लिव-इन रिलेशनशिप में क्या शादी जैसी सुरक्षा मिल सकती है?

    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में लिव-इन रिलेशनशिप के एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि शादी का संस्थान जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकार्यता, प्रगति और स्थायित्व एक व्यक्ति को प्रदान कर सकता है वो लिव-इन रिलेशनशिप कभी नहीं दे सकता.

भारतीय समाज में लिव-इन रिलेशनशिप यानी शादी किए बग़ैर एक लड़का और लड़की के एक साथ रहने पर सवाल उठते रहे हैं.

जहां इसके पक्षधर इसे संविधान में दिए गए मूलभूत अधिकारों और निजता से जोड़ते हैं वहीं ऐसे संबंधों का विरोध करने वाले सामाजिक मूल्यों, भारतीय संस्कृति से जोड़ते हुए इसे बुरा बताते हैं.

वहीं समाज ऐसे रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को एक अलग नज़रिए से देखता है जहां उसे समाज के चश्मे और नैतिकता के आधार पर परखा जाता है.

हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर संसद ने कोई क़ानून नहीं बनाया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसलों के ज़रिए ऐसे रिश्तों के क़ानूनी दर्जे को साफ़ किया है.

वहीं ऐसे मामलों में विभिन्न अदालतों का अलग-अलग रुख़ देखा गया है.

इलाहबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा

एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा कि इस देश में शादी के संस्थान को बर्बाद करने के लिए एक ''सिस्टमेटिक डिज़ाइन'' है. समाज को अस्थिर करना और देश की प्रगति में रुकावट लाना जो फ़िल्म और टीवी सीरियल दिखाए जा रहे हैं वो शादी जैसे संस्थान को ख़त्म करने में लगे हैं.

कोर्ट का कहना था कि शादीशुदा संबंध में पार्टनर के साथ बेवफ़ाई और फ्री लिव-इन रिलेशनशिप को प्रगतिशील समाज के तौर पर दिखाया जाता है और नौजवान इसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं.

कोर्ट का कहना था, '' लिव-इन रिलेशनशिप को तभी सामान्य माना जाएगा जब शादी का संस्थान इस देश में बेकार बन जाएगा जैसे कई तथाकथित विकसित देशों में शादी के संस्थान को बचाना एक बड़ी समस्या बन गया है.''

कोर्ट का कहना था कि अगर व्यक्ति का परिवार में सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं है तो वो देश की प्रगति में सहयोग नहीं दे सकता.

साथ ही कोर्ट ने कहा कि एक देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता उस देश के मध्य वर्ग और उसकी नैतिकता पर निर्भर करती है.

लेकिन कोर्ट ने ये टिप्पणी क्यों की?

दरअसल एक महिला ने कोर्ट में याचिका डाली थी.

इस महिला ने कोर्ट में अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि अभियुक्त ने पहले उनसे दोस्ती की और जब वो एक साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में थी तो शादी का झुठा वादा किया और बलात्कार किया.

इस महिला ने याचिका में ये भी कहा था कि जब वो गर्भवती हुई तो उन्हें गर्भपात के लिए दवा दी गई. इसके बाद याचिकाकर्ता ने अभियुक्त से शादी की बात रखी तो उसने इंकार कर दिया.

कोर्ट के समक्ष आए इस मामले में अभियुक्त को ज़मानत मिल गई लेकिन अदालत ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अपने बातें रखी.

कोर्ट का कहना था, ''ऊपरी तौर पर देखे तो लिव-इन रिलेशनशिप सुनने में तो बहुत आकर्षक लगता है और यह युवाओं को अपनी ओर खींचता है लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है और मध्यम वर्गीय सामाजिक नैतिकता/नियम का वो सामना करने लगते हैं. ऐसे जोड़े बाद में महसूस करने लगते हैं कि उनके रिश्ते को मिलने वाली सामाजिक स्वीकृति के अभाव में वे सामान्य सामाजिक जिंदगी नहीं जी सकते हैं.

कोर्ट का कहना था कि ब्रेकअप के बाद महिला के लिए समाज का सामना करना मुश्किल हो जाता है. मध्य वर्गीय समाज इस महिला को रिश्ते से अलग हुई महिला के तौर पर नहीं देखता है.

जज सिद्धार्थ का कहना था, "सामाजिक बहिष्कार से लेकर अभद्र टिप्पणियां लिव-इन रिलेशनशिप के बाद महिला की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं. फिर वो जैसे-तैसे इस लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के संबंध में बदलने की कोशिश करती है, जिससे कि उसे सामाजिक मंज़ूरी मिल सके."

लिव-इन रिलेशनशिप पर राय

कोर्ट का कहना था कि पुरुष को एक दूसरी महिला लिव-इन पार्टनर या पत्नी ढूढ़ने में परेशानी नहीं होती लेकिन महिला को शादी के लिए पुरुष पार्टनर को ढूढ़ने में दिक़्कत आती है.

हालांकि जानकार मानते हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप सदियों से समाज का हिस्सा रहा है और ऐसे रिश्तों को उसमें जगह भी मिली है.

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक और महिला संगठनों से जुड़ी रंजना कुमारी कहती हैं कि कोर्ट की ऐसी टिप्पणी लिव-इन रिलेशनशिप के ख़िलाफ़ और महिलाओं के साथ अन्याय है.

रंजना कुमारी इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहती है कि भारतीय समाज में ये ख़ास तरह की मानसिकता अभी भी बनी हुई है जिसमें शादी को सामाजिक और पारिवारिक मान्यता दी जाती है और ये धारणा बनी हुई है कि महिला चाहे कोई भी परेशानी हो शादी को चलाने की कोशिश करेगी.

उनके अनुसार, ''लिव-इन रिलेशनशिप में एक महिला को अपना साथी चुनने की आज़ादी है, वे अपने टर्म पर स्वतंत्रता से रह सकती है. लेकिन वहीं शादी में आप उसे स्वीकृति भी देंगे लेकिन शोषण भी करते रहेंगे.''

वहीं जानकार ये भी कहते हैं कि समाज को ये स्वीकार करने में वक्त लगेगा, जहां एक महिला का निर्णय, व्यक्तित्व, स्वतंत्रता दिखाई दे क्योंकि भारतीय समाज में शादीशुदा जिंदगी में एक महिला को दबा कर रखने और सुरक्षित रखना सामान्य माना जाता है.

भारतीय संविधान में हर नागरिक को मूलभूत अधिकार दिए गए हैं जिसमें आज़ादी, जिंदगी जीने का अधिकार और साथी चुनने का अधिकार है तो ऐसे में किसी महिला को अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है.

पुणे में पिछले आठ साल से राइट टू लव कैंपेन चला रहे के. अभिजीत के अनुसार, ''अगर कोई महिला किसी लड़के के साथ शादी से पहले रहना चाहती है, लड़की अगर उसके बाद उसी पार्टनर के साथ शादी करना पसंद करती है तो वो उसकी मर्ज़ी है.ऐसे रिश्ते से अगर वो चाहे तो वो उससे बाहर भी निकल सकती है या उस रिश्ते को आगे भी ले जा सकती है.''

लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं के अधिकार

कुछ महीनों पहले ही श्रद्धा वालकर और आफ़ताब के मामले में देश भर को चौका दिया था और लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बहस शुरू हो गई थी.

हालांकि इस पर के.अभिजीत कहते हैं कि ये कहना ग़लत होगा कि शादी में एक महिला को जो सुरक्षा मिलती है वो लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं मिल सकती.

वो कहते हैं, ''जो शादीशुदा संबंध में हो सकता है वो लिव-इन रिलेशनशिप में भी हो सकता है. ऐसे में ये कहना ग़लत होगा कि शादी में ज़्यादा सुरक्षा बनी रहती है क्योंकि हर व्यक्ति पर निर्भर करता है.''

साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा के लिए PWDV एक्ट 2005 के अंतर्गत ही लिव-इन रिलेशनशिप की बात कही गई थी.

इसके सेक्शन 2 (एफ) में घरेलू संबंधों को परिभाषित किया गया है.

महिलाओं के मुद्दों पर मुखर होकर बोलने वाली वकील सोनाली कड़वासरा बताती हैं, ''भारत में लिव-इन रिलेशनशिप लीगल है और साल 2005 के क़ानून में ऐसे रिलेशनशिप जिसकी प्रकृति शादी जैसे संबंध की हो, उसमें थोड़ा स्थायित्व हो , ऐसे रिश्ते में महिलाओं को वही अधिकार दिए गए हैं जो एक शादीशुदा महिला को मिलते हैं.''

उनके अनुसार, "ऐसी महिलाओं का अगर लिव-इन रिलेशनशिप किसी तरह का शारीरिक, मानसिक या आर्थिक उत्पीड़न होता है जैसे आपसे पैसे लिए जा रहे हैं तो इस क़ानून के तहत महिला शिकायत भी कर सकती है. वहीं अगर वो सोचती है कि उनकी कोई फ़ोटो, वीडियो लीक किया जा सकता है तो वो उसकी शिकायत भी आईटी एक्ट के तहत कर सकती हैं."

एक स्वंय सेवी संस्था धनक के संस्थापक आसिफ़ इक़बाल कहते हैं कि इस तरह की टिप्पणी देना एक तरह के गहरे दबाव को दर्शाता है.

विश्व हिंदू परिषद के नेता विनोद बंसल का कहना है कि वो लिव-इन रिलेशनशिप के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

वे कहते हैं, ''लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को वो अधिकार नहीं मिलते जो एक शादी में महिला को मिलते हैं. वहीं ये समझने की ज़रुरत हैं कि ऐसा रिश्ता कितना आगे बढ़ेगा और इस रिश्ते को शादी नहीं माना जा सकता क्योंकि क़ानून में विवाह को भी परिभाषित किया गया है.''

जानकार मानते हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज दो धड़ों में बंटा हुआ है जहां दोनों पक्षों की अपनी अपनी राय और तर्क हैं लेकिन ये भी समाज की सच्चाई है कि ऐसे रिश्तों में रहने वाला युवा अभी भी अपने संबंध के बारे में खुलकर बात करने से कतराता है.

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