शादी में सेक्स, अधिकार और प्रताड़ना के सवाल पर क्या कहते हैं क़ानून

उमंग पोद्दार

बीबीसी संवाददाता

16 जून को कर्नाटक हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक़, शादीशुदा जोड़े के बीच सेक्स नहीं होना, तलाक़ का आधार तो हो सकता है. मगर, इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) के तहत इसे क्रूरता नहीं माना जाएगा.

भारतीय क़ानून हो या फिर अदालतों के फ़ैसले, दोनों के हिसाब से कोई शादी जारी रहने में पति-पत्नी के बीच सेक्स का होना अहम माना जाता है.

अदालतों ने अपने फ़ैसलों में बार-बार ये कहा है कि अगर पति या पत्नी में से कोई एक अपने साथी के साथ लंबे समय तक यौन संबंध नहीं बनाता, तो इसे क्रूरता माना जाएगा और सेक्स संबंध न होना तलाक़ का एक आधार बन सकता है.

हालांकि, बहुत से विशेषज्ञ ये मानते हैं कि इस क़ानूनी प्रावधान का इस्तेमाल मर्द अधिक करते हैं, क्योंकि, आम तौर पर ये माना जाता है कि शादीशुदा ज़िंदगी में पति को यौन सुख देना, पत्नी का धर्म होता है.

सेक्स संबंध के दूसरे पहलू, जैसे कि शादीशुदा रिश्ते में ज़बरदस्ती या मैरिटल रेप के अपवाद भी इस सोच को बढ़ावा देते हैं कि शादी के बाद महिलाओं को पति के साथ यौन संबंध बनाने की ज़िम्मेदारी पूरी करनी चाहिए.

इस मामले में अदालतों ने क्या क्या कहा है, वो आपको बता देते हैं.

शादी का संपूर्ण न होना

कर्नाटक हाई कोर्ट के सामने जो मुक़दमा था, उसमें एक जोड़े ने दिसंबर 2019 में शादी की थी.

शादी के बाद पत्नी, 28 दिनों तक अपने पति के साथ रही थी. उसके बाद उसने ये कहते हुए अपने पति का घर छोड़ दिया कि शादी के बाद पति पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं बने थे.

फ़रवरी 2020 में महिला ने दो मुक़दमे दायर किए. पहली अर्ज़ी तो शादी ख़त्म करने की थी. वहीं दूसरा मुक़दमा आईपीसी की धारा 498A के तहत दायर किया गया.

आईपीसी की इस धारा में पति और उसके परिवार की तरफ़ से पत्नी के ऊपर ज़ुल्म ढाने से रोकने का प्रावधान है.

महिला ने आरोप लगाया कि उसका पति ब्रह्मकुमारियों का अनुयायी है, जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों का समूह है. इसके अलावा, महिला ने दावा किया कि उसके पति ने उसके साथ तब तक सेक्स नहीं किया, जब तक वो अपने मायके से फ्रिज, सोफा सेट और टेलिविज़न लेकर नहीं आई.

नवंबर 2022 ने दोनों की शादी को ख़त्म कर दिया. कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि शारीरिक संबंध नहीं बनाना, क्रूरता है और ये वैवाहिक रिश्ते को ख़त्म करने का वाजिब आधार है.

हालांकि, हाई कोर्ट ने ये भी कहा कि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत महिला के साथ कोई क्रूरता की गई.

शादीशुदा जीवन में सेक्स नहीं होने को दो स्तरों पर अलग अलग तरह से देखा जाता है. अगर पति या पत्नी में से किसी की नपुंसकता के कारण यौन संबंध नहीं बन पाते हैं, तो हिंदू क़ानून के तहत ऐसी शादी को शून्य क़रार दिया जा सकता है. इसका मतलब ये है कि पति या पत्नी में से कोई भी शादी को रद्द किए जाने की मांग कर सकता है.

अगर, शादी के बाद पति-पत्नी में शारीरिक संबंध बन चुके हैं. लेकिन बाद में पति या पत्नी में से कोई भी दूसरे को सेक्स से महरूम रखता है, तो उनमें से कोई भी इस आधार पर तलाक़ की मांग कर सकता है कि पार्टनर ने उसे यौन सुख से वंचित रखकर उससे निर्दयता की है, या उस पर ज़ुल्म किया है.

जानकार कहते हैं कि सभी धर्मों के लोगों की शादियों में तलाक़ का ये क़ानूनी आधार मौजूद है.

वैवाहिक संबंध में क्रूरता करने पर सज़ा देने का भी प्रावधान मौजूद है. आईपीसी की धारा 498A में ये व्यवस्था है कि अगर पति या उसके परिवार के लोग या फिर रिश्तेदार, पत्नी पर ऐसे ज़ुल्म ढाते हैं, जिससे पत्नी की सेहत को ख़तरा हो सकता है. या फिर, पत्नी पर धन संपत्ति की अवैध मांग पूरी करने का दबाव डालते हैं, उसको तंग करते हैं, तो उनके लिए सज़ा का प्रावधान इस धारा में है.

अदालतों के फ़ैसले

कई मामलों में अदालतों ने फ़ैसला दिया है कि शादीशुदा ज़िंदगी में लंबे समय तक सेक्स से वंचित रखना, हिंदू मैरिज एक्ट के तहत निर्दयता है.

ये तलाक़ का वाजिब आधार हो सकता है. मई महीने में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक आदमी को इस आधार पर तलाक़ दे दिया था कि उसकी शादी पूरी तरह टूट चुकी थी क्योंकि पति और पत्नी अलग अलग रह रहे थे. और दूसरे विवादों के साथ-साथ, पति पत्नी के बीच किसी भी तरह का यौन संबंध नहीं था.

2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फ़ैसले में कहा था कि शारीरिक या सेहत संबंधी कोई समस्या न होने के बावजूद, अगर पति या पत्नी में से कोई भी लंबे समय तक इकतरफ़ा तरीक़े से यौन संबंध बनाने से इनकार करते हैं, तो इसे मानसिक प्रताड़ना का एक वाजिब आधार माना जाएगा.

इसके लिए, कितने समय तक यौन संबंध बनाने से इनकार करने को क्रूरता माना जाएगा, ये किसी भी केस के तथ्यों पर निर्भर करेगा.

2012 के एक मुक़दमे में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक आदमी को तलाक़ दे दिया था, जिसने दावा किया था कि उसकी पत्नी ने पांच महीने के दौरान उसके साथ केवल 10-15 बार सेक्स किया था. और, सेक्स करते समय उसकी पत्नी ‘एक मुर्दे की तरह’ पड़ी रहती थी. अदालत ने अपने फ़ैसले में इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि पत्नी ने शादी की पहली रात को पति के साथ सेक्स से इनकार करके ‘क्रूर कृत्य’ किया था.

अपने फ़ैसले में जज ने ये भी कहा था कि, ‘इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि यौन संबंध से महरूम शादियां अब महामारी बन गई हैं.’ जज ने ये भी कहा था कि, ‘यौन संबंध की पवित्रता और इसकी वजह से शादीशुदा रिश्ते में जो नई ऊर्जा आती है, वो भी कमज़ोर होती जा रही है.’

हालांकि, शादी के पहले साल, क़ानून तभी किसी जोड़े को तलाक़ की इजाज़त देता है, जब उनके संबंधो में बेहद निर्दयता दिखाई गई हो, या पति पत्नी में से कोई एक चरित्रहीन हो, दुराचार में लिप्त हो. पिछले साल अप्रैल में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई जोड़ा शादी के पहले ही साल में सेक्स से इनकार करने को आधार बनाकर तलाक़ लेना चाहे, तो यौन संबंध से महरूम रखने को असाधारण ज़ुल्म नहीं माना जा सकता है.

महिला और पुरुष से अलग-अलग क़ानूनी बर्ताव

वैसे तो यौन संबंध से वंचित रखने को आधार बनाकर तलाक़ लेने का विकल्प, पति और पत्नी दोनों के लिए उपलब्ध है. लेकिन, क़ानून के जानकार कहते हैं कि पुरुष इस मुद्दे को तलाक़ का आधार ज़्यादा बनाते हैं.

मुंबई की महिला अधिकारों की वकील वीना गौड़ा कहती हैं कि, ‘महिलाएं आम तौर पर सेक्स से वंचित रखे जाने को ‘क्रूरता’ नहीं मानती हैं. लेकिन, पुरुष इसे ज़ुल्म मानते हैं.’

महिला अधिकारों की वकील और जेंडर से जुड़े मसलों की जानकार फ्लैविया एग्नेस कहती हैं कि, ‘ऐसे दस मामलों में से आठ या नौ शिकायतें मर्द लेकर आते हैं’

वो कहती हैं कि, ‘तलाक़ का ये आधार महिलाओं के लिए नुक़सानदेह होता है. क्योंकि, इससे महिलाएं तलाक़ से बचने के लिए सेक्स करने को मजबूर हो जाती हैं.’

वीना गौड़ा के मुताबिक़ अगर महिलाएं तलाक़ लेने के लिए इस बात को आधार बनाती भी हैं, तो इसके साथ दूसरी शिकायतें भी जोड़ दी जाती हैं. वो कहती हैं कि, ‘जब तक महिला के साथ मार-पीट नहीं होती या पति दूसरी महिला के साथ संबंध नहीं रखता, तब तक महिलाएं सेक्स से वंचित किए जाने को तलाक़ लेने की वजह नहीं बनातीं

शादीशुदा रिश्ते में सेक्स से पहले सहमति लेना

क्या इसका मतलब ये है कि कोई इंसान अपने जीवनसाथी को सेक्स करने के लिए मजबूर कर सकता है?

आदर्श स्थिति में इस सवाल का जवाब नहीं है.

पति अगर पत्नी को अपने साथ सेक्स के लिए मजबूर करता है, तो इसे हिंदू मैरिज एक्ट और इंडियन पीनल कोड, दोनों के तहत क्रूरता माना जाएगा और ये इसे तलाक़ लेने की वजह बनाया जा सकता है.

2021 में केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ बिना उसकी सहमति के सेक्स करता है, तो इसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की क्रूरता माना जाएगा.

इस वक़्त, भारत में शादीशुदा संबंध में बलात्कार के रूप में इसका एक अपवाद मौजूद है.

क़ानून के जानकार ये मानते हैं कि इसका संबंध उस सोच से है, जिसमें शादीशुदा रिश्ते में सेक्स करना महिला का कर्तव्य माना जाता है. कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस क़ानूनी अपवाद की आलोचना की है.

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और पारिवारिक क़ानूनों की जानकार सरासू एस्थर थॉमस कहती हैं कि, ‘ऐसे बहुत से विचार (जैसे कि पति को जब मर्ज़ी हो तब सेक्स करने का अधिकार होना) अदालतों की शादी में बलात्कार को मान्यता देने की हिचक से जुड़े हैं. किसी वैवाहिक संबंध में सेक्स को पत्नी के कर्तव्य और पति के हक़ के तौर पर देखा जाता है.’

पिछले साल मई में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस बात पर बँटा हुआ फ़ैसला सुनाया था कि शादीशुदा जोड़े के बीच बिना सहमति के सेक्स को बलात्कार माना जाए या नहीं. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

वैसे तो मैरिटल रेप को बलात्कार के बराबर नहीं माना जाता. फिर भी इसके लिए IPC की अलग-अलग धाराओं जैसे कि 498A के तहत सज़ा दी जा सकती है.

लिव-इन रिलेशन की क्या स्थिति है?

लिव-इन संबंधों को ग़ैर-क़ानूनी नहीं माना जाता है. हालांकि, इनके नियमन के लिए कोई क़ानून भी नहीं है. लिव इन संबंधों में कई बार सेक्स का मुद्दा उठता रहा है. ख़ास तौर से तब, जब ऐसे संबंध शादी में तब्दील नहीं होते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई पुरुष, किसी महिला से शादी का झूठा वादा करता है, जिसे पूरा करने का उसका कोई इरादा नहीं होता. मगर उस वादे की वजह से कोई महिला सेक्स के लिए राज़ी हो जाती है, तब ऐसा यौन संबंध IPC के तहत बलात्कार माना जाएगा.

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