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'जो लिव-इन रिलेशनशिप तोड़े, वो ही दे हर्जाना'
अगर लिव इन रिलेशनशिप में ज़हर घुल जाए और लड़का शादी के वादे से मुकर जाए तो?
...तो क्या वो लिव इन में साथ रह रही लड़की को हर्जाना देने के लिए बाध्य है?
सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से इस बाबत सुझाव मांगा है कि क्या लिव इन रिलेशनशिप टूटने पर लड़के को "नैतिक ज़िम्मदारी" के तहत लड़की को हर्जाना देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सुझाव देने को कहा है.
कैसे उठी हर्जाना देने की बात?
कर्नाटक हाई कोर्ट के एक मामले पर सुनवाई करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट में यह मामला आया.
याचिकाकर्ता आलोक कुमार अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड के साथ पिछले छह साल से लिव इन रिलेशनशिप में थे. लेकिन आलोक ने शादी से मना कर दिया जिसके बाद लड़की ने आलोक पर जबरन शारीरिक संबंध बना कर रेप करने का आरोप लगाया.
केस दर्ज़ होने के बाद आलोक हाई कोर्ट पहुंचे, लेकिन वहां उनकी याचिका ख़ारिज हो गई.
जिसके बाद आलोक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. उनके मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रेप और दूसरे आपराधिक मामलों पर तो रोक लगा दी, लेकिन इस मामले में "नैतिक ज़िम्मेदारी" तय करने के लिए अटॉर्नी जनरल से सलाह मांगी है.
कोर्ट ने सवाल किया है - क्या, लिव इन रिलेशनशिप को भी शादी की ही तरह देखा जा सकता है और ऐसे रिश्ते में रह रही महिला या लड़की के अधिकार किसी शादी-शुदा की तरह ही हो सकते हैं ?
क्या है लोगों की राय?
लिव इन रिलेशनशिप अब उतना भी नया नहीं रह गया है. ग्रामीण इलाकों को छोड़ दें तो शहरों में ये बढ़ रहा है.
आम राय यही है कि लिव इन में वही लोग रहते हैं जो शादीशुदा ज़िंदगी जीना तो चाहते हैं, लेकिन ज़िम्मेदारी उठाने से बचते हैं. लिव इन रिलेशनशिप पूरी तरह से दो लोगों की आपसी सहमति पर आधारित होता है जिसमें न तो कोई सामाजिक दबाव होता है और न ही क़ानूनी बंधन.
ऐसे में अगर लड़का, लिव इन रिलेशनशिप तोड़ देता है तो क्या उसे हर्जाना देना चाहिए?
यह सवाल हमने अपने पाठकों से पूछा और आश्चर्यजनक रूप से 90 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि गुज़ारा-भत्ता नहीं मिलना चाहिए.
ये सवाल हमने अलग-अलग ग्रुप्स में पूछे. हमारे लेडीज़ स्पेशल ग्रुप लेडीज़ कोच पर बहुत सी लड़कियों ने कॉमेंट किया और सबने यही कहा कि रिश्ते में पैसे जैसी चीज़ को लाना सही नहीं है.
महविश रिज़वी का मानना है कि अगर लड़की आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है तो गुज़ारा-भत्ता देने का सवाल ही नहीं उठता.
"लड़की अगर कमा रही है तो गुज़ारा भत्ते का सवाल नहीं बनता. भत्ता उन्हें मिलता है जो निर्भर हों. लिव इन में रहने वाली 99 फ़ीसदी लड़कियां आत्मनिर्भर होती हैं. लिव इन रिलेशनशिप ऑलमोस्ट शादी के जैसा है, शादी नहीं है. क्योंकि शादी का सर्टिफ़िकेट नहीं है, एक तरह से ओपन मैरिज है. लड़का और लड़की दोनों की वफ़ादारी का प्रमाण मिलना मुश्किल है. ऐसा भी नही है कि साथ रहने की शुरुआत में कोई कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया हो जिसमें शादी करने का वादा हो. गहरी जांच पड़ताल के बाद ही कोई सबूत मिल सकता है. हां, शादी से मुकरने के लिए सज़ा का प्रावधान किया जा सकता है."
हमें जो कॉमेंट मिले उनमें से बहुत से ऐसे भी थे जिसमें लोगों ने पूछा कि क्या अगर लड़की रिश्ता तोड़ती है तो वो भी हर्जाना देगी? वैसे ये सवाल पूछने वाले ज़्यादातर पुरुष ही थे, लेकिन कुछ महिलाओं ने भी यही सवाल किया.
कुमारी स्नेहा लिखती हैं कि क्या पुरुष के प्रति भी महिला की ज़िम्मेदारी बनेगी, अगर वह छोड़ के जाती है तो...और कई बार तो प्यार ही नहीं बचा रहता तो शादी करके ही क्या होगा...
रिदम त्रिपाठी लिखते हैं कि 'पुरुष ही क्यों उठाए ज़िम्मेदारी? महिला क्यों नहीं? वो भी तो धोखा दे सकती है.. अगर सिर्फ़ पुरुषों के लिए ऐसा कोई नियम बना तो कुछ महिलाओं द्वारा ये लिव इन रिलेशनशिप पैसा ऐंठने का ज़रिया भी बन सकता है, दोनों के लिए ये नियम होना चाहिए जिससे सही तथ्य की जांच हो और सही न्याय हो सके.'
डी कुमार लिखते हैं कि 'भारत में रूढ़िवादी विचारधारा और सोच के रहते हुए लिव-इन रिलेशनशिप से अलग हुई औरतों को समाज शायद ही अपनाए. अगर वह औरत आर्थिक तौर पर कमज़ोर है तो और मुश्किल... ये सब देखते हुए छोड़ने वाले को भत्ता देना तो बनता ही है. अगर रिश्ता तोड़ने वाला पुरुष है तो...'
कुछ लोगों ने लिव इन रिलेशनशिप के इस मुद्दे पर एक क़दम बढ़ाते हुए भी अपनी बात कही.
शोभा पांडे लिखती हैं कि 'अगर लिव इन में रहते हुए लड़की प्रेग्नेंट हो जाए और लड़का शादी से मना कर दे तब तो ज़िम्मेदारी और सज़ा का प्रावधान हो, वरना 2-4 साल बाद अगर कोई उस रिश्ते में नहीं रहना चाहता तो ज़बरदस्ती क्यों करना?
संदीप नय्यर मानते हैं कि लिव इन में स्पेस रहना चाहिए. "लिव इन में आउट भी जोड़ा जाना चाहिए. खाली लिव इन तो शादी जैसा ही है."
अनिल सिंह लिखते हैं कि 'जिस संबंध को किसी विधिक नियम, उप-नियम, उपबंध अथवा अधिनियम द्वारा मान्यता प्राप्त न हो, उसे भंग करने पर कोई उत्तरदायित्व कैसे निर्धारित किया जा सकता है?'
जुनैद अली लिखते हैं कि 'यदि लीव इन रिलेशनशिप में ज़िम्मेदारी तय हो जाए तो फिर वह लीव इन रिलेशनशिप कहां रहेगा बल्कि वह तो विवाह में परिवर्तित हो जाएगा जिसमें दोनों पक्षों के कर्तव्य निश्चित रहते है. लीव इन रिलेशनशिप का वास्तविक आधार आत्म स्वच्छंदता है तो फिर इसे कैसे नियमों के दायरे में लाया जा सकता है? हालांकि लीव इन रिलेशनशिप का स्वरूप समाजिक ताने-बाने के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है.'
कम ही सही पर कुछ लोगों ने "नैतिक ज़िम्मेदारी" का भी समर्थन किया है.
जसवंत लिखते हैं कि 'जिम्मेदारी तो बनती है. शादी का झांसा देकर शोषण करना और लिव इन में होना अलग बात है.'
रिंकी सिंह लिखती हैं कि 'हर्जाना बनता है क्योंकि हमारा समाज ऐसे रिश्ते को स्वीकार नहीं करता है फिर भी समाज में ये तेज़ी से बढ़ रहा है. आजकल लोग शादी से परहेज़ कर रहे हैं और अगर शादी कर भी ले रहे हैं तो शादी तोड़कर लिव इन में रहने लग रहे हैं. उन्हें इसमें कोई ख़तरा नहीं लगता इसलिए हर्जाना लगना शुरू हो जाएगा तो डर रहेगा और इस रिलेशनशिप को भी लोग गंभीरता से लेंगे.'
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