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कॉरपोरेट जगत में क्या ‘जेन ज़ी’ लीडरशिप रोल के लिए तैयार है?
- Author, पायल भुयन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कॉरपोरेट जगत में ‘जेन ज़ी' वर्कफ़ोर्स का हिस्सा बन रही है. मिलेनियल्स और जेन ज़ी से कुछ युवा तेज़ी से शीर्ष पदों पर पहुंच रहे हैं.
जो लोग 1980 के दशक की शुरुआत से 1990 के दशक के अंत के बीच पैदा हुए उन्हें मिलेनियल्स या जेनरेशन Y कहा जाता है. इनकी उम्र अभी 25 से 40 साल के बीच हैं वहीं इसके बाद की पीढ़ी जेनरेशन Z कही जाती है.
वहीं ऐसी चर्चा भी होती है कि बिना दशकों के अनुभव, क्या उनके पास ज़िम्मेदारियां संभालने की क्षमता है?
30 साल की निष्ठा योगेश ने चार साल पहले ‘हुनर ऑनलाइन कोर्सेस’ कंपनी की शुरुआत की थी. ये कंपनी महिलाओं को सफल उद्यमी बनने के लिए ऑनलाइन ट्रेनिंग देती है. निष्ठा 150 लोगों को लीड कर रही हैं.
पर 30 साल की निष्ठा योगेश में वो क्या चीज़ है, जो उनको बाक़ी लोगों से जुदा करती है. जवाब है- उनकी उम्र, जो ज़्यादातर सीईओ की उम्र से काफ़ी कम है.
निष्ठा आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "मैं 18 साल की उम्र से कॉर्पोरेट में काम कर रही हूं, जिसके बाद मैंने अपनी कंपनी की शुरुआत की. हर दिन कंपनी में लिया गया कोई भी नया फैसला मुझे मेरी लीडरशिप क्वॉलिटी के प्रति और ज्यादा आत्मविश्वास से भर देता है.’’
अमूमन ऐसा समझा जाता है कि कॉरपोरेट जगत में किसी टीम का नेतृत्व करने या फिर कंपनी चलाने के लिए आपको दशकों के तजुर्बे की ज़रूरत होती है.
हालांकि, आज की युवा पीढ़ी इस धारणा को चुनौती दे रही है. वो समय आ गया है जब 'मिलेनियल्स' और 'जेन ज़ी' शीर्ष पदों को संभाल रहे हैं, कई अपनी कंपनी खोल रहे हैं.
ये पीढ़ी अपने साथ नया दृष्टिकोण, काम करने का नया तरीका और नई मानसिकता ला रही है.
इस पीढ़ी के युवा लीडरशिप रोल अपने तरीके से चलाने के लिए तत्पर है लेकिन सवाल ये भी उठते हैं कि क्या वे तैयार हैं?
अनुभव की कमी
मैकेन्सी एंड कंपनी के जून 2023 के एक रिसर्च के मुताबिक़, पिछले साल नए नियुक्त किए गए एस एंड पी 500 सीईओ में से एक तिहाई 50 साल से कम उम्र के थे, जो 2018 के डेटा से दोगुना है.
एक अनुमान के मुताबिक़ औसतन एक सीईओ की उम्र 54 साल के आस-पास होती है. पर कई डेटा इस ओर इशारा करते हैं कि अब युवा शीर्ष पदों को संभालने के लिए आगे आ रहे हैं.
अर्नेस्ट एंड यंग ने 2021 में एक सर्वे किया था, जिसमें 45 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो अपना काम शुरू करने में ज़्यादा इच्छुक हैं.
लेकिन कई प्रबंधक विशेषज्ञों का मानना है कि कभी-कभी युवा होना एक प्रभावी लीडर बनने की राह में बाधा बन सकता है.
मसलन, किसी के लिए भी इतनी कम उम्र में ये समझ पाना ये मुश्किल होता है कि कंपनी कैसे चलाई जाती है, कंपनी चलाने के लिए फ़ंडिंग कैसे आती है या फिर पैसा कैसे कमाया जाए.
लेकिन पिछले 40 सालों से कॉर्पोरेट जगत में अलग-अलग क्षेत्र की कंपनियों में डायरेक्टर एचआर की भूमिका में रह चुके और अब पीपल ए2ज़ी कंपनी में निदेशक दीपक भरारा मानते हैं कि युवा पीढ़ी में बहुत क्षमताएं हैं, लेकिन कुछ चीज़ें हैं जिन पर उनको ध्यान देना चाहिए.
वो कहते हैं "ये पीढ़ी बहुत बेसब्र है. इन लोगों को तुरंत नतीजे चाहिए होते हैं. पर ज़िंदगी में ऐसा होता नहीं है. बहुत सारी चीज़ें होती हैं जिनमें वक्त लगता है, कई बार कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ता है जैसे कि टीम में कटौती, वित्त संकट के दौर में कैसे कंपनी को संभाले रखे, इन चीज़ों का अनुभव इनके पास अभी उतना नहीं है. ऐसे में धैर्य सबसे बड़ी पूंजी है’’
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इस पीढ़ी की जो सबसे अच्छी चीज़ है. वो है- ये तकनीक को बहुत अच्छी तरह समझते हैं. लेकिन इनमें पर्सनल टच ग़ायब है.
‘’हमें पता है कि हमें कितना नहीं पता है’’
एचआर एक्सपर्ट दीपक भरारा का मानना है, "हमारी पीढ़ी के लोग जब नौकरी पर जाते थे, तो वो उसे सर्विस की तरह देखते थे. पर आज की जेनरेशन खुद को एक उद्यमी की तरह देखती है.वो अपने काम की ज़िम्मेदारी लेते हैं. ये पीढ़ी टेक सेवी है. ये बहुत अच्छे से समझते हैं कि इन्हें लोगों से किस तरह बात करनी है, कैसे मिलना है, सोशल मीडिया का बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल करना है.’’
कई रिसर्च के मुताबिक़, युवा पीढ़ी में ‘टीम स्पिरिट’ की भावना प्रबल है. ये सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं. डायवर्सिटी एंड इन्क्लूशन इनका मंत्र है.
'जेन वाई' और 'जेन ज़ी' की ख़ूबियां क्या हैं, इस पर हुनर की सीईओ निष्ठा योगेश कहती हैं, "कॉर्पोरेट इंडिया के लीडरशिप स्टाइल और यंग इंडिया के लीडरशिप स्टाइल दोनों एक-दूसरे से अलग हैं.’’
"हमारा स्टाइल बहुत कैजुअल और दोस्ताना होता है. हम सच में जानने की कोशिश करते हैं कि जो दूसरी ओर की हमारी टीम है, जिससे हम काम करवाने की कोशिश कर रहे हैं उनका नज़रिया क्या है. उनके लिए क्या ज़रूरी है. जब आप ये बात ठीक से समझ जाएं कि सामने वाला क्या चाहता है और उसकी कैसे ग्रोथ हो सकती है तो कोई भी टीम का सदस्य आपके लिए अपना दिन-रात एक कर देगा. मैं कहूंगी कि एक युवा लीडर को ये पता है कि उसे कितना नहीं पता है.’’
निष्ठा कहती हैं कि युवा पीढ़ी के लीडरशिप का ये माइंडसेट है कि वो चीज़ों को समझना चाहते हैं, बजाए इस नज़रिए के कि ‘’मैंने कह दिया तो कह दिया’’.अंग्रेज़ी में इसे एंप्थेटिक लीडरशिप कहते हैं.
‘’मुझे हमेशा से पता था मुझे अपना काम शुरू करना है’’
युवा पीढ़ी की लीडरशिप इस बात को समझती है कि उनमें पारंपरिक नेतृत्व वाले गुण नहीं हैं, पर ख़ुद पर भरोसा और हिम्मत के बूते वो आगे बढ़ रहे हैं.
आज से 10 साल पहले 19 साल के त्रिशनीत अरोड़ा ने अपनी कंपनी 'टैक सिक्योरिटी' की स्थापना की थी.
आज अमेरिका के कैलिफोर्निया में रहने वाले और फ़ोर्ब्स अंडर 30 में शामिल हो चुके 29 साल के त्रिशनीत अरोड़ा, 100 लोगों का नेतृत्व कर रहे हैं.
वह बताते हैं, ’’बचपन से ही उन्हें इस बात का इल्म हो गया था कि उन्हें अपना काम शुरू करना है, और जब घर में पहली बार कंप्यूटर आया तब से टेकनोलोजी की दुनिया में रूची बढ़ने लगी.’’
"शुरूआत में लोगों को लगता था जो मैं कर रहा हूं वो सिर्फ़ शौक़ के लिए कर रहा हूं, अपना पेशा बनाने के लिए नहीं. मैं तब और बच्चे जैसा दिखता था. लेकिन जैसे-जैसे चीज़ें बदलती गईं, वैसे-वैसे वही लोग वापस आने लगे और बात करने लगे.’’
‘’ लेकिन फिर सालों की मेहनत के बाद जब हमारे साइबर सिक्योरिटी प्रोडक्ट ईएसओएफ़- को अमेरीकी सरकार के क्लाइंट्स ने खरीदना शुरू किया तो उसके बाद हमने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा’’
लीडरशिप ट्रेनिंग के सेक्टर में काम करने वाले जानकारों के मुताबिक, जो सबसे अच्छी बात इस युवा पीढ़ी में है वो ये कि ये तुरंत फ़ीडबैक और रिज़ल्ट के मॉडल पर भरोसा करते हैं. ये फ़ीडबैक को अहमियत देते हैं, जिसके बाद ये ख़ुद को मार्केट की ज़रूरत के हिसाब से बदलने की कोशिश करते हैं.
पिछली पीढ़ी से क्या सीख सकती है युवा पीढ़ी
दीपक भरारा के मुताबिक़ पुरानी पीढ़ी जिसे 'बेबी बूमर्स' या 'जेन वाई' कहा जाता है, उनकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि वो नई पीढ़ी के जोश को सही दिशा दें.
निष्ठा कहती हैं, जो चीज़ हमें अपने पिछली पीढ़ी से सीखनी चाहिए वो ये कि बड़ी कंपनियों, बड़ी टीमों को कैसे संभाला जाए, क्योंकि वहां आपके पास हर चीज़ में पर्सनल टच देना का समय नहीं होता है. हमें क्योंकि उतना तजुर्बा नहीं है इसलिए हमें ये चीज़ उनसे सीखनी चाहिए.
त्रिशनीत कहते हैं, ‘’हम से पहले वाली पीढ़ी में बहुत ठहराव था. जो मुझे लगता है कि हमारे जेनरेशन में उतना नहीं है. दूसरा, पहले रिलेशनशिप बनाने पर ज़ोर दिया जाता था. हमें वो चीज़ सीखने की ज़रूरत है. अभी हम लोगों की कभी मुलाकात भी नहीं हुई होती है और हम साथ में काम करना शुरू कर देते हैं.इसका नुकसान होता है. हमें पुरानी पीढ़ी से सीखना चाहिए की पर्सनल टच कैसे बनाए रखें’’
किस सेक्टर में हैं ज़्यादा युवा लीडर
जानकारों के मुताबिक आईटी सेक्टर,मार्केटिंग,सोशल मीडिया, मीडिया मैनेजमेंट्स, बैंकिंग सेक्टर ख़ासकर इंवेस्टमेंट बैंकिंग में ज़्यादा युवा लीडर्स देखने को मिलते हैं.
ये लोग चैलेंजिंग काम करना पसंद करते हैं. लेकिन वहीं इंफ़्रास्ट्रकचर, मैन्यूफ़ैक्चरिंग, पावर सेक्टर में युवा पीढ़ी शीर्ष पदों पर ज़्यादा नज़र नहीं आती है.
अंत में दीपक भरारा कहते हैं, "लीडर वही होता है जो काम कर के दिखाए. जिसे पता हो कि कब आगे से नेतृत्व करना है, कब बीच में खड़ा होना है, कब कोने पर जाना है और कब टीम को खुद करने के लिए छोड़ देना है. अगर आप अपनी टीम को प्रेरित करते हैं तो वह 200 प्रतिशत ज़्यादा बेहतर काम करते हैं.’’
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