छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव: बस्तर के कई गाँवों में आज़ादी के बाद पहली बार होगी वोटिंग

लखमा पोड़ियाम

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    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मिनपा (सुकमा), छत्तीसगढ़ से

लखमा पोड़ियाम को अपनी उम्र याद नहीं है, ये भी नहीं कि उन्होंने पहली बार वोट कब डाला था.

लेकिन अपनी टूटी-फूटी हिंदी में वो कहते हैं, "चार या पाँच बार तो मैं लगा चुका हूँ. सरपंच का हो, विधायक का हो. अब विधायक वोट हो रहा है तो फिर जाएँगे."

घर के पीछे अपनी 'बाड़ी' में सब्ज़ियाँ रोपने की तैयारी कर रहे लखमा कहते हैं, "ये पहला साल है चांदामेटा में होगा, तो देंगे."

"जंगल के कारण यहाँ नहीं हो रहा था साहब, नक्सलाइट के डर से यहाँ कोई अंदर नहीं घुस रहे थे. पहले हम लोग बहुत दूर चिंगूर जाते थे वोट डालने."

ज़िला मुख्यालय जगदलपुर से 65 किलोमीटर दूर स्थित चांदामेटा में पहुँचते ही चुनाव की सरगर्मियों का अंदाज़ा होने लगता है.

चुनावी सरगर्मियाँ

बीजेपी कार्यकर्ता

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गाँव के तिराहे पर कुछ लोग भारतीय जनता पार्टी का झंडा लिए रैली निकालने की तैयारी में दिखते हैं. कुछ ने कमल के फूल वाली गेरुआ टोपी भी पहन रखी है.

तिराहे के एक तरफ़ जून में बनकर तैयार हुआ गाँव का प्राथमिक स्कूल है. इसी स्कूल में पोलिंग बूथ तैयार होगा, फ़िलहाल यहाँ वोटरों को पर्चियाँ बाँटने का काम जारी है.

मतदान के लिए पर्ची लेकर बाहर निकल रहे वैट्टी हेता को इस बात की ख़ुशी है कि अब वोट देने के लिए गाँव वालों को परेशान नहीं होना होगा.

लेकिन अड़मा क्वासी वोटर लिस्ट में नाम न होने को लेकर परेशान हैं. वो कहते हैं कि अब उन्हें चिंगूर जाना होगा, पंचायत में पता करने के लिए.

सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के संबंध

बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मुहम्मद अली के साथ सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट राजू वाघ
इमेज कैप्शन, बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली के साथ सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट राजू वाघ (नीले जैकेट में)

स्कूल के बिलकुल सामने, सड़क की दूसरी तरफ़, एक टीले पर कँटीले तारों से घिरा अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ़ का कैंप है.

हो-हल्ले की आवाज़ें बाहर आ रही हैं. बाद में मालूम होता है कि जवानों और ग्रामीणों के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था.

असिस्टेंट कमांडेंट राजू वाघ बताते हैं कि शुरुआत में तो बच्चे-बूढ़े सभी सुरक्षाबलों को देखते ही भाग जाते थे, होस्टलिटी अभी भी है, लेकिन पहले से बहुत कम.

राजू वाघ कहते हैं कि कैंप स्थापित करने में भी फ़ोर्स को दिक्क़तों का सामना करना पड़ा था.

वे बताते हैं, "साल 2022 में जब कैंप लग रहा था तो बहुत सारी दिक़्क़तें थीं. चांदामेटा नक्सलों के गढ़ के रूप में जाना जाता था. आईडी ब्लास्ट हुआ जिसमें एक जवान की क्षति हुई थी. उसके बाद लगातार आईईडी रिकवर होता रहा."

नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर

कभी यहां नक्सली कॉडर का प्रशिक्षण होता था

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छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमा पर बसे चांदामेटा में सुरक्षा बलों के अनुसार कभी नक्सलियों के मिलिट्री विंग पिपुल्स लिब्रेशन गुरिल्ला आर्मी (पीजीएलए) का ट्रेनिंग ग्राउंड हुआ करता था.

गाँव के भीतर जा रही कोलतार की सड़क को छोड़ बाईं तरफ़ होते ही घने जंगलों का सिलसिला शुरू हो जाता है.

उसी में आगे जाते ही दाहिनी तरफ़ है पत्थरों को जोड़कर बनाया गया (नक्सलियों का) एक 'शहीद' स्मारक.

उसी के सामने साल के पेड़ों को काटकर मैदान तैयार कर दिया गया है. कहा जाता है कि यहाँ दूसरे इलाक़ों से नक्सली गुरिल्ला युद्ध के प्रशिक्षण के लिए लाए जाते थे.

ज़िला मुख्यालय जगलदपुर से 65 किलोमीटर दूर बसे गाँव के रास्ते में नक्सिलयों के मौजूद होने के निशान जगह-जगह दिख जाते हैं. बारूद लगाकर उड़ाए गए स्कूल भवन, वन विभाग के स्टाफ़्स क्वॉर्टर्स.

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सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होने की वजह से इस बार हम लगभग 40 गाँवों के अंदर मतदान केंद्र बना रहे हैं. पहले इन्हें गाँवों के बाहर सुरक्षित स्थानों पर शिफ़्ट कर दिया जाता था.
सुंदरराज पी
पुलिस महानिरीक्षक, बस्तर संभाग

बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी कहते हैं, "बेहतर हुई सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र लगभग 40 गाँवों के मतदान केंद्र गाँवों के भीतर ही बनाए जा रहे हैं."

"पहले इन्हें पास के सुरक्षित स्थानों पर शिफ़्ट कर दिया जाता था. ये इसलिए संभव हो पाया क्योंकि हमने इलाक़े में 65 नए सुरक्षा कैंप्स स्थापित किए हैं जिनकी वजह से गाँव तक सड़क पहुँचाना, स्कूल-अस्पताल बनवा पाना, जैसे काम हो पा रहे हैं."

बस्तर के क़रीब सभी इलाक़ों में सुरक्षा बलों के कैंप अब हर पाँच किलोमीटर की दूरी पर मौजूद हैं.

सुंदरराज पी दावा करते हैं कि बस्तर संभाग के उन इलाक़ों में जो नक्लियों का गढ़ कहे जाते थे, 80 फ़ीसद हिस्से पर अब सुरक्षाबलों का दबदबा है.

नक्सलवाद ही कारण?

भाकपा (माओवादी) की ओर से लगाए गए चुनाव के बहिष्कार का पोस्टर

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चुनाव आयोग ने एक बयान में कहा है कि बस्तर इलाक़े में 126 नए बूथ तैयार कराए गए हैं. हालाँकि इनमें से बहुत सारे ऐसे हैं, जो वोटरों की संख्या बढ़ जाने के कारण तैयार हुए हैं.

लेकिन कई गाँव ऐसे हैं, जो नक्सलियों के दबदबे वाले क्षेत्रों में रहे हैं और जहाँ तक पहुँच पाना चुनाव आयोग के अधिकारियों के लिए संभव नहीं हो पाता था.

इन क्षेत्रों के मतदान केंद्रों को उन गाँवों में शिफ़्ट कर दिया जाता था, जहाँ सुरक्षा व्यवस्था मज़बूत हुआ करती थी.

माओ की विचारधारा से प्रेरित नक्सल संगठन चुनाव प्रक्रिया में यक़ीन नहीं रखते हैं और उसके बहिष्कार का दबाव आम लोगों पर भी रहा है.

कई बार उन्होंने इसके लिए दूसरे रास्ते भी अपनाए हैं.

इस बार भी कई जगहों पर नक्सलियों ने 'छत्तीसगढ़ फ़र्ज़ी विधान सभा चुनाव का बहिष्कार करें' की पर्चियाँ चिपका रखी हैं.

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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समाप्त

बीबीसी की टीम ने सोमवार को जिस मिनपा गाँव का दौरा किया, ठीक उसके दूसरे दिन गाँव जाने वाले रास्ते पर आईईडी ब्लास्ट हुआ.

हालाँकि एक राय ये भी है कि नक्सलवाद के कारण चांदामेटा जैसे गाँवों में मतदान न होने की कहानी अधूरी है.

क्योंकि नक्सलवाद पश्चिम बंगाल के रास्ते आंध्र प्रदेश होते हुए 1980 के दशक में बस्तर पहुँचा, शायद 1984 में. आज़ादी को तब तक 37 साल हो चुके थे.

साल 1950 में लागू हुए भारतीय संविधान ने सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार दिया था. नक्सलियों और पुलिस दोनों को लेकर गाँव में अपनी-अपनी कहानियाँ हैं.

लखमा पोड़ियाम हमसे बातचीत के दौरान हमें अपने भाई मंगलू आयता से मिलवाते हैं, जो पाँच साल जेल काटकर पिछले रविवार ही वापस गाँव लौटे हैं.

वे बताते हैं, "नक्सलाइट बताकर पकड़कर ले गए थे साहिब."

गाँव के स्कूल में पढ़ाने वाले श्याम कवासी बताते हैं कि नक्सली जब 2004 में इस इलाक़े में आए, तो पहले उन्होंने लोगों से कहा कि वो उनका साथ देंगे लेकिन बाद में फिर उनके लिए चावल-सब्ज़ी का जुगाड़ करने से लेकर गश्त पर आई सुरक्षा बलों के टोह लेने का काम ग्रामीणों के सिर आ गया, जिसके कारण उन्हें पुलिस हिंसा का शिकार भी होना पड़ता था.

गाँव से पलायन

श्याम कवासी

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श्याम कवासी बताते हैं कि लोगों का गाँव-बाज़ार तक जाना बिना नक्सलियों के हुक्म के संभव नहीं था.

इन सबसे तंग आकर श्याम और गाँव के दूसरे 100 से अधिक परिवार गाँव छोड़कर चले गए थे. श्याम और उनका परिवार सात सालों के बाद गाँव लौटा है.

हालाँकि गाँव में स्कूल के अलावा पानी और बिजली तक की व्यवस्था हो गई है, लेकिन बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या है.

श्याम कवासी को ही स्कूल में गेस्ट टीचर की नौकरी मिल गई है, जिसका मानदेय पाँच हज़ार रुपए महीना है.

लेकिन तनख़्वाह समय पर नहीं मिलती है, उनके शब्दों में पिछले साल तनख़्वाह के लिए उन्हें हड़ताल करनी पड़ी, फिर भी पूरे पैसे नहीं मिले.

बस्तर में विधानसभा चुनाव का मतदान

विधानसभा चुनाव के मतदान का कार्यक्रम

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बस्तर की 12 और राज्य की दूसरी आठ सीटों को मिलाकर 20 सीटों पर छत्तीसगढ़ में सात नवंबर को मतदान होना है, जिसके मद्देनज़र सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है.

आईजी सुंदरराज कहते हैं कि सीआरपीएफ़, बीएसएफ़, छत्तीसगढ़ स्टेट आर्म्ड पुलिस के अलावा चुनाव आयोग अतिरिक्त सुरक्षा बल मुहैया करवा रहा है.

नक्सलियों और दूसरी तरह की गतिविधियों को सीमित करने के लिए महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा से समन्वय स्थापित किया जा रहा है.

बस्तर संभाग के जिन सात ज़िलों में कई गाँवों में पहली बार मतदान होगा, उनमें मिनपा भी शामिल है.

जगदलपुर से तक़रीबन 180 किलोमीटर दूर बसे सुकमा ज़िले के इस गाँव में लोगों से बातचीत करने की कोशिश के दौरान अहसास होता है कि मतदान केंद्र तैयार करने के निर्णय और लोगों से वाक़ई मतदान करवा लेने की प्रक्रिया के बीच भी एक लंबा फ़ासला है.

ग्रामीणों से पहली बार वोट का पूछने पर या तो वो ख़ामोश रहते हैं या कहते हैं कि मालूम नहीं क्या होगा.

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सुकमा ज़िला और पास के क्षेत्र ताड़मेतला और दरभा घाटी जैसे इलाक़े नक्सली वारदातों के लिए जाने जाते हैं.

ताड़मेतला में नक्सली हमले में सुरक्षा बल के 76 जवानों की मौत हुई थी. कसालपाड़ में 16 तो दरभा घाटी में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा से लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ला नक्सली हमले का शिकार हो गए थे.

मिनपा गाँव पहुँचने के रास्ते में मुख्य सड़क पर ही रात में नक्सलियों ने वोट बायकॉट करने के फ़रमान लगा दिए हैं.

दो दिन पहले अंदरूनी गाँव में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक व्यक्ति के मुताबिक़ नक्सलियों ने गाँव वालों को धमकी दी है कि जो वोट करेगा उसकी उंगली काट दी जाएगी.

गाँव में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता मनीष कुंजाम के अलावा किसी भी दल का उम्मीदवार नहीं आया है, न ही प्रशासन या चुनाव आयोग की ओर से ग्रामीणों के लिए किसी तरह का कोई जागरूकता कार्यक्रम हुआ.

हालाँकि माइक हटते ही ग्रामीणों ने हमसे कहा कि "हम काहे को जान दें, हम तो आजतक नाले का गंदा पानी पीते हैं, प्रशासन उस तक की व्यवस्था हमारे लिए न करवा पाया."

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