You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बच्चों को अपनी मातृभाषा सिखाने से क्यों कतराने लगे हैं माता-पिता?
‘अगर मुझे बुंदेलखंडी आती तो अम्मी और अब्बू से बात करने का मज़ा ही कुछ और होता.’
दिल्ली में एक डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में काम रहे इमरान रईस यह कहते हुए भावुक हो जाते हैं.
इमरान को इस बात की कसक है कि वह अपने माता-पिता से उनकी मातृभाषा बुंदेलखंडी में बात नहीं कर पाए.
इमरान के पिता का पैतृक घर ग्वालियर में था लेकिन नौकरी के सिलसिले में वह सपरिवार झांसी आकर बस गए थे. यहीं इमरान और उनके भाई-बहनों का जन्म हुआ.
घर पर सभी लोग हिंदी में बात करते थे मगर कॉलेज के दिनों में इमरान को अहसास हुआ कि उनके माता-पिता को अगर कोई बुंदेलखंडी बोलने वाला मिलता था तो वो बहुत खुश हो जाते थे.
तब इमरान को लगा कि उन्हें भी माता-पिता की ख़ुशी के लिए बुंदेलखंडी सीखनी चाहिए. लेकिन उन्हें लगता हैं कि शायद उन्होंने थोड़ी देर कर दी. कोरोना महामारी ने उनसे उनके अब्बू-अम्मी को छीन लिया.
माता-पिता की मातृभाषा विरासत में न मिलने का यह दर्द सिर्फ़ इमरान का नहीं है बल्कि बड़े शहरों, ख़ासकर महानगरों में रहने वाली उस पीढ़ी का भी है जिसके माता-पिता रोज़गार या दूसरी जरूरतों के लिए कहीं और से आकर बसे हैं.
अपनी भाषाएं भुलाते परिवार
जर्मनी में जन्मीं और वहीं पली-बढ़ीं लेखिका मिट्ठू सान्याल को इस बात का रंज है कि वह अपने नाम का सही से उच्चारण नहीं कर पातीं.
वह बताती हैं “मेरे पापा भारत में बांग्ला बोलते हुए बड़े हुए और फिर जर्मनी आ गए. यहां वह अपने दोस्तों से तो बांग्ला बोलते थे लेकिन मुझसे जर्मन भाषा में ही बात करते थे."
ऐसा ही कुछ इमरान रईस के साथ भी हुआ. वह बताते हैं, "अब्बू-अम्मी को बुंदेलखंडी आती थी मगर वे हिंदी में ही बात करते थे. इसलिए हम भाई-बहन अच्छे से बुंदेलखंडी नहीं सीख पाए.”
एनिक डि हावर जर्मनी के एफ़र्ट विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं.
उन्होंने इस विषय पर गहन शोध किया है कि कैसे कुछ परिवार अपनी भाषाओं को भुला देते हैं.
उन्होंने कई देशों में किए गए अध्ययन में पाया कि जिन घरों में बच्चे दो या अधिक भाषाएं सुनते हुए बड़े होते है उनमें से ऐसे बच्चों की संख्या 12 से 44 प्रतिशत है जो बाद में सिर्फ़ एक भाषा अपनाते हैं.
प्रोफ़ेसर हावर बताती हैं, “शुरूआत में बच्चे दोनों भाषाओं में शब्दों को सीखते हैं. मेरे बच्चों ने दोनों भाषाएं सीखीं लेकिन प्री-स्कूल जाने के बाद वे एक भाषा ही बोलते थे. और ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि एक ही भाषा पर चीज़ें केंद्रित होती और बच्चों को जल्द समझ में आ जाता है कि दूसरी भाषा सीखना बेकार है.''
माता-पिता की सोच
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे जीवन में बेहतर करें. इसलिए अपनी मातृभाषा से गहरा लगाव होने के बावजूद कई बार उनका ज़ोर बच्चों को अपनी मातृभाषा के बजाय ऐसी भाषा सिखाने पर रहता है जो आगे चलकर उनके काम आए.
इन दिनों अमेरिका में रह रहीं रूस की कत्थक नृत्यांगना स्वेतलाना तुलसी की मां रूसी हैं और पिता भारत से रूस आए थे.
वह बताती हैं कि पिता की मातृभाषा तेलुगू थी मगर उन्होंने कभी इसे सिखाने की कोशिश नहीं की.
स्वेतलाना बताती हैं, “रूस में हर कोई रूसी बोलता है. पापा ने हम भाई-बहनों को तेलुगू की बजाय अंग्रेज़ी सिखाई क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय भाषा है और आज अंग्रेज़ी मेरे बहुत काम आ रही है.”
दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान केंद्र में सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. हरि माधब राय कहते हैं, “जब माता-पिता की भाषा में अवसर नहीं होंगे तो दिक्कतें आना स्वाभाविक है. जिस भाषा में रोज़ी-रोटी दिखेगी, उसका प्रभाव ज़्यादा रहेगा.”
वह उदाहरण देते हैं, “लंबे आंदोलन के बाद असम की बोडो भाषा को साल 2003 में आठवीं अनुसूची में डाला गया. शुरू में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने बच्चों का दाख़िला बोडो माध्यम के स्कूलों में करवाया लेकिन फिर देखा कि जब असमिया, हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रभाव ज़्यादा है तो बहुत से लोग वापस लौट आए.”
डॉ. राय के मुताबिक़, अक्सर लोग भाषाओं को लेकर दुनिया या देश के माहौल के हिसाब से चलते हैं. इसके अलावा सांस्कृतिक वर्चस्व का भाषाओं पर प्रभाव पड़ता है.
एक बड़ी ग़लतफ़हमी
जर्मन लेखिका मिट्ठू सान्याल बताती हैं कि न तो वह पिता से बांग्ला सीख पाईं और न ही अपनी मां की मातृभाषा पोलिश सीख सकीं.
वह कहती हैं, “जब मैं छोटी थी, तब मेरे माता-पिता से लोगों ने कहा कि अगर बच्ची को एक से ज़्यादा भाषा सिखाने की कोशिश की तो वह एक भाषा भी सही से नहीं सीख पाएगी. इसलिए मुझे सिर्फ जर्मन सिखाने पर ज़ोर दिया गया.”
बहुत से माता-पिता इसी डर के चलते बच्चों के सामने एक ही भाषा बोलने की कोशिश करते हैं.
लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चे एक से अधिक भाषाएं सीख सकते हैं और ज़्यादा भाषाएं जानने वाले बच्चों के ज्ञान हासिल करने की क्षमता और याद्दाश्त भी सामान्य से ज़्यादा होती है.
प्रोफ़ेसर एनिक डि हावर बताती हैं कि पहले कहा जाता था कि बच्चों को एक से अधिक भाषा सिखाने की कोशिश करेंगे तो वे कन्फ्यूज़ होंगे मगर ऐसा नहीं होता है.
वह कहती हैं, “बच्चे शुरू में दो भाषाओं के शब्द इस्तेमाल करें तो इसका मतलब है कि उनके शब्दों का ज्ञान बढ़ रहा है और वे अपनी समझ के हिसाब से ज़्यादा सटीक शब्द का इस्तमाल कर रहे होते हैं."
समाज का रवैया
जानकार बताते हैं कि मातृभाषा इंसान को प्राय: विरासत में मिलती है. इसे इंसान सबसे पहले सीखता है. वह इसी में सोचता और भावनाएं ज़ाहिर करता है. यह उसकी पहचान का हिस्सा बन जाती है.
डॉ. हरि माधब राय कहते है, ''भारत में कई अभिभावक बच्चों को वही भाषा सिखाने की कोशिश करते हैं, जो उनके राज्य या शहर की मुख्य भाषा होती है. पैतृक भाषा या बोली में बात करने पर बच्चों को घर पर भी टोके जाने के दृश्य अक्सर देखने को मिल जाते हैं.''
वे बताते हैं कि इसका एक बड़ा कारण है सामाजिक दबाव. बहुत से लोगों को लगता है कि वे या उनके बच्चे अपनी पैतृक भाषा या बोली इस्तेमाल करेंगे तो उन्हें पिछड़ा समझा जाएगा.
देश में गाहे-बगाहे ऐसे मामले भी सामने आते रहे हैं जब स्कूल में बच्चों को अंग्रेज़ी में बात न करने या कोई स्थानीय भाषा बोलने पर सज़ा दे दी गई.
प्रवासियों के साथ स्थानीय लोगों के भाषा के आधार पर भेदभाव और हिंसा करने की घटनाएं भारत में भी देखने को मिलती रही हैं.
ऐसी घटनाएं भाषाई अल्पसंख्यकों के आत्मविश्वास को तोड़ देती हैं. इसलिए उनकी कोशिश रहती है कि वे और उनके बच्चे हिंदी, अंग्रेज़ी या वह मुख्य भाषा बोलें जिसका प्रभाव ज़्यादा है.
समाज का यह रवैया भी भाषाओं को सीखने और सिखाने की प्रवृति को प्रभावित कहता है.
भाषा पर ख़तरा
एक परिवार का अपनी भाषा को छोड़ना उस बड़ी प्रक्रिया का एक छोटा क़दम हो सकता है, जिससे आगे चलकर वह भाषा लुप्त हो सकती है.
डॉक्टर राय कहते हैं, “भाषाओं को बचाकर रखना चाहिए. भाषा सिर्फ़ बात कहने का माध्यम नहीं है. भाषा इतिहास, संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं के बारे में बताती हैं. जब कोई भाषा लुप्त होती है तो एक सामूहिक ज्ञान भी नष्ट हो जाता है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में कई भाषाएं बोलने को बढ़ावा देना ज़रूरी है और इसकी शुरुआत स्कूलों से की जा सकती है.
स्कूल में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए बच्चों की भाषा का सम्मान होना चाहिए. इससे माता पिता में भी अपनी भाषा को लेकर आत्मविश्वास बढ़ेगा.
जेएनयू के डॉ. हरि माधब राय बताते हैं, “भारत में नई शिक्षा नीति (एनईपी) में स्थानीय भाषाओं के महत्व को समझा गया है और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कम से कम पांचवीं तक या फिर आठवीं तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाए. नीति के स्तर पर यह अच्छी पहल है मगर ज़मीन पर इसे कैसे लागू किया जाता है, यह देखना होगा.”
परिवार क्या करें?
जापान के कैनगावा विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर जैनिस नाकामुरा ने ऐसे जापानी परिवारों का अध्ययन किया जहां माता या पिता में से किसी एक की मातृभाषा जापानी के अलावा कोई और भाषा थी.
इस अध्ययन में ये पाया गया कि ऐसे बच्चों में नाराज़गी देखी गई जो अपने माता या पिता की ग़ैर-जापानी भाषा नहीं सीख पाए. इसी तरह माता-पिता में निराशा देखी गई कि बच्चे उनकी मातृभाषा नहीं बोलते.
भाषा न सीख पाने के इस अफ़सोस को प्रोफ़ेसर नाकामुरा ने ‘लैंग्वेज रिग्रेट’ का नाम दिया और पाया कि इससे संबंधों में खिंचाव भी आ सकता है.
इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे अन्य भाषाओं के साथ बच्चों को अपनी मातृभाषा भी सिखाएं और जो लोग बचपन में नहीं सीख पाए, उन्हें अब सीखने की कोशिश करनी चाहिए.
विशेषज्ञ कहते हैं कि ज़रूरी नहीं कि आपको माता-पिता की पैतृक भाषा धारा प्रवाह ही बोलनी है. कुछ वाक्य बोल देंगे तो भी उन्हें अच्छा लगेगा.
उधर इमरान रईस बुंदेलखंडी सीखने की कोशिश कर रहे हैं.
वह कहते है, “अभी मेरा शब्द भंडार सीमित है लेकिन हिंदी और अंग्रेज़ी के शब्दों के साथ बुंदेली बोलने की कोशिश करता रहता हूं.”
इमरान यह सब इसलिए कर रहे हैं ताकि जब उनके बच्चे हों तो उन्हें वह अपने अब्बू-अम्मी संस्कृति, उनकी पहचान, उनकी भाषा सिखा सकें. वह भाषा, जिसे वे इमरान को चाहकर भी नहीं सिखा पाए थे.
ये भी पढ़ेंः-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)