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बिहार में शेरशाहबादी मुस्लिम लड़कियों की शादी में ऐसी मुश्किलें अब भी क्यों
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, सुपौल और कटिहार से बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के सुपौल की शमा जब कभी शादी के गीतों को सुनती हैं, तो मायूस हो जाती हैं.
27 साल की शमा की मायूसी का कारण उनकी शादी न होना है, लेकिन ये फ़ैसला उनका लिया हुआ नहीं है बल्कि अविवाहित रहना उनकी मजबूरी है.
शमा की बहन सकीना ख़ातून भी अविवाहित हैं. उनकी उम्र 26 साल है.
लेकिन ये कहानी केवल शमा और सकीना की नहीं है बल्कि सुपौल प्रखंड की कोचगामा पंचायत के वॉर्ड 10 में क़रीब 15 ऐसी युवा लड़कियाँ हैं जो अविवाहित रहने को मजबूर हैं.
ये महिलाएं शेरशाहबादी समुदाय से आती हैं, जहां लड़कियों की शादी के लिए पैग़ाम या अगुआ का इंतज़ार किया जाता है.
इन लड़कियों के लिए कोई अगुआ नहीं आए हैं. अगुआ वो लोग होते हैं, जो शादी के लिए दो परिवारों के बीच मध्यस्थता करते हैं.
वॉर्ड सदस्य अब्दुल माली बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "हमारे यहां आम तौर पर 15 से 20 साल की उम्र तक लड़कियों की शादी हो जाती है. अगर वे 25 साल की उम्र पार कर जाती हैं तो उन्हें 'बूढ़ी' समझ लिया जाता है. ऐसे में उनकी शादी होनी मुश्किल हो जाती है.''
वो कहते हैं, "साथ ही हमारे समाज में लड़की की शादी के लिए लड़के वालों की तरफ़ से पैग़ाम या अगुआ का इंतज़ार किया जाता है. लड़की वाले रिश्ता लेकर नहीं जाते. अगर वो ऐसा करेंगे तो माना जाएगा, लड़की में कोई दोष है."
अविवाहित रहने का दर्द झेलती इन महिलाओं में 27 साल की शमा से लेकर 76 साल की जमीला ख़ातून तक हैं.
सुपौल में जन्मी जमीला ख़ातून ने भी सपना देखा था कि उनकी बारात आएगी और उनका निकाह होगा, लेकिन ये सपना अधूरा रह गया. जमीला अपनी 57 साल की बहन शमसुन के साथ रहती हैं.
दोनों ही बहने अविवाहित हैं और पांच बकरियों से अपना जीवन यापन कर रही हैं.
लेकिन इतने लंबे समय तक शादी न करने का कारण पूछने पर दोनों कहती हैं, "क्या करें परिवार के पास शादी का कोई पैग़ाम ही नहीं लाया."
शमसुन बीबीसी से कहती हैं, "मेरे सीने में कितना दर्द छिपा है वो किससे बयान करें, क्या बताएं.''
लेकिन दोनों बहनों की शादी क्यों नहीं हो पाई? इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं कि शादी नहीं हो पाने की वजह है, उनका शेरशाहबादी मुसलमान होना.
शेरशाहबादी मुसलमान की पहचान
बिहार में रहने वाली शेरशाहबादी आबादी अति पिछड़ा वर्ग में आती है. ये बिहार के सुपौल, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया ज़िलों में ज़्यादा संख्या में है.
इनमें ये परंपरा है कि लड़कियों की शादी के लिए लड़के वालों की तरफ़ से ही पैग़ाम या अगुआ (शादी का मध्यस्थ) जाता है.
इस परंपरा का पालन इतनी मज़बूती से किया जाता है कि अगर किसी लड़की के लिए शादी का पैग़ाम नहीं आए तो वो अविवाहित रह जाती है.
यही वजह है कि बिहार में जहां कहीं भी शेरशाहबादी हैं, वहां आपको ऐसी ही अविवाहित महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी.
शेरशाहबादी मुस्लिम आबादी बहुल कोचगामा पंचायत के मुखिया पति नुरुल होदा बताते हैं, "हम लोगों ने कुछ साल पहले ऐसी अविवाहित महिलाओं की लिस्ट बनाई थी. तब इनकी संख्या 250 थी, अब तो ये और बढ़ गई होगी."
शेरशाह सूरी से संबंध का दावा
ठेठी बंगाली (उर्दू और बंगाली का मिश्रण) बोलने वाले शेरशाहबादी ख़ुद को बादशाह शेरशाह सूरी से जोड़ते हैं.
इन लोगों का दावा है कि यह लोग शेरशाह की सेना में सैनिकों के तौर पर शामिल हुए थे. शेरशाह, सूरी वंश के संस्थापक थे और उन्होंने मुग़ल बादशाह हुमांयू को पराजित कर अपनी सल्तनत स्थापित की थी.
ऑल बिहार शेरशाहबादी एसोसिएशन के अध्यक्ष सैय्यदुर्रहमान रहमान बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "इन लोगों को शेरशाह ने आबाद किया था. मज़बूत क़दकाठी, मेहनती और नदी किनारे बसने वाले ये लोग बिहार के अलावा बंगाल, झारखंड और नेपाल की सीमा पर बसते हैं.''
''बिहार में इनकी आबादी तक़रीबन 40 लाख है और सीमांचल की 20 विधानसभा सीटों पर गेम चेंजर हैं. बिहार में ये लोग शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर बहुत पिछड़े हुए हैं."
बच्चियों में शादी ना होने का डर
सुपौल की कोचगामा पंचायत से तक़रीबन 200 किलोमीटर दूर कटिहार के कोढ़ा प्रखंड की खैरिया पंचायत में भी शेरशाहबादियों की आबादी रहती है.
धीमनगर गांव में हाथ में बच्चा थामे रेफ़ुल ख़ातून कहती हैं, "मैं एक शेरशाहबादी महिला हैं और मेरी शादी के लिए पिता ने अगुआ को दस हज़ार रुपये दिए थे.'' रेफ़ुल के पति बंगाल में मज़दूरी करते हैं.
वो बताती हैं, "हमारे यहां यही रूल (नियम) है. लड़के वाले के यहां से ही अगुआ आएगा. बिना उसके शादी नहीं होगी. लड़की घर बैठी रह जाएगी. यहीं हमारे गांव में कई लड़कियां बिन ब्याही बैठी हैं."
"शादी होने या ना होने' का ये डर इतना ज़्यादा है कि 14 साल की बच्चियों को भी शादी नहीं होने का डर घेरे रहता है."
पैसे और तालीम से अलग लड़की का रंग अहम
आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े समाज से आने वाले इस समुदाय में औरतों की पढ़ाई ज़्यादातर पांचवी कक्षा तक ही होती है.
औरतों को घर से बाहर निकलने की आज़ादी नहीं होती और पुरूष भी मज़दूरी के पेशे या फिर दर्ज़ी का काम करने के लिए सूरत, जयपुर, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में चले जाते हैं.
शादी के लिए पैग़ाम के अलावा जो चीज़ सबसे ज़्यादा इस समाज में मायने रखती है वो है लड़की का शारीरिक रंग.
शहनाज़ बेगम अपने 12 भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं. उनकी दो छोटी बहनों की शादी हो चुकी है लेकिन वो अविवाहित हैं.
शहनाज़ कहती हैं, "मेरी बहनें गोरी थीं इसलिए उनकी शादी हो गई. मैं काली हूँ तो मुझसे शादी कौन करेगा?
मेरे इस सवाल पर शहनाज़ के बग़ल में बैठी पांचवीं पास मरजाना ख़ातून थोड़ा चिढ़ कर कहती हैं, "हम दुनिया देख रहे हैं. यहां काले लोगों की शादी नहीं होती. हमें भी बचपन से मालूम था कि हम ग़रीब और काले दोनों हैं. शादी होनी मुश्किल है."
पेशे से प्राइवेट टीचर अबू हिलाल शेरशाहबादी समुदाय के अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "80 के दशक में कोचगामा में बिहार भर के शेरशाहबादी की मीटिंग हुई थी. इसमें तय हुआ था कि लड़की वाले भी लड़के वालों के यहां रिश्ता लेकर जाएगें, लेकिन कुछ बदलाव नहीं हुआ."
"अब तो लड़की का रंग बहुत ज़रूरी होता जा रहा है. लड़की का पिता 'ख़ुफ़िया तरीक़े से' (बिना समाज को ज़ाहिर किए) दहेज भी दे दे, लेकिन लड़की का रंग साफ़ नहीं है तो शादी मुश्किल है."
कोचगामा पंचायत के वार्ड सदस्य अब्दुल माली इसका उदाहरण हैं.
वो कहते हैं, "मेरी बच्ची पढ़ी लिखी है. उसकी शादी में रुपये ख़र्च करना मुश्किल नहीं है, लेकिन बहुत पैरवी के बावजूद बड़ी बेटी की शादी नहीं हो पाई. मेरी छोटी बेटी गोरी है उसकी शादी में कोई दिक़्क़त नहीं आएगी."
इलाक़े के ही फ़रहान कहते हैं, "काला लड़का भी गोरी लड़की खोजता है. वो भी अपना भविष्य देखता है. बाल बच्चा गोरा होना चाहिए."
बेमेल शादियां
यहाँ बेमेल शादियां भी आम हैं और इन बेमेल शादियों के लिए भी लड़की वाले पैग़ाम या अगुआ का इंतज़ार करते हैं.
11 बच्चों की मां आरफ़ा ख़ातून की बड़ी बेटी की शादी नहीं हो सकी तो उन्होने अपनी छोटी बेटी रुख़साना की शादी 50 साल के रेयाज़ुल्लाह से कर दी.
रुख़साना 18 साल की हैं और उनके शौहर रेयाज़ुल्लाह के पहले से ही पांच बच्चे हैं. उनके सबसे बड़े बच्चे की उम्र ही 23 साल है.
आरफ़ा रोते हुए कहती हैं, "क्या करें, जैसा रिश्ता आता है, उसी में लड़कियों को निपटाते जाना है."
बिन ब्याही महिलाएं ख़र्च कैसे चलाती हैं?
शेरशाहबादी समाज में औरतों को घर से बाहर निकलकर काम करने की इजाज़त भी मुश्किल है. ऐसे में सवाल उठता है कि ये बिन ब्याही महिलाएं क्या करती हैं और उनका ख़र्चा कैसे चलता है?
आर्थिक तौर पर ये महिलाएं अपने माता-पिता या भाई पर निर्भर रहती हैं.
संपत्ति में उनका कुछ हिस्सा और गांव वालों की अनाज के तौर पर की गई सामूहिक मदद के सहारे ही वो अपना जीवन जीती हैं.
शादी ना होने का ट्रॉमा झेलती इन महिलाओं को अपने ही परिवार के उन सदस्यों का तंज़ सुनना पड़ता है जिनकी शादियां हो गईं हैं.
अपनी शादी को लेकर नाउम्मीद हो चुकी तस्करा ख़ातून कहती हैं, "मेरे भाई के छह बच्चे हैं. मैं भाई-भाभी के ताने-गाली सहकर भी बच्चों को और पूरा घर संभालती हूं."
छोटे-छोटे बदलाव
इस समाज की परेशानियां अपनी जगह हैं, लेकिन बीते कुछ सालों में इन्हीं के बीच कुछ-कुछ बदलाव भी देखे जा सकते हैं.
कुछ महिलाओं ने आंगनबाड़ी केंद्रों और सरकारी स्कूलों में मिड डे मील बनाने का काम शुरू किया है.
45 साल की हमीदा ख़ातून मिड डे मील बनाती हैं. शादी के बारे में बात करने पर हमीदा कहती हैं, "1500 रुपये कमाने लगे तो भाई से अलग झोपड़ी बना ली. अगर कोई बिना दहेज शादी करेगा तो मैं शादी के लिए तैयार हूं."
मुसलमानों की दूसरी जातियों में भी अब शादी होने लगी है. इसके अलावा बिहार से बाहर निकलकर अब उत्तर प्रदेश से लेकर कश्मीर तक में इनकी शादियां होने लगी हैं. अकेले कोचगामा में हाल के सालों में ऐसी 100 से ज़्यादा शादियां हो चुकी हैं.
उत्तर प्रदेश से लेकर कश्मीर में हो रही शादियों के लिए भी लड़की वालों के पास शादी का पैग़ाम आता है.
10 बच्चों की मां नस्तारा ख़ातून ने अपनी बारहवीं पास बेटी का रिश्ता कश्मीर में किया था. नस्तारा बताती हैं, "बिटिया पढ़ी लिखी थी लेकिन उसका रंग सांवला था. यहां कोई रिश्ता ही नहीं लाया. फिर कश्मीर से एक 30 साल के लड़के का रिश्ता आया तो शादी कर दी."
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