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कमज़ोर पृष्ठभूमि के कुछ बच्चे कैसे लिखते हैं कामयाबी की नई इबारत
- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
गंगा सहाय मीणा का जन्म राजस्थान के सवाई माधोपुर ज़िले के एक छोटे से गांव में एक किसान परिवार में हुआ था.
उनका बचपन बहुत मुश्किलों में बीता. हालात ऐसे थे कि पेटभर खाना मिलना भी आसान नहीं होता था. कभी पड़ोसियों से लाई गई छाछ से कढ़ी बनाई जाती, कभी पिसी हुई मिर्च के साथ रोटी खाई जाती तो कभी प्याज़ के साथ.
सरकारी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई करने के बाद वह एम.ए. करने दिल्ली आ गए. यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दाख़िला लिया और आज इसी के भारतीय भाषा केन्द्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. वह जेएनयू में सबसे कम उम्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर बने थे.
कुछ ऐसी ही कहानी हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले के द्रंग की संगीता की भी है. माता-पिता के साथ मेलों में चूड़ियां और खिलौने बेचे ताकि परिवार का गुज़ारा हो सके और पढ़ाई का खर्च भी निकल सके.
कॉलेज के बाद आगे की पढ़ाई करने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला आईं तो उसी दौरान पिता को कैंसर हो गया. वह पढ़ाई के साथ-साथ पिता के इलाज के लिए शिमला और चंडीगढ़ के बीच भागदौड़ भी करती रहीं. इसी दौरान हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के कॉलेज कैडर का असिस्टेंट प्रोफ़ेसर का टेस्ट भी क्लियर कर दिया.
प्रोफ़ेसर गंगा सहाय मीणा और संगीता, दोनों के लिए यहां तक का सफ़र तय करना आसान नहीं था. इसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की, कई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से पार पाया, तब जाकर यह मुक़ाम हासिल किया.
हमें अपने आसपास ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जब बचपन में बहुत ही मुश्किल दिन देखने वाले लोग आगे चलकर कामयाबी की नई इबारत लिखते हैं. कोई खेल की दुनिया में नाम कमाता है, कोई प्रशासनिक अधिकारी बनता है, कोई वैज्ञानिक बन जाता है तो कोई सफल कारोबारी बनता है.
ऐसा कैसे होता है, इस सवाल का सीधा कोई जवाब नहीं है. लेकिन एक बड़े शोध से निकले कुछ बहुत ही रोचक नतीजे इस विषय पर रोशनी डालते हैं.
सहयोग और सहारा देने वाला रिश्ता
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की ‘यंग लाइव्स’ रिसर्च टीम ने 20 सालों तक भारत, वियतनाम, पेरू और इथियोपिया के 12 हज़ार बच्चों का अध्ययन किया.
इस अध्ययन में मुश्किल हालात को हराकर सफल होने वाले बच्चों में कुछ समानताएं पाई गईं. कुछ एक जैसे कारण थे, जिनके चलते वे बाक़ियों की तुलना में आगे बढ़ पाए.
शोध में पहला कारण यह निकलकर आया कि मुश्किलों को पार करने वाले बच्चों के जीवन में कोई तो ऐसा था जो उनके साथ खड़ा रहा, जिससे उन्हें समय-समय पर सहयोग और सहारा मिला.
ब्रितानी लेखक और कवि लेम सिसे का बचपन बालाश्रयों में बीता. उन्हें एक से दूसरे बाल आश्रय भेजा जाता रहा मगर आज वह एक सफल और प्रसिद्ध शख्सियत हैं.
वह कहते हैं, “मेरे पास परिवार नहीं था और इस कारण मुझे यह समझने का मौक़ा मिला कि एक बच्चे के लिए सहारा देने वाले और सहयोग भरे रिश्ते की कितनी अहमियत होती है.”
सिसे के लिए यह भूमिका उस सामाजिक कार्यकर्ता ने निभाई, जिसे उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. मगर उस वक्त उन्हें इस बात का एहसास नहीं था.
सिसे कहते हैं, “वह कोई रोल मॉडल जैसा नहीं था. वह दोस्त जैसा भी नहीं था मगर उससे बढ़कर था. वह ऐसा शख़्स था जो मेरी भावनात्मक स्थिति पर नज़र रखता था और यही बात मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई.”
शोध में पाया गया कि बच्चों को आगे बढ़ाने में छोटी-छोटी चीज़ें बहुत महत्व रखती हैं. जैसे कि माता-पिता और बच्चे का रिश्ता गर्मजोशी भरा होना चाहिए.
साथ ही, शुरुआती सालों में बच्चों को पढ़कर सिखाना और उनकी देखभाल करना बहुत महत्वपूर्ण होता है.
जेएनयू में एसोसिएट प्रोफ़ेसर गंगा सहाय मीणा बताते हैं कि उनके माता-पिता अनपढ़ थे मगर पढ़ाई-लिखाई का महत्व जानते थे.
वह कहते हैं, “छोटे किसानों के घर में बहुत काम होता है. खेतों में जाना होता है, पशुओं की देखभाल करनी होती है. लेकिन परिवार ने कभी मुझपर बोझ नहीं डाला. जितना हो सकता था, मैं हाथ बंटा दिया करता था. मेरी बहन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. अक्सर वह मेरे हिस्से के काम भी कर लेती थी. इससे मैं पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर सका.”
संगीता की ज़िंदगी में ऐसी भूमिका उनके पिता की रही. वह बताती हैं कि उनके पिता डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए थे. मगर वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों को कोई दिक्कत आए.
संगीता कहती हैं, “जिस साल पापा ने मेरा दाख़िला पहली कक्षा में करवाया था, उसी साल उन्होंने जमा दो की परीक्षा दी थी. उसके बाद फिर परिवार का पेट भरने की जुगत में लगे रहे. जब ग्रैजुएशन के बाद मैं एम.ए. करना चाहती थी तो परिवार के पास पैसा नहीं था. फिर भी पापा ने मुझे एम.ए. करने के लिए यूनिवर्सिटी भेजा.”
‘सुरक्षा तंत्र’ की मौजूदगी
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ‘यंग लाइव्स’ के शोध के अनुसार, मुश्किल परिवेश से निकलकर कामयाब होने वाले बच्चों के जीवन में दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु था- सेफ़्टी नेट यानी कि एक ‘सुरक्षा तंत्र’ की मौजूदगी.
सुरक्षा तंत्र यानी ऐसी चीज़ या व्यवस्था, जिस पर आप किसी मुश्किल स्थिति में फंसने पर भरोसा कर सकते हैं.
ब्रिटेन में हुए कई शोध बताते हैं कि ग़रीबी का बच्चों पर बुरा असर पड़ता है. पांच साल तक के आयुवर्ग में देखा गया कि ग़रीबी में पलने वाले बच्चे, नए शब्द सीखने के मामले में आख़िर के 10 फ़ीसदी में थे.
‘यंग लाइव्स’ ने पाया कि इथियोपिया और पेरू में जिन बच्चों को भोजन वगैरह के रूप में सरकारी मदद मिली, 12 साल की उम्र का होने पर उनकी याद्दाश्त और सोचने-समझने की क्षमता उन बच्चों से काफ़ी बेहतर थी, जिन्हें ऐसी मदद नहीं मिल पाई थी.
जो परिवार जितना ज़्यादा अभावों में रहा, उसके बच्चों पर उतना ही बुरा असर पड़ा.
अमेरिका में भी हुए एक नियंत्रित शोध में भी ऐसा ही देखने को मिला. इस शोध में यह अध्ययन किया गया कि शहर के सबसे ग़रीब परिवारों को आर्थिक सहायता देने का उनके बच्चों पर क्या असर पड़ता है.
एक समूह में शामिल परिवारों को हर महीने 20 डॉलर दिए गए जबकि दूसरे समूह के परिवारों को 333 डॉलर की मदद दी गई.
इन परिवारों के बच्चे जब एक साल के हो गए तो उनके दिमाग़ को स्कैन किया गया. जिन परिवारों को ज़्यादा आर्थिक मदद मिली थी, उनके बच्चों के दिमाग़ का वह हिस्सा ज़्यादा सक्रिय था, जो भाषाएं और नई बातें सीखने से जुड़ा है.
यहां ग़रीब परिवारों को मिलने वाली सरकारी सहायता या आर्थिक मदद को सेफ़्टी नेट कहा जा सकता है. वर्ल्ड बैंक के अनुसार, सेफ़्टी नेट कार्यक्रम परिवारों को आर्थिक, प्राकृतिक और अन्य संकटों से बचाते हैं.
गंगा सहाय मीणा भी मानते हैं कि इस तरह के सोशल सेफ़्टी नेट कार्यक्रमों से मिलने वाली मदद कमज़ोर वर्ग के बच्चों को आगे बढ़ाने में सहायता करती है.
अपना उदाहरण देते वह कहते हैं, “जब मैं बीए के अंतिम वर्ष में था तब पिता जी का निधन हो गया था. घर पर कर्ज़ चढ़ा था. परिवार आगे पढ़ाने की स्थिति में नहीं था. मगर जेएनयू में चयन प्रक्रिया भी पारदर्शी है और फ़ीस भी कम है. फिर यूजीसी से फ़ेलोशिप मिलने से मुझे पढ़ाई के लिए परिवार पर आश्रित नहीं रहना पड़ा.”
वह बताते हैं, “सरकार की ओर से सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बच्चों को शिक्षा और रोज़गार में मदद के लिए लाए गए अफ़रमेटिव एक्शन का भी बहुत लाभ मिलता है. एम.ए. में मेरा चयन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित श्रेणी में हुआ था मगर एम.फ़िल. की प्रवेश परीक्षा में मेरा चयन अनारक्षित श्रेणी में हुआ. अगर मुझे एमए में मौक़ा नहीं मिला होता तो एमफ़िल के समय अच्छा प्रदर्शन कैसे कर पाता?”
ऐसा ही कुछ अनुभव संगीता का भी रहा.
वह बताती हैं, “एम.ए. के बाद एम.फ़िल. करना मेरे लिए आसान नहीं था. पता था कि घर वाले अब और पैसे नहीं दे सकते. मैंने इस उम्मीद में नेशनल इलिजिबिलिटी टेस्ट (NET) दिया कि जेआरएफ़ मिलने से कुछ मदद हो जाएगी. जेआरएफ़ में डेढ़ प्रतिशत से रह गई थी मगर लेकिन नेट की मेरिट के आधार पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए राष्ट्रीय फैलोशिप में मेरा नंबर आ गया. उससे मुझे बहुत मदद मिली.”
भरोसा जताना और दूसरा मौक़ा देना
‘यंग लाइव्स’ के शोध से निकली तीसरी महत्वपूर्ण बात है- सेकेंड चांस यानी दूसरा मौक़ा मिलना.
अगर मुश्किल हालात में पल-बढ़ रहे बच्चों पर भरोसा जताया जाता है, उनका मनोबल बढ़ाया जाता है तो वे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित होते हैं. ब्रितानी कवि लेम सिसे कहते हैं, “परवरिश कहीं पर भी हो रही हो, बच्चे के लिए वह चीज़ मिलना बहुत महत्वपूर्ण होता है, जो चीज़ उसे बहुत पसंद होती है.”
वह कहते हैं, “बचपन में मैं चाहता था कि कोई मुझे समझे. किसी को दूसरा मौक़ा देने का मतलब है कि आप उसे समझ रहे हैं. जब मैं 13 साल का था तो मुझे बाल आश्रय के एक अध्यापक ने कविताओं की किताब दी थी. लेकिन वह सिर्फ़ एक किताब नहीं थी. महत्वपूर्ण बात यह थी कि मुझे किताब देने लायक समझा गया. मैं भाग्यशाली था कि मुझे यह किताब मिली क्योंकि मुझे कविताएं पसंद थीं.”
संगीता के लिए वह दौर बहुत मुश्किल हो गया था, जब एम.फ़िल करने के दौरान उन्हें पता चला कि पिता को कैंसर हो गया है. उनके सामने संकट यह खड़ा हो गया कि पढ़ाई और करियर को चुने या पिता और परिवार को संभालें.
वह बताती हैं, “मैंने इलाज के लिए पापा को शिमला बुला लिया था. फिर वहां से आगे के इलाज के लिए पीजीआई मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ ले जाना पड़ता था. फिर जहां रहते थे, वहां जल संकट था तो खाना बनाने के लिए भी दूर से पानी ढोना पड़ता था. उस समय लगा कि अब तो नहीं हो पाएगा. लेकिन गाइड ने मुझे हिम्मत दी और कहा कि पहले पिता जी का ख़्याल रखो.”
कमज़ोर पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को और भी कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. अगर आत्मविश्वास की कमी हो और उस दौरान प्रोत्साहन न मिले तो उनका मनोबल टूट सकता है.
प्रोफ़ेसर गंगा सहाय मीणा याद करते हैं, “जेएनयू में दाख़िला लिया तो लगा कि यहां तो लोग इतनी अच्छी भाषा बोलते हैं. बड़ी निराशा हुई. मगर फिर पहले सेमेस्टर के मार्क्स आए और क्लास में सबसे पहले JRF के लिए चयन हुआ तो आगे बढ़ने का मौक़ा मिला. जेएनयू का माहौल ऐसा था जहां सीनियर छात्र बहुत मदद करते थे. इसके अलावा जब-जब मैंने अच्छा किया, तब मेरे अध्यापकों ने भी ख़ूब प्रोत्साहित किया और निराशा से बचाए रखा."
लेम सिसे की कविता का एक अंश है-
I'm not defined by darkness confined in the night.
Each dawn I am reminded I am defined by lights.
इसका भावार्थ कुछ ऐसा है-
रात में सिमटे अंधेरों से बयां नहीं होती मेरी हस्ती
हर सुबह होता है एहसास कि उजालों से है वजूद मेरा
ये पंक्तियां समर्पित हैं हर उस बच्चे के लिए, जो मुश्किलों के अंधियारे से निकलकर सफलता के उजियारे में अपना मुक़ाम बनाने की क्षमता रखता है.
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