पति की जगह अक्सर पत्नियां ही क्यों करती हैं करियर और नौकरी का त्याग

    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

नौ साल पहले स्मृति (बदला हुआ नाम) दिल्ली में एक बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग कंपनी में कंस्ट्रक्शन मैनेजर थीं.

वेतन अच्छा था और उन्हें अपना काम पसंद भी था. मगर शादी के एक साल के अंदर उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

वह बताती हैं, “पति गुड़गांव में वाहन बनाने वाली एक कंपनी में नौकरी करते थे. फिर उन्हें एक दूसरी कंपनी से नौकरी का ऑफ़र आया मगर इसके लिए उन्हें जयपुर जाना था. मैंने देखा कि वह इस प्रस्ताव से बहुत ख़ुश थे. ऐसे में मैंने तय किया कि मैं अपनी नौकरी छोड़कर उनके साथ जयपुर चली जाऊंगी."

स्मृति ने एक शीर्ष के संस्थान से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और फिर कड़ी मेहनत के बाद एक अच्छे पद पर पहुंची थीं. मगर जब पति के करियर और उनकी ख़ुशी की बात आई तो उन्होंने अपने करियर और अपनी ख़ुशी को पीछे छोड़ दिया.

भारत समेत दुनिया भर में यह देखने को मिलता है कि महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों से आगे रहती हैं मगर नौकरी और रोज़गार के मामले में अक्सर वे पिछड़ जाया करती हैं. और जब बात शादी के बाद किसी एक की नौकरी या व्यवसाय को चुनने को आती है तो अक्सर महिलाओं को ही त्याग करना पड़ता है.

ग्लोबल कंसल्टिंग कंपनी डेलॉइट की ‘विमेन एट वर्क 2023’ रिपोर्ट के लिए शोधकर्ताओं ने 10 देशों में 5000 महिलाओं के बीच सर्वे किया. इनमें 98 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों के साथ रिश्ते में थीं.

सर्वे में पाया गया कि इनमें से 40 प्रतिशत महिलाएं अपने पति या पुरुष साथी के करियर को तरजीह देती हैं.

आमदनी में अंतर

महिलाओं ने इसके लिए कई कारण बताए. कुछ कारण आर्थिक थे तो कुछ सामाजिक. इनमें घर की ज़िम्मेदारियां उठाना और परिजनों की देखभाल करना शामिल था. लेकिन इस सर्वे में सबसे बड़ा कारण उभरकर आया- पुरुष साथी का उनसे ज़्यादा पैसे कमाना.

यह बात हैरान नहीं करती क्योंकि कुछ शोध बताते हैं कि दुनिया भर में महिलाएं, पुरुषों द्वारा 1 रुपया कमाने के मुक़ाबले सिर्फ़ 77 पैसे कमाती हैं.

डेलॉइट में वैश्विक विविधता, समानता और समावेश देखने वालीं एमा कॉड कहती हैं, “स्वाभाविक है कि आमदनी में अंतर होगा तो मुश्किल दौर आने पर कम पैसे कमाने वाला ख़ुद पीछे हट जाएगा. फिर चाहे यह फ़ैसला सोच-समझकर लिया गया हो या फिर अनजाने में.”

न्यूयॉर्क सिटी के हंटर कॉलेज में सामाजिक विज्ञान की प्रोफ़ेसर पामेला स्टोन कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि महिलाएं दूरदर्शिता नहीं अपनाती या फिर वे उदार और प्रगतिशील नहीं हैं. मगर वे देखती हैं कि किसके पास बेहतर मौक़ा है. अगर आपको दांव खेलना हो तो आप अच्छी संभावनाओं को देखते हुए महिला के बजाय पुरुष के करियर पर दांव लगाएंगे. इसका कारण है- लिंग के आधार पर होने वाला भेदभाव.”

अगर महिलाओं की आय उनके पति की आय से बढ़ने लगे, तो भी गारंटी नहीं है कि उनके करियर को पति के करियर से ज़्यादा तरजीह मिलेगी.

डेलॉइट की रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों का ज़िक्र है जहां महिलाओं ने अपने पुरुष साथी से ज़्यादा कमाने के बावजूद अपने व्यवसाय को तवज्जो नहीं दी. 10 में से एक महिला अपने साथी से ज़्यादा कमाती थी लेकिन इनमें भी 20 फ़ीसदी पर अपने जीवनसाथी के करियर को तरजीह देने का दबाव था.

एमा कॉड कहती हैं, “ये आंकड़े हमारे लिए चौंकाने वाले थे. हो सकता है इसके पीछे सांस्कृतिक कारण हों.”

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के सरोजिनी नायडू सेंटर फ़ॉर विमेंस स्टडीज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर फ़िरदौस अज़मत सिद्दीक़ी का मानना है कि बाहर से तस्वीर भले ही बदली हुई सी नज़र आती है लेकिन लैंगिक समानता के मामले में महिलाएं अभी भी काफ़ी पीछे हैं.

वह कहती हैं, “भारत में आजकल माता-पिता बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने पर ज़ोर तो दे रहे हैं मगर इसका एक कारण शादी के लिए बेहतर संभावनाएं बनाना भी है. पहले लड़कियों के लिए सुंदर और घर के कामों में कुशल होने जैसे पैमाने थे मगर अब शिक्षा भी देखी जाती है. ऐसे में माता-पिता पर दबाव रहता है कि बेटी के लिए अच्छा दामाद चाहिए तो बेटी को उसके अनुरूप शिक्षित करना पड़ेगा.”

डॉक्टर सिद्दीक़ी बताती हैं कि लड़कियों से शुरू से ही यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे शादी के बाद पति को ज़्यादा तरजीह दें और समाज द्वारा गढ़े तथाकथित पारिवारिक मूल्यों के अनुरूप चलें. उनसे घर-परिवार और बच्चों की देखभाल को तरजीह देने की अपेक्षा की जाती है. ऐसे में शादी के बाद भी उन्हें अक्सर अपने करियर को लेकर समझौता करना पड़ता है.

पुरुषों की सोच

प्रोफ़ेसर पामेला स्टोन और उनके साथियों ने हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल से पढ़े अलग-अलग आयु वर्ग के 25 हज़ार से अधिक लोगों से बात की.

उन्होंने पाया कि ज़्यादातर महिलाएं इगैलिटेरीयन मैरिज यानी समतावादी विवाह की अपेक्षा रखती थीं जिसमें पति-पत्नी, दोनों के करियर को समान महत्व दिया जाता है. जबकि आधे से ज़्यादा पुरुषों का कहना था कि पत्नी के बजाय उनके करियर को ज़्यादा महत्व मिलना चाहिए.

पुरुषों से ब्रेड विनर यानी कमाऊ होने की उम्मीद रखी जाती है मगर इस शब्द का मतलब सिर्फ़ ज़्यादा पैसा कमाने वाले तक सीमित नहीं है. उनपर महिला साथी से ज़्यादा कमाने का दबाव भी रहता है.

ब्रिटेन के बाथ विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक़, पुरुषों की मानसिक सेहत पर इस बात का भी असर पड़ता है कि वे अपनी महिला साथी से अधिक पैसा कमा पा रहे हैं या नहीं.

प्यू रीसर्च सेंटर द्वारा 2023 में किए गए एक सर्वे में कहा गया कि भले ही कोई जोड़ा बराबर पैसे कमा रहा हो, बावजूद इसके वे लिंग आधारित पारंपरिक भूमिकाएं निभाने लगते हैं. जैसे कि पुरुष पैसा कमाने और मनोरंजक गतिविधियों में ज़्यादा समय बिताते हैं जबकि ज़्यादार महिलाएं घर के काम और बच्चों की देखभाल में व्यस्त रहती हैं.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. सिद्दीक़ी के मुताबिक़, अगर महिला शादी के बाद करियर को प्राथमिकता देती है तो एक अलग तरह का सामाजिक संकट पैदा होने लगता है.

वह कहती हैं, “महिलाओं को निशाने पर लेते हुए कहा जाने लगता है कि पश्चिमीकरण हो रहा है, परिवार टूट रहे हैं, तलाक बढ़ रहे हैं. जबकि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पुरुष बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं. वे चाहते हैं कि जब वे काम से लौटें तो पत्नी चाय लेकर तैयार रहे. जबकि कोई सुपरवुमन ही होगी जो लगातार दफ़्तर और घर, दोनों के काम संभाले.”

काम का दोहरा बोझ

महिलाएं भी कई बार ख़ुद अपने करियर को कम तवज्जो देती हैं. कई बार वे ऐसा जानबूझकर करती हैं ताकि रिश्ते में कलह उत्पन्न ना हो. कई बार अनजाने में ऐसा होता है क्योंकि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब उन्होंने अपने करियर को कमतर समझना शुरू कर दिया.

डेलॉइट की अधिकारी एमा कॉड कहती हैं कि लोग महिलाओं और पुरुषों के लिए समाज द्वारा गढ़े गए मानकों में उलझ जाते हैं और ऐसा अनजाने में भी हो हो सकता है.

डेलॉइट की रिपोर्ट के अनुसार, भले ही सर्वे में हिस्सा लेने वालीं 88 महिलाएं फ़ुल टाइम काम करती हैं मगर उनमें से क़रीब आधी को घरेलू कामकाज, जैसे कि साफ़-सफ़ाई और बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल जैसी ज़िम्मेदारियां भी उठानी पड़ती हैं. सिर्फ 10 फ़ीसदी ने कहा कि इन ज़िम्मेदारियों को उनके पुरुष साथी संभालते हैं.

डेलॉइट की अधिकारी एमा कॉड कहती हैं, “हम जानते हैं कि तरक्की के लिए सिर्फ़ दफ़्तर आना और अपना काम करना काफ़ी नहीं होता. इसके लिए आपको आगे बढ़ने के अवसर पकड़ने होते हैं. मगर जब आप नौकरी के बाद घर जाकर भी काम करते हैं, सप्ताहांत पर भी काम करता पड़ता है तो थकान और बर्नआउट (लंबे समय से बने भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक तनाव) के चलते आप आगे बढ़ने के अवसरों को यह कहते हुए छोड़ सकते हैं कि मेरे पास इसके लिए ऊर्जा नहीं बची है.”

अपना उदाहरण देते हुए डॉ. फ़िरदौस अज़मत सिद्दीक़ी कहती हैं कि वह और उनके पति कामकाजी हैं और वे दोनों घर का काम मिलकर करते हैं. लेकिन सभी घरों में ऐसा नहीं होता.

वह कहती हैं, “एकल परिवारों में महिला के करियर को भी तवज्जो मिलने की संभावना ज़्यादा होती है क्योंकि अक्सर पति-पत्नी मिलकर रास्ता निकाल लेते हैं. लेकिन जहां अन्य रिश्तेदारों की राय फैसलों को प्रभावित करती है, वहां लड़कियों को अपनी इच्छाओं और ख़्वाहिशों का दम घोंटना पड़ता है. जहां ऐसा नहीं होता, वहां आप उन्हें अच्छा प्रदर्शन करता देखेंगे.”

महिलाओं के करियर को प्राथमिकता न मिल पाने को दुखद बताते हुए डॉ. सिद्दीक़ी कहती हैं. “अफ़सोस, महिलाओं की जिस क्षमता का इस्तेमाल हम राष्ट्र निर्माण के लिए कर सकते थे, हमने उसकी दिशा ही मोड़ दी है.”

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