वाएर की हत्या के बाद उधम सिंह पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई.
31 जुलाई, 1940 की सुबह नौ बजे उधम सिंह को पेंटनविले जेल में मौत की सज़ा सुनाई गई.
उधम सिंह की अंतिम रस्मों को पूरा नहीं करने दिया गया. डॉ. नवतेज सरकारी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए लिखते हैं कि उनकी कब्र पर 'यूएस' शब्द अंकित था और पेंटनविले जेल में उन्हें मदन लाल ढींगरा की कब्र के पास दफनाया गया था, जिन्हें 1909 में फांसी दी गई थी.
बाद में उधम सिंह की देह को 19 जुलाई 1974 को भारत वापस लाया गया और यहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया.
2 अगस्त 1974 को उनकी अस्थियाँ एकत्रित कर 7 कलशों में रखी गईं.
उनमें से एक को हरिद्वार, दूसरे को गुरुद्वारा कीरतपुर साहिब और तीसरे को रोज़ा शरीफ भेजा गया. अंतिम कलश को जलियांवाले बाग ले जाया गया.
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