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प्रसव के बाद होने वाले डिप्रेशन की नई दवा कितनी कारगर?
- Author, पायल भुयन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''डिलीवरी के कुछ दिन बाद मुझे घर पर रहते हुए अजीब सी घुटन होने लगी जैसे सांस नहीं आ रही हो. कई बार हालत इतनी ख़राब हो जाती कि मैं हांफ़ने लगती थी. वो दौर ऐसा था जब मैं अपने नवजात शिशु के साथ ठीक से समय नहीं बिता पा रही थी.''
केरल की रहने वाली लता (बदला हुआ नाम) अपनी पहचान गुप्त रखना चाहती हैं.
वो उस बुरे दौर को याद कर आज भी सहम जाती हैं.
वो कहती हैं अगर आप किसी भी मानसिक या शारीरिक परेशानी में हैं तो फ़ौरन मदद के लिए हाथ बढ़ाइए.
क्या होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन?
प्रसव होने के बाद जो डिप्रेशन होता है उसे कहते हैं पोस्टपार्टम डिप्रेशन. इसमें महिलाओं के व्यवहार में उदासी, तनाव, चिड़चिड़ापन और गुस्से जैसे बदलाव आते हैं. ऐसे में उन्हें पारिवारिक सहयोग और इलाज की ज़रूरत होती है. डॉक्टरों के मुताबिक़ ये समस्या क़रीब 50 से 60 फ़ीसदी महिलाओं को होती है.
इसके भी तीन स्तर होते हैं.
- पोस्टपार्टम ब्लूज़
- पोस्टपार्टम डिप्रेशन
- पोस्टपार्टम साइकोसिस
एमेटी इंस्टीट्यूट ऑफ़ बिहेवियरल हेल्थ एंड अलायड साइंसेस डिपार्टमेंट में प्रोफ़ेसर और डायरेक्टर डॉक्टर रूशी कहती हैं, ''डिलीवरी के बाद बहुत सारी महिलाओं को उदासी का एहसास हो सकता है, लेकिन आम तौर पर हमें इस बारे में सही जानकारी नहीं होती या फिर हम पोस्टपार्टम के लक्षणों को नज़रअंदाज़ करते हैं या फिर शर्म की वजह से हम किसी मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल के पास नहीं जाते.''
पहली पोस्टपार्टम डिप्रेशन पिल को मंज़ूरी
हाल ही में अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) ने पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लिए दवा को मंजूरी दी है. इस दवा का नाम है ज़ुज़ुर्वे. इस दवा को 14 दिनों के लिए लेना पड़ता है.
एफ़डीए के मनोचिकित्सक विभाग में अध्यक्ष डॉक्टर टिफ़नी फ़ॉर्टियन के मुताबिक़, ''गर्भावस्था के दौरान या फिर प्रेग्नेंसी के बाद महिलाएं मानसिक परेशानियों से गुज़र रही होती हैं, ऐसे समय में कई बार ख़ुद को नुकसान पहुंचाने जैसे ख़्याल भी आते हैं. ऐसे में कोई ऐसी दवा जिसे आप आसानी से ले सकें महिलाओं के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है.''
लेकिन वो ज़ोर देकर कहते हैं कि ये दवा सिर्फ़ उन मरीज़ों के लिए हैं जो सिवियर डिप्रेशन की शिकार हों.
'ज़ुज़ुर्वे' के साइड इफ़ेक्ट्स
अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) के मुताबिक़ 'ज़ुज़ुर्वे' गोली लेने के कुछ साइड इफ़ेक्ट्स भी हैं. एफ़डीए कहता है कि दवा लेने के 12 घंटों तक आप कोई भी शारीरिक परिश्रम वाला काम न करें. गाड़ी न चलाएं.
दवा लेने के बाद आपको ये शिकायत हो सकती है.
- चक्कर आना
- दस्त
- थकान
- सर्दी जुकाम
- यूरिनरी ट्रैक्ट इंफ़ेक्शन
वैसे डॉक्टर रूशी कहती हैं कि आमतौर पर एंटी-डिप्रेसेंट दवा के साइड इफ़ेक्ट्स जल्द ख़त्म हो जाते हैं. इसमें बहुत चिंता की बात नहीं है.
वहीं दिल्ली के एक आईवीएफ़ सेंटर 'द नर्चर' में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अर्चना धवन बजाज कहती हैं कि अभी ये साफ़ नहीं है कि इस दवा का स्तनपान कराने वाली महिलाओं पर ट्रायल किया गया है या नहीं.
वो यह भी कहती हैं कि दुनिया के जिन इलाकों में डॉक्टर की बजाए मिडवाइफ़ की मदद से बच्चे को जन्म दिया जाता है, वहां थोड़ी परेशानी आ सकती है.
इसके साथ ही वो आशंका जताती हैं कि अगर इसे मेंटेल हेल्थ प्रोफ़ेशनल की बजाए अन्य डॉक्टर लेने की सलाह देने लगे तो इसके ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल होने का ख़तरा भी बढ़ जाएगा.
पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण
कनाडा में रहने वाली प्रिया (नाम बदला हुआ) पीआर कंपनी में काम करती हैं.
वो बताती हैं, ''डिलीवरी के 20-25 दिन बाद उनमें एक अजीब बदलाव आना शुरू हुआ. जो एक पैटर्न जैसा हो गया. मैं पूरे दिन ठीक रहती लेकिन रात में सबके सोने का इंतज़ार करती. क़रीब दो महीने तक रात 12 बजे से सुबह 4 बजे के क़रीब (घरवालों के जागने के समय) तक मैं रोती रहती. इस दौरान मन में कई बुरे ख़्याल आते, जैसे अगर मुझे कुछ हो गया तो बच्चे का क्या होगा. बच्चा सांस ले रहा है कि नहीं. बच्चा बिना हिले डुले क्यों सो रहा है. कई बार बच्चे पर गुस्सा भी आता. ये सिलसिला क़रीब दो महीने तक चलता रहा.''
पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण अगर किसी में हो तो उन्हें पहचाने कैसे इस पर डॉक्टर रूशी कहती हैं, ''सबसे पहले आप देखें तो पाएंगे कि ऐसी महिलाओं में ऊर्जा की कमी हो सकती है. उन्हें किसी चीज़ में दिलचस्पी नहीं रहती. उनका सोने का समय बहुत ख़राब होने लगता है. आत्मविश्वास की कमी, छोटी छोटी बातों पर चिड़चिड़ी हो जाती हैं.''
डॉक्टर अर्चना धवन बजाज बताती हैं कि पोस्टपार्टम के ये तमाम लक्षण अगर दो हफ़्तों से ज़्यादा समय के लिए चलते रहे तो ये डिप्रेशन की शक्ल ले लेते हैं और ऐसे में ज़रूरी है कि आप डॉक्टर की सलाह लें.
वो कहती हैं, ''कई बार पोस्टपार्टम डिप्रेशन और साइकोसिस वाले मरीज़ों को आत्महत्या तक के ख़्याल आते हैं, बच्चे को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोचते हैं. ये बर्ताव पोस्टपार्टम साइकोसिस का एक्स्ट्रीम है.''
प्रिया (बदला हुआ नाम) बताती हैं, ''मुझे ये एहसास था कि मेरे साथ कुछ ग़लत हो रहा है. मैंने ख़ुद से ही मूवी देखना शुरू किया, बाहर जाना शुरू किया. और धीरे-धीरे मैं इस पैर्टन से बाहर निकल पाई. मैंने कोई दवा नहीं ली.''
जागरूक रहना कितना जरूरी है
स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर अर्चना धवन बजाज कहती हैं कि जो महिलाएं पास्टपार्टम ब्लूज़ से जूझ रही होती हैं, उन्हें दवा की ज़रूरत नहीं पड़ती.
वे कहती हैं कि डिलिवरी से पहले उन्हें उनके परिवार के साथ जागरूक करने से मदद मिल सकती है.
वो कहती हैं, ''जिन लोगों को पोस्टपार्टम डिप्रेशन में दवा की ज़रूरत पड़ती है उनकी संख्या काफ़ी कम होती है. लेकिन लोग दवा पर जाएं इससे पहले उन्हें काउंसिलिग, साइको थेरेपी, कॉगनिटिव थेरेपी के ज़रिए ठीक करने की कोशिश की जाती है. इसके बाद उन्हें विटामिन बी12 की हाई डोज़ दी जाती है. इससे कई बार फ़ायदा होता है कई बार नहीं.''
''अगर ये सब करने के बाद भी लक्षण ना जाएं तब केमिकल ट्रीटमेंट का सहारा लिया जाता है. इसलिए ज़रूरी है कि जैसे ही आपको पोस्टपार्टम ब्लूज़ के सिम्पटम्स नज़र आए तभी आप सचेत हो जाएं. ये वो समय है जहां चीज़ों को जल्द ठीक किया जा सकता है. अगर आप ब्लूज़ से डिप्रेशन में स्लिप हो जाते हैं तब दिक्कत बढ़ जाती है.''
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