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अल्ज़ाइमरः क्या ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ में है इस रोग का इलाज
- Author, नेहा कश्यप
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
ये आपको सुनने में अजीब लगे लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि धीमी गति से और कंट्रोल तरीक़े से सांस लेने के जहाँ अपने फ़ायदे हैं, वहीं अल्ज़ाइमर की बीमारी से भी रक्षा करती है.
अल्ज़ाइमर वो बीमारी है, जिसमें व्यक्ति अपनी याद्दाश्त खोने लगता है. हालाँकि अल्ज़ाइमर होने का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता. इसका एक अहम कारण रोगी में एमिलॉयड बीटा प्रोटीन का पाया जाना है, जिसे प्लेक़्स भी कहा जाता है.
डॉक्टरों के अनुसार, इस बीमारी की वजह से मरीज़ ठीक से बात नहीं कर पाता क्योंकि उसे यह याद ही नहीं रहता कि वो किस भाषा में बात करता है. लेकिन इसके लक्षण धीरे धीरे शुरू होते हैं.
ऐसा ही कुछ हुआ रोहन (बदला हुआ नाम) की मां के साथ.
रोहन बताते हैं, “मेरी माँ अक्सर रात में नीद के बीच से उठने लगी थीं. वे थोड़ी देर टहलतीं और फिर सो जातीं. पहले हमें सब सामान्य लगा लेकिन दिन अचानक एक अजीब बात हुई.”
उन्होंने बताया, “उस दिन मेरी मां रात को उठीं और मुझे कहा कि मेरे कमरे में कोई आदमी लेटा हुआ है. वो कौन है? पुलिस को बुलाओ और उसे घर से निकालो. जबकि उनके बगल में मेरे पिता लेटे हुए थे. हमें उस दिन एहसास हुआ कि कुछ ग़लत है.”
रोहन के परिवार ने डॉक्टरी सलाह ली और जांच में पाया कि उनकी मां को शुरुआती स्टेज का अल्ज़ाइमर रोग है.
क्या कहते हैं एम्स के डॉक्टर?
ऋषिकेश स्थित एम्स में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ अरविंद माधव इस बीमारी के बारे में बताते हैं, “मस्तिष्क में एक हिस्सा होता है जो याद्दाश्त को सहेजकर रखता है लेकिन अल्ज़ाइमर जब होने लगता है तो इस हिस्से में न्यूरॉन्स नष्ट होने लगते हैं और व्यक्ति चीज़ें भूलने लगता है."
"जहां कई मरीज़ों में ये बहुत तेज़ी से होता है तो कुछ में ये धीरे-धीरे होता है. ऐसे में लोग छोटी से छोटी चीज़ भूलने लगते हैं, जैसे- सामान रखकर भूल जाना आदि. डॉक्टर इसे फ़ास्ट एजिंग भी कहते हैं.”
वे कहते हैं, “अल्ज़ाइमर का कोई इलाज नहीं है. जो दवाएं दी जाती हैं, वह केवल इस बीमारी को स्लो कर देती हैं और मरीज़ को अगली स्टेज तक टाइम मिल जाता है."
"लेकिन कई बार मरीज़ पर इन दवाओं के साइड इफेक्ट भी नज़र आते हैं. जैसे हैलोसिनेशन या असामान्य रूप से कन्फ़्यूज़ होना.”
श्वसन प्रक्रिया का असर
हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि अगर धीरे-धीरे सांस लें तो यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है. एशिया के कई देशों में ऐसा लंबे समय से अभ्यास किया जाता रहा है.
भारत में अनुलोम विलोम जैसे प्राणायाम के रूप में यह योगाभ्यास का एक प्राचीन हिस्सा है.
हालांकि शोध में सांस लेने के विभिन्न तरीक़े की तुलना नहीं की गई है लिहाजा वो इस पर बात नहीं करते कि किस तरह से सांस लेने से आपको सबसे अधिक फ़ायदा होगा.
हालांकि वो एक तरीक़ा ज़रूर सुझाते हैं. वे कहते हैं, “धीरे धीरे सांस लेने की प्रक्रिया में आपकी छाती फूलती है, आप पांच तक की गिनती करें फिर पांच गिनने के क्रम में धीमी गति से सांस को छोड़े. 10 सेकेंड की इस प्रक्रिया में आपको फौरन ही सुकून मिलता है.”
“अगर आप ऐसा दिन के 20 मिनट और हफ़्ते में कम से कम पांच दिन करें तो शोध के मुताबिक़ आपको इससे आपको सुकून, शांति और तनाव से मुक्ति भी मिलती है. हाल के एक शोध के अनुसार यह कई बीमारियों के प्रतिरोधक के रूप में भी काम करता है, यहां तक कि यह अल्ज़ाइमर में भी कारगर है. ”
शोध ने बताया कि इस प्रक्रिया को अपनाने से हाई ब्लड प्रेशर, तनाव और पुराने दर्द जैसे रोगों में सुधार देखा गया है.
शोध में क्या निकला?
एक नए रिसर्च में शोधकर्ताओं ने अल्ज़ाइमर होने के सबसे बड़े ख़तरे बायोमार्कर की ब्लड प्लाज़्मा में माप की.
इस शोध की लेखिका यूनिवर्सिटी ऑफ़ सदर्न कैलिफ़ोर्निया में मनोविज्ञान और बॉयोमेडिकल इंजीनियरिंग की प्रोफ़ेसर मारा मेथर हैं.
उनके मुताबिक़ जिन 108 लोगों पर ये शोध किया गया उनमें से आधे लोगों के समूह को ऐसी जगहों पर जाने को कहा गया जहां उन्हें शांति मिले, जैसे- उन्हें गाना सुनने या आंख बंद करने या ध्यान लगाने को कहा गया.
इसका मकसद उनकी हद्य गति को तेज़ धड़कने से कम करना और उसे नियमित करना था.
वहीं दूसरे समूह को लोगों को कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने बिठाया गया.
उनके सामने स्क्रीन पर एक फूल पांच सेकेंड के अंतराल पर आता था. फूल स्क्रीन पर दिखने पर उन्हें पांच सेकेंड के लिए सांस लेना था और उसके स्क्रीन से ग़ायब होने पर सांस छोड़ना था. इस तरह से गहरी और धीमी सांस लेने से उनके हद्य गति में बढ़ोतरी देखी गई.
दोनों समूहों को यह प्रक्रिया पांच हफ़्तों तक 20 से 40 मिनट तक करने को कहा गया.
प्रोफ़ेसर मारा मेथर कहती हैं कि इन दोनों समूहों के लोगों की पांच हफ़्ते बाद जब ब्लड सैंपल चेक की गई तो नतीजे चौंकाने वाले थे.
वे बताती हैं कि अल्ज़ाइमर के किसी एक कारण के बारे में तो पता नहीं चल पाया लेकिन इस बीमारी के होने का एक मुख्य कारण एमिलॉयड बीटा प्रोटीन के समूहों या प्लेक़्स को बताया.
जब मस्तिष्क में ये गुच्छे के रूप में बन जाते हैं तो ये प्रोटीन ज़हरीले बन जाते हैं और इससे इसके सामान्य काम करने पर असर पड़ता है.
प्रोफ़ेसर मारा मेथर कहती हैं कि ये प्रोटीन ख़ासतौर पर तब खतरनाक हो जाता है, जब वो एक साथ मस्तिष्क न्यूरॉन्स के अंदर चिपक जाता है. जिससे कोशिकाओं को नुकसान होता है. ये दिमाग के सामान्य काम को प्रभावित करता है. जिससे व्यक्ति धीरे-धीरे चीजें भूलने लगता है. ये ब्रेन डेड होने की वजह भी बन सकता है.
मारा और उनकी टीम के अनुसार एक स्वस्थ युवा में एमीलॉयड बीटा का स्तर कम है तो उससे अल्ज़ाइमर बीमारी होने का ख़तरा भी कम होता है.
गहरी नींद का फ़ायदा
शोधकर्ता निश्चित नहीं हैं कि वास्तव में ऐसा क्यों होता है. लेकिन एक परिकल्पना यह है कि धीमी, स्थिर सांस लेने से गहरी नींद के कुछ फायदे मिल सकते हैं. शोध में पाया गया है कि इससे ब्रेन और नर्व सिस्टम से न्यूरोटॉक्सिक वेस्ट को तेज़ी से साफ किया जा सकता है. जिनका निर्माण अल्ज़ाइमर के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है.
हर तरह की शारीरिक और मानसिक एक्सरसाइज, हार्टबीट को प्रभावित करती है. शोध से ये संकेत मिला कि दिल की धड़कन में बदलाव नर्व सिस्टम के कामकाज को नापने के लिए एक अच्छा मीट्रिक है. और इसलिए डिप्रेशन या क्रोनिक स्ट्रेस से लेकर वायरल इन्फेक्शन तक कई तरह की हेल्थ कंडीशन का एक इंडीकेटर है.
कितना ‘ब्रीदवर्क’ फायदेमंद?
मारा मेथर के अनुसार हैं कि सटीक बॉडी-ब्रेन मेकेनिज्म के बावजूद, धीमी गति से सांस लेने का नियमित अभ्यास ज्यादातर लोगों को फायदा पहुंचा सकता है.
“अभी हम नहीं जानते कि सांस का कितना अभ्यास करना उचित है, लेकिन संभवतः इसे हर रोज़ नहीं करना चाहिए. मेरा अनुमान है कि हफ़्ते में 4 या 5 दिन 20 मिनट करने से लाभ होगा.”
लेकिन क्या ब्रीदिंग एक्सरसाइज वाकई लंबे समय तक असरदार हैं, जानने के लिए बड़ी संख्या में अल्ज़ाइमर प्रभावित लोगों पर इसे दोहराया जाना बाकी है.
कई वैज्ञानिकों ने मेडिकल ट्रीटमेंट की तुलना में सांस लेने की इस तकनीक के फ़ायदेमंद होने पर संदेह जताया है.
क्या सांस के व्यायाम हैं मददगार?
एम्स ऋषिकेश के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर अरविंद माधव अल्ज़ाइमर के ट्रीटमेंट की इस नई थ्योरी को सामान्य स्तर पर देखते हैं.
उनके मुताबिक, सांस के व्यायाम से माइग्रेन जैसी परेशानियों से निपटा जा सकता है लेकिन अल्ज़ाइमर में ये सीधे तौर पर मददगार नहीं है.
हालांकि वे कहते हैं कि मेडिटेशन, व्यायाम और बेहतर लाइफ़स्टाइल पूरे शरीर पर पॉजिटिव प्रभाव डालती है और हर बीमारी को दूर रखा जा सकता है.
वे कहते हैं, "ज़रूरी नहीं कि भूलने की हर समस्या का कारण अल्ज़ाइमर या डिमेन्शिया ही हो. अक्सर याददाश्त कम होने का कारण अवसाद, स्ट्रोक, माइग्रेन, विटामिन की कमी, थायरॉयड, रक्तचाप आदि की समस्या होती है. वर्तमान में अल्ज़ाइमर का जड़ से इलाज भले संभव नहीं लेकिन इससे मिलती जुलती बीमारियों का इलाज बिल्कुल संभव है. इसीलिए अगर किसी को याददाश्त में समस्या आ रही हो तो डिमेंशिया समझ कर बहुत डरने या हताश निराश होने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि एक न्यूरो फ़िज़िशियन से मिलकर सलाह लेना ज़्यादा ज़रूरी है."
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