छत्तीसगढ़ में दो चरणों का मतदान और कांग्रेस-बीजेपी के दावे पर सवाल

बस्तर

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    • Author, आलोक पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

क्या छत्तीसगढ़ में माओवादियों को हाशिए पर धकेल देने के सरकार के दावे पूरी तरह से सच नहीं हैं?

कम से कम चुनाव की तारीख़ों को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है.

सोमवार को चुनाव आयोग ने जिन पाँच राज्यों में चुनाव की तारीख़ों की घोषणा की है, उनमें 230 सीटों वाले मध्यप्रदेश, 200 सीटों वाले राजस्थान, 119 सीटों वाले तेलंगाना और 40 सीटों वाले मिज़ोरम में एक ही चरण में मतदान होंगे.

लेकिन 90 सीटों वाला छत्तीसगढ़ अकेला ऐसा राज्य है, जहाँ दो चरणों में मतदान होंगे. पहले चरण में राज्य की उन 20 सीटों पर 7 नवंबर को मतदान होंगे, जो माओवाद प्रभावित हैं.

2018 के चुनाव में भी पहले चरण में 18 सीटों पर चुनाव कराए गए थे. लेकिन इस बार पहले चरण में जिन सीटों पर चुनाव होने वाले हैं, उनकी संख्या में और बढ़ोत्तरी हो गई है.

आम तौर पर माओवाद प्रभावित संवेदनशील इलाक़ों में अब तक बस्तर और अविभाजित राजनांदगांव के इलाक़े ही शामिल रहते थे.

लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने इन ज़िलों में कबीरधाम को भी शामिल कर लिया है.

राज्य के गृह विभाग के आँकड़े बताते हैं कि कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में 1 जनवरी 2019 से इस साल 15 जून तक के साढ़े चार सालों में राज्य में माओवादी हिंसा की 1302 घटनाएँ हुई हैं.

इन हिंसक घटनाओं में माओवादियों के हमले में सुरक्षाबलों के 139 जवान मारे गए हैं.

तो क्या माओवादियों पर पूरी तरह से काबू पाने का सरकारी दावा, धरातल पर सच नहीं?

सुकमा में प्रदर्शन

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छत्तीसगढ़ की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रीना बाबासाहेब कंगाले का कहना है कि पिछले चुनाव में ‘क्रिटिकल पोलिंग स्टेशनों’ की संख्या लगभग चार हज़ार थी लेकिन इस बार पिछली बार की तुलना में इनकी संख्या ज़रूर कम हुई है

रीना बाबासाहेब कंगाले ने कहा, “वहाँ क़ानून व्यवस्था या सुरक्षा की स्थिति है, वो आने समय में देखने की बात है. और वहाँ पर एक तो सबसे पहले केंद्रीय बलों की तैनाती तो होगी ही होगी, उसके साथ-साथ लाइव वेब कॉस्टिंग की भी सुविधा, इस बार पहली बार रहेगी. यानी हमारे जो नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं, वहाँ के भी जो क्रिटिकल पोलिंग स्टेशन हैं, वहाँ से भी लाइव वेबकॉस्टिंग की सुविधा बनी रहेगी.”

रीना बाबासाहेब कंगाले का दावा है कि 2018 के जो चुनाव हुए थे, उसमें लगभग 160 मतदान दलों को और सुरक्षाकर्मियों समेत 900 लोगों को चुनाव संपन्न करने के लिए हेलिकॉप्टर से भेजना पड़ा था. अब ये आँकड़ा बहुत कम हो गया है.

उन्होंने कहा, “इस बार ये संख्या बहुत कम रहेगी और इसके लिए भी प्लान किया गया है. बेशक़ यह शून्य तो नहीं है, लेकिन यह संख्या कुछ सौ में ही रहेगी.”

उन्होंने बताया, “संख्या तो घटी है क्रिटिकलिटी की, लेकिन फैलाव बढ़ा है. पर जो एरिया है, जिस हिसाब से सिक्योरिटी असेसमेंट हुआ है, उसको देखते हुए ये कहा जा सकता है, सीटों की संख्या बढ़ी है, पर क्रिटिकल पोलिंग स्टेशनों की संख्या कम हुई है.”

लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला दो चरणों में चुनाव को केंद्र सरकार की साज़िश मानते हैं.

रीना बाबासाहेब कंगाले

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उनका कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हों या सुरक्षाबलों के मुखिया, सभी यह मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में माओवादियों को हमारी सरकार ने पीछे धकेल दिया है.

संसद के भीतर सरकार ने माना है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा में 80 फ़ीसदी की कमी आई है.

सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं, “केंद्र सरकार नहीं चाहती कि देश में यह संदेश जाए कि कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बस्तर में विकास कार्यों का विस्तार किया है और माओवादियों की जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है. बस्तर की बदली हुई तस्वीर को दिखाने से बचने के लिए, जानबूझ कर बस्तर और राज्य के दूसरे हिस्सों में मतदान की तारीख़ें अलग-अलग रखी गईं हैं और दो चरणों में मतदान करवाया जा रहा है. यह केंद्र की सोची-समझी साज़िश है.”

हालाँकि विधायक और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अजय चंद्राकर इन दावों को हास्यास्पद बताते हैं.

अजय चंद्राकर ने बीबीसी से कहा, “बस्तर में विकास आख़िरी साँस ले रहा है. ज़िला खनिज न्यास के भ्रष्टाचार का पैसा माओवादियों तक पहुँच रहा है, इसलिए हिंसक घटनाओं में कमी आई है. कैंप बनाने से लेकर माओवादियों से लड़ने तक का काम, केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं. राज्य सरकार की न कोई नक्सल नीति है और ना ही पुनर्वास की नीति. ऐसे में अपनी ग़लतियों को केंद्र के मत्थे मढ़ना चकित करने वाला है.”

उम्मीदवारों को चेतावनी

नक्सली

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इस साल अगस्त के महीने में ही पुलिस की ओर से माओवाद प्रभावित इलाक़ों में राजनीतिक दलों को दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं.

माओवादियों के चुनाव बहिष्कार की घोषणा के बाद पुलिस ने इन इलाक़ों में चुनाव प्रचार करने वालों को कहा है कि अगर कोई प्रत्याशी चुनाव प्रचार के लिए अंदरूनी इलाक़ों में जा रहा हो, तो उन्हें पुलिस को कम से कम 24 घंटे पहले सूचना देनी होगी.

इसके अलावा बिना जानकारी दिए इन इलाक़ों में जाने की भी मनाही होगी. राजनीतिक कार्यकर्ता और उम्मीदवार जिन इलाक़ों में चुनाव प्रचार के लिए जाएँगे, उसका पूरा खाका पहले से तैयार करके सुरक्षाबलों के साथ साझा करेंगे.

हालाँकि कोंटा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का कहना है कि राज्य सरकार विपक्षी उम्मीदवारों को रोकने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रही है.

मनीष कुंजाम का कहना है कि माओवाद प्रभावित इलाक़ों में एक के बाद एक कैंप खोले गए हैं.

राज्य और केंद्र सरकार दोनों ही दावा करती है कि माओवादियों का ख़ात्मा हो गया है. अगर ऐसा है तो फिर उम्मीदवारों को इन इलाक़ों में जाने से रोका क्यों जा रहा है?

मनीष कुंजाम कहते हैं, "सरकार तय कर ले कि वस्तुस्थिति क्या है? कांग्रेस पार्टी के मंत्री और दूसरे नेताओं को तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था के साथ माओवाद प्रभावित इलाक़ों में जाने दिया जाता है लेकिन हमें माओवादियों का भय दिखा कर प्रचार करने भी जाने नहीं दिया जा रहा है."

मतदान केंद्र ही नहीं

मनीष कुंजाम

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माओवादियों के भय को इस बात से समझा जा सकता है कि माओवाद प्रभावित इलाक़ों में मतदान केंद्र को दूसरी जगह शिफ़्ट कर दिया गया है. यहाँ तक कि जिन गाँवों के आसपास सुरक्षा बलों के कैंप हैं, वहाँ भी मतदान केंद्र नहीं हैं.

सुकमा ज़िले में तो ऐसे मतदान केंद्रों की संख्या काफ़ी है.

पिछले सप्ताह कई पंचायतों के आदिवासी इसके ख़िलाफ़ ज़िला मुख्यालय पहुँचे और उन्होंने अपने गाँव में ही मतदान की मांग करते हुए धरना-प्रदर्शन भी किया.

सुकमा ज़िले के अंतिम छोर पर बसे गोंडेरास के लोगों को मतदान के लिए इस साल कोंड्रे गाँव जाना पड़ेगा.

गाँव के 27 साल के वकील जोगा वंजामी कहते हैं, “हमारे गाँव से मतदान केंद्र की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है, जिसे एक पहाड़ को पार कर जाना होगा. एक तरफ़ तो सरकार मतदान केंद्रों को लोगों के और पास लाने का दावा कर रही है, दूसरी ओर आदिवासियों को मतदान से वंचित किया जा रहा है. हमारे गाँव के आसपास सुरक्षाबलों के तीन-चार कैंप हैं, फिर भी हमारे गाँव में मतदान की सुविधा नहीं होना, दुखद है.”

मारोकी गाँव के सरपंच सविन मरकाम की भी शिकायत है कि नदी और पहाड़ को पार कर इस साल 12-13 किलोमीटर कोर्रा जा कर मतदान करना पड़ेगा.

पड़ोसी ज़िले दंतेवाड़ा के दैनिक अख़बार ‘बस्तर इंपैक्ट’ के संपादक सुरेश महापात्र का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार भले ही नक्सल मोर्चे पर सफलता के दावे करें, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त थोड़ी उलट है.

आँकड़े बताते हैं कि फ़ोर्स के कैंप बहुत सारे बिठाए गए लेकिन ऑपरेशन कितने हुए?

माओवादियों के पास से कितने हथियार बरामद हुए? इन दो सवालों के वाजिब जवाब ना केंद्र सरकार दे सकती है और ना ही राज्य सरकार.

सुरेश महापात्र का कहना है कि ज़मीन पर माओवादी आज भी जन अदालत लगा रहे हैं, वे अपने आयोजन के वीडियो जारी कर रहे हैं, पहले से ज़्यादा तेज़ी से अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, हत्याएँ बंद नहीं हुई हैं.

सुरेश महापात्र ने बीबीसी से कहा, “मैंने दंतेवाड़ा ज़िले के एसपी से पूछा कि कितने मतदान केंद्र शिफ़्ट किए गए हैं? उन्होंने बताया कि पहले 24 पोलिंग बूथों को शिफ़्ट किया गया था, अब 11 पोलिंग बूथों को शिफ़्ट किया गया है. इनमें से किसी भी बूथ में मतदान के लिए प्रचार अभियान नहीं चलाया गया है.”

सुरेश के अनुसार, “नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बस्तर की मतदान वाली चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है. जिस दिन यह चुनौती समाप्त मान ली जाएगी तो माना जाना चाहिए कि अब माओवादी पीछे हट गए हैं.”

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