जब कनाडा के खालिस्तानियों ने एयर इंडिया के यात्री विमान को बनाया था निशाना

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- Author, शर्नया ऋषिकेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और कनाडा के रिश्तों में दरार हर रोज़ बढ़ती नज़र आ रही है.
दोनों देशों में बढ़ती कड़वाहट के बीच साल 1985 में एयर इंडिया फ्लाइट में हुए धमाके की घटना भी फिर ख़बरों में है.
बीते हफ़्ते कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अलगाववादी सिख नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या मामले में भारत पर गंभीर आरोप लगाए थे. भारत ने कनाडा के आरोपों को ख़ारिज किया है.
इसके बाद पहले कनाडा ने भारत के राजनयिक को निष्कासित किया और फिर भारत ने भी कनाडा के राजनयिक को निष्कासित किया.
इस वाकये के बाद कई टिप्पणीकारों ने 38 साल पुराने एयर इंडिया फ्लाइट में हुए धमाके का ज़िक्र किया. इसे 'कनिष्क विमान हादसा' भी कहा जाता है. जिस विमान में हादसा हुआ, उस बोइंग 747 का नाम 'कुषाण वंश के राजा कनिष्क' के नाम पर रखा गया था. इस धमाके के बाद तब भी भारत और कनाडा के बीच दूरियां आ गई थीं.
1985 में हुआ क्या था?

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तारीख़ 23 जून 1985.
एयर इंडिया की फ्लाइट लंदन से होते हुए कनाडा से भारत आ रही थी.
तभी आयरिश हवाई इलाक़े में फ्लाइट में बम फटने से सभी 329 यात्रियों की जान चली गई. ये धमाका सूटकेस में रखे बम के फटने से हुआ था. ये सूटकेस जिस यात्री का था, वो फ्लाइट में सवार ही नहीं हुआ था.
इस हादसे में मरने वाले लोगों में 268 कनेडियाई नागरिक थे. ज़्यादातर भारतीय मूल के थे. वहीं 24 भारतीयों की भी मौत हुई थी. समंदर से सिर्फ़ 131 शवों को निकाला जा सका था.
जब ये विमान हवा में था, लगभग उसी वक़्त पर टोक्यो एयरपोर्ट पर एक और धमाका हुआ. इस धमाके में जापान के दो बैग हैंडलर्स की जान चली गई.
जांचकर्ताओं ने बाद में बताया था कि इस बम के ज़रिए एक दूसरी बैंकॉक जाती एयर इंडिया फ्लाइट में धमाके की साजिश थी, मगर बम वक़्त से पहले ही फट गया.
हमले के पीछे कौन था?

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कनाडा के जांचकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि इन धमाकों के पीछे सिख अलगाववादी थे, जो 1984 में पंजाब के स्वर्ण मंदिर में इंदिरा गांधी सरकार की सैन्य कार्रवाई का बदला लेना चाहते थे.
इस हमले के कुछ महीनों बाद रॉयल कनेडियन माउंटेड पुलिस यानी आरसीएमपी ने तलविंदर सिंह परमार को गिरफ़्तार किया था. परमार उग्रवादी संगठन बाबरा खालसा के नेता थे. ये संगठन अब भारत और कनाडा दोनों देशों में अब प्रतिबंधित है.
पुलिस ने कई तरह के हथियार, विस्फोटक और साजिश के आरोप में इंद्रजीत सिंह रियत को गिरफ़्तार किया था. इंद्रजीत सिंह बिजली का काम करते थे.
भारत ने 1980 के दौर में कनाडा से परमार का प्रत्यर्पण करने की काफी कोशिश की मगर सफलता नहीं मिली. बाद में परमार को रिहा कर दिया गया था.
जांचकर्ताओं का अब मानना है कि परमार ही कनिष्क विमान धमाके के मास्टरमाइंड थे. साल 1991 में परमार भारत में पुलिस के हाथों मारे गए थे.
और किन लोगों की गिरफ़्तारी हुई?

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साल 2000 में पुलिस ने कनाडा के रईस कारोबारी रिपुदमन सिंह मलिक, मील में काम करने वाले ब्रिटिश कोलंबिया के अजायब सिंह बागरी को सामूहिक हत्या और साज़िश करने के आरोप में गिरफ़्तार किया.
दो साल तक चले ट्रायल के बाद 2005 में दोनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. जज ने कहा- जिन प्रमुख गवाहों ने अभियुक्तों के ख़िलाफ़ गवाही दी थी, उनके बयानों में तथ्यात्मक और विश्वसनीयता से जुड़े मसले थे.
बीबीसी ने तब इस मामले में रिपोर्ट किया था कि इस फ़ैसले से पीड़ितों के रिश्तेदार सदमे में थे और कोर्ट के अंदर ही लोग रोने लगे थे.
इंद्रजीत सिंह इकलौते ऐसे आदमी थे, जिन्हें दुनिया के सबसे ख़तरनाक हवाई चरमपंथी हमले में सज़ा मिली थी. जापान में हुए धमाके में शामिल होने को लेकर इंद्रजीत सिंह को 1991 में ब्रिटेन में 10 साल की सज़ा दी गई थी.
साल 2003 में कनाडा की अदालत ने इंद्रजीत सिंह को कनिष्क विमान हादसे के मामले में दोषी पाया और पांच अतिरिक्त साल की सज़ा सुनाई.
बाद में रिपुदमन सिंह और अजायब सिंह बागरी के ट्रायल के दौरान झूठी गवाही देने के मामले में इंद्रजीत सिंह को और सज़ा सुनाई गई थी.
इस केस की जांच की आलोचना क्यों हुई थी?

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इस धमाके को लेकर कनाडा की आलोचना होती रही है कि उसने धमाका रोकने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए और जांच में गड़बड़ की.
रिपुदमन सिंह और अजायब सिंह बागरी को रिहा किए जाने के बाद धमाके के पीड़ित परिवारों में गुस्सा था. इसे लेकर कनाडा की सरकार ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बनाई थी.
इस जांच कमेटी ने 2010 में बताया कि लगातार ऐसी बड़ी गलतियां की गईं, जिसके चलते कनाडा के इतिहास का सबसे बड़ा हमला हुआ.
जांच में ये बात भी सामने आई कि एक अज्ञात चश्मदीद ने हमला होने से महीनों पहले विमान उड़ाए जाने के बारे में कनाडा की पुलिस को आगाह किया था.
जांच में ये भी पता चला कि हमले से कुछ हफ़्ते पहले कनाडा की ख़ुफ़िया एजेंसियों के अधिकारियों ने परमार और इंद्रजीत सिंह का वैनकूवर के जंगलों तक पीछे किया था, जहां उन्हें तेज़ धमाके की आवाज़ सुनाई दी थी. लेकिन उन्होंने इसको इतना अहम नहीं समझा.
इस केस में दो सिख पत्रकारों को बतौर गवाह पेश किया गया था. इन दोनों की लंदन और कनाडा में 1990 के दौर में हत्या कर दी गई थी. इनमें से एक पत्रकार पर पहले ही गोली चली थी और वो इस कारण व्हीलचेयर पर आ गए थे.
कनाडा के एजेंट ने क्या बताया था?

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साल 2000 में कनाडा की ख़फ़िया एजेंसी के पूर्व अधिकारी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने सिख संदिग्धों की 150 घंटे की टेलिफोन रिकॉर्डिंग टेप्स को पुलिस को सौंपने की बजाय नष्ट कर दिया.
इन पूर्व अधिकारी ने कहा था कि उन्हें डर था कि इससे मुखबिर की पहचान सामने आने का ख़तरा था.
साल 2010 में जांच रिपोर्ट के जारी होने के बाद कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने पीड़ित परिवारों से सार्वजनिक माफ़ी की पेशकश की थी.
उन्होंने कहा था, "पीड़ित परिवारों को जिन सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए था, जो सांत्वना दी जानी चाहिए थी, उसका सालों तक तिरस्कार किया गया."
साल 2016 में इंद्रजीत सिंह को कनाडा की जेल से रिहा कर दिया गया. अगले साल इंद्रजीत सिंह को ये अनुमति दी गई कि वो जहां चाहें, रह सकते हैं.
इस फ़ैसले की काफी आचोलना हुई थी.
बीते साल रिपुदमन सिंह की भी सरे में हत्या कर दी गई थी. पुलिस ने इस हत्या के मामले में दो लोगों को गिरफ़्तार किया था. ये हत्या क्यों की गई, इस बारे में पता नहीं चल पाया था.
भारत में कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी?

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इस साल एयर इंडिया के कनिष्क विमान हादसे को 38 साल पूरे हो रहे हैं.
कनाडा की एक संस्था की रिपोर्ट में कहा गया कि 10 में से 9 कनेडियाई लोगों को इस हमले के बारे में या तो बिलकुल पता नहीं है या फिर थोड़ी ही जानकारी है.
इस धमाके का भारतीयों पर गहरा असर हुआ था. हालांकि इस धमाके में मारे जाने वाले ज़्यादातर लोग कनाडा के नागरिक थे पर काफी लोग भारतीय मूल के थे और कुछ के परिवार भारत में रहते थे.
भारत में ये माना जाता है कि इस हादसे के बाद पीड़ित परिवारों के साथ इंसाफ़ नहीं हुआ.
साल 2006 में कनाडा के वकील रिचर्ज क्वांस ने भारत का दौरा किया था और कुछ पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी.
उन्होंने बीबीसी को बताया था कि इन परिवारों को लगता है कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया. साथ ही इन परिवारों ने केस में पकड़े गए लोगों को रिहा किए जाने पर भी सवाल उठाए थे.
धमाके का शिकार एयर इंडिया फ्लाइट के को-पायलट की पत्नी अमरजीत भिंडर ने तब बीबीसी से कहा था- धमाके से प्रभावित भारतीय परिवारों की उपेक्षा की गई.
सालों से ये पीड़ित परिवार गुस्से में हैं.
सुशील गुप्ता 12 साल के थे, जब इस विमान हादसे में उनकी मां की मौत हो गई थी.
सुशील गुप्ता कहते हैं, "मैं अब भी ऐसे लोगों से मिलता हूं जो किसी न किसी तरह इस धमाके से प्रभावित हुए थे. ये हैरान करने वाली बात है कि इस धमाके ने कितने बड़े स्तर पर कनाडियाई लोगों को प्रभावित किया?"
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