छत्तीसगढ़ का सुकमा: क्या कभी बदलेंगे हालात?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सुकमा से
छत्तीसगढ़ के सुकमा में हर तरफ सन्नाटा और खौफ पसरा है. जो अब लंबा खिंचता चला जा रहा है.
वजह ये है कि बस्तर में नक्सली हिंसा की जितनी भी बड़ी वारदातें हुई हैं वो इसी इलाके में हुई हैं.
ये वो इलाका है जहां सुरक्षा बलों ने सबसे ज्यादा नुकसान उठाया है. सबसे ज्यादा जवान हताहत हुए हैं.
बात अगर नक्सलियों की हो तो साल 2010 में जब सुकमा के ही ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों की मौत हुई थी तब से लेकर आज तक जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों को नक्सलियों के खिलाफ कभी कोई बड़ी सफलता नहीं मिली.

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नक्सलियों का आत्मसमर्पण
बीते तीन सालों में इस इलाके में कई जगहों पर नक्सलियों के आत्मसमर्पण के कई समारोह आयोजित हुए जिनमें दावा किया गया कि नक्सली विचारधारा से अलग होकर अब मुख्यधारा में जुड़ रहे हैं.
पिछले दो सालों में अनुमान के अनुसार तीन सौ लोगों का ये कहते हुए आत्मसमर्पण कराया गया कि ये नक्सलियों के कैडर थे.
लेकिन, ऐसे कार्यक्रमों में कथित कैडर ने कभी बड़े हथियारों के साथ आत्मसमर्पण नहीं किया.
जिससे ये जानकारी होती है कि जो माओवादियों के छापामार दस्ते हैं, वो अब भी सक्रिय हैं और इस इलाके में अपना दबदबा बनाए रखने में कामयाब भी हैं.
यहां पर बड़े पैमाने पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की भी तैनाती की गई है. अब इन सुरक्षा बलों के जवानों से सड़क निर्माण कार्य की सुरक्षा कराई जा रही है.

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दंतेवाड़ा ज़िला
बीते सोमवार को चिंतागुफा के पास हुए नक्सली हमले के बाद दोरनापाल से लेकर जगरगुंडा तक की सड़क के निर्माण का काम फिलहाल बंद पड़ा है.
अधिकारियों का दावा है कि सुरक्षा बलों को सुदूर जंगलों में चलाए जा रहे कॉम्बिंग ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जा रहा है.
सुकमा का इलाका बीते कई सालों से विकास से दूर है.
जब ये इलाका दंतेवाड़ा ज़िले का हिस्सा था तब भी पिछड़ा हुआ था और अब अलग ज़िला बनने के बाद भी यहां कुछ खास विकास नहीं हुआ है.
केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के लिए एक इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान की घोषणा की.
जिसके तहत विभिन्न योजनाओं के लिए 70 से 80 करोड़ रुपये की राशि नक्सल प्रभावित ज़िलों को मिलती है.

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सरकारी आंकड़ें
लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुकमा के कोंटा ब्लॉक में, जहां चिंतागुफा, जगरगुंडा, काकेरलंका और चिंतलनार जैसे इलाके हैं, जहां पर प्लान की राशि का इस्तेमाल न के बराबर हुआ है.
सिर्फ सुकमा जिले को नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के मद में नौ करोड़ रुपये, मनरेगा के मद में 10 करोड़ रुपये, इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान के तहत 20 करोड़ और विभिन्न अन्य योजनाओं के तहत 10 करोड़ रुपये हर साल आवंटित किए जाते हैं.
कोंटा ब्लॉक में इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान के तहत पिछले चार सालों में सिर्फ छह से सात करोड़ रुपये ही खर्च हो सके और ये आरोप है कि बाकी राशि का इस्तेमाल अधिकारियों के बंगलों और कार्यालयों पर किया गया.
हालांकि, इस रकम को खर्च किए जाने के दिशा निर्देश भी तय हैं.

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सीआरपीएफ़ जवान
लेकिन ये आरोप है कि उसके बाद भी यहां पर तैनात जिलाधिकारियों ने अपने हिसाब से इस राशि को शहर की सड़कों और अपने बंगलों पर खर्च किया.
इस आवंटन के बाद भी पिछले कई सालों से सुकमा से लेकर कोंटा तक की सड़क और दोरनापाल से लेकर जगरगुंडा तक की सड़क बन नहीं सकी है.
सीआरपीएफ के जवानों का इस्तेमाल सड़क के निर्माण कार्यों की सुरक्षा के लिए किया तो जा रहा है लेकिन रणभूमि बन चुके इस इलाके में यहां तैनात होने वाले जवानों पर हमला होने की स्थिति में उन तक मदद वक्त पर नहीं पहुंच पाती है.
इसकी वजह ये है कि ये इलाका अब भी दुर्गम है और यहां तक पहुंच आसान नहीं है.

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सुकमा के हालात
इसके कई उदाहरण भी हैं. कई बार ऐसी घटनाओं की स्थिति में मदद पहुंचने में पांच घंटे तक का वक्त लग गया है.
इस इलाके में सुरक्षा बलों पर हमला नई बात नहीं है लेकिन इस बार नक्सलियों के हमले में 25 जवानों की मौत हुई है.
और इस इलाके की स्थिति एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस का मुद्दा बन गई है.
लेकिन क्या इस बार बहस से कोई ऐसा नतीजा निकलेगा जिससे सुकमा की स्थित बदल सके. यहां की मुख्य चिंता फिलहाल यही है.
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