You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बिहार में स्कूली शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया बदलने से क्या बदलेगी शिक्षा की सूरत?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहार सरकार ने राज्य में स्कूली शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है. राज्य में अब इंटरमीडिएट तक के शिक्षकों की भर्ती की ज़िम्मेदारी 'बिहार लोक सेवा आयोग' (बीपीएससी) के पास होगी. बीपीएससी इसके लिए परीक्षा आयोजित करेगी.
इससे पहले साल 2006 से शहरी इलाक़ों में शिक्षकों की बहाली विभिन्न नगर निकाय करता था, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में इस बहाली की ज़िम्मेदारी ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद के पास थी.
इस तरह की भर्ती में किसी ज़िले में बहाल शिक्षक को उस ज़िले से बाहर तबादला नहीं किया जा सकता था. ग्रामीण स्तर पर भी शिक्षकों के ट्रांसफ़र इलाक़े से बाहर नहीं होते थे.
सरकार के नए आदेश के बाद अब जिन शिक्षकों को नौकरी दी जाएगी, वो राज्य सरकार के कर्मचारी होंगे. इससे पहले शिक्षकों को स्थानीय निकाय कर्मी का दर्जा हासिल था.
शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में इस बदलाव पर सोमवार को कैबिनेट की बैठक में मुहर लगा दी गई. सरकार के इस फ़ैसले के बाद बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर कहा कि बिहार में अब बहुत जल्द ही क़रीब सवा दो लाख शिक्षकों की बहाली होगी.
तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, "शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा दिया जाएगा जिसमें आकर्षक वेतन के साथ सभी सुविधाएं दी जाएंगी. पूर्व के जो नियोजित शिक्षक हैं, वो भी बीपीएससी के माध्यम से एक परीक्षा पास कर नियमित शिक्षक बन सकते हैं."
लेकिन सरकार के इस फ़ैसले के बाद ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है.
बिहार में टीईटी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अमित विक्रम के मुताबिक़, सरकार ने पहले से शिक्षक पात्रता परीक्षा पास कर बैठे अभ्यर्थियों को नौकरी देने का वादा दिया था, अब उन्हें फिर से परीक्षा देनी होगी.
अमित विक्रम ने बीबीसी को बताया, "प्राइमरी से लेकर हाईस्कूल तक के क़रीब तीन लाख अभ्यर्थी सीटीईटी और एसटीईटी जैसी परीक्षा पास कर चार साल से बैठे हुए हैं, सरकार ने कहा था कि उन्हें सीधी नौकरी देगी."
ये भी पढ़ें:- बिहार के शिक्षक नीतीश सरकार से क्यों नाराज़
टीईटी शिक्षक संघ के मुताबिक़, आरजेडी, कांग्रेस और माले जैसी पार्टियों ने चुनाव से पहले वादा किया था कि जो शिक्षक नौकरी कर रहे हैं, उन्हें राज्यकर्मी का दर्जा दिया जाएगा.
लेकिन नए नियम के मुताबिक़, पहले से नियोजित शिक्षकों को राज्य सरकार का कर्मचारी बनने के लिए नई प्रक्रिया के तहत परीक्षा पास करनी होगी.
ऐसे शिक्षकों को उम्र की अधिकतम सीमा में 10 साल की छूट दी जाएगी. बिहार में इस तरह के क़रीब साढ़े चार लाख शिक्षक पूर्व नियोजित (यानी पहले से नौकरी करने वाले) हैं. अगर पूर्व नियोजित शिक्षक इस परीक्षा को पास कर लेते हैं, तभी उन्हें राज्यकर्मी का दर्जा दिया जाएगा.
सरकार के इस फ़ैसले के बाद 'बिहार माध्यमिक शिक्षक भर्ती' के वेरिफ़ाइड ट्विटर हैंडल से काफ़ी तीखा ट्वीट किया गया है. इसमें सरकार के नए फ़ैसले को इंसानियत के ख़िलाफ़ बताया गया है.
नीति पर राजनीति
बिहार में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी इस मुद्दे पर नीतीश सरकार के फ़ैसले का विरोध कर रही है.
राज्य के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने इस पर ट्वीट किया, "नियोजित शिक्षकों को सरकारी कर्मी बनने के लिए भी पुनः परीक्षा देनी पड़ेगी. अब हर विद्यालय में पुराने वेतनमान, नियोजित शिक्षक और नई नियमावली के तहत बहाल सरकारी शिक्षक यानी कुल तीन प्रकार के शिक्षक होंगे. इतना भद्दा मज़ाक शिक्षक अभ्यर्थियों के साथ कृपया मत कीजिए."
वहीं इस मुद्दे पर बिहार की सत्ता में साझीदार राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार के फ़ैसले का स्वागत किया है.
आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने बीबीसी से कहा, "राज्य सरकार शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं कर सकती, सरकार ने ऐसी कोई बात नहीं की है जिससे उन्हें परेशानी हो. शिक्षक राज्य का भविष्य बनाएंगे."
मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि सरकार शिक्षकों को हर तरह की सुविधा देगी और उनकी बेहतरी के बारे में सोचेगी.
रोज़गार या नौकरी पाने की इच्छा रखने वाले युवाओं का दबाव लगातार बिहार सरकार पर है.
इस मामले को लेकर बिहार में राजनीति भी ख़ूब होती रही है. नीतीश कुमार जब बीजेपी के साथ बिहार में सरकार चला रहे थे तब आरजेडी बेरोज़गारी के मुद्दे को उठा रही थी.
अब जब आरजेडी बिहार सरकार में नीतीश के साथ है तो बीजेपी के लिए शिक्षकों की नौकरी एक मुद्दा बनी हुई है.
ये भी पढ़ें:-कौन कर रहा है बिहार के सरकारी स्कूलों को बदहाल?
शिक्षा की दशा
राज्य टीईटी शिक्षक संघ के मुताबिक़, बिहार में फ़िलहाल प्राइमरी से बारहवीं तक के क़रीब ढाई लाख शिक्षकों के पद खाली हैं. इनमें क़रीब 90 हज़ार पद उच्च माध्यमिक शिक्षकों के हैं.
बिहार में क़रीब 45 हज़ार माध्यमिक शिक्षकों के पद खाली हैं. यही हाल प्राइमरी स्कूल का है जहां शिक्षकों के क़रीब 80 हज़ार पद खाली पड़े हैं.
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एक ग़ैर-सरकारी संस्था 'प्रथम' ने हाल ही में शिक्षा की गुणवत्ता पर एक रिपोर्ट जारी की. उस रिपोर्ट में बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता को काफ़ी ख़राब बताया गया था.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, बिहार के प्राइमरी और अपर प्राइमरी छात्रों की स्कूल में उपस्थिति 60 फ़ीसदी से कम है. जबकि इसका राष्ट्रीय औसत क़रीब 72 फ़ीसदी है.
यही नहीं, इस रिपोर्ट में प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति भी राष्ट्रीय औसत से कम बताई गई है.
'प्रथम' की साल 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक़, बिहार के सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल यह भी है कि इन स्कूलों के बच्चे बड़ी संख्या में प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं. ऐसे बच्चों का औसत बिहार में राष्ट्रीय औसत से दोगुना है जो प्राइवेट ट्यूशन पढ़ते हैं.
पटना के एएन सिन्हा इन्स्टीट्यूट में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक़, बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए कम से कम अगले 15 साल तक सख़्ती ज़रूरी है.
विद्यार्थी विकास कहते हैं, "आप परीक्षा लें. कॉलेज के लिए, हाई स्कूल के लिए और प्राइमरी स्कूल तक के लिए भी. चाहे बीपीएससी ले या जो ले. लेकिन जो भी पढ़ाने आएं, वो परीक्षा देकर आएं. ठीक से छंटनी कर शिक्षकों को रखा जाएगा, तभी शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी."
बेरोज़गारी का संकट
बिहार में बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या है. नौकरी पाने की चाहत में बिहार में अक्सर आंदोलन और प्रदर्शन होते हैं.
सीएमआईई (सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के आंकड़ों के मुताबिक़, बिहार में मौजूदा बेरोज़गारी दर 17.6 फ़ीसद है. यह दर भारत के राष्ट्रीय स्तर पर बेरोज़गारी दर 7.5 फ़ीसदी से बहुत ज़्यादा है.
साल 2020 के विधानसभा चुनावों में आरजेडी के तेजस्वी यादव ने 10 लाख लोगों को नौकरी देने का वादा किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका उन्हें चुनाव में लाभ भी मिला था. हालांकि उस चुनाव में आरजेडी को जीत नहीं मिल सकी थी और नीतीश कुमार के गठबंधन वाली एनडीए सरकार ही दोबारा सत्ता में आई थी.
लेकिन फिर नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया और आरजेडी के साथ मिल कर सरकार बना ली.
नीतीश और तेजस्वी के साथ आने के बाद सरकार की तरफ़ से युवाओं को लगातार नौकरी देने के दावे किए जाते रहे हैं.
कई कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव लोगों को नौकरी की चिट्ठी दे चुके हैं.
लेकिन राज्य में बेरोज़गारी के आंकड़े और राज्य की अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से बेरोज़गारी को दूर करना एक चुनौती बनी हुई है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)