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एनसीईआरटी ने अपनी किताबों से क्या हटाया जिसे केरल में पढ़ाना जारी रखा जाएगा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल सरकार ने कक्षा 11 और 12 के छात्रों के लिए राजनीति विज्ञान की पूरक पाठ्यपुस्तकें लाने का फ़ैसला किया है.
इन किताबों में उन हिस्सों को शामिल किया जाएगा, जिसे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने मौजूदा अकादमिक सत्र से राजनीति विज्ञान की किताबों से हटा दिया है.
एनसीईआरटी ने हाल में अपनी वेबसाइट पर की गई एक घोषणा में कहा है, "राजनीति में नए विकास के अनुसार, कंटेंट को अपडेट किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फ़ैसले और इसका व्यापक रूप से स्वागत होने के बाद हुए नए बदलावों के कारण अयोध्या मुद्दे पर पाठ को पूरी तरह से बदल दिया गया है."
केरल के शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "एनसीईआरटी ने स्पष्टीकरण दिया है कि पेज 148 से 151 में ज़िक्र की गई जिन घटनाओं के कारण बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, उन्हें हटा दिया जाएगा. ऐसा करके एनसीईआरटी ने आज़ाद भारत की बर्बर घटनाओं का असर कम करने और टेक्स्ट बुक्स के ज़रिए उन मुद्दों को हल्का करने के छिपे हुए एजेंडे को पूरा किया है."
उन्होंने कहा, "यह दुखद है कि बच्चों को इतिहास से संबंधित तथ्यों को सीखने के मौक़े से वंचित किया जा रहा है. एनसीईआरटी पिछले तीन सालों में देश की अकादमिक साख बचाने के अपने उद्देश्य से भटक गया है. अब यह छिपे हुए राजनीतिक हित पूरा करने की दिशा में बढ़ चला है. अकादमिक वैल्यू बरकरार रखने के एनसीईआरटी के शानदार अतीत को देखते हुए यह बदलाव चिंताजनक है."
इस मसले पर शिक्षाविदों की राय भी नेताओं की राय से मिलती जुलती है. बेंगलुरु के शिक्षाविद प्रोफ़ेसर वीपी निरंजन आराध्या ने इस मुद्दे पर बीबीसी हिंदी से बातचीत की.
उनका कहना है कि कम से कम कक्षा 11 और 12 के विद्यार्थी की समझ पर्याप्त परिपक्व होती है और उन्हें इतिहास के तथ्य उपलब्ध कराए जाने चाहिए. इससे निश्चित रूप से उन्हें आलोचनात्मक सोच और विश्लेषण विकसित करने में मदद मिलेगी.
प्रोफ़ेसर वीपी निरंजन आराध्या ने कहा, "उन्हें ये पता चलेगा कि क्या सही है और क्या ग़लत. हम ऐसे ही लोकतांत्रिक सोच का विकास करते हैं. वे एक ख़ास तरह का मत थोप रहे हैं."
लेकिन क्या किशोर उम्र के विद्यार्थियों को हिंसक घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए?
इस पर दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय की रिटायर्ड डीन प्रोफ़ेसर अनीता रामपाल ने बीबीसी हिंदी को बताया, "बच्चे विभिन्न समुदाय के साथ होने वाली हिंसा को देख रहे होंगे या उसके साथ जी रहे होंगे. हम युवा बच्चों के लिए मुद्दों को छोटा बनाकर पेश करने में भी यकीन नहीं करते. ये ऐसे सार्वजनिक मुद्दे हैं जिनका अनुभव उनके समुदाय या दूसरों ने किया होगा. इन मुद्दों के साथ उन्हें जुड़ने की ज़रूरत है. ये ज़िंदगी की कठोर सच्चाइयां हैं. हम उसे इसलिए ला रहे हैं ताकि उसके ज़रिए वे सवाल उठाना, आलोचना करना सीख सकें."
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, एनसीईआरटी की करिकुलम ड्राफ्टिंग कमेटी की ओर से हुए बदलावों के तहत, राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े तथ्यों को 'राजनीति में हुए नए बदलावों के अनुसार' बदल दिया गया है.
राजनीति विज्ञान की 11वीं क्लास की किताब के 'धर्मनिरपेक्षता' नामक आठवें अध्याय में पहले बताया गया था, "2002 में गुजरात में गोधरा के बाद हुए दंगों के दौरान 1,000 से अधिक लोगों का नरसंहार हुआ था, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे."
अब इसे बदलकर "2002 में गुजरात में गोधरा के बाद हुए दंगों के दौरान 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे" कर दिया गया है.
ताज़ा बदलाव के पीछे एनसीईआरटी का तर्क है, "किसी भी दंगे में सभी समुदाय के लोगों को नुक़सान होता है. इसमें सिर्फ़ एक समुदाय का ही नुक़सान नहीं हो सकता."
प्रोफेसर सीआई इसहाक भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के पूर्व सदस्य हैं.
उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "देशहित में इन हिस्सों को हटा दिया गया है. हिंदू-मुसलमान में विवाद क्यों पैदा करें. इससे देश का भला नहीं होने वाला है. यह (बाबरी मस्जिद मुद्दा) भारत के इतिहास का एक महत्वहीन प्रकरण है. अब वहां वहां एक हिंदू मंदिर है."
एनसीईआरटी क्या बदलने जा रही है?
पीटीआई की रिपोर्ट में अयोध्या मुद्दे के बारे में जानकारी दी गई है.
उसके अनुसार, किताब में पहले लिखा था, "कई घटनाओं का परिणाम दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे (जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था) के विध्वंस के रूप में हुआ. यह घटना प्रतीकात्मक थी. इसने देश की राजनीति में कई बदलावों को जन्म दिया और भारतीय राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति के बारे में बहस को तेज़ किया. ये घटनाक्रम भाजपा और 'हिंदुत्व' की राजनीति के उदय से जुड़े हैं."
अब इसे बदलकर ऐसा कर दिया गया, "चौथा, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर को लेकर सदियों पुराने क़ानूनी और राजनीतिक विवाद ने भारत की राजनीति को प्रभावित करना शुरू कर दिया, जिसने विभिन्न राजनीतिक बदलावों को जन्म दिया. राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन अब केंद्रीय मुद्दा बन गया, जिसने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर चर्चा की दिशा बदल दी. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फ़ैसले (9 नवंबर, 2019) के बाद इन बदलावों की परिणति अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के रूप में हुई."
शिवनकुट्टी ने कहा, "यह बेहद अफ़सोस की बात है कि एनसीईआरटी की किताबों से ऐतिहासिक तथ्य हटाए जा रहे हैं. एनसीईआरटी ने पहले भी ऐसे प्रयास किए थे और इतिहास, सामाजिक विज्ञान और राजनीति विज्ञान की अपनी पाठ्यपुस्तकों से कई हिस्सों को हटा दिया था."
उनके अनुसार, "लेकिन, पिछले दो सालों के दौरान अभी की कई किताबों, ख़ास तौर पर कक्षा 6 से 12 तक की किताबों से कई अहम कंटेंट हटा दिए गए. इन हिस्सों को कोविड 19 के मद्देनजर छात्रों पर शैक्षणिक बोझ कम करने की आड़ में हटाया गया. लोकतंत्र, लोकप्रिय विद्रोह, मुग़ल शासन काल, संवैधानिक सिद्धांत, महात्मा गांधी की हत्या और गुजरात दंगों सहित कई अहम टॉपिक हटा दिए गए हैं."
उन्होंने कहा, "केरल ने हटाए गए इन कंटेंट को शामिल करते हुए पूरक पाठ्यपुस्तकें तैयार करके जवाब दिया है. बच्चों के लिए हम बिना तोड़ मरोड़ के इतिहास की सटीक प्रस्तुति करने की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम हैं."
प्रोफेसर इसहाक केरल सरकार के उस फैसले को खारिज करते हैं, जिसमें बाबरी मस्जिद मुद्दे से संबंधित हटाए गए हिस्से की जगह पर पूरक पाठ्य पुस्तकें देने की बात कही गई है. वो कहते हैं, "पाठ्यक्रम एनसीईआरटी द्वारा तय किया जाता है. परीक्षा पत्र में वह भाग शामिल नहीं होगा जिसे हटा दिया गया है. केरल सरकार का रुख अप्रासंगिक है."
वो कहते हैं, "कुछ गलतियां हुई हैं. उन्हें सुलझा लिया गया है. अब उन पर विवाद पैदा करना बिल्कुल गैर जरूरी है. 16वीं सदी में एक धर्म के लोग वहां प्रार्थना करते थे. कुछ लोग परिवर्तित होकर मुसलमान बन गए. अब कोई प्रासंगिकता नहीं है. हम सभी भारतीय हैं."
प्रोफेसर इसहाक ने कहा, "ऐसे मुद्दों से छात्रों को कोई फायदा नहीं है. ये युवा दिमाग पढ़ रहे हैं और भविष्य के लिए जी रहे हैं."
विद्यार्थियों के लिए इस फ़ैसले के मायने
प्रो निरंजन आराध्या का तर्क है, "एनसीईआटी का यह प्रयास छात्रों के दिमाग़ में चीजों को डालने का यह बहुत चुनिंदा तरीक़ा है, जिससे विद्यार्थी एक ही दिशा में सोचें."
"यह नज़रिया छात्रों को खुले दिमाग़, आलोचनात्मक सोच, विश्लेषण करने और निष्कर्ष पर पहुंचने की क्षमता विकसित करने से वंचित करता है. इन मूल्यों को हम इतिहास पढ़ाते समय विकसित करते हैं. लेकिन जब जानकारी ही नहीं दी जाएगी, तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का सवाल ही कहां उठता है."
संक्षेप में, उन्होंने कहा, "यह पूरी तरह से एकतरफ़ा, ख़ास मत थोपने के उद्देश्य और ख़ास राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित है. इस तरह का नज़रिया असहिष्णुता को बढ़ावा देगा और एक इंसान के रूप में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, बहुलतावाद के प्रति सम्मान और संविधान के बुनियादी मूल्यों के अस्तित्व को प्रभावित करेगा."
"इससे ऐसे लोगों का समूह तैयार होगा, जो इतिहास और समझ के मामले में बहुत संकीर्ण होंगे, जो बहुत चिंताजनक है."
वहीं प्रोफ़ेसर रामपाल ने कहा, "हम जो देख पा रहे हैं वो ये कि इतिहास या विज्ञान सभी राजनीति से प्रेरित होंगे. चीज़ों को डिलीट करना बहुत आसान है. लेकिन रचनात्मक रूप से इतिहास लिखना और इसे विभिन्न पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों तक पहुंचाना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है. हमारे जैसे देश के लिए यह चुनौती है."
प्रो निरंजन आराध्या ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि एनसीईआरटी जैसी सर्वोच्च संस्था में ऐसे लोग हैं जो किसी के आदेशों का पालन करते हैं.
उनका आरोप है कि तथ्यों और तर्क के आधार पर काम करने वाले लोगों को एनसीईआरटी से बाहर कर दिया गया है. और जो लोग वहां हैं भी वे कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं, तो अब ऐसी हालत हो गई है कि 'वे जो भी कहते हैं वही इतिहास है'.
अकादमिक साख का अभाव
प्रो अनीता रामपाल का कहना है कि अब किसी को भी 'शैक्षणिक प्रामाणिकता या साख' की चिंता नहीं है.
उनका तर्क है कि यह समस्या एक नेशनल केस स्टडी है, जिसे हल करने की ज़रूरत है. इन मुद्दों पर काम करने वाली समिति की साख पूरी तरह से धुंधली है.
"आप नहीं जानते कि कौन क्या लिख रहा है या क्या बदल रहा है या क्या जोड़ रहा है. हो सकता है कि कुछ बड़े नाम दिखाए जाएं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि लेखन उन्होंने ही किया हो. वे चोरी छिपे बदलाव करके सामाजिक वैज्ञानिकों के नाम और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं."
प्रो रामपाल ने कहा कि वे ख़ुद उन बदलावों का शिकार हुई हैं, जो उनकी सहमति या जानकारी के बिना किए गए हैं.
क्या किताब के मूल लेखकों की अनुमति लिए हुए ही ये बदलाव किए गए हैं?
इस सवाल पर प्रो अनीता रामपाल ने कहा, "बिल्कुल नहीं. राजनीति विज्ञान पर पिछली चर्चा में इसके दोनों अध्यक्ष- सुहास पलसीकर और योगेन्द्र यादव ने औपचारिक रूप से एनसीईआरटी से कहा कि जो काम उन्होंने नहीं किया है, उससे कृपया उनके नाम हटा दिए जाएं."
इस पर एनसीईआरटी ने कहा कि अब इस पर उनका कॉपीराइट है.
प्रोफ़ेसर रामपाल कहती हैं कि जब एनसीईआरटी अनुमति लेती है तो ज़ाहिर है ये केवल छोटे-मोटे बदलावों के लिए होती है. इसका मतलब ये नहीं होता कि ऐसी चीजें डाली जाएं, जो हमें लगता है कि झूठ हैं या ग़लत हैं."
बीबीसी ने बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रो राकेश सिन्हा या विद्या भारती के पदाधिकारियों से उनकी पार्टी की सरकार का पक्ष जानने के लिए भी संपर्क किया, लेकिन संपर्क हो नहीं पाया. उनका पक्ष मिलते ही इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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