छत्तीसगढ़: बीजापुर नक्सली हमले में सुरक्षाबलों से कहां चूक हुई थी?

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"भारत में इस समय कुल नक्सल प्रभावित ज़िलों की तादाद महज़ 41 रह गई है जो एक वक़्त 223 ज़िलों में मौजूद हुआ करता था इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि नक्सलवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में कामयाबी हासिल नहीं हो रही है."

"कभी 20 राज्यों में फैला नक्सलवाद अब नौ राज्यों में ही मौजूद है और उसमें भी अगर गंभीर रूप से नक्सल-प्रभावित इलाक़ों की बात करें तो ये तीन ज़िलों में ही सीमित है."

दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर अजय साहनी ने बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से ये आंकड़े उस सवाल के जवाब में पेश किए जिसमें पूछा गया था कि क्या सरकार की नक्सलवाद से लड़ाई के लिए कोई ठोस पॉलिसी है और उसमें किस हद तक कामयाबी या नाकामी हासिल हो पाई है?

अजय साहनी हालांकि ये मानते हैं कि बीजापुर नक्सली हमले में पहली नज़र में ये लगता है कि जवानों ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर (एसओपी) को नज़रअंदाज़ किया था.

माओवादियों के इस हमले में 22 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी.

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उनका कहना है कि जिस तरह से जवानों के शव घटना के बाद पास-पास पाए गए, उससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वो फैलाव में चलने के दिशा-निर्देश का पालन नहीं कर रहे थे.

पूरी बात हालांकि उनके मुताबिक़ जांच के बाद ही सामने आ पाएगी लेकिन ऑपरेशन के दौरान अधिकतर सुरक्षाकर्मियों की मौतों के पीछे एसओपी का उल्लंघन एक बड़ा कारण रहा है.

ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी?

'इंटेलिजेंस फेलियर,' यानी ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी की बात को भी सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी सही नहीं मानते हैं, और कहते हैं कि इस तरह के मामलों में हमेशा एक पैमाना काम नहीं कर सकता.

वीडियो कैप्शन, सीआरपीएफ़ जवान ने बताई नक्सली हमले की आपबीती

ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी का मुद्दा हमले के बाद कई ओर से उठा था, जिसके बाद सीआरपीएफ़ के प्रमुख कुलदीप सिंह ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा था कि इस मामले में अगर किसी तरह का कोई इंटेलिजेंस फेलियर होता तो नक्सलियों को उस तरह का जान का नुक़सान नहीं होता जैसा हुआ है.

एनडीटीवी को दिए गए एक इंटरव्यू में हमले में घायल एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया था कि जब वो तीन अप्रैल के ऑपरेशन से वापस आ रहे थे तो उन पर घात लगाकर हमला हुआ, और लगता है कि माओवादियों को उनके मूवमेंट की ख़बर थी.

घटनास्थल

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सुरक्षाबल माओवादियों की पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के बटालियन कमांडर हिड़मा को तुर्रम के आसपास के जंगलों में खोजने निकले थे.

वापसी में नक्सल विद्रोहियों ने सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाया था जिसमें 22 जवानों की मौत हुई थी और 30 जवान घायल हुए थे. वहीं एक जवान को बंधक बना लिया गया था जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

राहुल गांधी का निशाना

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने माओवादियों के ख़िलाफ़ इसे 'एक कच्चे तरीक़े से बनाई गई योजना' बताया था और कहा था कि 'इसे बहुत ख़राब तरीके से अमल में लाया गया'.

लेकिन अजय साहनी का मानना है कि इस तरह के लंबे चलने वाले ऑपरेशन में हमेशा एक ही पक्ष को कामयाबी नहीं मिल सकती और कभी-कभी उसे भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

बस्तर

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उनका कहना है कि अगर इंटेलिजेंस की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा करना है तो कश्मीर जैसे इलाक़ों पर भी नज़र डालनी होगी जहां हर दिन ख़ुफ़िया तंत्र की सूचना पर ही ऑपरेशन किये जा रहे हैं और जहां एक समय वहां मौतों की तादाद 4000 हुआ करती थी, अब वो 300-350 पहुंच गई है.

नक्सलवादी हिंसा में भी मौतों की तादाद अब 1100 से घटकर 239 तक आ पहुंची है.

इंस्टिट्यूट ऑफ़ कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट ने नक्सलवाद के फैलाव का जो ग्राफ़ तैयार किया है उसके मुताबिक़ जिन 41 ज़िलों में अब भी यह क़ायम है, उसमें 24 ऐसे हैं जिसमें इसका प्रभाव बस नाम का ही है.

देश के 14 ज़िलों में उसका असर औसत है और सिर्फ़ तीन ज़िले ऐसे बच गए हैं जहां पर गंभीर-रूप से इसकी पैठ है.

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