आज़ादी के हीरो सैयद हुसैन और विजयलक्ष्मी पंडित की कहानी - विवेचना

विजयलक्ष्मी पंडित और सैयद हुसैन

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मिस्र की राजधानी काहिरा में एक क़ब्रिस्तान है ‘अल-अराफ़ा’ जिसे अंग्रेज़ी में कहा जाता है ‘द सिटी ऑफ़ द डेड’.

इस क़ब्रिस्तान में एक अकेला भारतीय दफ़्न है जो अपने ज़माने में एक बहुत बड़ा अध्येता, पत्रकार और देश प्रेमी था और जिसने सालों तक भारत के बाहर रहकर उसकी आज़ादी के लिए बहुत पसीना बहाया था.

इस शख़्स का नाम था सैयद हुसैन जिसका जन्म सन 1888 में ढाका में हुआ था. होसैन मामूली शख़्स नहीं थे.

एनएस विनोध उनकी जीवनी ‘अ फ़ॉरगॉटेन एमबेसेडर इन काएरो द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ सैयद हुसैन’ में लिखते हैं, “सैयद अपने समय के निहायत ही आकर्षक, विद्वान और सुसंस्कृत शख्स थे जिनमें अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देने की ग़ज़ब की क्षमता थी. वो एक असाधारण लेखक और धर्मनिरपेक्ष देशभक्त थे.”

वे लिखते हैं, “उनकी उपलब्धियों को शायद इसलिए नज़रअंदाज़ कर दिया गया क्योंकि उन्हें देश के एक बहुत बड़े परिवार की नाराज़गी का सबब बनना पड़ा था. वो एक ऐसे इंसान थे जिनके बड़े योगदान और उपलब्धियों के बावजूद उनके देश और इतिहास ने उन्हें वो स्थान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था.”

किताब

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

मोतीलाल नेहरू ने बनाया ‘इंडिपेंडेंट’ अख़बार का संपादक

अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद सैयद क़ानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे लेकिन उन्होंने बैरिस्टर बनने के बजाए पत्रकार बनना ज़्यादा पसंद किया.

सैयद 5 फ़ीट 10 इंच लंबे थे और अच्छे कपड़े पहनने के शौकीन थे. अंग्रेज़ी भाषा पर उनका अधिकार इतना ज़बरदस्त था कि इंग्लैंड की कई महिलाएं उनकी तरफ़ आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकीं.

इंग्लैंड में सात साल रहने के बाद सैयद नवंबर 1916 में भारत लौटे थे और एक महीने बाद ही उन्होंने बंबई के बॉम्बे क्रॉनिकल अख़बार में बतौर उप संपादक काम करना शुरू कर दिया था.

अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ लिखे उनके लेखों को पूरे भारत में बहुत दिलचस्पी के साथ पढ़ा जाता था. उन लेखों पर मोतीलाल नेहरू और महात्मा गांधी की भी नज़र गई थी.

सैयद हुसैन की असली कहानी शुरू होती है जनवरी 1919 में जब मोतीलाल नेहरू ने उनके लेखन से प्रभावित होकर ‘इंडिपेंडेंट’ अख़बार का संपादक बनने के लिए इलाहाबाद आमंत्रित किया.

इस अख़बार का दफ़्तर शुरू में मोतीलाल नेहरू के निवास स्थान आनंद भवन में हुआ करता था. सैयद को 1500 रुपये के वेतन पर रखा गया था जो उस ज़माने में बड़ी तनख़्वाह हुआ करती थी.

सैयद हुसैन

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

सैयद हुसैन ने विजयलक्ष्मी पंडित से किया गुपचुप विवाह

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

जब सैयद ‘इंडिपेंडेंट’ के संपादक बनकर इलाहाबाद आए तो शुरू में आनंद भवन मे ही रुके. उन्हीं दिनों मोतीलाल नेहरू की बेटी विजयलक्ष्मी पंडित ने सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू को लिखे पत्र में लिखा, "सैयद हमारे साथ ही रह रहे हैं क्योंकि उनको प्रेस के पास कोई ढंग का घर नहीं मिल पाया है."

आनंद भवन में रहने की वजह से सैयद को नेहरू परिवार से घुलमिल जाने के कई मौके मिले.

तब विजयलक्ष्मी की उम्र 19 वर्ष थी. वो बहुत सुंदर थीं. घर में लोग उन्हें ‘नान’ कहकर पुकारते थे. हालांकि सैयद उनसे उम्र में 12 वर्ष बड़े थे, लेकिन वो उनकी तरफ़ आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके. विजयलक्ष्मी भी उनकी तरफ़ खिंची चली गईं.

उन दिनों इलाहाबाद जैसे शहर में इंग्लैंड में पढ़े लिखे आकर्षक युवा ढूंढने से भी नहीं मिलते थे. उन्हीं दिनों सैयद हुसैन को लंदन में होने वाली ख़िलाफ़त कान्फ़्रेंस के लिए चुन लिया गया.

एक सूत्र के अनुसार दोनों ने सैयद के लंदन जाने से पहले गुपचुप तरीके से मुस्लिम तरीके से विवाह कर लिया.

एनएस विनोद लिखते हैं, "जब मोतीलाल नेहरू को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया. वो इस बात पर आगबबूला हो गए कि इस तरह की चीज़ उनके अपने घर में परिवार की निगरानी के बावजूद कैसे हो गई? जवाहरलाल नेहरू भी अपनी बहन से कम नाराज़ नहीं थे."

विजयलक्ष्मी पंडित

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अपने युवा दिनों में विजयलक्ष्मी पंडित

विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा में किया सैयद हुसैन का ज़िक्र

बाद में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा ‘स्कोप ऑफ़ हैपिनेस’ में स्वीकार किया, "अपनी किशोरावस्था में मैं एक युवक सैयद हुसैन की तरफ़ आकर्षित हो गई थी. उन्हें मेरे पिता ने ‘इंडिपेंडेंट’ अख़बार का संपादक नियुक्त किया था."

वे लिखती हैं, "उस ज़माने में जहाँ हर जगह हिंदू-मुस्लिम एकता की बात हो रही थी और उस परिवार का सदस्य होने के नाते जिसके बहुत सारे मुस्लिम दोस्त थे, मैंने सोचा कि धर्म के बाहर शादी करना बहुत अजूबी बात नहीं होगी. लेकिन शादी के मामलों में अभी भी परंपरा का बोलबाला था. लिहाज़ा मुझे ये समझने के लिए मना लिया गया कि ऐसा करना ग़लत होगा."

विजयलक्ष्मी पंडित की बहन कृष्णा हठी सिंह ने भी अपनी आत्मकथा ‘वी नेहरूज़’ में इस घटना का ज़िक्र दबे छिपे अंदाज़ में किया है.

वे लिखती हैं, "सन 1920 में मेरी बहन की मंगनी रंजीत सीताराम पंडित से हो गई. लेकिन इससे पहले मेरे पिता ने उनके लिए एक वर ढूंढा था लेकिन उन्होंने उससे शादी करने से ये कहते हुए इनकार कर दिया था कि वो एक लड़के को चाहती हैं."

उन्होंने लिखा, "मेरे पिता का मानना था कि वो लड़का उनके लायक नहीं हैं. इसकी वजह से मेरे पिता और नान (बहन) के बीच तनाव पैदा हो गया था और वो गांधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा के साथ रहने उनके साबरमती आश्रम चली गई थीं. गाँधीजी के प्रयासों के बाद छह महीनों में नान और पिताजी के बीच संबंध सामान्य हो पाए थे."

विजयलक्ष्मी पंडित की आत्मकथा ‘स्कोप ऑफ़ हैपिनेस’

इमेज स्रोत, Speaking Tiger

इमेज कैप्शन, विजयलक्ष्मी पंडित की आत्मकथा ‘स्कोप ऑफ़ हैपिनेस’

कटरा में सैयद हुसैन के घर पर हुआ निकाह

इस पूरे मामले पर टिप्पणी करते हुए मशहूर लेखिका शीला रेड्डी ने अपनी किताब ‘मिस्टर एंड मिसेज़ जिन्ना’ में लिखा था, "इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि मोतीलाल नेहरू जैसे दुनियादार शख़्स ने, जिन्होंने इंग्लैंड में पढ़ रहे अपने बेटे जवाहरलाल को किसी अंग्रेज़ लड़की से संबंध ने बनाने की सलाह दी थी, किस तरह एक स्मार्ट, संवेदनशील और बेहतरीन शख़्सियत के मालिक युवा को अपनी निहायत ही सुंदर लड़की नान के सामने छोड़ दिया."

वे लिखती हैं, "जब तक मोतीलाल नेहरू को पता चलता कि उनकी छत के नीचे क्या हो रहा है, वो लोग अनौपचारिक रूप से शादी कर चुके थे जैसा कि सैयद हुसैन ने अपनी दोस्त सरोजिनी नायडू के सामने बाद में स्वीकार भी किया."

शीला रेड्डी की किताब मिस्टर ऐंड मिसेज़ जिन्ना

इमेज स्रोत, Penguin Random

इस शादी का वर्णन एक पाकिस्तानी पत्रकार एचएम अब्बासी ने डेली न्यूज़ के 17 नवंबर, 1971 के अंक में छपे अपने लेख ‘लव लाइफ़ ऑफ़ मिसेज़ पंडित’ में किया है.

अब्बासी लिखते हैं, "मैं अपने दादा हज़रत मौलाना रशीद फ़ाकरी के पास बैठा हुआ था. तभी एक आदमी ने उनके कान में आकर कुछ कहा. मौलाना फौरन खड़े होते हुए बोले, सैयद ने मुझे बुलाया है. मैं उनके साथ सैयद हुसैन के कटरा में म्योर कॉलेज के सामने वाले घर में गया."

उन्होंने लिखा, "जब मैं वहाँ पहुंचा तो क़रीब आधा दर्जन लोग उनके बरामदे में खड़े थे. सैयद काफ़ी परेशान दिख रहे थे. पास में मिस पंडित बैठी हुई थीं जिनके चेहरे पर परेशानी के कोई भाव नहीं थे."

"वहाँ मौजूद लोगों में नवाब सर मोहम्मद यूसुफ़ जो बाद में उत्तर प्रदेश में मंत्री भी बने और सैयद असग़र हुसैन भी थे. ये दोनों सैयद के क़रीबी दोस्त थे. मुझे तभी पता चला कि सैयद और विजयलक्ष्मी पंडित की उसी समय शादी होने वाली है. मेरे दादा मौलाना रशीद फ़ाकरी ने उन दोनों का निकाह पढ़वाया था."

विजयलक्ष्मी पंडित

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, विजयलक्ष्मी पंडित

नेहरू ने काग़ज़ात जलवाए

उस ज़माने के मशहूर वकील के एल गौबा ने जिन्होंने ख़ुद एक मुस्लिम महिला से शादी की थी अपनी आत्मकथा ‘फ़्रेंड्स एंड फ़ोज़’ में लिखा था, "हिंदू-मुस्लिम रोमाँस का सबसे ताज़ा उदाहरण है एक कश्मीरी महिला जो ‘द इंडिपेंडेंट’ अख़बार के मुस्लिम संपादक के साथ चली गई थीं."

"महात्मा गाँधी के निजी हस्तक्षेप के बाद उस लड़की को तलाक दिया गया था. बाद में वो गुजरात में जाकर रहीं और बहुत मशहूर महिला बन गई."

शादी की कहानी के एक और स्रोत नेहरू के सचिव रहे एम ओ मथाई हैं जो अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज’ में लिखते हैं, "गाँधीजी की हत्या के कुछ दिनों बाद राजकुमारी अमृत कौर ने, जो स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं, गाँधी के पास रखी एक सील्ड फ़ाइल नेहरू के पास पहुंचाई थी."

वे लिखते हैं, "नेहरू ने फ़ाइल खोलने के बाद मुझे बुला कर कहा था, इस फ़ाइल में विजयलक्ष्मी के सैयद हुसैन के साथ जाने संबंधी कागज़ात हैं. आप उनको जला दीजिए. मैंने उनसे अनुरोध किया कि ये कागज़ आप मेरे पास रहने दीजिए, लेकिन वो उसके लिए राज़ी नहीं हुए. मैं उनसे फ़ाइल लेकर सीधे प्रधानमंत्री निवास के रसोइघर गया और तब तक वहाँ खड़ा रहा जब तक वो कागज़ राख में नहीं बदल गए."

रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज

इमेज स्रोत, Vikas Publishing

मोतीलाल नेहरू और गांधी ने सैयद पर बनाया दबाव

इस कहानी ने तब दिलचस्प मोड़ लिया जब सैयद हुसैन ने अचानक 18 दिसंबर, 1919 को ‘द इंडिपेंडेंट’ के संपादक पद से इस्तीफ़ा दे दिया और उसी दिन अख़बार में अपना अंतिम संपादकीय लिखा.

22 दिसंबर को इलाहाबाद में एक समारोह हुआ जिसमें कई लोगों ने राष्ट्रीय मसलों में सैयद के योगदान और उनके लेखन की तारीफ़ की. इसके तुरंत बाद हुसैन ख़िलाफ़त कमेटी और कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने अमृतसर चले गए.

एनएस विनोद लिखते हैं, "इस अधिवेशन से कुछ समय निकाल कर गांधी और मोतीलाल ने सैयद हुसैन से इस दुस्साहसी काम के लिए सवाल जवाब किए होंगे और उन्हें इस शादी को तोड़ने के लिए मनाया होगा."

वे लिखते हैं, "चूँकि सैयद का इंग्लैंड जाने का कार्यक्रम पहले से ही तय था, चतुर गाँधी ने उनसे तब तक इंग्लैंड में रहने का अनुरोध किया जब तक ये मामला ठंडा नहीं पड़ जाता. सैयद इन दो सम्मानित महानुभावों के संयुक्त हमलों का सामना नहीं कर पाए और युवा जोड़ा अपनी शादी तोड़ने के लिए राज़ी हो गया."

The Independent

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

जिन्ना और सैयद की शादियों में कई समानताएं

बाद में विजयलक्ष्मी पंडित ने 13 मार्च, 1920 को पद्मजा नायडू को लिखे पत्र में इशारा किया कि गांधी ने उनसे और सैयद से मिलकर उनके वैवाहिक ‘मिसएडवेंचर’ के लिए उन्हें काफी खरी खोटी सुनाई. जल्द ही सैयद लंदन जाने के लिए बंबई रवाना हो गए और विजयलक्ष्मी को उनके दिमाग़ और आत्मा की शुद्धि के लिए गाँधीजी के साबरमती आश्रम में भेज दिया गया.

एन एस विनोद लिखते हैं, "पद्मजा और कुछ हद तक उनकी माँ सरोजिनी नायडू उन लड़कियों के लिए ‘एगनी आँट’ का काम करती थीं जो इस तरह के संबंध बनाने की हिम्मत करती थीं. पहले वो जिन्ना की पत्नी रति की राज़दार हुआ करती थीं. बाद में वो विजयलक्ष्मी पंडित की भी राज़दार बनीं."

वे लिखते हैं, "एक सवाल उठना भी लाज़िम है कि क्या जिन्ना और रति के विवाह से प्रेरणा लेकर तो सैयद और विजयलक्ष्मी ने अपनी शादी की योजना नहीं बनाई थी? दोनों शादियों में कई समानताएं थीं. एक तरफ़ पढ़ा लिखा एक अभिजात्य मुसलमान अपने से कहीं छोटी पारसी लड़की से शादी कर रहा था तो दूसरी तरफ़ एक अच्छे परिवार का मुस्लिम लड़का अपने से कहीं छोटी कश्मीरी ब्राह्मण लड़की से शादी रचा रहा था."

मोहम्मद अली जिन्ना और रति जिन्ना

इमेज स्रोत, PAKISTAN NATIONAL ARCHIVE

इमेज कैप्शन, मोहम्मद अली जिन्ना और रति जिन्ना

विजयलक्ष्मी पंडित को गाँधीजी के साबरमती आश्रम भेजा गया

अमृतसर में काँग्रेस अधिवेशन के बाद महात्मा गाँधी आनंद भवन आए. आनंद भवन में अपने प्रवास के दौरान ही गाँधीजी ने सुझाव दिया कि विजयलक्ष्मी अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम में उनके साथ कुछ दिन गुज़ारें.

विजयलक्ष्मी लिखती हैं, "मेरी माँ का मानना था कि मेरी पश्चिमी तरीके से हुए पालन-पोषण के कारण मैं गैरपरंपरागत ढंग से सोचने लगी हूँ. इसलिए उन्होंने गाँधीजी के मेरे साबरमती आश्रम जाने के सुझाव का स्वागत किया."

विजयलक्ष्मी को साबरमती जाना पसंद नहीं आया. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने जैसे ही उस जगह को देखा मेरा दिल बैठ गया. वहाँ की हर चीज़ नीरस और आँखों के लिए अप्रिय थी."

उन्होंने लिखा, "हम प्रार्थना के लिए सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे और फिर अपने कमरे में झाड़ू लगाते थे. हम पास की नदी में अपने कपड़े धोने जाते थे. आश्रम में ज़ोर रहता था कि हमारी खाने की सभी इच्छाएं मर जाएं. आश्रम में उगने वाली कुछ सब्ज़ियों को बिना नमक, मसाले और घी के उबाल दिया जाता था. उनको हम चपातियों और चावल के साथ खाते थे. आश्रम में न तो चाय पीने के लिए दी जाती थी और न ही कॉफ़ी."

विजयलक्ष्मी पंडित

इमेज स्रोत, Getty Images

रणजीत पंडित से हुई विजयलक्ष्मी पंडित की शादी

मोतीलाल नेहरू ने रहने और खाने के पश्चिमी तरीके ज़रूर अपना लिए हों लेकिन दिल से वो परंपरागत हिंदू थे जो ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनकी बेटी किसी मुस्लिम से शादी करे.

दूसरी तरफ़ महात्मा गाँधी सार्वजनिक रूप से भले ही हिंदू मुस्लिम एकता की बात करते हों लेकिन वो भी परंपराओं में उतना ही यकीन करते थे जितना मोतीलाल नेहरू.

यही कारण था कि उन्होंने 1926 में अपने बेटे मणिलाल को मुस्लिम लड़की फ़ातिमा गुल से शादी नहीं करने दी थी. सैयद के लंदन जाने के कुछ महीनों बाद विजयलक्ष्मी पंडित की मंगनी महाराष्ट्र के सास्वत ब्राह्मण रणजीत पंडित से कर दी गई.

9 मई 1921 को इलाहाबाद में उनकी शादी हुई जिसमें गांधीजी ने भी शिरकत की. इस शादी में सरोजिनी नायडू भी आईं.

15 मई 1921 को उन्होंने अपनी बेटी लैलामणि को एक पत्र में लिखा, "बेचारा सैयद. उसके लिए मेरा दिल बहुत दुखा लेकिन फिर भी शुक्र है इसका अंत इस तरह हुआ क्योंकि विजयलक्ष्मी को इससे शायद ही कोई फ़र्क पड़ा." हाँ, सैयद हुसैन ताउम्र अविवाहित रहे.

रंजीत पंडित

इमेज स्रोत, Nehru Memorial Library

इमेज कैप्शन, विजयलक्ष्मी के पति रंजीत पंडित

सैयद और विजयलक्ष्मी की शादी का मसला ब्रिटिश संसद में उठा

इस शादी की गूँज ब्रिटेन के हाउज़ ऑफ़ कॉमंस में भी सुनाई दी.

14 अप्रैल, 1920 को कंज़रवेटिव साँसद कुथबर्ट जेम्स ने भारतीय मामलों के मंत्री एडविन मौंटागू से लिखित सवाल पूछा, "क्या ये सही है कि इस देश की हाल में भारतीय ख़िलाफ़त प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में यात्रा करने वाले सैयद हुसैन पर मोतीलाल नेहरू की बेटी का अपहरण करने का आरोप है?"

एडविन मौंटागू ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

सैयद ने इसका प्रतिरोध करते हुए जेम्स को एक पत्र लिख कर कहा कि, "मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आपने मेरे चरित्र पर गंभीर और बेबुनियाद टिप्पणी की है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आपने किस आधार पर ऐसी बेतुकी बात कही? आप अपने इस कथन को वापस लीजिए और इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगिए. अगर आप में ज़रा भी इज़्ज़त बाकी है तो आप ये बात संसद के बाहर कहकर देखिए ताकि मैं इसका यथोचित जवाब दे सकूँ."

सैयद हुसैन

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

इमेज कैप्शन, सैयद हुसैन

सैयद हुसैन 26 सालों तक भारत नहीं लौटे

सैयद हुसैन ने 1920 में जो भारत छोड़ा तो वो अगले 26 सालों तक भारत नहीं लौटे. बीच में वो 1937 में कुछ दिनों के लिए भारत आए थे.

उन्होंने पहले ब्रिटेन और फिर अमेरिका की धरती पर भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी. इस दौरान भारत में हो रही घटनाओं जैसे असहयोग आँदोलन, मुस्लिम लीग के उदय और पाकिस्तान बनाने के लिए उनके पुराने दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना के किए गए आँदोलन, नेहरू के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार और धर्म के आधार पर देश के विभाजन से उनका सीधा साबिक़ा (वास्ता) नहीं पड़ा.

लंदन प्रवास के दौरान सैयद हुसैन राष्ट्रवादी अख़बार इंडिया के संपादक रहे. अक्टूबर 1921 में उन्होंने लंदन छोड़कर अमेरिका का रुख़ किया जहाँ वो 1946 तक रहे.

इस दौरान वे पूरे अमेरिका में घूम घूम कर भारत की आज़ादी के पक्ष में भाषण दिए.

1924 से 1928 तक वे ‘द न्यू ओरिएंट’ के संपादक रहे. उनके कार्यकाल के दौरान उनके अख़बार में महात्मा गाँधी, अल्बर्ट आइंस्टीन, ख़लील जिब्रान, सरोजिनी नायडू और बर्टरेंड रसेल के लेख छपे.

इसके बाद उन्होंने एक और पत्रिका ‘वॉएस ऑफ़ इंडिया’ का भी संपादन किया. उन्होंने हमेशा भारत की साँस्कृतिक एकता की वकालत की. उनका कहना था कि भारतीय संस्कृति न तो हिंदू है और न ही मुस्लिम. वो पूरी तरह से भारतीय है.

उस दौरान वो शायद उन गिने चुने लोगों में से थे जो अविभाजित भारत का सपना देखते थे जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों को समान अधिकार प्राप्त होंगे.

सरोजिनी नायडू

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सरोजिनी नायडू

सैयद हुसैन के भारत वापस आने के फ़ैसले पर नेहरू की ठंडी प्रतिक्रिया

1945 में जब विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका गईं तो वो 26 साल बाद अपने हुसैन से मिलीं.

1946 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिख भारत वापस आने की इच्छा प्रकट की लेकिन नेहरू की तरफ़ से उन्हें बहुत ठंडा जवाब मिला.

उन्होंने लिखा, "आप अमेरिका में रहकर भारत के लिए बेहतर काम कर सकते हैं."

एमओ मथाई लिखते हैं, "नेहरू का जवाब उस संभावना को रोकने के लिए था कि विजयलक्ष्मी पंडित और सैयद हुसैन फिर से संपर्क में आ जाएंगे और उनके बारे में बातों का दौर फिर से शुरू हो जाएगा. ज़ाहिर था कि नेहरू ने 30 साल पहले उनकी बहन के साथ हुए उनके प्रेम संबंधों को भुलाया नहीं था."

सैयद हुसैन प्रधानमंत्री नेहरू के साथ

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

इमेज कैप्शन, सैयद हुसैन प्रधानमंत्री नेहरू के साथ

नेहरू ने विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ और सैयद को मिस्र में राजदूत नियुक्त किया

नेहरू और गाँधी के हतोत्साहित किए जाने के बावजूद सयैद हुसैन 1946 में भारत वापस लौट आए. उस समय विजयलक्ष्मी पंडित उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थीं.

दो साल पहले उनके पति रंजीत पंडित का देहावसान हो चुका था. उस समय जवाहरलाल नेहरू 17 यॉर्क रोड पर रहते थे.

जब भी विजयलक्ष्मी लखनऊ से दिल्ली आतीं, वो अपने भाई के घर पर ही ठहरतीं.

एमओ मथाई की बात मानी जाए तो रिमलेस चश्मा लगाए सैयद हुसैन रोज़ सुबह नेहरू के घर पहुंच जाते. उनकी पतलून के पीछे की जेब में कोनयेक का एक फ़्लास्क रखा रहता जिससे वो समय समय में कोनयेक का घूँट भरते रहते.

विजयलक्ष्मी पंडित और सैयद हुसैन की मुलाक़ातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया.

संभवतः यही कारण था कि नेहरू ने विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ में भारत का पहला राजदूत नियुक्त किया, हाँलाकि उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ख़ासकर लियाक़त अली ने इसका घोर विरोध किया.

खुद विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उन्हें अपने भाई का ये फ़ैसला पसंद नहीं आया.

दूसरी तरफ़ सैयद हुसैन को मिस्र में भारत के पहले राजदूत के तौर पर भेजा गया.

इसके पीछे नेहरू की मंशा रही होगी कि विजयलक्ष्मी और सैयद हुसैन को मिलने का मौका इतनी आसानी से न मिल सके.

सैयद हुसैन (दाएं) और विजयलक्ष्मी पंडित (बीच में)

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

इमेज कैप्शन, सैयद हुसैन (दाएं) और विजयलक्ष्मी पंडित (बीच में)

मिस्र में सैयद हुसैन का देहावसान

सैयद हुसैन ने 3 मार्च 1948 को मिस्र के सम्राट एमएम फ़ारूख के सामने अपने परिचय पत्र पेश किए.

उनको चार घोड़ों की बग्घी में बैठा कर परंपरगत रूप से मिस्र के सम्राट के महल आबदीन पैलेस ले जाया गया.

उनके जुलूस में मिस्र की सेना के क़रीब 100 घुड़सवार चल रहे थे. महल में उनके पहुंचते ही उन्हें सम्राट के अंगरक्षकों ने गार्ड ऑफ़ ऑनर दिया.

काहिरा में अपने प्रवास के दौरान सैयद घर में न रह कर शैपहर्ड होटल में रहे.

उनके मिस्र प्रवास के दौरान जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित और उनकी बेटियाँ चंद्रलेखा और नयनतारा उनसे मिलने वहाँ गए. लेकिन एक वर्ष के अंदर ही सैयद हुसैन का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. उस समय उनकी उम्र 61 साल थी.

काहिरा में सैयद हुसैन की क़ब्र

इमेज स्रोत, Simon & Schuster

इमेज कैप्शन, काहिरा में सैयद हुसैन की क़ब्र

मिस्र की राजधानी काहिरा में ही उन्हें पूरे सैनिक सम्मान के साथ दफ़नाया गया.

मिस्र की सरकार ने एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा.

भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मई, 1949 में काहिरा जाकर सैयद हुसैन की क़ब्र पर फूल चढ़ाए.

कुछ दिनों बाद विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि बन गईं.

न्यूयॉर्क की अपनी सरकारी यात्राओं के दौरान वो अक्सर काहिरा में रुकतीं और सैयद हुसैन की कब्र पर फूल चढ़ातीं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)