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तलाक़ पर क्या अब महिलाएं खुलकर कर रही हैं बात?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में शादी को उम्र भर के बंधन की तरह देखा जाता है.
शादी में हिंसा और उत्पीड़न की वजह से दरार पड़ने लगती है तो लड़कियों को परंपरा के नाम पर बर्दाशत करने की सलाह दी जाती है.
मुश्किल शादियों में फंसी महिलाओं से अक्सर ये कहा जाता है कि अलग हुए तो समाज क्या कहेगा.
इसी दवाब के कारण उन्हें एक असहनीय रिश्ते की गिरफ़्त में क़ैद करने की कोशिश होती है.
और अगर कोई महिला बंधन की डोर को तोड़कर तलाक़ लेने का फ़ैसला लेती है तो समाज उसे ही ग़लत
ठहराने का प्रयास करता है.
लेकिन हाल के वर्षों में ये देखा गया है कि न केवल ये महिलाएं तलाक ले रही है बल्कि खुलकर सोशल मीडिया पर अपनी ख़ुशी का इज़हार भी कर रही हैं.
भारत में तालक़ की दर
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक अभिनेत्री और फ़ैशन डिज़ाइनर का पोस्ट काफ़ी वायरल हुआ.
उन्होंने तलाकशुदा महिलाओं के लिए एक संदेश लिखा है.
वे लिखती हैं, "एक ख़राब शादी से निकलना ठीक है क्योंकि ख़ुश रहना आपका हक़ है. और कभी भी कम पर समझौता मत करिए. अपने जीवन के फ़ैसले लें. अपने और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए ज़रूरी बदलाव करें.''
वर्ल्ड ऑफ़ स्टेटिस्टिक के अनुसार यूरोप और अमेरिका की तुलना में एशियाई देशों में रिश्ते कम टूटते हैं.
भारत में जहां एक प्रतिशत तलाक़ के मामले हैं वहीं वियतनाम दूसरे नंबर पर है जहां केवल 7 प्रतिशत शादियां टूटती हैं.
हाल के वर्षों में जिस तरह से महिलाओं ने तलाक़ के बारे में खुल कर बात करना शुरू किया है, क्या ये कहा जा सकता है कि अब तलाक़ के बारे में धारणा बदल रही है?
तलाक़ को पहले सामान्य किया जाए
'रोडमेप टू मैनेजिंग डिवोर्स' नाम की किताब लिख चुकी डॉ सुचित्रा दालवी 'कॉशियस अनकपलिंग कोच' भी हैं.
वे महिलाओं की भावनात्मक तौर पर मदद करने के साथ-साथ उनके भविष्य को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं.
डॉ सुचित्रा दालवी कहती हैं कि कुछ महिलाएं जिनके पास विशेषाधिकार,सुविधाए हैं जैसे ये अभिनेत्री वो इस तरह से सेलीब्रेट करके बताती हैं कि शादी एक समस्या है तो उसका समाधान तलाक़ है.
लेकिन किसी भी टैबू को सामान्य करने के बाद ही उसे हटाया या ख़त्म किया जा सकता है.
वे तीस साल तक शादीशुदा जिंदगी में रहीं और दो साल पहले उन्होंने तलाक़ लिया है.
डॉ सुचित्रा देलवी कहती हैं, ''जब छुआछुत या दहेजप्रथा जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी शुरू हुई तो लोग जागरुक हुए लेकिन इसे धीरे-धीरे ही सामान्य किया जा सकता है. ये टैबू नहीं रहा ये कहना मुश्किल है.''
युवाओं में ख़त्म होता 'कलंक'
वकील वंदना शाह तलाक के मामले लड़ती हैं.
वे मुंबई में रहती हैं और फ़ोन पर हंसते हुए कहती हैं कि साल 2011 में जब उनका तलाक़ हुआ था तो उन्होंने पार्टी की थी.
इस पार्टी में आए मेहमानों को उन्होंने अपने तलाक़ की याचिका बोनफ़ायर में जलाने के लिए दी थी.
वंदना 'द एक्स फ़ाइल्स: द स्टोरी ऑफ़ माई डिवोर्स' लिख चुकी हैं. वे कहती है कि हमें तलाक़ को सामान्य बनाने की ज़रुरत है.
उनके अनुसार, ''पिछले 15 सालों में, मैं ये बदलाव देख रही हूं कि अब लड़कियां अपने दोस्तों के साथ तलाक़ के बारे में चर्चा करती हैं. युवा वर्ग के लोगों में तलाक़ को लेकर स्टिग्मा ख़त्म हो रहा है.''
एक ख़राब शादी के अनुभव से गुज़र चुकी वंदना शाह कहती हैं, ''लड़कियां दोस्तों से सहयोग मिलने के बाद अपने अभिभावकों के पास आती हैं और फिर उनसे अपनी बात शेयर करती हैं. इससे उन्हें अपने फ़ैसले को लेकर माता-पिता को मनाने में आसानी होती है.''
जानकारों के मुताबिक़ ये एक तरह का सामाजिक और सांस्कृति बदलाव समाज में देखा जा रहा है यानी आपके दोस्तों का समूह ये कह रहा आगे बढ़ो.
लेकिन अभिभावक अब भी कहते हैं कि थोड़ा एडजस्ट कर लो.अभिभावकों को लगता है कि तलाक़ के बाद लड़कियों के भविष्य ख़राब हो जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट का तलाक़ पर अहम फ़ैसला
वंदना कहती हैं कि उनकी तलाक़ को इतने साल हो गए लेकिन अभी भी इसे लेकर एक स्टिग्मा नज़र आता है.
उनके अनुसार, ''जब फैमिली कोर्ट में मेरा केस चल रहा था तो तलाक़ के 15-20 मामले आते थे. लेकिन अब एक दिन में 70-80 मामले आते हैं. वहीं ये भी देखा जा रहा है कि कोर्ट के फ़ैसले बहुत ही प्रगतिशील आ रहे हैं.''
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ के एक मामले में अहम फ़ैसला सुनाया है. इसके तहत अब जोड़ों को छह महीने का इंतजार नहीं करना होगा.
पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सर्वोच्च अदालत विवाह को तुरंत भंग कर सकती है.
लेकिन यह तभी संभव है जब अदालत इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो जाए कि शादी अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुकी है.
यानी पति-पत्नी के बीच सुलह की सारी संभावनाएं ख़त्म हो चुकी हैं और उनके बीच रिश्तों को दोबारा शुरू करने की कोई गुंजाइश नहीं है.
समाज में बदलाव
हाल ही अपने पति से अलग हुई रोशनी भावनात्मक रूप से टूट चुकी हैं.
दिल्ली की रहने वाली रोशनी की 2016 में शादी हुई थी.
वे बताती हैं कि दो सालों में उन्होंने भावनात्मक, आर्थिक और शारीरिक प्रताड़ना को सहा और फिर जब वे गर्भवती हुई तो मायके लौट आईं और उसके बाद कभी ससुराल नहीं लौटी.
वो कहती हैं, "मैंने शादी के दो साल तक अपने माता-पिता को कभी अपनी परेशानियों के बारे में नहीं बताया. मेरे मायके लौटने पर वो मुझे फ़ोन पर मुझे गालियां देते थे. फिर उन्होंने मेरे माता-पिता और रिश्तेदारों तक को नहीं छोड़ा.इसके बाद मैंने अपने माता-पिता से खुलकर इन प्रताड़नाओं के बारे में बताया.''
रोशनी बताता हैं कि इसके उनके पति ने उनका नाम एक वेबसाइट पर डाल दिया. जिसके बाद उन्हें गंदे कॉल्स आने लगे.
उसके बाद रोशनी ने पुलिस केस दर्ज कराया और फिर तलाक़ के लिए अर्ज़ी डाली.
रोशनी एक विज्ञापन और मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करती हैं और फिलहाल अपने बच्चे पर ध्यान देना चाहती हैं.
उनका कहना है वे तनाव से जुझ रही हैं और दोबारा रिश्ते में नहीं जाना चाहतीं.
जानकारों का कहना है कि बचपन से ही लड़कियों को घर की ज़िम्मेदारी, परिवार का ख़्याल आदि के बारे में बताया जाता है. लेकिन अगर इसी रिश्ते में किसी प्रकार के दुर्व्यवहार से कैसे निपटने के तरीके पर बात नहीं होती.
वही शादीशुदा ज़िंदगी में तलाक़ शब्द के इस्तेमाल से ही गुरेज़ किया जाता है. ऐसे में अगर लड़की एक कदम इस दिशा में आगे भी बढ़ाती है तो उसे वहीं रोक दिया जाता है.
चेन्नई की रहने वाली शास्वति सिवा का साल 2019 में तलाक़ हुआ था और उन्होंने इसी के बाद तलाकशुदा लोगों की मदद के लिए एक ग्रुप भी बनाया.
इस ग्रुप में लोग एक दूसरे की बातें सुनकर या कोई पेशेवर की जानकारी देकर मदद करते हैं.
वे कहती हैं, ''मुझे अपने परिवार का पूरा सपोर्ट मिला और मैंने तलाक़ को सेलीब्रेट भी किया लेकिन लोगों को ऐसा सहयोग नहीं मिल पाता और कई तलाक़ ले भी नहीं पाती और ऐसे रिश्तों में रहने को मज़बूर हो जाती हैं.''
जानकार मानते हैं कि तलाक़ को लेकर सोच में बदलाव आ रहा है लेकिन वो धीमा है.
लेकिन तलाक़ को लेकर शर्म करने की ज़रूरत नहीं है. महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता आ रही है ऐसे में तलाक़ को लेकर भी स्वीकृति आने लगेगी.