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कामसूत्र और खजुराहो के देश में सेक्स टैबू कैसे बन गया?
- Author, ऐना गेब्रियाला रोजस
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में वैलेंटाइन डे मनाने के मुद्दे को लेकर लगभग हर साल ही विवाद होता है. एक तरफ़ जो लोग सार्वजनिक स्थानों पर प्यार करने को ग़लत नहीं मानते वो अपनी प्रेमिका को गुलाब का फूल देते हैं और हाथों में हाथ डाल कर पार्कों या बज़ारों में घूमते नज़र आते हैं.
लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ कथित कट्टरपंथी हिंदू दल हैं जो मानते हैं कि सार्वजनिक स्थान पर प्यार करना अनैतिक है. वो 'गश्त' लगाते हैं और ऐसे प्रेमी जोड़ों को अपमानित करते हैं और उन्हें परेशान करते हैं.
ख़ुद को न्याय देने वाला मानने वाले ऐसे लोगों की उपस्थिति उन लोगों की सोच को एक तरह से आश्चर्यचकित कर देती है जो भारत को कामसूत्र को जन्म देने वाली और उत्तेजक मूर्तियां बनाने वाली भूमि मानते हैं.
'जीवन का एक लक्ष्य सुख प्राप्ति भी है'
धर्म पर शोध करने वाली जानी-मानी इतिहासकार मधु खन्ना ने बीबीसी को बताया, "भारत के बनने से संबंधित दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड लौकिक इच्छा से बनाया गया था और कामुकता को पवित्र माना गया था."
वो कहती हैं, "अपनी इंद्रियों को सुख देना इसका हिस्सा है और ये इंसान के जीवन और उसके श्रेष्ठतम बनने के उद्देश्यों में से एक है. कामुकता शर्म महसूस करने जैसी बात नहीं है, लेकिन इसके विपरीत भारतीयों के लिए इसकी जगह बहुत महत्वपूर्ण है- सेक्स के तौर पर नहीं बल्कि जीवन जीने की ख़ूबसूरती के तौर पर."
इस संदर्भ में देखें तो आप पाएंगे कि जिस प्रकार कामुकता को दिखाना भारतीय संस्कृति में संभव हो सका उतना पश्चिमी या किसी अन्य संस्कृतियों में नहीं हो सका.
आज भी महत्वपूर्ण है कामसूत्र
कामुकता के बारे में सबसे विस्तृत मानी जाने वाली किताब 'कामसूत्र' तीसरी सदी में लिखी गई थी और ये किताब प्राचीन भारत के बारे में बहुत कुछ कहती है.
'कामसूत्र' का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाले आदित्य नारायण हक्सर कहते हैं, "संस्कृत में काम का अर्थ सेक्स नहीं है बल्कि आनंद लेना है, अपनी इच्छा को पूरा करने का सुख लेना है."
यह किताब जीवन के प्रत्येक हिस्से में सुख की खोज करने के बारे में है. हक्सर सावधानी से इसे शब्दों में बांध कर कहते हैं, "ये खोज इंसानी जीवन के तीन मुख्य सिद्धांतों की खोज का एक हिस्सा भर है. इसके अलावा जीवन में परोपकार और सुख पाने के लिए धन-संपत्ति की खोज है."
कामसूत्र में कुल सात अध्याय हैं जिनमें से केवल एक अध्याय में यानी दूसरे अध्याय में सेक्स की बात की गई है. हक्सर बताते हैं, "इसमें चित्रों के आधार पर वर्णन किया गया है. इसमें सेक्स के दौरान कौन-कौन से पोज़ीशन बनाए जा सकते हैं उसके बारे में बताया गया है."
'द कामसूत्र फ़ॉर वीमेन' की लेखिका संध्या मूलचंदानी कहती हैं कि इस किताब में दिए गए कई चित्र अजीबोग़रीब हैं, लेकिन इस किताब में दिए कई सिद्धांत आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं."
वो कहती हैं, "कई मायनों में ये एक आधुनिक किताब है. उदाहरण के तौर पर इसमें महिला की इच्छा का सम्मान करने की बात की गई है और कहा गया है कि यौन संबंध में महिला की सहमति होनी चाहिए."
वो कहती हैं, "कामसूत्र एक मैगज़ीन की तरह है जो किशोरों को बताता है कि किसी डेट पर कैसे जाएं, अपना बर्ताव कैसा रखें. इसमें नहाने, नाखून काटने और साफ कपड़े पहनने के बारे में भी बताया गया है. साथ ही इसमें बताया गया है कि अपने साथी की बात कैसे सुनें और कैसे स्वार्थी की तरह व्यवहार ना करें."
मंदिरों की दीवारों पर हैं उत्तेजक मूर्तियां
मूलचंदानी का कहना है कि ये किताब बेहद परिपक्व और संवेदनशील समाज में ही लिखी जा सकती थी जहां, "जीवन के सभी हिस्सों का उत्सव मनाने की बात है."
कामुकता के बारे में भारत के इतिहास में जहां और बातें की गई हैं वो है खजुराहो के मंदिर. भारत के केंद्र में स्थित इस जगह पर लाल पत्थर पर तराशी गई मूर्तियां पर्यटकों को अपनी ओर अकर्षित करती रही हैं.
इनमें से कई मूर्तियों में सुडौल शरीर वाली देवियों को दिखाया गया है जो श्रृंगार करती या अपने पांव में चुभा कांटा निकाल रही हैं. लेकिन कुछ अन्य मूर्तियों में देवी या देवियों को कामुक मुद्राओं में दिखाया गया है.
हक्सर बताते हैं, "कुछ ही मंदिरों की दीवारों पर कामुकता से भरी मूर्तियां देखने को मिलती हैं. ये मूर्तियां सेक्स को कुछ उसी तरह दिखाती हैं जिस तरह कई अन्य संस्कृतियों में पुरुषों को युद्ध करते दिखाया गया है."
ब्रितानी हुकूमत और इस बाद हुए बदलाव
कई अन्य विशेषज्ञों की तरह जानकार मानते हैं कि लोगों की ये धारणा है कि 300 साल तक भारत में मुसलमानों का शासन रहा जिस दौरान भारत में कामुकता का दमन किया गया, लेकिन ये सही नहीं है.
इतिहासकार खन्ना बताते हैं, "मानते हैं कि मुग़ल शासक इतने आज़ाद ख़्याल नहीं थे, लेकिन उन्होंने भारत को श्रेष्ठ बनने दिया और कला के क्षेत्र में अपना योगदान दिया."
उनका धर्म इस्लाम था, लेकिन उन्होंने हिंदुओं के दैनिक काम के तरीके में कोई दखलअंदाज़ी नहीं की. मध्यकालीन इतिहास के जानकार और 'लव ऑफ़ सेम सेक्स इन इंडिया' के सह लेखक सलीम किदवई कहते हैं, "भारत में इस्लामी संस्कृति ने भी खुल कर सांस ली. मुगल काल के दौरान जो फ़ारसी शेरो-शायरी लिखी गई उसमें ईश्वर के अलावा समलैंगिक इच्छाओं की भी बात की गई है."
सलीम कहते हैं, "भारत में सेक्स को टैबू समझने का बदलाव एक जटिल प्रक्रिया है जिसे आसानी से समझा और समझाया नहीं जा सकता."
वो कहते हैं, "लेकिन काफ़ी मशक्कत के बाद हम कह सकते हैं कि 19वीं शताब्दी के मध्य में ये बदलना शुरू हुआ. इसमें ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ 1857 में हुए सैन्य विद्रोह को भी एक अहम घटना के रूप में देखा जा सकता है."
संस्कृति पर पुनर्चिंतन
इस विद्रोह का बर्बरतापूर्ण दमन कर दिया गया और भारत को ब्रितानी शासन में ले लिया गया जिसने यहां वह क़ानून लागू किए जो वहां के मूल्यों पर आधारित थे और ये मूल्य विक्टोरयन काल के थे.
ये नियम रानी विक्टोरिया के दौर में, यानी 1837 से 1901 में बनाए गए थे और उस दौर के लोगों के लिए थे. ये "शुद्धतावादी नैतिक मूल्यों" पर आधारित थे और इनमें परिवार की एक ख़ास रूपरेखा बनाई गई थी और साथ ही ये भी बताया गया था कि महिलाओं और पुरुषों को किस तरह का व्यवहार करना चाहिए.
इतिहासकार कहते हैं, "हार और ग़ुलामी को खुद पर बोझ मानने वाले भारतीय समाज के एक तबके ने अपनी संस्कृति को एक नई नज़र से देखना शुरू किया और उसमें बदलाव लाने की कोशिश की. कुछ ऐसे लोग जिनकी शिक्षा ब्रितानी तौर तरीकों से हुई थी उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला कि सेक्स करना ग़लत है."
मूलचंदानी कहती हैं, "औपनिवेशीकरण ने हमारी सोच को काफ़ी हद तक प्रभावित किया. सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि कहीं भी जब लोग तर्कसंगत बनने लगते हैं तो वो अपने रीति रिवाजों और मिथकों को सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं."
विदेशी नज़रिए के अलावा हिंदुत्व से जुड़ी भी कुछ ऐसी विचारधराएं हैं जहां सेक्स को बातचीत का विषय नहीं माना जाता. इनमें से एक वो विचारधारा है जो भारत की मौजूदा सरकार यानी भाजपा सरकार के नज़रिए की मार्गदर्शक के रूप में जानी जाती है. जिन जगहों पर इस पार्टी की सरकारें हैं वहां प्रेमी जोड़ो के उत्पीड़न के अधिक मामले देखे जा रहे हैं.
सलीम कहते हैं, "पारम्परिक तौर पर हिंदू धर्म आज़ाद ख़्याल है, लेकिन दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े कुछ दल हैं जो हर बात को अपने चश्मे से देखते हैं, कामुकता को भी."
मूलचंदानी का कहना है कि हालांकि सेक्सुएलिटी का उत्सव मनाना भारतीय संस्कृति का हिस्सा था, लेकिन इसे हमेशा निजी रखा गया था. वो कहती हैं, "कोई व्यक्ति सेक्स संबंधों पर अपने विचार रख सकता है लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की ज़रूरत नहीं है."
हालांकि कामुकता एक ऐसी चीज़ है जिसे छुपाया नहीं जा सकता. वो कहती हैं, "यह समाज और लोगों की प्रकृति है, भारत ने इसे हर पल व्यक्त किया जाता है, ये जीवन के जीवंत होने और रंग, स्वाद और खुश्बू से भरे होने जैसा है."
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