इमोशन ज़ाहिर करने वाली महिलाओं को समझा जाता है तेज़तर्रार, धौंस जमाने वाली...

    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

“जब मैं बड़ी हो रही थी, तब मुझे बहुत ज़्यादा भावुक, संवेदनशील और ग़ुस्सैल कहा जाता था.''

बिहेवियरल एंड डेटा साइंटिस्ट, प्रोफ़ेसर प्रज्ञा अग्रवाल अपनी भावनाओं के बारे में साझा करते हुए कहती हैं, ''जब मैंने एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया तो वरिष्ठ पुरुष सहयोगियों ने मुझे कैसा व्यवहार करना चाहिए उसके संकेत मिले. मुझे ख़ुद को मज़बूत दिखाना था, भावनाएं छिपानी थीं और कुछ मौक़ों पर आक्रामक भी दिखना था.”

वह बताती हैं कि बचपन में ही उन्हें इस बात अहसास हो गया था कि भावनाएं भी लिंग के आधार पर बँटी हुई हैं.

उन्होंने एक किताब लिखी है- हिस्टेरिकल: एक्सप्लोडिंग द मिथ ऑफ़ जेंडर्ड इमोशंस. इस किताब में उन्होंने इसी विषय पर बात की है, कैसे लोगों से उनके लिंग के आधार पर अलग-अलग भावनाएं रखने और जताने की उम्मीद की जाती है.

वह कहती हैं, “महिलाओं को हमेशा से उनकी भावनाओं के आधार पर आंका और निशाने पर लिया जाता रहा है.

कहा जाता है कि वे बहुत ज़्यादा इमोशनल यानी भावुक होती हैं. फिर उनकी इस भावुकता को तार्किकता और विवेक से कमतर आंका जाता है, जिन्हें ‘मर्दाना’ गुण माना जाता है. लेकिन हमें तार्किकता को भावुकता से बेहतर मानने की इस सोच को चुनौती देनी होगी.”

भावनाओं को छिपाने का दबाव

पुराने दौर की कला और साहित्य में कुछ भावनाएं सिर्फ़ महिलाओं से जोड़ी गई हैं तो कुछ सिर्फ़ पुरुषों से. जैसे कि ईर्ष्या या चीज़ों को पाने की चाहत का संबंध महिलाओं से बताया गया है जबकि बहादुरी जैसी सकारात्मक भावनाओं का पुरुषों से.

अब हालात कुछ हद तक बेहतर तो हुए हैं लेकिन पूरी तरह नहीं. दिल्ली में मनोवैज्ञानिक शिवानी मिस्री साधु बताती हैं कि आज भी पुरुषों में ग़ुस्से या प्रभुत्व जताने वाली भावना को बढ़ावा दिया जाता है जबकि महिलाओं में संवेदना और ख़्याल रखने की भावना पर ज़ोर दिया जाता है.

वह कहती हैं, “इस कारण पुरुषों में अपने भावनात्मक पहलू को और महिलाओं में मज़बूती के भाव को छिपाने का दबाव बनता है. ऐसे में पुरुष उदासी या डर जताने से बचते हैं, जबकि महिलाएं ग़ुस्से का भाव नहीं दिखा सकतीं क्योंकि ऐसा करना उनकी देखभाल करने और ख़्याल रखने की भूमिका के अनुरूप नहीं माना जाता.”

जब महिलाएं अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करती हैं तो उन्हें ‘कुछ ज़्यादा ही’ संवेदनशील, धौंस जमाने वाली, तेज़-तर्रार या फिर ‘बेहद आक्रामक’ कह दिया जाता है.

प्रोफ़ेसर प्रज्ञा कहती हैं, “ये शब्द सकारात्मक नहीं हैं और महिलाओं की वाजिब भावनाओं को भी ग़लत रूप में दिखाते हैं. यही कारण है कि महिलाएं अपनी भावनाओं को दबाती हैं ताकि उन्हें लोग गंभीरता से लें.”

इसी तरह, ग़ुस्से का ही उदाहरण लें तो पुरुषों और महिलाओं, दोनों के ग़ुस्से को अलग-अलग नज़रिये से देखा जाता है. पुरुष ग़ुस्सा होते हैं तो इसे सामान्य समझा जाता है जबकि महिला को ग़ुस्सा आ जाए तो कहा जाता है कि इसके व्यक्तित्व में ही कोई समस्या है.

शोध भी बताते हैं कि कार्यस्थल पर ग़ुस्सा दिखाने वाले पुरुषों की तुलना में ग़ुस्से का इज़हार करने वाली महिलाओं को कम वेतन दिया जाता है.

प्रोफ़ेसर प्रज्ञा कहती हैं, “मैं पुरुषों और महिलाओं के बारे में बात कर रही हूं लेकिन कुछ लोग इन दो श्रेणियों में नहीं आते हैं. ट्रांसजेंडर या जेंडर नॉनकन्फ़र्मिंग लोगों पर ज़्यादा शोध नहीं हुए हैं लेकिन कई ट्रांस महिलाओं और ट्रांस पुरुषों ने बताया है कि उनपर भी अपनी पहचान के अनुरूप व्यवहार करने का दबाव रहता है.”

कहाँ से हुई शुरुआत?

हमारी भावनाओं को कई सदियों में गढ़े गए सामाजिक और सांस्कृतिक पैमानों के आधार पर आंका जाता है और हम बचपन से ही इन विचारों पर यकीन करने लग जाते हैं.

शोध कहते हैं कि माता-पिता अपने लड़के और लड़कियों से अलग ढंग से व्यवहार करते हैं और इसी कारण हमारे मन में कुछ धारणाएं बैठ जाती हैं जो हमेशा बनी रहती हैं.

अक्सर आपने लोगों को छोटे बच्चों से कहते हुए सुना होगा- अरे क्या लड़कियों की तरह रो रहे हो? या फिर लड़कियों को अक्सर कुछ विषयों पर बात करते समय चुप करा दिया जाता है. उन्हें ज़्यादा मत बोलो, धीरे से बोलो या ज़ोर से मत हंसो जैसी हिदायतें भी दी जाती हैं.

मनोवैज्ञानिक शिवानी मिस्री साधु कहती हैं कि भावनाओं के इस बंटवारे का संबंध जेंडर रोल यानी पारंपरिक रूप से लिंग के आधार पर बांट दी गई भूमिकाओं से है.

वह कहती हैं, “प्राचीन समाजों में जीवित रहने के लिए लिंग आधारित भूमिकाएं बांट दी गई थीं. पुरुष शिकार करके लाते थे और अपने समूह की सुरक्षा करते थे. इसके लिए उनके अंदर बहादुरी और मज़बूती चाहिए होती थी. वहीं महिलाएं परिवारों का ख़्याल रखती थीं, जिसके लिए हमदर्दी और संवेदनशीलता ज़रूरी है.”

“यही भूमिकाएं बाद में धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं में बदल गईं. ऐसे ही जब औद्योगिक क्रांति का दौर आया तो पुरुष घरों से फ़ैक्ट्रियों में जाने लगे. तब पुरुषों से भावनात्मक रूप से कठोर होने की उम्मीद रखी जाने लगी जबकि घर का ख़्याल रख रही महिलाओं से देखभाल करने वाले गुणों की अपेक्षा रखी जाने लगी. समय के साथ यह सोच और गहरी होती चली गई.”

यह एक अजीब स्थिति है, जहां पहले तो महिलाओं पर एक ख़ास तरह की भावनाएं थोपी जाती हैं और फिर उन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करने पर उनके बारे में राय बनाई जाती है.

यही नहीं. अब, जबकि महिलाओं का दबदबा कार्यस्थलों में बढ़ा है, तब उन्हें तथाकथित पुरुषों वाले गुणों, जैसे कि अधिकार और दृढ़ता का प्रदर्शन भी करना पड़ता है और तथातकथित महिलाओं वाले गुणों, जैसे कि विनम्रता और सरल होने का भी.

प्रोफ़ेसर प्रज्ञा कहती हैं यह सोच महिलाओं के लिए मुश्किलें पैदा कर देती है. उदाहरण देते हुए वह कहती हैं, “राजनीति में महिलाओं का आकलन उनके द्वारा जताई जा रही भावनाओं के आधार पर किया जाता है. जैसे कि हिलेरी क्लिंटन को लेकर कहा जाता था कि वह बहुत बेबाक हैं और अक्सर गुस्से में रहती हैं.

एक सर्वे में पुरुष और महिला मतदाताओं से उनकी इस बात के लिए भी आलोचना की कि वह कम मुस्कुराती हैं. कई सारी योग्यताओं के बावजूद इस सर्वे में उन्हें राष्ट्रपति चुने जाने लायक समर्थन नहीं मिल पाया था.”

मीडिया का असर

मीडिया, टीवी सीरियल और सिनेमा ने भी भावनाओं को लिंग के आधार पर बांटने और इस सोच को और गहरा करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.

मीडिया ने ज़्यादातर समय पुरुषों और महिलाओं को रूढ़िवादी विचारों के अनुरूप ही दिखाया है. फ़िल्मों और टीवी सीरियल्स में अक्सर पुरुषों को सशक्त और आत्मविश्वास से भरा दिखाया जाता रहा है जबकि महिलाओं को नाज़ुक और भावुक.

हालांकि, हाल के समय में कुछ बदलाव भी आए हैं. मनोवैज्ञानिक शिवानी शिवानी मिस्री साधु कहती हैं, “मीडिया इस दिशा में सकारात्मक भूमिका भी निभा सकता है. अब पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ा जाने लगा है. अब ऐसे पुरुष कैरक्टर दिखने लगे हैं जो भावुक होते हैं और डर महसूस करते हैं. महिलाएं भी अब मज़बूत और सशक्त भूमिकाओं में दिख रही हैं. इससे दर्शकों के मन में बैठी रूढ़ियों को तोड़ने में मदद मिलती है.”

कैसे हो सकता है सुधार

किसी नए और अलग माहौल में ढलने के लिए हम सभी अपने व्यवहार में बदलाव लाते हैं. लेकिन कुछ लोगों पर इस तरह का दबाव बहुत ज़्यादा होता है.

अगर कोई अपनी भावनाओं को ज़ाहिर न कर पाए तो इसका असर उसकी मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ सकता है. आप तनाव, बेचैनी, अनिद्रा और यहां तक कि डिप्रेशन यानी अवसाद के शिकार भी हो सकते हैं.

प्रोफ़ेसर प्रज्ञा अग्रवाल कहती हैं कि आदर्श स्थिति तो यह है कि हर किसी को बिना यह चिंता किए अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति की आज़ादी हो कि कोई उसके बारे में क्या सोचेगा.

विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा होगा तो कोई भी अपनी उदासी, डर, दुख या किसी भी नकारात्मक भावना को अभिव्यक्त करने से नहीं हिचकेगा, भले ही उसका लिंग कोई भी हो. तब किसी को भी उदासी या अन्य नकारात्मक समझी जाने वाली भावना जताने में कोई शर्म महसूस नहीं होगी.

एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां हर कोई खुलकर बात कर सके और अपनी असल भावनाओं को ज़ाहिर कर सके.

प्रोफ़ेसर प्रज्ञा कहती हैं, “याद रखें, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना ही तो हमें इंसान बनाता है.”

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