छत्तीसगढ़: पुलिस पर फ़ेक एनकाउंटर के आरोप से गरमाई राजनीति

तथाकथित मुठभेड़ के विरोध में ताड़मेटला में धरना देते आदिवासी.

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इमेज कैप्शन, तथाकथित मुठभेड़ के विरोध में ताड़मेटला में धरना देते आदिवासी.
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के ताड़मेटला गांव में सुरक्षाबलों के साथ कथित मुठभेड़ में दो आदिवासियों के मारे जाने का मुद्दा गरमाने लगा है.

एक दर्जन से भी अधिक गांवों के सैकड़ों आदिवासियों ने इस घटना की जांच और घटना के ज़िम्मेदार पुलिसकर्मियों की गिरफ़्तारी की मांग को लेकर ताड़मेटला में धरना शुरु किया है.

पुलिस ने पांच सितंबर को कथित मुठभेड़ में दो संदिग्ध माओवादियों, सोढ़ी कोसा और रवा देवा के मारे जाने का दावा किया था.

लेकिन मृतक के परिजनों और दूसरे ग्रामीणों का कहना है कि दोनों आदिवासियों युवकों का माओवादी संगठन से कोई लेना-देना नहीं था. वे गांव में ही रह कर खेती-बाड़ी करते थे और किराने की दुकान चलाते थे.

परिजनों का कहना है कि सुरक्षाबल के जवानों ने उन्हें थाने के पास से पकड़ा और बाद में उन्हें हिरासत में गोली मार दी.

परिजनों का आरोप है कि परिवार वालों को शवों का अंतिम संस्कार भी नहीं करने दिया गया. पुलिस के जवानों ने ही आठ सितंबर को गांव में शव ला कर, उन्हें जला दिया.

सोमवार को सर्व आदिवासी समाज ने फिर से मामले की न्यायिक जाँच की माँग दुहराई है.

शुक्रवार को बस्तर के हर ज़िला मुख्यालय में आदिवासियों ने धरना प्रदर्शन किया.

पुलिस का आरोपों से इनकार

पूर्व विधायक मनीष कुंजाम.

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लेकिन पुलिस गांव वालों और परिजनों के आरोपों को ग़लत बता रही है.

बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी के अनुसार दोनों संदिग्ध माओवादियों के ख़िलाफ़ कई मामले दर्ज थे.

सुंदरराज ने कहा, ''माओवादियों द्वारा उनके अपने पुराने तौर-तरीके के तहत प्रत्येक मुठभेड़ में मारे जाने वाले मिलिशिया एवं अन्य कैडर्स को निर्दोष ग्रामीण बताते हुए, पुलिस एवं सुरक्षा बल को बदनाम करने और क्षेत्र की जनता को दिग्भ्रमित करने हेतु झूठे तथ्यों का उल्लेख करते हुए प्रचार-प्रसार किया जाता है.''

हालांकि आदिवासी महासभा के नेता और इलाके के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने कहा है कि जिस दिन दोनों युवकों की कथित मुठभेड़ का दावा पुलिस कर रही है, वे उस दिन उसी इलाके में थे और पुलिस ने दिन के साढ़े दस बजे उन्हें उस मुठभेड़ का हवाला देकर जाने से रोका. जबकि वहां कोई मुठभेड़ नहीं चल रही थी और ना ही गोलियों की आवाज़ आ रही थी.

उन्होंने कहा, ''ग्रामीणों का आरोप बहुत साफ़ है कि यह पूरी तरह से फर्जी मुठभेड़ है. उच्च अधिकारियों के निर्देश पर इनकी हत्या की गई है. निर्दोष ग्रामीणों को मार कर सरकार भय का वातावरण बना रही है. इस मामले की उच्च स्तरीय जांच ज़रूरी है.''

इस बीच राज्य के उद्योग मंत्री और इलाके के विधायक कवासी लखमा ने पत्रकारों से कहा कि पुलिस इसे माओवादियों का मुठभेड़ बता रही है और गांव वालों का कहना है कि मारे गए ग्रामीण निर्दोष हैं.

कवासी लखमा ने कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री ने तत्काल मामले की दंडाधिकारी जांच की घोषणा की है.

कवासी लखमा ने कहा, "मैंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को इसकी जानकारी दी है. मैंने मांग की है कि मेरे क्षेत्र का मामला है...दोनों तरफ़ से बातें आ रही हैं. वास्तव में क्या है, इसकी जांच की जानी चाहिए."

हिंसा प्रभावित इलाका

सोढ़ी कोसा की मां.

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इमेज कैप्शन, कथित मुठभेड़ में मारे गए सोढ़ी कोसा की मां.

ताड़मेटला वही इलाका है, जहां छह अप्रैल 2010 को संदिग्ध माओवादियों के हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे.

इसके अगले साल 11 मार्च 2011 को ताड़मेटला और पड़ोसी गांवों में आदिवासियों के 250 घरों को आग लगा दी गई थी. इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है.

कथित मुठभेड़ में मारे गए सोढ़ी कोसा की पत्नी का कहना है कि इसी साल जून में माओवादियों ने जन अदालत लगा कर उनके सगे भाई को मार डाला था. अब पुलिस ने उनके पति को माओवादी बता कर मार डाला.

सोढ़ी कोसा के भाई सोढ़ी भीमा का कहना है कि उनके भाई तो अपने ट्रैक्टर के लिए लगातार शहर जाते थे. रास्ते में पड़ने वाले दर्जन भर पुलिस कैंप में उसकी आमद दर्ज होती थी.

सोढ़ी भीमा के अनुसार उनके भाई और रवा देवा चार सितंबर की सुबह एक रिश्तेदार के गांव गए थे.

सोढ़ी भीमा का कहना है कि गांव के सभी लोगों ने तीन-चार फायरिंग की आवाज़ सुनी थी. लेकिन हमलोग आश्वस्त थे कि मेरा भाई और रवा देवा तो रिश्तेदार के पास गए हैं. लेकिन अगली सुबह वाट्सऐप पर कथित मुठभेड़ की ख़बर और फोटो मिली तो उन्हें घटना की जानकारी हुई.

अंतिम संस्कार भी ना करने देने का आरोप

कथित मुठभेड़ में मारे गए रवा देवा की दुकान.

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इमेज कैप्शन, कथित मुठभेड़ में मारे गए रवा देवा की दुकान.

सोढ़ी भीमा कहते हैं, ''हमारा परिवार उनका शव लेने के लिए सुकमा जा रहा था तो सुरक्षाबल के जवानों ने हमारे ट्रैक्टर की चाबी छीन ली. फिर अगले दिन तड़के तीन बजे शवों के साथ सबको गांव लाया गया. हम लोगों ने पुलिस वालों से कहा कि आसपास के गांवों में परिजनों को ख़बर देने में देर होगी. "

"इसलिए हमलोग अंतिम संस्कार कल करेंगे लेकिन पुलिस ने जबरदस्ती शवों को डीजल डाल कर जला दिया. गांव के जिन लोगों ने इसका वीडियो बनाने की कोशिश की, उनके मोबाइल फोन छीन लिए गए.''

मारे गए युवकों में से एक, रवा देवा की पत्नी रवा सोनी ने सुकमा ज़िले के पुलिस अधीक्षक को आवेदन दे कर कहा है कि उनके पति को फर्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया है.

रवा सोनी का दावा है कि उनके पति और सोढ़ी कोसा खेती-बाड़ी करते थे, उनके नाम से आधार कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, ट्रैक्टर खरीदने के दस्तावेज़, बैंक से चेकबुक से लेन-देन, दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दुकान चलाने, साप्ताहिक बाज़ार में दुकान लगाने के सारे प्रमाण हैं.

न्यायिक जांच की मांग

कथित मुठभेड़ में मारे गए आदिवासियों के परिजन.

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इमेज कैप्शन, कथित मुठभेड़ में मारे गए आदिवासियों के परिजन.

इन गंभीर आरोपों के बीच सर्व आदिवासी समाज ने पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और सर्व आदिवासी समाज के नेता अरविंद नेताम ने बीबीसी से कहा, "बस्तर में आदिवासियों को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है. पंचायत क़ानूनों का उल्लंघन करके जगह-जगह पुलिस कैंप बना दिए गए हैं और सुरक्षा देने की जगह, आदिवासियों को ही मारा जा रहा है. "

अरविंद नेताम ने पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग करते हुए कहा कि दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज़ कर कार्रवाई की जानी चाहिए.

मानवाधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता बेला भाटिया ने भी पुलिस पर पूरे मामले की लीपापोती का आरोप लगाया है. उन्होने कहा कि इस घटना की जांच के लिए जब वे मूलवासी बचाओ मंच के कार्यकर्ताओं के साथ पीड़ितों के गांव ताड़मेटला जाना चाह रही थीं तो पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया.

बेला भाटिया ने कहा कि पुलिस ने सबूत मिटाने के लिए मृतकों के शव को आनन-फानन में जला दिया.

छत्तीसगढ़ में अगले दो महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में ज़ाहिर है, बस्तर के इलाके में इस तरह की घटनाएं चुनाव में एक बड़ा मुद्दा हो सकती हैं.

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