पीएम मोदी की तारीफ़ करने के बाद छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने मांगी माफ़ी- प्रेस रिव्यू

टीएस सिंहदेव

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आने वाले वक़्त में होने वाले विधानसभा और लोकसभा में बीजेपी से निपटने को लेकर तेलंगाना में हुई कांग्रेस के कार्यसमिति की बैठक में एकता और अनुशासन पर चर्चा हुई.

इस दौरान छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव को पीएम मोदी की तारीफ़ करने के लिए मांफ़ी मांगनी पड़ी.

द हिंदू में छपी एक ख़बर के अनुसार, टीएस सिंहदेव कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य के तौर पर बैठक में शामिल हुए थे. उन्होंने बैठक में शामिल अपने अन्य सहयागियों से कहा कि वो अपने बयान के लिए सभी से माफ़ी चाहते हैं.

उन्होंने कहा कि अपने बयान के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा के टोकने पर पहले ही उनसे मांफ़ी मांग ली है, जिसके बाद उन्होंने अब कार्यसमिति के दूसरे सदस्यों से माफ़ी मांगी है.

अख़बार के अनुसार बैठक में मौजूद एक नेता ने कहा, "पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनसे कहा कि अभी उन्हें पछतावा हो सकता है, लेकिन जो नुक़सान होना था वो हो चुका है. एक उपमुख्यमंत्री और पार्टी के एक वरिष्ठ सदस्य के रूप में लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेंगे."

साथ ही बैठक में खड़गे ने सिंहदेव से जुड़ी घटना का उदाहरण देते हुए को दूसरों को सतर्क रहने की सलाह दी.

पी चिदंम्बरम

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ये मामला गुरुवार का है, जब रायगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने छत्तीसगढ़ के लिए कई विकास योजनाओं की घोषणा की थी.

इस कार्यक्रम में राज्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में टीएस सिंहदेव शामिल थे. उन्होंने "छत्तीसगढ़ को बहुत सारी चीजें देने" के लिए प्रधानमंत्री का धन्यवाद किया था.

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उन्होंने कहा था, "हमने हमेशा केंद्र सरकार के मार्गदर्शन में काम किया है और मैं यह कहने से नहीं चूकना चाहता कि मेरे अनुभव में मुझे कोई भेदभाव महसूस नहीं हुआ… राज्य में, जब हमने केंद्र सरकार से कुछ मांगा तो केंद्र ने कभी भी मदद से इनकार नहीं किया. मेरा मानना है कि आगे चलकर, राज्य सरकार और केंद्र सरकार सभी क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगी और देश और राज्य को आगे ले जाएंगी."

इससे पहले पार्टी ने इस बयान को ये कहकर दरकिनार कर दिया था कि सिंहदेव केवल प्रोटोकॉल का पालन कर रहे थे.

पूर्व वित्त मंत्री रहे पी चिदंम्बरम ने कहा था, "सिंहदेव राजनीति को बीच में लाए बिना, प्रोटोकॉल के तहत अपनी भूमिका निभा रहे थे. वो जिस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे उसमें केंद्र और राज्य सरकार को योजनाएं लॉन्च करनी थीं. इस तरह के कार्यक्रम में ये ज़रूरी था कि वो बीच में राजनीति न करें."

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि "टीएस सिंहदेव प्रधानमंत्री की तरह नहीं हैं जो हर सरकारी कार्यक्रम में दूसरे पर आरोप लगाएं, उन्होंने सरकारी कार्यक्रम में पीएम की आलोचना नहीं की."

मणिपुर में सेना के जवान

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मणिपुर में सेना के एक जवान का अपहरण और हत्या

द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के अनुसार, मणिपुर में सेना के एक जवान को इम्फाल में उनके घर से अगवा कर उनकी हत्या कर दी गई है.

41 साल सेर्तो तांगतांग कॉम डिफेन्स सर्विस कॉर्प्स में थे और मणिपुर के लीमाखोंग में तैनात थे.

वो कोम आदिवासी समुदाय से थे जो यहां की मैतेई और कुकी-ज़ोम समुदाय से अलग है. मणिपुर में बीते कुछ महीनों से मैतेई और कुकी-ज़ोम समुदाय के बीच तनाव है.

अख़बार के अनुसार कथित तौर पर तांगतांग कॉम का 10 साल का बेटा इस घटना का प्रत्यक्षदर्शी है. उनके बेटे ने पुलिस को बताया कि शनिवार को तीन अनजान लोग उनके घर में घुस आए थे.

उन्होंने बंदूक की नोंक पर तांगतांग कॉम को एक सफेद कार में बैठाया और वहां से ले गए. रविवार को उनका शव घर से 14 किलोमीटर दूर कुनिंगतेक गांव के पास मिला.

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तांगतांग कॉम के कज़न पाचुंग कॉम के अनुसार हो सकता है कि उन्हें अगवा करने वाले उन्हें पहले से जानते थे. उन्होंने पहले तांगतांग कॉम को अलग किया और केवल उन्हें को ही उठाकर ले गए.

उन्होंने कहा, "वो कुछ दिन पहले ही लीमाखोंग से घर लौटे थे. वो गेट से घर के भीतर आए और बंदूक की नोंक पर उन्हें लेकर चले गए. ऐसा लग रहा है कि कोई निजी दुश्मनी रही होगी."

आर्मी के प्रवक्ता के अनुसार सेर्तो तांगतांग कॉम को सिर में एक गोली लगी थी. उनके शव की शिनाख्त उनके भाई ने की.

जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी

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'आरएसएस के साथ जुड़े होने का मुझे गर्व है'

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी ने कहा है कि उन्हें एक हिंदू होने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़े होने पर गर्व है.

द हिंदुस्तान टाइम्स की एक ख़बर के अनुसार किताब विमोचन के मौक़े पर उन्होंने कहा कि वामपंथ की विचारधारा का मुक़ाबला करने की ज़रूरत है. इस मौक़े पर मंच पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद थे.

वो लेखक अभिजीत जोग की 'जगाला पोखरनारी दवी वल्वी' (वामपंथी दीमक दुनिया को खोखला कर रहा है) नाम की किताब का विमोचन कर रही थीं. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का पालन किए जाने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, "मुझे अपने हिंदू होने और संघ से जुड़े होने पर गर्व है. वामपंथी प्रोपोगैंडा का मुक़ाबला करने के लिए हमें नैरेटिव की ताकत की ज़रूरत है. वामपंथ से लड़ने के लिए हमें एक काउंटर नैरेटिव बनाने की ज़रूरत है."

इस मौक़े पर उन्होंने पुणे की सिवित्री बाई फुले युनवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर अपने दिनों को याद किया और कहा "मैंने यहां जो चुनौतियां झेली हैं, उनकी बात करूं तो पुणे युनिवर्सिटी में अधिक वामपंथी हैं लेकिन जहां जेएनयू में उन्हें खुले तौर पर देखा जाता है, वहं पुणे युनिवर्सिटी में वो उतना दिखाई नहीं देते."

शांतिश्री धूलिपुड़ी ने कहा, "मुझे मेरे संस्कार आरएसएस से मिले हैं और मुझे गर्व से ये कह सकती हूं कि मैं संघ से हूं और मैं हिंदू हूं. ये कहने में मुझे कोई हिचक नहीं."

उन्होंने कहा कि वामपंथी अपने कल्चरल मार्क्सिज़्म के साथ संस्कृति में कैंसर लेकर आए हैं और इसका मुक़ाबला करने के लिए शक्तिशाली काउंटर की ज़रूरत है.

बकरवाल समुदाय के लोग

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गुज्जर-बकरवाल बोले- मांग पूरी न हुई तो सड़कों पर उतरेंगे

रविवार को जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों ने एक महापंचायत की जिसमें उन्होंने कहा कि अगर सरकार प्रस्तावित अनुसूचित जनजाति (एसटी) संशोधन विधेयक और वन संरक्षण अधिनियम को वापस नहीं लेती है तो वो सड़कों पर उतरेंगे.

द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार रविवार को हुई महापंचायत में समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी अपने जन्मदिन पर उन्हें उपहार दें. वो उनके अधिकारों को न छीनें, और आरक्षण के उनके अधिकार को किसी और न बांटें.

उत्तर प्रदेश से बहुजन समाज पार्टी के लोकसभा सांसद मलूक नागर ने महापंचायत को संबोधित किया. उन्होंने कहा, "देश के 14 करोड़ हिंदू गुज्जर आज जम्मू-कश्मीर के गुज्जरों के साथ हैं. हम प्रधानमंत्री से अनुरोध करते हैं कि वो अपने जन्मदिन पर हमारे समुदाय को उपहार दें. जो हमें दिया गया है कृपया न तो हमसे वो चीज़ छीनें. और न ही इसके साथ कोई छेड़छाड़ करें."

केंद्र की बीजेपी सरकार ने संकेत दिया है कि वो जम्मू-कश्मीर में पहाड़ी समुदाय को जनजाति का दर्जा दे सकती है. गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों का कहना है कि ये "वोट हासिल करने की राजनीति" है और समुदाय के जनजाति आरक्षण को कम करने के उद्देश्य से ये कदम उठाया जा सकता है.

अख़बार लिखता है कि पिछले साल जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का काम पूरा हुआ है जिसके बाद पहली बार एसटी समुदाय के लिए नौ सीटें आरक्षित की गई हैं.

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