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ब्रेन फ़ॉग क्या है? मेनोपॉज़ से पहले महिलाओं को क्यों होती है याददाश्त से जुड़ी परेशानियां?
- Author, लौरा प्लिट
- पदनाम, बीबीसी मुंडो
करियर के शुरुआती दिनों में न्यूयॉर्क के लेनॉक्स हिल अस्पताल की न्यूरोलॉजिस्ट गायत्री देवी और उनकी सहयोगियों ने एक ग़लती कर दी. उन्होंने मेनोप़ॉज़ से ग़ुज़र रही एक महिला को अलज़ाइमर का मरीज़ समझ लिया.
कई दौर के उपचार के बाद महिला के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और डॉक्टर गायत्री ने महसूस किया कि इसके शुरुआती लक्षण- भूल जाना और ध्यान भटकना हैं. इन लक्षणों के पीछे दूसरे कारण थे.
मरीज़ के दिमाग से जुड़ी समस्याएं उनके एस्ट्रोजन (स्त्री हार्मोन) के स्तर में भारी गिरावट से जुड़ी हुई थीं. इस हार्मोन में मेनोपॉज़ के आस-पास के सालों में काफ़ी उतार-चढ़ाव होता है. मेनोपॉज़ मेडिकल भाषा में किसी महिला के आख़िरी पीरियड के एक साल बाद शुरू होता है.
इस घटना ने डॉक्टर गायत्री को मेनोपॉज़ के एक ऐसे लक्षण के बारे में रिसर्च करने के लिए प्रेरित किया जिसके बारे में कम जानकारियां मौजूद है. उस लक्षण का नाम है ब्रेन फ़ॉग.
ब्रेन फ़ॉग (जिसे कभी-कभी मेंटल फ़ॉग भी कहते हैं) के बारे में सबसे विचलित करने वाली एक चीज ये है कि कि कई महिलाएं इससे पीड़ित हैं, लेकिन इसके कारणों से अनजान हैं.
याददाश्त पर असर
डॉक्टर गायत्री ने बीबीसी को बताया, "कई महिलाओं को प्रीमेनोपॉज़ (मेनोपॉज़ के आसपास की अवधि, जो लगभग सात साल तक चल सकती है) के दौरान शब्दों को याद रखने, एक साथ कई कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होने लगती है. वे बोलने में भी दिक्कत का सामना कर सकती हैं, जबकि महिलाएं अक्सर बोलने में अच्छी होती हैं."
इलेनॉइस यूनिवर्सिटी, शिकागो में मनोचिकित्सा, मनोविज्ञान, प्रसूति और स्त्री रोग की प्रोफेसर और अमेरिकन मेनोपॉज सोसाइटी की पूर्व अध्यक्ष पॉलीन माकी बताती हैं, "ये उनकी याददाश्त को प्रभावित करता है, जैसे कि जब हम स्टोर जाते हैं और याद रखने की कोशिश करते हैं कि हम क्या खरीदना चाहते हैं."
इसके अलावा ब्रेन फ़ॉग कहानियां बताने या बातचीत में भाग लेने की और उन बातों को बाद में याद रखने की हमारी क्षमता को भी प्रभावित करता है.
समस्या जितनी व्यापक है, उतना इसपर ध्यान नहीं दिया गया है
प्रो. माकी कहती हैं, "हमारे अध्ययन में हमें चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण गड़बड़ियां मिलीं. 10 फीसदी महिलाओं का स्कोर उनकी उम्र के हिसाब से काफी कम था. लेकिन कई अन्य लोगों को बहुत छोटी कठिनाइयों का अनुभव होता है, जो कि उनके काम या क्षमता को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन उनमें भी फ़र्क दिखता है."
डॉ. गायत्री के अनुसार, "लगभग 60 फीसदी प्री-मेनोपॉज़ या मेनोपॉज़ से ग़ुज़र रहीं महिलाएं कई बदलावों का अनुभव करती हैं, लेकिन इनका इलाज किया जा सकता है."
एस्ट्रोजन की संवेदनशीलता
एक बड़ी मुश्किल ये है कि मस्तिष्क में एस्ट्रोजन रिसेप्टर्स होते हैं और उनमें से कई हिप्पोकैम्पस में स्थित होते है, यानी मस्तिष्क के उस हिस्से में जो किसी तरह मेमोरी को ठीक करने या वापस पाने के लिए महत्वपूर्ण है.
डॉ गायत्री बताती हैं, "जब एस्ट्रोजन में अचानक गिरावट आती है, तो हिप्पोकैम्पस में कुछ गतिविधियां प्रभावित होती हैं."
प्रो. माकी का कहना है कि अध्ययन में शामिल वो महिलाएं जिनके अंडाशय (जहां सबसे अधिक एस्ट्रोजन का उत्पादन होता है) हटा दिया गया था, उन्हें एस्ट्रोजन की खुराक देने से फ़ायदा हुआ.
लेकिन प्री-मेनोपॉज़ से गुजरने वालीं सभी महिलाएं मेंटल फ़ॉग से पीड़ित नहीं होती हैं, क्यों?
ऐसा इसलिए है क्योंकि एस्ट्रोजन का असर हर महिला पर अलग होता है.
'मेंटल फ़ॉग' शब्द 19वीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश चिकित्सक एडवर्ड टिल्ट द्वारा गढ़ा गया था. ये मेनोपॉज़ से गुजरने वालीं विक्टोरियन रोगियों में होने वाली फ़ॉगिंग की स्थिति को बताता था, जैसे कि उन्हें याद नहीं रहना कि उन्होंने अपना पर्स कहाँ छोड़ा था या फिर घर वापस कैसे जाना है.
पसीना आना और याददाश्त
पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी में मनोचिकित्सा की प्रोफेसर रेबेका थर्स्टन कहती हैं, "लेकिन सिर्फ़ एस्ट्रोजन ही मायने नहीं रखता. नींद में व्यवधान जैसे अन्य कारणों को भी ध्यान में रखना होता है. मेनोपॉज़ में जाने के दौरान, 60% महिलाएं नींद से जुड़ी समस्याओं की शिकायत करतीं हैं - जिसका कनेक्शन याददाश्त से है."
नींद की कमी मेमोरी सर्किट के साथ हस्तक्षेप करती है, बहुत तेज़ पसीना भी इसी कारण आता है.
तेज़ गर्मी अचानक पूरे शरीर में फैल जाती है, जिससे त्वचा लाल हो जाती है और पसीना आता है.
नींद पर गहरा प्रभाव डालने के अलावा बहुत पसीना आना अपने आप में एक समस्या है. कुछ महिलाएं पसीने के कारण आधी रात में जागने की शिकायत करती हैं, कईं महिलाओं को पसीने के कारण अपना पाजामा और चादर भी बदलना पड़ता है.
प्रो.थर्स्टन के मुताबिक, "हम बहुत पसीना आने को एक छोटा लक्षण समझते हैं जिसे महिलाओं को सहना पड़ता था, लेकिन ये दिल की बीमारी के जोखिम से जुड़े हैं, इससे मस्तिष्क रोग हो सकते हैं. इससे हिप्पोकैम्पस के दोनों ओर के कनेक्शन पर असर पड़ता है और याददाश्त कम होती है."
मूड स्विंग, एंज़ाइटी और डिप्रेशन, जो प्रीमेनोपॉज के दौरान बढ़ जाते हैं, ये याददाश्त पर भी असर डालते हैं.
जागरूकता की कमी
यदि ये लक्षण इतने व्यापक हैं, तो इनपर बात क्यों नहीं होती हैं?
इसका कारण जागरूकता की कमी प्रतीत होता है, क्योंकि कई संस्कृतियों में मेनोपॉज़ पर खुलकर बात नहीं होती.
यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मिल्वौकी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर कैरन फ्रिक बताते हैं, "समस्या यह है ये परेशानियां कई वर्षों तक चल सकती हैं, और महिलाओं को यह भी पता नहीं हो होता कि वे प्री-मेनोपॉज़ के दौर में हैं. इसलिए इन लक्षणों के लिए दूसरे कारणों को जिम्मेदार ठहराना आसान होता है."
मेनोपॉज़ के लक्षण क्या हैं?
- पीरियड की अवधि और आवृत्ति में बदलाव
- पीरियड के प्रवाह में परिवर्तन (तेज़ या धीमा)
- योनि का सूखापन
- सोने में कठिनाई
- घबराहट
- जोड़ों का दर्द और जकड़न
- मूड स्वींग
- वज़न कम होना
- पेशाब मार्ग में संक्रमण (यूटीसी)
स्रोत: ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सर्विस
प्रो. फ्रिक के मुताबिक, "40 से 50 साल के बीच की महिलाएं बहुत व्यस्त होती हैं, वो नौकरी में या घर की देखभाल व्यस्त रहती थीं. उनके अलग-अलग उम्र के बच्चे होते थे, वो माता-पिता की देखभाल कर रही होती थीं, इसलिए इन चीज़ों के लिए तनाव को जिम्मेदार मान लिया जाता था. "
"वहीं कई पेशेवर महिलाएं इसके बारे में बात करने से डरती हैं. महिलाएं अपने करियर में कुछ हासिल करने के लिए बहुत मेहनत करतीं हैं और वो नहीं चाहती कि वो बूढ़ी या कमज़ोर दिखें."
बीबीसी ने जिन डॉक्टरों से बात की, वो मेनोपॉज़ और इसके दिमाग पर होने वाले असर पर बेहतर अध्ययन की आवश्यकता पर सहमत हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि इसे लेकर जागरूकता पैदा करनी होगी ताकि लाखों महिलाओं को इस अनावश्यक पीड़ा से बचाया जा सके.
इलाज
प्रो. माकी के मुताबिक पहले कदम के रूप में, "यह महत्वपूर्ण है कि महिलाएं घबराएं नहीं क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें अल्ज़ाइमर हो सकता है. इसकी संभावना कम है, उनके साथ जो हो रहा है वह सामान्य है."
"इस विषय पर जितने अध्ययन हुए हैं, उनके परिणाम मिले-जुले हैं, लेकिन इनसे इस बात के संकेत मिलते हैं कि मेंटल फ़ॉगिंग अस्थाई है और कम हो जाता है क्योंकि मस्तिष्क को कम या बिना एस्ट्रोजन के काम करने की आदत हो जाती है."
"लेकिन अगर बहुत पसीने के कारण आपको पूरी रात जागना पड़ रहा है तो अपने डॉक्टर से परामर्श करें. कुछ मामलों में, विशेष रूप से युवा महिलाओं में हार्मोन रिप्लेसमेंट थैरेपी भी की जाती है. इसके लाभ जोखिम से अधिक हैं."
डॉक्टर गायत्री इस बात से सहमत हैं कि कई महिलाएं इस थेरेपी को लेकर अच्छी प्रतिक्रिया देती हैं. इस थेरेपी का उपयोग लगभग दो दशक पहले एक विवादास्पद अध्ययन के छपने के बाद काफ़ी कम हो गया था. इसमें हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी को स्तन कैंसर से जोड़ कर बताया गया - इस निष्कर्ष को बाद में चुनौती दी गई थी.
वो कहती हैं कि "आधुनिक हार्मोन रिप्लेसमेंट थैरेपी पहले की तुलना में अधिक केंद्रित हो गई है, और एस्ट्रोजन के कई प्रकार होते हैं. कई मामलों में वे फायदेमंद हो सकते हैं."
उन महिलाओं के लिए जो हल्के लक्षणों का अनुभव करतीं हैं या हार्मोन थैरेपी नहीं लेने का विकल्प चुनती हैं, ऐसे कई उपाय हैं जो कॉगनेटिव परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं.
एरोबिक्स एक्सरसाइज़, खेल या मानसिक एक्सरसाइज़, नींद का अच्छा रूटीन, शराब का सेवन कम करना और अच्छा खाना, ये सभी मेनोपॉज़ से उत्पन्न होने वाले लक्षणों को कम करने में मदद सकते हैं.
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