भोजपुरी के अउर केतना इंतजार करे के पड़ी.....

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कहानी का शीर्षक पढ़ कर क्या आपको भी लग रहा है कि हिंदी लिखने में गड़बड़ हो गई है.

ऐसा बिल्कुल नहीं है.

ये हेडलाइन भोजपुरी में लिखी गई है जिसकी अपनी कोई अलग लिपि नहीं है.

दुनिया के 15 से ज़्यादा देशों में ये बोली जाती है जिनमें मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िजी, ब्रिटिश गुयाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, हॉलैंड, नेपाल और दक्षिण अमेरिका के कई द्वीप शामिल हैं.

भारत में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भोजपुरी बोलने वाले लोगों की संख्या बाक़ी राज्यों के मुक़ाबले ज़्यादा है.

वहीं दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, सूरत और अहमदाबाद जैसे शहरों में काम की तलाश में गए कई लोग भोजपुरी भाषा बोलते हैं.

संसद में दिए गए अलग-अलग भाषणों में अलग-अलग सांसदों के भारत में भोजपुरी भाषा बोलने वालों की तादाद 15 करोड़ के आसपास बताई है.

हालांकि साल 2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में तक़रीबन पांच करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं.

साल 1960 से इस भाषा को भारत के संविधान के 8वीं अनुसूची में शामिल करने की माँग उठ रही है, लेकिन इंतज़ार आज तक ख़त्म नहीं हुआ.

18 बार इस मुद्दे पर प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया जा चुका है.

साल 2012 में तमिल भाषी गृह मंत्री पी चिदंबरम ने सांसद जगदंबिका पाल, रघुवंश प्रसाद सिंह और शैलेन्द्र सिंह की माँग पर सदन को भोजपुरी में आश्वासन देते हुए कहा था, " हम रउआ सब के भावना समझतानी".

उनके इस आश्वासन की क्लिप तब सुर्ख़ियों में छाई थी. बावजूद इसके भोजपुरी का इंतज़ार अब तक ख़त्म नहीं हुआ.

साल 2012 के बाद साल 2022 आ गया.

सत्ता में बैठे नेता अब विपक्ष में हैं और जो नेता कभी विपक्ष में बैठा करते थे वो अब सत्ता पक्ष में बैठे हैं.

फिर भी भोजपुरी का इंतज़ार अब तक कायम है.

आज कहानी भोजपुरी के इसी इंतज़ार की.

निरहुआ क्या बोले

आजमगढ़ के सांसद दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ ने संसद के अंदर अपने पहले भाषण में भोजपुरी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की माँग को दोहराया.

हालांकि उनका पूरा भाषण हिंदी में था क्योंकि भोजपुरी भाषा में बोलने की इजाज़त संसद के अंदर नहीं है.

अंत में उन्होंने 'जय भारत जय भोजपुरी' कह कर अपना भाषण ख़त्म किया.

यही नारा उन्होंने सांसद के तौर पर शपथ ग्रहण करने के बाद भी लगाया था.

इस वजह से उनके पहले भाषण में भोजपुरी से जुड़ी माँग उठाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ.

निरहुआ से पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर पूर्व कांग्रेस नेता और अब बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल, रघुवंश प्रसाद और रविशंकर प्रसाद - सब संसद में ये मुद्दा उठा चुके हैं.

संविधान की 8वीं अनुसूची

संविधान की 8वीं अनुसूची में शुरुआत में 14 भाषाओं को शामिल किया गया था.

साल 1967 में सिंधी को शामिल किया गया.

नेपाली, कोंकणी और मणिपुरी को साल 1992 में शामिल किया गया.

इसके बाद साल 2004 में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को शामिल किया गया.

38 अलग-अलग भाषाओं को इस सूची में शामिल करने की माँग आज भी जारी है जिसमें से भोजपुरी भी एक है.

भारत में भोजपुरी भाषी

भोजपुरी भाषा के जानकार और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर सदानंद शाही कहते हैं, "भोजपुरी का इतिहास क़रीब 1000 साल पुराना है. कवि गोरखनाथ की कविता में भोजपुरी के शब्द या ध्वनियां मिलती हैं. संतों की एक लंबी परंपरा है, जिसमें भोजपुरी कविता की गूंज और गूढ़ रहस्य मिलते हैं.

पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार में भोजपुरी भाषा बोली जाती है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में भी भोजपुरी भाषी हैं.

एक ज़माने से इन इलाकों से मज़दूरों का विस्थापन देश और दुनिया में होता आया है. जितने भी हमारे महानगर हैं चाहे दिल्ली हो, मुबंई हो, कोलकाता हो, चेन्नई हो या पंजाब, तमिलनाडु, केरल और गुजरात के बड़े शहर, हर जगह भोजपुरी बोलने वाले श्रमिकों की बड़ी तादाद मिलेगी. भोजपुर के इलाके से गए लोग मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िजी और ब्रिटिश गुयाना में भी बस गए हैं.

तो ऐसी भाषा जिसमें उन्नत कोटि का इतिहास लिखा गया है, जो देश और विदेश तक में बोली जाती है, जिसके बोलने वालों की संख्या 15 से 20 करोड़ के बीच है उस भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाना ही चाहिए."

भोजपुरी के बारे में अक़्सर ये कहा जाता है कि इस भाषा की अपनी कोई लिपि या स्क्रिप्ट नहीं है.

प्रोफ़ेसर सदानंद शाही कहते हैं, "ये सवाल अपने आप में ग़लत है. भोजपुरी भाषा की अपनी स्क्रिप्ट थी, इसे कैथी लिपि में लिखते थे, जो आज के गुजराती भाषा की लिपि से काफ़ी मिलती-जुलती लिपि थी. आज़ादी की लड़ाई जब लड़ी जा रही थी, उस दौरान हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए लोगों ने भोजपुरी की कैथी लिपि को योजना बना कर चलन से बाहर कर दिया.

इसकी वजह से भोजपुरी को बहुत नुक़सान हुआ है. बहुत सारा साहित्य मंदिरों में, मठों में, यहां-वहां बिखरा पड़ा है, जो कैथी लिपि में लिखा गया है और वो सामने नहीं आ पा रहा है. बाद में राहुल सांकृत्यायन ने प्रस्ताव रखा कि भोजपुरी को देवनागरी में ही लिखा जाए और तब से भोजपुरी लिखने के लिए देवनागरी लिपि का इस्तेमाल किया जाने लगा."

प्रोफ़ेसर शाही के मुताबिक़ लिपि और भाषा का एक दूसरे पर निर्भर होने वाला संबंध नहीं है.

किसी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का आधार

हालांकि किसी भाषा के लिए लिपि ना होने की वजह से उसे 8वीं अनुसूची में शामिल ना किया जाना कोई तर्क नहीं है. और ना ही ये तर्क सही है कि किसी भाषा विशेष को बोलने वाले कितने लोग भारत में हैं.

मैथिली भाषा 8वीं अनुसूची में शामिल है, जबकि अब उसकी लिपि भी देवनागरी ही है. इसी तरह से डोगरी भाषा को बोलने वाले महज़ कुछ लाख लोग ही भारत में हैं, फिर भी 8वीं अनुसूची में वो शामिल है.

केंद्र सरकार के मुताबिक़ किसी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई आधार नहीं बनाया गया है.

इसके पीछे तर्क ये दिया जाता है कि चूंकि बोलियों और भाषाओं का विकास सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक घटनाक्रमों से प्रभावित होकर सतत प्रक्रिया से होता है, इस वजह से ऐसा करना संभव नहीं है.

वैसे भारत सरकार ने इसके लिए दो बार प्रयास भी किया था. पहली बार साल 1996 में पाहवा कमेटी का गठन किया था और साल 2003 में सीताकांत महापात्रा कमेटी का गठन भी किया था. लेकिन दोनों बार बात नहीं बनी.

भोजपुरी को क्यों नहीं मिला वो सम्मान

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहते हैं कि ये बात उनकी समझ से परे है कि भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का सम्मान आज तक क्यों नहीं मिला.

वो कहते हैं, 'भारत भाव' को निर्मित करने का जो काम भोजपुरी ने किया है, वो अद्भुत है. भोजपुरी के बिना ये भाव अधूरा ही रह जाता. यही भोजपुरी की ताक़त है. आज़ादी की क्रांति में भोजपुरी भाषा के गीत-संगीत का काफ़ी योगदान रहा. राजेन्द्र प्रसाद, जगजीवन राम जैसे उस दौर के नेता भोजपुरी बोला करते थे. अगर आज़ादी के आंदोलन में इन लोगों के योगदान के प्रति भारत के सत्ताधारियों में सम्मान भाव होता तो अब तक भोजपुरी भाषा को ये सम्मान मिल जाता."

वो आगे कहते हैं, "मेरी समझ में भोजपुरी बोले जाने वाले इलाकों को पिछड़ा इलाका माना जाता है. ऐसा कुछ लोगों की सोच है. ऐसा सोचने वाले मानते हैं कि पिछड़े इलाकों में बोली जाने वाली भाषा पिछड़ी ही होगी. इस भाषा में बहुत समृद्ध साहित्यिक ग्रंथ नहीं लिखे गए हैं. बीए-एमए में पढ़ाने लायक इसमें साहित्य नहीं है, ऐसा कई लोग सोचते हैं. जबकि कई जगह भोजपुरी को कोर्स में अब भी शामिल किया गया है. शायद इन वजहों से भोजपुरी को 8वीं अनुसूचि में शामिल करने के बारे में सरकारें विचार नहीं कर रही हैं. "

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते 2017 में बिहार कैबिनेट की तरफ़ से केंद्र सरकार को भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की गुहार भी लगाई गई थी. साल 2022 में बिहार सरकार ने अपनी इस माँग को एक बार फिर से दोहराया भी.

साल 2016 में बीजेपी सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ भी इस मुद्दे को लोकसभा में उठाया था.

नीतीश कुमार हाल तक बीजेपी के साथ बिहार में सरकार चला रहे थे, लेकिन अपनी ये माँग केंद्र सरकार से नहीं मनवा पाए.

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के दो बार से मुख्यमंत्री है, लेकिन इस मामले में उनकी भी केंद्र सरकार के सामने नहीं चली.

भोजपुरी भाषा को सम्मान दिलाने के लिए नेताओं के योगदान पर प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी कहते हैं, "नेता अलग-अलग मंचों से माँग भले ही उठाते हों, लेकिन पब्लिक रैलियों में ख़ुद इस भाषा में नहीं बोलते. जो लोग कर्ता-धर्ता हैं उनके अंदर भी भोजपुरी के लिए वो सम्मान नहीं है या फिर कोई राजनीतिक कारण भी हो सकता है, जिस वजह से भोजपुरी को वो सम्मान नहीं मिला."

भोजपुरी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों के योगदान पर वो आगे कहते हैं, " भोजपुरी सिनेमा ने भोजपुरी भाषा का सत्यानाश ही किया है. केवल अश्लील दृश्य और अश्लील संवाद लोगों के सामने रखे हैं, जिनका असर ये हुआ कि भोजपुरी भाषा में केवल अश्लीलता ही है.''

हालांकि वो मानते हैं कि हाल में कुछ कलाकारों ने भोजपुरी को प्रचार-प्रसार में काफ़ी पॉज़िटिव योगदान भी दिया है, जिनमें वो नेहा सिंह राठौर का नाम लेते हैं. उनके मुताबिक़ लोकगायकों ने भोजपुरी के प्रचार-प्रसार के लिए सबसे ज़्यादा काम किया है.

बीबीसी से इंटरव्यू के दौरान भी नेहा सिंह राठौर ने कहा कि वो भोजपुरी में गाने लिखती और गाती हैं इसलिए क्योंकि वो भोजपुरी को जीती हैं. अपनी भाषा को वो 'माँ' समान मानती हैं. इस वजह से भाषा के प्रचार-प्रसार में जितनी मदद कर सकती हैं कर रही हैं.

1 दिसंबर 2016 को यूनेस्को ने भोजपुरी की गीत गवई की परंपरा को मॉरीशस सरकार की पहल पर विश्व की ग्लोबल इनटैन्डिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है.

8वीं अनुसूची में शामिल होने से क्या होगा?

भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने से केवल भोजपुरी को ही नहीं हिंदी को भी फ़ायदा होगा.

प्रोफ़ेसर शाही के मुताबिक़ एक औपनिवेशिक साज़िश के तहत जनपदीय भाषाओं को बोलने और समझने वालों को गंवार और पिछड़ा बताया गया.

अगर उन भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा, तो भोजपुरी बोलने और लिखने वालों के अंदर जो एक 'हीनता' की भावना आ गई थी, उसमें कमी आएगी.

संघ लोक सेवा आयोग का विचार जानने के बाद उसे राष्ट्रीय स्तर और दूसरे उच्चतर केंद्रीय सेवा परीक्षाओं में वैकल्पिक माध्यम के रूप में भाषा की अनुमति दी जा सकेगी.

इतना ही नहीं साहित्य अकादमी अपने विवेकाधिकार के बाद इन भाषाओं के लिए पुरस्कार और विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम की शुरुआत कर सकती है.

भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने या ना करने का फैसला गृह मंत्रालय के अंदर आता है.

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