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हेल्दी मैस्क्युलिनिटी: एक अच्छा मर्द होना क्या है?
मर्दों को कैसा दिखना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? इस बारे में शायद जब से दुनिया बनी है, एक ख़ास तरह की सोच रही है.
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के आधार पर कुछ फ़र्क़ ज़रूर हो सकते हैं लेकिन मर्दों की छवि कमोबेश एक ही जैसी रही है.
हम सब अपने घरों में, अपने आस-पास के लोगों से बातचीत के दौरान या मीडिया या फ़िल्मों में भी कई पुश्तों से कुछ ख़ास तरह की बातें सुनते आए हैं.
जैसे मर्दों को दर्द नहीं होता, मर्द होकर रोता है, कैसा मर्द है मार खाकर चला आया, चूड़ियां पहन रखी हैं वग़ैरह-वग़ैरह.
दरअसल इस तरह की सोच हमारी पितृसत्तात्मक समाज का आइना है.
पैसे कमाना और घर चलाना मर्दों की ज़िम्मेदारी है, मेहनत के सारे काम मर्द ही कर सकते हैं, घर के मामले में आख़िरी फ़ैसला हमेशा मर्द ही करेंगे जैसी विचारधारा हमारी सामाजिक सोच का हिस्सा रही हैं.
पंजाब यूनिवर्सिटी में वीमेन स्टडीज़ विभाग की प्रोफ़ेसर डॉ अमीर सुल्ताना कहती हैं कि यह एक ‘सोशल कंस्ट्रक्ट’ है यानी इसे समाज ने बनाया है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मर्दों के बारे में इस तरह की सोच को समाज ने बनाया है और क़ुदरत के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है."
"इसीलिए हम यह भी देखते हैं कि अलग-अलग समाज में मैस्क्युलिनिटी की अलग-अलग परिभाषाएं हो सकती हैं, लेकिन एक चीज़ सब में कॉमन है और वो है कि मर्द ज़्यादा ताक़तवर है इसलिए वही अंतिम फ़ैसला करेगा."
मर्दों को लेकर शब्द
साल 2018 में जब #Metoo कैंपेन दुनिया भर में शुरू हआ तो मर्दों के बारे में इस तरह की मानसिकता के लिए एक ख़ास शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा.
और वो ख़ास शब्द था ‘टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी’.
इसको आप ऐसे समझ सकते हैं कि अगर आप सोचते हैं कि आप मर्द हैं तो आपको एक ख़ास तरह से उसका प्रदर्शन करना होगा.
मर्द ताक़तवर होता है और औरत कमज़ोर, आपको केवल इसको मानना ही नहीं है, आपके व्यवहार में भी यह झलकना चाहिए.
अगर आपकी यह सोच है तो वो असल में मर्दानगी नहीं बल्कि ‘टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी’ या ‘ज़हरीली मर्दानगी’ है.
तो फिर अगला सवाल यह उठा कि अगर मर्दों को लेकर सदियों से चली आ रही सोच मर्दानगी नहीं बल्कि ज़हरीली मर्दानगी है तो फिर असली मर्दानगी क्या है?
इसी सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश में एक नए शब्द का चलन बढ़ने लगा और उसे कहा गया हेल्दी मैस्क्युलिनिटी या पॉज़िटिव मैस्क्युलिनिटी.
गैरी बारकर ‘इक्यूमुंडो सेंटर फ़ॉर मैस्कुलिनिटीज़ एंड सोशल जस्टिस’ के सीईओ और सह-संस्थापक हैं. वो ‘मेनकेयर’ और ‘मेनइंगेज’ नाम की संस्था के भी सह-संस्थापक हैं.
मेनकेयर 50 से ज़्यादा देशों में चल रहा एक ग्लोबल कैंपेन है जिसका मुख्य मक़सद है मर्दों को केयरगिवर का रोल अदा करने के लिए प्रोत्साहित करना.
मेनइंगेज दुनिया भर के सात सौ से ज़्यादा ग़ैर-सरकारी संगठनों का एक ग्लोबल अलायंस है.
गैरी बारकर इंटरनेशनल मेन एंड जेंडर इक्वैलिटी सर्वे (IMAGES) के सह-संस्थापक हैं.
मर्दों के बिहेवियर, पिता की ज़िम्मादरी, हिंसा और लैंगिक समानता के प्रति उनके नज़रिए को लेकर यह किया गया अब तक का दुनिया का सबसे बड़े सर्वे है.
गैरी बारकर ने बीबीसी रील्स से अपने विचारों को शेयर किया.
अच्छा लड़का होना क्या है?
बीबीसी रील्स से बातचीत में उन्होंने कहा कि कई लड़कों और मर्दों को इस बात को लेकर बहुत कन्फ़्यूज़न है कि दरअसल एक अच्छा लड़का या मर्द होना क्या होता है?
बारकर के अनुसार उन्होंने अपने सर्वे में पाया है कि मर्द जब परिवार में एक दूसरे का ख़याल रखते हैं तो उससे पूरे परिवार को फ़ायदा होता है.
उनके अनुसार हेल्दी मर्दानगी महिला-विरोधी ज़हरीली सोच को काटने का एक एंटीडोट या टीका है.
उन्होंने कहा कि सबसे आसान तरीक़ा तो यह है कि मर्दों को इस बात का एहसास दिलाया जाए कि जब वो यौन शोषण की बात सुनें या कोई महिला-विरोधी मज़ाक़ सुनें तो फ़ौरन उसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएं.
वो आगे कहते हैं कि जब किसी मर्द को पता चले कि उनके ऑफ़िस में या उनके दोस्तों या रिश्तेदारों की सर्किल में कोई मर्द यौन हिंसा कर रहा है तो उसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करें.
पंजाब यूनिवर्सिटी की डॉ अमीर सुल्ताना का भी कहना है कि महिलाओं और लड़कियों के साथ समाज में अगर कहीं ग़लत हो रहा है तो मर्दों को उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए.
डॉ सुल्ताना के अनुसार यही पॉज़िटिव मैस्क्युलिनिटी है.
इसका उदाहरण देते हुए वो कहती हैं, “अगर आप मर्द होने के नाते घर में फ़ैसला लेने का अधिकार रखते हैं तो पॉज़िटिव मैस्क्युलिनिटी की यह मिसाल होगी कि अगर लड़का कहे कि वो बग़ैर दहेज़ के शादी करेगा.”
टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी
बारकर के अनुसार महिलाओं के सशक्तिकरण और पूर्ण लैंगिक समानता के सफ़र में मर्दों की एक अहम भूमिका है.
भारत में समलैंगिकों के अधिकारों के लिए वर्षों से लड़ाई कर रहे मुंबई स्थित हरीश अय्यर का मानना है कि हेल्दी मैस्क्युलिनिटी का मतलब एक ऐसी सोच का होना है जिसमें सभी जेंडर के लिए जगह हो, उनका स्वागत किया जाता हो और सभी के लिए बराबरी का मौक़ा हो.
बीबीसी हिंदी के लिए फ़ातिमा फ़रहीन से बात करते हुए हरीश अय्यर ने कहा कि हेल्दी मैस्क्युलिनिटी की विचारधारा की जड़ में फ़ेमिनिज़्म या नारीवाद ही है.
नारीवाद की धारणा है कि समाज, पुरूष-दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है और पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव और अन्याय होता है.
हरीश अय्यर कहते हैं कि स्वस्थ मैस्क्युलिनिटी भी वही सोच है लेकिन इसमें फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसमें ना केवल महिलाओं के लिए बल्कि सभी जेंडर के लिए बराबरी का मौक़ा मिलना चाहिए.
आजकल पॉज़िटिव मैस्क्युलिनिटी की बात क्यों ज़्यादा हो रही है, इस सवाल का जवाब देते हुए हरीश अय्यर कहते हैं कि समाज में जब टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी की बात हो रही है तो उसके विरोध में इस तरह की प्रगतिशील सोच की भी बात होना लाज़िमी है.
हरीश अय्यर एक और अहम बात कहते हैं कि टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी का संबंध सिर्फ़ मर्दों से नहीं होता है, कुछ महिलाएं भी टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी को बढ़ावा देती हैं.
चूड़ियों का सिम्बल
डॉ अमीर सुल्ताना का भी ऐसा ही मानना है. वो कहती हैं, “महिलाएं भी उसी समाज का हिस्सा हैं जहां हम मर्दानगी को ज़्यादा अहमियत देते हैं. महिलाएं ख़ुद भी कई बार राजनीतिक विरोध में शामिल होती हैं तो किसी अधिकारी या राजनेता को जाकर अपनी चूड़ियां देती हैं. चूड़ियों को विरोध का सिम्बल बना देती हैं.”
गैरी बारकर का मानना है कि पिछले कुछ वर्षो में मर्दों की सोच में भी बदलाव देखा जा रहा है.
उन्होंने कहा कि यह भी बहुत अहम है कि मर्दों को इस बात का एहसास दिलाया जाए कि इसमें उनका भी बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ है. अगर यह दुनिया लैंगिक समानता की तरफ़ बढ़ती है तो यह मर्दों के लिए भी फ़ायदे का सौदा है.
लैंगिक समानता की इस जंग में अगर मर्द महिलाओं के साथ उनके सहयोगी बन कर खड़े होते हैं तो इस पूरी प्रक्रिया में वो भी एक बेहतर इंसान बनते हैं.
क्वीर फ़ेमिनिस्ट ग्रुप नज़रिया के सीनियर प्रोग्राम कॉर्डिनेटर ज़यान कहते हैं कि हेल्दी मैस्क्युलिनिटी वही है जो समाज के बने-बनाए नियमों और नज़रिए को चुनौती दे सके.
बीबीसी के लिए फ़ातिमा फ़रहीन से बातचीत में वो कहते हैं, "जैसे-जैसे समाज में घरेलू हिंसा बढ़ने लगी और उस पर चर्चा होने लगी तभी लोगों को लगा कि इस पूरे मामले में सबसे ज़रूरी है कि मैस्क्युलिनिटी के बारे में मर्दों से सीधे बातचीत की जाए."
उनके अनुसार मर्दों को बताया जाने लगा कि मर्दानगी की जो छवि बनाकर रखी गई है, वो सही नहीं है.
सोच बदलने की ज़रूरत
ज़यान कहते हैं कि इस समय जिस तरह की राष्ट्रीयता की बात की जा रही है उसमें भी कहीं न कहीं पारंपरिक मैस्क्युलिनिटी की ही सोच काम कर रही है.
वो कहते हैं, “भारत में वेल्दी मैस्क्युलिनिटी के बारे में बात तो हो रही है लेकिन ज़रूरत है कि उसको और फैलाया जाए. संस्थाएं लोगों को बता रही हैं कि हम अपने लड़कों को कैसे बड़ा करें, कैसे उनकी परवरिश करें.”
वहीं लोगों की सोच और अभिभावक इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं.
इस बारे में डॉ अमीर सुल्ताना कहती हैं, “इस तरह की सोच तभी बदल सकती है अगर हम बच्चों को शुरू से ही यह सिखाएं कि लड़का और लड़की दोनों बराबर हैं. एक अच्छा मर्द तभी हो सकता है जब वो पहले एक अच्छा इंसान बने.”
डॉ सुल्ताना कहती हैं कि अब तो सिर्फ़ मर्द और औरत की बात ही नहीं है अब तो एलजीबीटीआईक्यू की बात हो रही है.
उनके अनुसार, पूरे समाज को बदलना पड़ेगा तभी कोई समाज तरक़्क़ी कर सकता है.
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